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Wednesday, 16 September, 2026
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हत्याएं, बम धमाके और वीरप्पन: कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में फिर क्यों बढ़ा संघर्ष?

कर्नाटक के कावेरी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी में तीन लोगों की गोली मारकर हत्या के बाद बदले की कार्रवाई और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. इससे वीरप्पन के दौर की आशंकाएं फिर से जाग गई हैं.

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हनूर, कर्नाटक: कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के शाग्या में एंटी-पोचिंग कैंप पूरी तरह बर्बाद हो गया है. इसके शीशे टूटे हुए हैं, पाइप उखाड़ दिए गए हैं, सोलर पैनल क्षतिग्रस्त हैं और दरवाजे तोड़ दिए गए हैं. पास में वन अधिकारियों के लिए बनाया गया नया आवास भी तोड़फोड़ का शिकार हुआ है.

पिछले महीने एक ही दिन में आठ एंटी-पोचिंग कैंपों पर हमला किया गया था. इनमें से तीन पर बम से हमला किया गया था.

कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के अंदर एक तरह की जंग चल रही है. वन कर्मचारी अब जंगल के अंदर रात बिताने से डर रहे हैं और अंधेरा होने के बाद गश्त करने से मना कर रहे हैं. ग्रामीणों पर कथित तौर पर सांभर हिरणों को मारने और उनके शव खुले में छोड़ने का आरोप है. इसे वन विभाग को खुली चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है.

यह सैंक्चुअरी कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है और यहां बदले की कार्रवाई का तनाव चल रहा है. 15 अगस्त को वन रक्षकों ने शिकारी होने के शक में तमिल मूल के तीन लोगों को मार दिया था. ग्रामीणों ने कहा कि वे खोए हुए मवेशियों को खोजने वाले डेयरी किसान थे. इसके जवाब में उसी दिन ग्रामीणों ने एंटी-पोचिंग कैंपों पर हमला किया और तीन कैंपों पर जिलेटिन की छड़ों से विस्फोट किया. मारे गए लोगों के लिए न्याय की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों ने चामराजनगर और मैसूर की सड़कों पर प्रदर्शन किया. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने इन हत्याओं की निंदा की है. इससे उस मुठभेड़ को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ गया है, जिसकी जांच अब कर्नाटक CID कर रही है.

अब चिंता यह है कि उस इलाके में कम से कम नाम के लिए मौजूद सुरक्षा व्यवस्था को खत्म करने की कोशिश हो रही है. वन अधिकारी इसकी पहली सुरक्षा पंक्ति हैं और अब उन्हें पुलिस के समर्थन की जरूरत है, क्योंकि यह बहुत, बहुत गंभीर चुनौती है.

प्रवीण भार्गव, संरक्षणवादी

जो बात खास तौर पर चिंता बढ़ाती है, वह यह है कि यही इलाका है जहां कभी वन अधिकारियों ने कावेरी और एमएम हिल्स वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के आसपास कुख्यात शिकारी वीरप्पन के गिरोह से लड़ाई की थी. भारत का सबसे वांछित डाकू, अपहरणकर्ता और तस्कर रहे वीरप्पन ने तीन दशकों में 120 लोगों की हत्या की थी, जिनमें पुलिस और वन अधिकारी भी शामिल थे. 2004 में एक मुठभेड़ में उसकी मौत के साथ उसका आतंक खत्म हुआ. उसे एक ऐसे रॉबिन हुड जैसे व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता था जो ग्रामीणों की रक्षा करता था. आज खतरा अलग है, लेकिन समस्याओं की जड़ वही है. शिकार, अवैध बंदूकें, नाराज स्थानीय समुदाय और लगातार कमजोर होती वन सुरक्षा व्यवस्था उन जंगलों में आपस में टकरा रही हैं, जिनमें एक टाइगर रिजर्व और कर्नाटक के कुछ सबसे अहम वाइल्डलाइफ इलाके शामिल हैं.

शाग्या एंटी-पोचिंग कैंप का एक तोड़फोड़ किया गया कमरा. तीन लोगों को शिकारियों के शक में गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद इस कैंप पर हमला हुआ था | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

इन हत्याओं और उसके बाद हुई जवाबी कार्रवाई ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: जब जंगल के आसपास रहने वाले समुदाय उस विभाग को अपना दुश्मन मानने लगें जो जंगल की रक्षा करता है, तो संरक्षण का क्या होगा? अब विभाग को डर है कि अगर इसे सावधानी से नहीं संभाला गया, तो ये जंगल फिर उसी तरह की संगठित और गुरिल्ला जैसी हिंसा की तरफ जा सकते हैं, जैसी उन्होंने वीरप्पन के दौर में देखी थी.

कर्नाटक के संरक्षणवादी और चार दशकों से ज्यादा समय से इस क्षेत्र में काम कर चुके तथा नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड के पूर्व सदस्य प्रवीण भार्गव ने कहा, “अब चिंता यह है कि उस इलाके में कम से कम नाम के लिए मौजूद सुरक्षा व्यवस्था को खत्म करने की कोशिश हो रही है. वन अधिकारी इसकी पहली सुरक्षा पंक्ति हैं और अब उन्हें पुलिस के समर्थन की जरूरत है, क्योंकि यह बहुत, बहुत गंभीर चुनौती है. अगर इन तत्वों से सख्ती से नहीं निपटा गया, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है.”

जंगल में गए वे लोग

सैंक्चुअरी के बाहर मरियामंगल एक छोटा सा गांव है. गांव के चारों तरफ सूखे खेत हैं. घरों के बाहर गायें बंधी हैं और गांव के बीच में एक ऊंचा चर्च है. यहां दूध का काम कमाई के कुछ भरोसेमंद साधनों में से एक है, और कई किसान नंदिनी डेयरी को दूध बेचते हैं.

50 वर्षीय एंथनी स्वामी भी उनमें से एक थे.

14 अगस्त को स्वामी ने शाम करीब 4 बजे अपनी गायों का दूध निकालने का काम पूरा किया. उनके परिवार के पास 18 मवेशी थे और जब उन्होंने गिनती की तो दो गायें गायब थीं.

उनकी चराई की जमीन सैंक्चुअरी से लगी हुई है और ग्रामीणों का कहना है कि मवेशी कभी-कभी जंगल में चले जाते हैं, जहां तेंदुए और दूसरे जानवर भी घूमते हैं.

उनके पास कोई बंदूक नहीं थी. वे गायों को खोजने गए थे. ऐसा पहली बार हुआ है. तीन परिवार बर्बाद हो गए हैं.

—जॉन पॉल, एंथनी स्वामी के भाई

ग्रामीणों का कहना है कि स्वामी और तीन अन्य लोग गायों को खोजने गए थे. यह तलाश सैंक्चुअरी के अंदर स्वामी और दो अन्य लोगों की मौत के साथ खत्म हुई. यही तुरंत भड़कने वाली घटना थी, जिसने वन रेंजरों और स्थानीय ग्रामीणों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और बढ़ा दिया.

मरियामंगल कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के किनारे स्थित है. यह खेत एंथनी स्वामी का था, जो 15 अगस्त को मारे गए तीन लोगों में से एक थे | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

15 अगस्त की सुबह के शुरुआती घंटों में किसी समय स्वामी और उनके साथ गए दो लोगों, जॉन रोज पीटर और सेबेस्टियन डेविड कुमार, को गोली मार दी गई. चौथे व्यक्ति जोसेफ महिमा दास मामूली चोटों के साथ बच निकले.

स्वामी के भाई जॉन पॉल ने कहा, “उनके पास कोई बंदूक नहीं थी. वे गायों को खोजने गए थे. ऐसा पहली बार हुआ है. तीन परिवार बर्बाद हो गए हैं.”

लेकिन वन विभाग का कहना है कि ये चारों लोग मवेशी चराने वाले नहीं थे जो अपने पशुओं को खोज रहे थे, बल्कि शिकारी थे जो देशी बनी बंदूकों के साथ सैंक्चुअरी में घुसे थे.

जॉन पॉल, एंथनी स्वामी के भाई, जिनकी 15 अगस्त को जंगल में हत्या हुई. उन्होंने कहा कि स्वामी और तीन अन्य लोग ‘बंदूक नहीं, टॉर्च’ लेकर गए थे | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

सैंक्चुअरी के अंदर क्या हुआ?

विभाग के मुताबिक उस रात की घटना 14 अगस्त को रात करीब 8 बजे शुरू हुई, जब वन कर्मचारियों को जानकारी मिली कि कुछ लोग सैंक्चुअरी में घुसे हैं और उनके शिकार करने का शक है.

अंधेरे के कारण बहुत कम दिखाई दे रहा था, लेकिन कर्मचारियों के पास लोगों की हलचल के दो संकेत थे: एक कैमरे में गतिविधि रिकॉर्ड हुई थी और वन कर्मचारियों ने गोलियों की आवाज सुनी थी.

हनूर और शाग्या से एक-एक टीम को रात में गश्त के लिए भेजा गया.

शाग्या का एंटी-पोचिंग कैंप, उसी वन क्षेत्र में जहां 15 अगस्त की गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हुई थी | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के प्रभारी डिप्टी कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स मरिस्वामी के मुताबिक, दो कर्मचारियों ने एक वॉचटावर में जगह ली, जबकि बाकी नीचे इंतजार कर रहे थे.

मरिस्वामी ने कहा कि सुबह करीब 4.30 बजे पांच वन कर्मचारी अपनी गाड़ी से बाहर निकले. दो लोग सड़क पर रुके, जबकि तीन लोग हलचल देखने के लिए पास की पहाड़ी की तरफ गए.

अगर वे मवेशियों को खोजने आए थे, तो हथियार लेकर जंगल के अंदर आठ किलोमीटर जाने की कोई जरूरत नहीं है.

— मरिस्वामी, प्रभारी DCF, कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी

सुबह होने से कुछ समय पहले वन विभाग के एक वॉचर का उस समूह से सामना हुआ.

मरिस्वामी के मुताबिक, उन लोगों ने पहले गोली चलाई और वन कर्मचारियों ने जवाब में गोली चलाई.

उन्होंने कहा, “हमारी तरफ से आत्मरक्षा में तीन राउंड गोलियां चलाई गईं.”

मरिस्वामी को सुबह करीब 5.24 बजे जब इसकी जानकारी मिली, तब उन्होंने कहा कि उनमें से एक व्यक्ति होश में था. उन्होंने कर्मचारियों को उन्हें अस्पताल ले जाने का निर्देश दिया.

मरिस्वामी, हनूर में कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के प्रभारी ACF. उन्होंने कहा कि तीनों लोगों को ‘आत्मरक्षा’ में गोली मारी गई | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

बाद में तीनों की मौत हो गई. विभाग के मुताबिक, उनके शवों को फोरेंसिक जांच के लिए मैसूर ले जाया गया.

वन विभाग का कहना है कि उन लोगों के पास से देशी बनी दो माउजर लोडिंग बंदूकें बरामद हुईं. उनके बैग में बर्तन, खाना, बारूद, सीसे के छर्रे, बॉल बेयरिंग, टॉर्च, गोलियां और चाकू थे.

विभाग ने यह भी कहा कि दो बैग से 34 किलो से ज्यादा जंगली जानवरों का मांस बरामद हुआ. मरिस्वामी ने बताया कि एक बैग में करीब 22 किलो और दूसरे में करीब 11 किलो मांस था.

विभाग के मुताबिक, बंदूकें, गोलियां और मांस शिकार अभियान की ओर इशारा करते हैं.

मरिस्वामी ने कहा, “अगर वे मवेशियों को खोजने आए थे, तो हथियार लेकर जंगल के अंदर आठ किलोमीटर जाने की कोई जरूरत नहीं है.”

उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि मवेशियों को खोजने वाले लोग दिन में वन विभाग से संपर्क करने के बजाय रात में जंगल के अंदर क्यों गए.

शाग्या में वन विभाग की तोड़फोड़ की गई इमारतों में से एक | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

‘वीरप्पन अपनी कला छोड़ गया है’

कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के अंदर का यह संघर्ष उस इलाके के शिकारियों और वन अधिकारियों के बीच संघर्ष के पुराने इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता. रिटायर्ड वन अधिकारी बीके सिंह के लिए इन सीमा वाले जंगलों की चर्चा वीरप्पन के बिना पूरी नहीं हो सकती.

चंदन की लकड़ी का तस्कर और शिकारी वीरप्पन दशकों तक कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा पर इन्हीं जंगलों में सक्रिय रहा. वह अपने पीछे डर और शक का ऐसा माहौल छोड़ गया, जो आज भी सुरक्षा और जंगल की रक्षा को लेकर विभाग के नजरिए में दिखता है.

वीरप्पन के दौर में सिंह कावेरी वन क्षेत्र के कोलेगल में डिप्टी कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स थे.

वीरप्पन अपनी कला छोड़ गया है. वह कला क्या है? जंगली जानवरों को मारो, मारो, उससे पैसा कमाओ और उसी पैसे से जिंदगी चलाओ.

— बीके सिंह, रिटायर्ड वन अधिकारी

उन्होंने कहा, “इस इलाके का ऐसा इतिहास रहा है. वीरप्पन 1980 और 1990 के दशक में वहां सक्रिय था, जब तक कि 2004 में वह मारा नहीं गया.” उन्होंने कहा कि अपने पीछे उसने “अपराध की विरासत” छोड़ी.

उन्होंने कहा, “वीरप्पन अपनी कला छोड़ गया है. वह कला क्या है? जंगली जानवरों को मारो, मारो, उससे पैसा कमाओ और उसी पैसे से जिंदगी चलाओ.”

हालांकि, वीरप्पन की मौत के बाद से इस इलाके में इतने बड़े स्तर की कोई मुठभेड़ नहीं हुई है.

सिंह ने कहा, “एक समय में एक तस्कर या एक शिकारी मारा गया है. मुझे याद नहीं कि कभी एक साथ दो लोग भी मारे गए हों.”

रिटायर्ड वन अधिकारी बीके सिंह, जिन्होंने वीरप्पन के दौर में हनूर-कोलेगल इलाके में काम किया था, ने कहा कि इस इलाके में ‘अपराध की विरासत’ है | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

उनके मुताबिक, मुठभेड़ वाली जगह से बरामद अलग-अलग चीजें—सब्जियां, बिस्किट के पैकेट, खाना बनाने के बर्तन, बंदूकें, चाकू और मांस से भरे दो बोरे—यह संकेत देती हैं कि समूह जंगल में रुकने की तैयारी के साथ आया था और पहले ही जानवरों को मार चुका था.

सिंह ने कहा कि वाइल्डलाइफ का शिकार सिर्फ खाने के लिए नहीं, बल्कि मैसूर और बेंगलुरु में जंगली जानवरों के मांस के अवैध कारोबार के लिए भी किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “यह होता रहा है. मैं कहूंगा कि वन कर्मचारी काफी कमजोर रहे हैं. वे इसका मुकाबला करने में नाकाम रहे हैं.”

हालांकि, वन कर्मचारियों के बीच डर वीरप्पन के उन वर्षों की यादों से भी जुड़ा है, जब वन और पुलिस कर्मचारियों पर हमले होते थे.

फिर भी सिंह वर्तमान संघर्ष को सिर्फ “ग्रामीण बनाम वन विभाग” की कहानी मानने से सावधान करते हैं. विभाग ने दशकों से आदिवासी समुदायों के साथ लंबे समय से संबंध बनाए हैं, जिसमें स्थानीय लोगों को वन वॉचर के तौर पर रोजगार देना भी शामिल है.

उन्होंने कहा, “वन विभाग ने ग्रामीणों के लिए काफी काम किया है, पानी की सप्लाई से लेकर रोजगार तक. वास्तव में, जंगल के कई ऐसे इलाके जो खराब हो गए थे, उन्हें आदिवासियों को फल के बाग लगाने के लिए दिया गया था.”

स्थानीय समर्थन की तुरंत जरूरत

वीरप्पन जैसे खतरे की सारी आशंकाओं को अलग रख दें, तो समस्या सिर्फ एक व्यक्ति की विरासत से कहीं बड़ी है.

चामराजनगर सर्किल की चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स मालती प्रिया के मुताबिक, 15 अगस्त की मुठभेड़ को इस इलाके में शिकार के लंबे इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता.

चामराजनगर का वन क्षेत्र करीब 2 लाख हेक्टेयर में फैला है और जिले की करीब 51 प्रतिशत जमीन पर वन क्षेत्र है. विभाग के पिछले एक दशक के रिकॉर्ड के मुताबिक, इन जंगलों में हथियारों और गोला-बारूद से जुड़ी करीब 66 घटनाएं हुई हैं.

एमएम हिल्स वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी में एक चालू एंटी-पोचिंग कैंप का दृश्य, जो जंगल की आंख और कान की तरह काम करता है | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

मालती प्रिया ने कहा, “मैं यह नहीं कहूंगी कि यह एक अकेली घटना है. यह एक ऐसा ट्रेंड है जो हो रहा है.”

संरक्षणवादी भार्गव ने कहा कि समस्या उन व्यावसायिक नेटवर्क से भी जुड़ी है, जो जंगल तक स्थानीय लोगों की पहुंच सीमित होने के बाद भी अपना काम जारी रख सकते हैं.

हमारा इलाका बहुत खुला हुआ है. मैं हर 10 मीटर की दूरी पर पहरा नहीं दे सकती. वास्तव में यह असंभव है. हम अभी कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं.

— मालती प्रिया, चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स, चामराजनगर सर्किल

कावेरी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी में वन रक्षकों के बीच डर वास्तविक है. कई लोगों का कहना है कि उनकी जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए.

भार्गव ने कहा कि वाइल्डलाइफ की सुरक्षा पूरी तरह तकनीक या समुदाय के साथ संपर्क पर निर्भर नहीं हो सकती. ड्रोन और सेंसर जमीन पर पैदल गश्त, मोबाइल गश्त और एंटी-पोचिंग कैंपों की वर्षों से चली आ रही कई स्तरों वाली व्यवस्था की जगह नहीं ले सकते.

उन्होंने कहा, “हमें जमीन पर लोगों की जरूरत है. वाइल्डलाइफ सबसे ज्यादा अधिकारों से वंचित जीव हैं. उनके पास न आवाज है और न वोट. उनकी रक्षा के लिए लगातार सतर्क रहना ही एकमात्र मंत्र है.”

मालती प्रिया, चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (चामराजनगर सर्किल) | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

वन विभाग को यह पता लगाने के लिए और ज्यादा मुखबिरों की जरूरत है कि जंगल में कौन घुस रहा है, हथियार कहां से आ रहे हैं और शिकार किया गया मांस कहां ले जाया जा रहा है. इसके लिए विभाग को स्थानीय लोगों के साथ काम करना होगा.

मालती प्रिया ने कहा, “हमारा इलाका बहुत खुला हुआ है. मैं हर 10 मीटर की दूरी पर पहरा नहीं दे सकती. वास्तव में यह असंभव है. हम अभी कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं.”

वन विभाग ने अब गश्त मजबूत करने और जंगल में अवैध प्रवेश रोकने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों और एक विशेष बल की मांग की है. साथ ही उसने वन, पुलिस और राजस्व अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल की मांग की है, जिसमें कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा के दोनों तरफ तालमेल भी शामिल है.

संरक्षणवादी प्रवीण भार्गव ने कहा कि वाइल्डलाइफ की सुरक्षा में ज़मीन पर मौजूद लोगों (फील्ड स्टाफ) की जगह ड्रोन नहीं ले सकते | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

दुख और गुस्सा

मरियामंगल में तीन घरों में मातम है. एंथनी स्वामी, जॉन रोज पीटर और सेबेस्टियन डेविड कुमार की नई फ्रेम की गई तस्वीरें दीवारों के पास रखी हैं. तस्वीरों पर ताजे फूलों की माला चढ़ी है और उनके नीचे दीये जल रहे हैं. लेकिन लोगों में गुस्सा भी है.

15 अगस्त की हत्याओं ने वन विभाग के खिलाफ लंबे समय से चली आ रही नाराजगी को और बढ़ा दिया है. गांव के लोगों का कहना है कि कभी-कभी मवेशी जंगल में चले जाते हैं, जबकि तेंदुए और दूसरे जंगली जानवर उनके खेतों में आ जाते हैं और मवेशियों को मार देते हैं. उनका कहना है कि मुआवजा अक्सर पर्याप्त नहीं होता और वन विभाग इस समस्या को दूर करने के लिए बहुत कम करता है.

मरियामंगल में एंथनी स्वामी के घर के बाहर बंधी गायें. वह अपने परिवार में कमाने वाले मुख्य व्यक्ति थे | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

लूर्ड मैरी के लिए, जो एंथनी स्वामी की पत्नी हैं, यह नुकसान दोहरा दुख लेकर आया है. उन्होंने एक ही घटना में अपने पति और अपने भाई सेबेस्टियन डेविड कुमार को खो दिया.

गांव के लोगों का कहना है कि तीनों पुरुष सामान्य तरीके से अपना घर चलाते थे. स्वामी और पीटर किसान थे. कुमार केरल में ड्राइवर का काम करते थे और घर में गृह प्रवेश के कार्यक्रम के लिए वापस आए थे. तीनों अपने-अपने परिवार में मुख्य कमाने वाले थे.

एंथनी स्वामी की माला चढ़ी तस्वीर. उनके परिवार का कहना है कि वह अपनी गायों को ढूंढने के लिए बाहर गए थे, जब उन्हें गोली मारी गई. वन विभाग का कहना है कि वह शिकार करने के लिए जंगल में गए थे | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

जो कुछ जंगल के अंदर हुआ, उसे समझने के लिए परिवार बार-बार एक बात पर लौटते हैं: पोस्टमार्टम रिपोर्ट.

स्वामी और कुमार की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि जानलेवा गोलियां “बहुत पास से” चलाई गई थीं. शुरुआती जांच में घावों से जुड़े सबूत बताते हैं कि गोलियां एक फुट से कम से लेकर करीब दो फुट की दूरी से चलाई गई थीं. इन बातों से वन विभाग के इस दावे पर सवाल उठे हैं कि पुरुषों को आत्मरक्षा में गोली मारी गई थी.

स्वामी के भाई जॉन पॉल ने दावा किया कि उनके भाई के शरीर पर लगी चोटें सरकारी बयान से मेल नहीं खाती थीं.

“हमने देखा कि उसे पीठ में गोली मारी गई थी,” उन्होंने कहा. “वे अंधेरे में रास्ता देखने के लिए सिर्फ टॉर्च लेकर गए थे, बंदूक नहीं.”

पॉल ने कहा कि मुठभेड़ में बचा चौथा व्यक्ति जोसेफ महिमा दास अभी भी बहुत डरा हुआ है और परिवार अब तक उससे सीधे बात नहीं कर पाया है. घटना के बाद सामने आए एक वायरल वीडियो में दास ने कथित तौर पर कहा कि जब गोली चलनी शुरू हुई, तब वह सो रहा था और अब वह डर में रहता है.

प्रदर्शन, ‘मिनी वीरप्पन’ और FIR

गांव वालों को पुरुषों की मौत की जानकारी मिलने के कुछ घंटे बाद, 15 अगस्त को हनूर में प्रदर्शन शुरू हो गए. प्रदर्शनकारी हनूर पुलिस स्टेशन और वन विभाग के कार्यालय के बाहर जमा हुए. अगले दिन कई स्थानीय संगठन भी इसमें शामिल हो गए. प्रदर्शनकारियों ने MM Hills की ओर जाने वाली सड़क को रोकने की कोशिश की और वन विभाग के खिलाफ कार्रवाई की मांग की.

स्थानीय मीडिया की खबरों में दावा किया गया कि प्रदर्शन में कुछ जाने-पहचाने शिकारी भी शामिल थे. इनमें गंगानादोड्डी गोविंदा भी शामिल था, जिसे स्थानीय तौर पर ‘शिकारी गोविंदा’ या ‘मिनी वीरप्पन’ के नाम से भी जाना जाता है.

वन विभाग के कर्मचारियों के लिए बनाए गए नए आवास की टूटी हुई खिड़कियां | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

गोविंदा की मौजूदगी से वन अधिकारियों में चिंता बढ़ गई. वह फिलहाल बाघ के शिकार के एक मामले में जमानत पर बाहर है. प्रदर्शन में उसके आने से विभाग के अंदर शिकार करने वाले नेटवर्क और इस डर को लेकर चिंता बढ़ गई कि शिकारी इस आंदोलन का फायदा उठा सकते हैं.

इन घटनाओं ने राज्य पुलिस और वन विभाग के बीच भी मतभेद पैदा कर दिए हैं.

पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शन में शामिल हर व्यक्ति को भड़काने वाला बताना सही नहीं है.

हनूर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर आनंद मूर्ति ने कहा कि लोग उस इलाके में इसलिए आए थे क्योंकि वे मारे गए लोगों के ही समुदाय से थे. लेकिन उन्होंने कहा कि वह उन्हें प्रदर्शन का नेता या भड़काने वाला नहीं मानते.

“वे भड़काने वाले नहीं हैं. उनका कोई नेतृत्व नहीं है. वे सिर्फ गांव के लोग हैं,” मूर्ति ने कहा. उन्होंने यह भी कहा कि इस इलाके में अवैध हथियारों की समस्या है.

कोल्लेगल में कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के DCF का कार्यालय | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

प्रदर्शनों के कारण पोस्टमार्टम में भी देरी हुई. परिवारों ने शुरुआत में पोस्टमार्टम की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था. उन्होंने मुआवजे और मुठभेड़ में शामिल वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर लिखित भरोसा मांगा था.

हनूर के विधायक एमआर मंजूनाथ ने परिवारों से बात की और आखिरकार उन्हें अपना विरोध वापस लेने के लिए मना लिया. बातचीत में शामिल लोगों के अनुसार, सरकार ने हर परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया. विधायक ने अपनी निजी रकम से 10 लाख रुपये और देने का भरोसा भी दिया. प्रदर्शनकारियों ने परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी और बच्चों की पढ़ाई के लिए सरकारी मदद की भी मांग की.

प्रदर्शन बढ़ने के बाद, कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए. रिपोर्ट 22 अगस्त को जमा की जानी थी, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है.

इस बीच, घटनाओं को लेकर कई FIR दर्ज की गई हैं, मूर्ति ने कहा.

1991 के एक राज्य आदेश के तहत वन अधिकारियों को कार्रवाई के दौरान की गई गोलीबारी के लिए तब तक गिरफ्तारी या मुकदमे से सुरक्षा मिलती है, जब तक मजिस्ट्रेट जांच पूरी नहीं हो जाती. इसके बावजूद, एंथनी स्वामी के परिवार की शिकायत पर हनूर पुलिस ने अज्ञात वन कर्मचारियों के खिलाफ BNS की धारा 103(1) के तहत हत्या का मामला दर्ज किया.

रामापुरा, हनूर और कोल्लेगल ग्रामीण पुलिस स्टेशनों में दर्ज अन्य FIR वन विभाग की संपत्ति पर हमले, हथियारों के इस्तेमाल और अधिकारियों के काम में रुकावट डालने से जुड़ी हैं.

अलग से, वन विभाग ने कथित शिकार को लेकर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धाराओं 2(16)(A), 9, 27 और 31 के तहत Wildlife Offence Report No. 01/2026-27 दर्ज की.

प्रदर्शन बढ़ने के बाद, राज्य सरकार ने मुठभेड़ और इसके बाद वन चौकियों पर हुए हमलों, दोनों की जांच कर्नाटक CID को सौंप दी. अब तक किसी भी वन अधिकारी को गिरफ्तार नहीं किया गया है.

फिर हुए धमाके

सड़क पर हुए प्रदर्शन के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ. कुछ लोग जंगल में घुस गए और वहां एंटी-पोचिंग कैंपों में तोड़फोड़ की, आग लगाई और धमाके किए.

करीब 5,000 लोगों की आबादी वाले गांव शाग्या और उसके आसपास वन विभाग की कई संपत्तियां नष्ट कर दी गईं. यही वह जंगल का इलाका है, जहां 15 अगस्त की सुबह गोली चलने की आवाज सुनी गई थी.

जब दिप्रिंट की टीम वहां पहुंची, तो गांव के किनारे बना एंटी-पोचिंग कैंप पहचान में भी नहीं आ रहा था कि यह कोई काम करने वाली चौकी है. शाग्या में वन विभाग के दो आवासों और एक कार्यालय में भी तोड़फोड़ की गई थी. वन कार्यालय के दरवाजे को बांधकर बंद कर दिया गया था. दरारों से अंदर हुई तबाही दिखाई दे रही थी.

जो पिछली रात हुआ था, उससे वे बहुत परेशान और गुस्से में थे. वे आए और इन दफ्तरों और कमरों को तोड़ दिया और कहने लगे, ‘उन्होंने हमारे लोगों को मार दिया, अब हमें यह करना होगा.’

— शाग्या के एक दर्जी ने कहा, जिसने हमले को देखने का दावा किया

एक दर्जी, जिसने हमले को देखने की बात कही, ने दिप्रिंट को बताया कि हमला करने वाले लोग करीब 2 किलोमीटर दूर मरियामंगल से आए थे.

“जो पिछली रात हुआ था, उससे वे बहुत परेशान और गुस्से में थे. वे आए और इन दफ्तरों और कमरों को तोड़ दिया और कहने लगे, ‘उन्होंने हमारे लोगों को मार दिया, अब हमें यह करना होगा.’ वे स्थानीय लोग नहीं थे, वे सभी तमिल थे,” उन्होंने कहा.

शाग्या गांव में तोड़े गए वन विभाग के कार्यालय के अंदर बिखरी चीजें | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

उस रात बाद में, जिस जगह मांस से भरे बैग मिले थे, वहां पहरा दे रहे वन कर्मचारियों ने कहा कि उन्होंने पास में धमाके सुने. वे फोरेंसिक और डॉग स्क्वॉड का इंतजार कर रहे थे, तभी उन्होंने कुछ लोगों को अपनी ओर आते देखा और वहां से भाग गए.

मारीस्वामी ने कहा कि 15 अगस्त को करीब आठ एंटी-पोचिंग कैंपों पर हमला किया गया. इनमें सोलर पैनल, लाइट, जनरेटर, पाइपलाइन, दरवाजे और खिड़कियां क्षतिग्रस्त हुईं. उन्होंने कहा कि तीन कैंपों पर जिलेटिन की छड़ों से हमला किया गया. जिन कैंपों को निशाना बनाया गया, उनमें मिनचिनहल्ली, भीमेश्वरी, ओलेमराडा हट्टी, बुदिकेरे, बांदाहल्ली और कालिदोड्डी शामिल हैं.

शाग्या में वन विभाग के कार्यालय की क्षतिग्रस्त संपत्ति | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

इसके बाद कैंपों और वन कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए पुलिस सुरक्षा मांगी गई. हमले सिर्फ कैंपों तक सीमित नहीं रहे. काउदाल्ली में वन विभाग की एक गाड़ी पर हमला किया गया और वहां कर्मचारियों के क्वार्टर को भी निशाना बनाया गया. परिसर की सुरक्षा के लिए पुलिस को बुलाया गया.

ये एंटी-पोचिंग कैंप वाइल्डलाइफ को बचाने के लिए बहुत जरूरी हैं. मालती प्रिया ने इन्हें “पूरे सैंक्चुअरी की जीवनरेखा” कहा था. इन्हें जंगल में अलग-अलग जगहों पर बनाया गया है, ताकि कर्मचारी और एंटी-पोचिंग वॉचर उन इलाकों में गश्त कर सकें, जहां मोबाइल नेटवर्क बहुत कम या बिल्कुल नहीं है. वायरलेस संचार और रोज के रजिस्टर से आवाजाही पर नजर रखने में मदद मिलती है.

एक सामान्य कैंप में एक वन रक्षक और एंटी-पोचिंग वॉचर होते हैं. स्थायी वन कर्मचारी पूरे काम की निगरानी करते हैं. कावेरी सैंक्चुअरी में ऐसे करीब 28 कैंप हैं और एमएम हिल्स में 36 और कैंप हैं.

इनमें से कई वॉचर स्थानीय लोग हैं. मालती प्रिया ने कहा कि इससे जंगल के आसपास रहने वाले लोगों और विभाग के बीच संबंध जटिल हो जाते हैं. उन्होंने कहा कि कुछ कर्मचारियों के रिश्तेदार भी शिकार में शामिल हो सकते हैं क्योंकि वे उन्हीं गांवों से आते हैं. फिर भी विभाग सुरक्षा के काम के लिए उन पर निर्भर रहता है.

एमएम हिल्स के अंदर एक एंटी-पोचिंग कैंप में तैनात एक वन रक्षक ने दिप्रिंट को बताया कि ये वॉचर रात में बाहर जाने से डरते हैं. इसके कारण जंगल के कुछ हिस्से बिना निगरानी के रह जाते हैं.

“वॉचर विभाग में सबसे कम पैसे पाने वाले कर्मचारियों में हैं, लेकिन वे ही जंगल के अंदर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं,” वन रक्षक ने कहा. उन्होंने बताया कि वे सैंक्चुअरी के आसपास के गांवों से आते हैं और इस इलाके को बहुत अच्छी तरह जानते हैं.

पहचान को लेकर नया सवाल

जंगल राज्य की सीमा पर खत्म नहीं हो जाता. कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के आसपास के गांव कर्नाटक-तमिलनाडु सीमा के पास हैं. यहां भाषा, परिवार के रिश्ते और रोजी-रोटी दोनों तरफ जुड़ी हुई हैं. कई लोग तमिल बोलने वाले ईसाई हैं और उनकी जिंदगी आसपास के जंगल से जुड़ी है.

“जंगल के पास रहने वाले गांवों में सीमा के उस पार आना-जाना बहुत आम है,” कर्नाटक में ऑल इंडिया किसान सभा के राज्य सचिव टी यशवंत ने कहा. वह प्रदर्शन के समय वहां मौजूद थे और बाद में परिवारों से भी मिले.

टी यशवंत, ऑल इंडिया किसान सभा के कर्नाटक सचिव, ने कहा कि तीनों लोगों की तमिल पहचान का मतलब यह नहीं है कि वे कर्नाटक के बाहर के लोग थे | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

लेकिन गोलीबारी के बाद कर्नाटक के इन तीन निवासियों की तमिल पहचान भी विवाद का हिस्सा बन गई है. तमिलनाडु की TVK, DMK और PMK जैसी पार्टियों ने भी जांच की मांग की है. एक मिली-जुली पहचान अब राजनीतिक आधार पर अलग दिखने लगी है.

जमीन पर लोगों ने बार-बार इस इलाके के तमिलनाडु का हिस्सा रहे इतिहास की बात की. लेकिन उनकी रोज की समस्याएं मवेशियों को चराने, जंगल में जाने और रोजी-रोटी पर लगी पाबंदियों से जुड़ी हैं.

यशवंत ने कहा कि परिवारों की तमिल पहचान को इस बात का सबूत नहीं माना जाना चाहिए कि वे कर्नाटक के बाहर के लोग थे. परिवार दशकों से सीमा के गांवों में रहते और खेती करते आए हैं. उनके बच्चे भी वहीं पैदा हुए और पले-बढ़े हैं.

उन्होंने वन विभाग के तीनों लोगों को शिकारी बताए जाने पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि तीनों के खिलाफ पहले कोई पुलिस या वन विभाग का मामला नहीं था.

“वे किसान और मजदूर थे और अपने गांवों में उनकी इज्जत थी,” उन्होंने कहा. उन्होंने बताया कि स्वामी ने एक NGO के साथ काम किया था, जो गांव के घरों में शौचालय बनाने में मदद करता था.

सीमा के पार पहुंची राजनीति

16 अगस्त को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने तीन तमिल लोगों की हत्या को “चौंकाने वाला और निंदनीय” बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि घटना में इंसानी जान की कोई परवाह नहीं की गई. उन्होंने कर्नाटक वन विभाग पर जिम्मेदार लोगों को बचाने की कोशिश करने का आरोप लगाया और हत्या का मामला दर्ज करने के साथ-साथ साफ और निष्पक्ष जांच की मांग की.

विपक्ष के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी तमिलनाडु सरकार से कर्नाटक के साथ यह मामला उठाने और मेकेदाटु जल-बंटवारे के विवाद के दौरान की तरह “चुप” न रहने की अपील की.

तमिलनाडु के नेताओं की CBI जांच की मांग कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को पसंद नहीं आई.

“यह संघीय व्यवस्था है. किसी भी राज्य को किसी दूसरे राज्य के प्रशासन में दखल नहीं देना चाहिए,” शिवकुमार ने 18 अगस्त को कहा.

डोमिना, सेबेस्टियन कुमार की पत्नी, और उनकी मां उनकी मौत के बाद घर चलाने और उनकी दो छोटी बेटियों की पढ़ाई को लेकर चिंतित हैं | फोटो: वितस्ता कौल | दिप्रिंट

इस विवाद में धार्मिक रंग भी आ गया. 17 अगस्त को बैंगलोर के आर्कबिशप ने हत्याओं की निंदा की और न्यायिक जांच की मांग की. चर्च के बयान में कहा गया कि वह सुरक्षित जंगलों में बिना अनुमति घुसने, शिकार करने या किसी गैरकानूनी काम का समर्थन नहीं करता. लेकिन बयान में कहा गया कि केवल ऐसे आरोपों के आधार पर जान लेने वाली ताकत का इस्तेमाल सही नहीं ठहराया जा सकता.

कर्नाटक विधानसभा में भी गोलीबारी को लेकर तीखी बहस हुई. विपक्ष के नेता BJP विधायक आर अशोक ने 17 अगस्त को आरोप लगाया कि वन अधिकारियों ने पुरुषों को बहुत पास से गोली मारी और सवाल किया कि उन्हें सीने और गर्दन में क्यों गोली मारी गई.

“वन अधिकारियों को आत्मरक्षा का अधिकार है और आम लोगों को भी. उन्हें पैर में गोली मारी जा सकती थी, लेकिन उन्हें सीने और गर्दन में गोली मारी गई,” अशोक ने कहा.

पर्यावरण और वन मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने विधानसभा में वन विभाग के बयान का बचाव किया. उन्होंने कहा कि अधिकारियों ने कथित शिकारियों से पहले आत्मसमर्पण करने को कहा था, जिसके बाद उन्होंने अधिकारियों पर हमला करने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि स्लाइड-एक्शन बंदूक से तीन गोलियां चलाई गई थीं और छर्रे फैल गए, जिससे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चोटें आईं.

इस बीच, हनूर में यशवंत ने कहा कि ऑल इंडिया किसान सभा हर परिवार के लिए 1 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग कर रही है.

सेबेस्टियन डेविड कुमार उन लोगों में से एक थे, जिन्हें उस मनहूस रात वन रक्षकों ने मार दिया था. उनकी पत्नी डोमिना और उनकी 11 और 8 साल की दो बेटियां अब न्याय और मुआवजे का इंतजार कर रही हैं. वह प्रदर्शन में भी शामिल हुईं. उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई के लिए मदद और अपने लिए सरकारी नौकरी की भी मांग की.

अपने छोटे से घर में डोमिना कुमार के परिवार के लोगों से घिरी हुई हैं, लेकिन अब आगे क्या होगा, इसका जवाब अभी नहीं है.

“अगर उन्होंने कुछ गलत किया था, तो उन्हें सजा मिलनी चाहिए थी. लेकिन उन्हें मारना गलत है,” डोमिना ने कहा.

 

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