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Wednesday, 16 September, 2026
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मनुस्मृति पर राहुल का रुख राजनीतिक सोच नहीं, यह बहस संविधान सभा के समय से चली आ रही है

आज मनुस्मृति को लेकर होने वाली बहस से बहुत पहले, संविधान बनाने वालों के बीच भारत की नई कानूनी व्यवस्था में इसकी जगह को लेकर बहस हुई थी. यहां तक कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में तर्क देने के लिए रणनीतिक तरीके से इसका इस्तेमाल किया था.

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नई दिल्ली: 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान अपनाए जाने से दो दिन पहले, समाज सुधारक और कांग्रेस नेता केशवराव जेधे ने देश का नया संविधान बनाने के लिए डॉ. बी.आर. आंबेडकर और उनके साथियों को बधाई दी. लेकिन उन्हें एक चिंता थी.

जेधे ने कहा, “संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने डॉ. आंबेडकर को बधाई देते हुए उन्हें वर्तमान मनु कहा है. मुझे पूरा यकीन है कि वह इस नाम से बुलाया जाना पसंद नहीं करेंगे. मैं जानता हूं कि वह मनु से नफरत करते हैं, जिन्होंने चार जातियां बनाई हैं, जिनमें सबसे निचली जाति अछूतों की है.”

1927 में महाड़ सत्याग्रह के दौरान आंबेडकर द्वारा सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति जलाए जाने की घटना को याद करते हुए जेधे ने कहा कि आंबेडकर ने इसके बजाय ‘भीम स्मृति’ यानी भारत का संविधान बनाया था.

करीब आठ दशक बाद भी मनुस्मृति पर बहस का राजनीतिक असर बना हुआ है. इस साल अगस्त में पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की मनुस्मृति और महिलाओं के अधिकारों पर की गई टिप्पणियों पर बीजेपी के कई नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी.

लोकसभा में विपक्ष के नेता ने “मनुस्मृति वाली सोच” के खिलाफ बात की, छात्रों से “पितृसत्ता को खत्म करने” की अपील की और कहा कि महिलाएं खुद की हैं, न कि अपने पिता, पति या बेटों की. गांधी ने कहा, “मनुस्मृति साफ तौर पर कहती है कि बचपन में एक महिला को अपने पिता के अधीन रहना चाहिए…युवावस्था में वह अपने पति की होती है, जब उसके पति की मृत्यु हो जाती है, तो वह अपने बेटों की होती है. एक महिला को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए…ये शब्द शर्मनाक हैं.”

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी 22 अगस्त, 2026 को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में | AICC
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी 22 अगस्त, 2026 को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में | AICC

इसके जवाब में बीजेपी नेताओं ने मनुस्मृति के दूसरे श्लोकों का हवाला दिया, जिनके बारे में उनका दावा था कि उनमें महिलाओं के सम्मान पर जोर दिया गया है. उन्होंने गांधी पर महिला सशक्तिकरण की आड़ में हिंदू धर्म को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया.

यह राजनीतिक बहस उसी बहस की गूंज है, जो पहले ही संविधान सभा-विधानसभा की बहसों तक पहुंच चुकी थी. हिंदू कोड बिल, समान नागरिक संहिता, अनुसूचित जातियों (SCs) के उत्थान और यहां तक कि बहुविवाह और बहुपति विवाह पर चर्चा के दौरान भी मनुस्मृति और दूसरी स्मृतियों का बार-बार ज़िक्र हुआ.

हालांकि, सदस्यों ने इस ग्रंथ का इस्तेमाल अलग-अलग तरीकों से किया. कुछ सदस्यों ने सुधारों को आगे बढ़ाने या यह दिखाने के लिए इसका रणनीतिक तरीके से हवाला दिया कि वे मनुस्मृति के विपरीत सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. वहीं, कुछ अन्य सदस्यों ने पारंपरिक हिंदू कानून का बचाव करने और हिंदू कोड बिल का विरोध करने के लिए स्मृतियों का हवाला दिया.

पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय के.आर. नारायणन के पूर्व प्रेस सचिव एस.एन. साहू ने दिप्रिंट से कहा, “बहस के दौरान कई सदस्यों ने कहा कि हमें पुराने कानूनों से आगे बढ़ने की ज़रूरत है, जिनसे बहुत सारी समस्याएं पैदा हुईं. इस तरह देखा जाए तो संविधान सभा का नज़रिया काफी प्रगतिशील था.”

इसे समझाने के लिए साहू ने नवंबर 1948 में संविधान सभा के सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक के.एम. मुंशी के उस बयान का हवाला दिया, जो उन्होंने संविधान के मसौदे पर चर्चा के दौरान दिया था. विधानसभा के सामने लंबित हिंदू कानून के मसौदे का जिक्र करते हुए मुंशी ने कहा था कि इसके ज्यादातर प्रावधान मनु और याज्ञवल्क्य के नियमों के खिलाफ होंगे. मुंशी ने कहा था, “लेकिन आखिरकार, हम एक आगे बढ़ता हुआ समाज हैं. हम ऐसी स्थिति में हैं, जहां हमें धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप किए बिना हर संभव तरीके से राष्ट्र को एकजुट और मजबूत करना होगा.”

संविधान को ‘भीम स्मृति’ कहा गया

NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के एडजंक्ट प्रोफेसर और The Foresighted Ambedkar के लेखक अनुराग भास्कर ने कहा कि सदस्यों के अलग-अलग विचार खास तौर पर इस बात में दिखाई देते थे कि वे खुद आंबेडकर को किस नज़र से देखते थे. भास्कर ने कहा, “कुछ शोषक जातियों से आने वाले सदस्यों ने भारत का संविधान बनाने की प्रक्रिया का नेतृत्व करने के लिए डॉ. आंबेडकर की तारीफ की और उन्हें ‘आधुनिक मनु’ कहा. वे दोनों को मुख्य रूप से कानून बनाने वालों के रूप में देखते थे.”

हालांकि, भास्कर ने कहा कि दलित सदस्य “इस तुलना से काफी असहज थे.”

“उनके लिए डॉ. आंबेडकर मनु की विरासत को आगे बढ़ाने वाले नहीं, बल्कि उसे खारिज करने वाले थे. एक सदस्य ने यादगार तरीके से कहा कि ‘मनु के कानून’ की जगह ‘महार का कानून’ आ गया है, जो समानता पर आधारित है. यह डॉ. आंबेडकर की जाति का ज़िक्र था. एक सदस्य ने संविधान को ‘भीम स्मृति’ कहा.”

संविधान सभा के सदस्य | विकिमीडिया कॉमन्स
संविधान सभा के सदस्य | विकिमीडिया कॉमन्स

खास बात यह है कि दलित नेता और सदस्य एच.जे. खांडेकर ने संविधान को ‘महार का कानून’ बताया. उन्होंने मनु के सामाजिक व्यवस्था और देश में अपनाए जा रहे नए कानूनी ढांचे के बीच अंतर बताया.

खांडेकर ने 21 नवंबर 1949 को कहा, “अगर मैं ऐसा कह सकता हूं, तो मैं इस संविधान को महार का कानून कहता हूं, क्योंकि डॉ. आंबेडकर महार हैं. अब जब हम 26 जनवरी 1950 को इस संविधान की शुरुआत करेंगे, तो मनु के कानून की जगह महार का कानून होगा. और मुझे उम्मीद है कि मनु के कानून के विपरीत, जिसके तहत देश में कभी समृद्धि नहीं आई, महार का कानून भारत को वास्तव में स्वर्ग बना देगा.”

संविधान सभा के एक अन्य सदस्य हर गोविंद पंत ने कहा था कि पुराने मनु स्मृति और वर्तमान स्मृति यानी संविधान में “कुछ समानता” है. उन्होंने संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए दिए गए सुरक्षा प्रावधानों की तुलना उस सुरक्षा से की, जो मनुस्मृति में ब्राह्मणों के लिए देने की बात कही गई थी.

उन्होंने कहा कि पुराने समय में ब्राह्मणों के पास कोई संपत्ति नहीं थी और वे अपने लिए सुरक्षा हासिल करना जरूरी नहीं समझते थे, इसलिए मनुस्मृति में उनकी सुरक्षा का प्रावधान किया गया. इसी तरह संविधान में SCs और STs के लिए सुरक्षा के प्रावधान किए गए हैं. पंत ने 24 नवंबर 1949 को, संविधान अपनाए जाने से दो दिन पहले कहा, “उनकी (SCs और STs की) सुरक्षा जरूरी थी, क्योंकि वे अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते थे. इसलिए हम देखते हैं कि पुराने मनुस्मृति और वर्तमान स्मृति में कुछ समानता है.”

पंत ने कहा, “एकमात्र अंतर यह है कि ‘गौ, ब्राह्मण हिताय च’ (गाय और ब्राह्मण की भलाई के लिए) की जगह अब ‘गौ परिगणित हिताय च’ (गाय और अनुसूचित जातियों की भलाई के लिए) है.”

जब महिला अधिकारों के पक्ष में तर्क देने के लिए मनुस्मृति का हवाला दिया

हिंदू कोड बिल को 1955-56 में चार अलग-अलग विधेयकों के रूप में पास किए जाने से पहले इसके कई रूप सामने आए. यह बिल 1947 में पेश किया गया था और 1948 में संविधान सभा की एक प्रवर समिति के पास भेजा गया. इसके बाद इसे फिर से पेश किया गया और 1949 से 1950 के बीच संविधान सभा-विधानसभा में इस पर बहस हुई. बिल के अटक जाने के कारण सितंबर 1951 में आंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया. उस समय के कानून मंत्री ने कहा था कि बिल को “मार दिया गया और दफना दिया गया, बिना किसी के शोक जताए और बिना किसी सम्मान के”.

बिल पर चर्चा के दौरान आंबेडकर ने बड़ी संख्या में स्मृतियों का ज़िक्र किया और कहा कि मनु और याज्ञवल्क्य को सबसे बड़े विद्वानों में माना जाता था. आंबेडकर ने 24 फरवरी 1949 को कहा था, “इसमें कोई शक नहीं है कि जिन दो स्मृतिकारों का मैंने जिक्र किया है—याज्ञवल्क्य और मनु—वे उन 137 लोगों में सबसे ऊपर हैं, जिन्होंने स्मृतियां बनाने की कोशिश की थी.” यह बात उन्होंने मनुस्मृति को लेकर बड़े पैमाने पर किए गए दहन का नेतृत्व करने के 22 साल बाद कही थी.

आंबेडकर ने तर्क दिया कि मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति दोनों में कहा गया था कि बेटी अपने पिता की संपत्ति में एक-चौथाई हिस्से का दावा कर सकती है. उन्होंने कहा, “यह अफसोस की बात है कि किसी न किसी वजह से परंपरा ने उस बात के असर को खत्म कर दिया है, नहीं तो हमारी अपनी स्मृतियों के आधार पर बेटी एक-चौथाई हिस्से की हकदार होती.”

बिल ने स्मृतियों में बताए गए हिस्से से एक कदम आगे बढ़ते हुए बेटी के हिस्से को बेटे के बराबर कर दिया.

बिल का विरोध करने वाले रूढ़िवादी लोगों को जवाब देते हुए आंबेडकर ने मनु का “रणनीतिक” तरीके से ज़िक्र किया था. इस बारे में भास्कर ने दिप्रिंट से कहा, “उनका तर्क सीधा था: अगर वे इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदू कोड बिल शास्त्रों के मुताबिक ही होना चाहिए, तो वे इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि जिन लोगों को वे सबसे ज्यादा मानते थे, वे भी अविवाहित बेटियों को विरासत में कुछ हिस्सा देने का समर्थन करते थे. वे महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करने के लिए परंपरा के कुछ हिस्सों का हवाला नहीं दे सकते थे और उसी परंपरा के उन हिस्सों को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे, जिनसे महिलाओं को फायदा मिलता था.”

भास्कर ने आगे कहा, “डॉ. आंबेडकर शोषक जातियों द्वारा शास्त्रों के चुनिंदा और अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल को सामने ला रहे थे. वह मनुस्मृति को महिलाओं के अधिकारों का स्रोत या आधार नहीं बता रहे थे. न ही वह जाति आधारित, पितृसत्तात्मक और असमान सामाजिक व्यवस्था की अपनी मूल आलोचना से पीछे हट रहे थे, जिसका समर्थन मनुस्मृति करती थी.”

उन्होंने कहा कि जब आंबेडकर ने मनु और याज्ञवल्क्य को सबसे बड़े स्मृतिकार बताया, तो वह सिर्फ “पारंपरिक हिंदू कानून के भीतर उनके सापेक्ष महत्व को स्वीकार कर रहे थे.”

भास्कर ने कहा, “इसका मतलब उनके नियमों को नैतिक रूप से सही मानना नहीं था. यह स्वीकार करना कि किसी ग्रंथ का इतिहास में अधिकार रहा है, यह मानने के बराबर नहीं है कि वह अधिकार न्यायपूर्ण, वैध या सम्मान के योग्य है.”

डॉ. बी.आर. आंबेडकर | विकिमीडिया कॉमन्स
डॉ. बी.आर. आंबेडकर | विकिमीडिया कॉमन्स

इस तरह, महिलाओं को विरासत में हिस्सा देने को परंपरा से हटकर कदम बताने के बजाय, आंबेडकर ने स्मृतियों में दिए गए प्रावधानों का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया कि महिलाओं को इतिहास में ऐसे अधिकार मिले थे, जिन्हें बाद की प्रथाओं ने सीमित कर दिया था.

आंबेडकर ने खुद को “प्रगतिशील रूढ़िवादी” भी बताया था. इसके लिए उन्होंने दार्शनिक एडमंड बर्क के इस विचार का हवाला दिया कि सुधार पुराने संस्थानों की नींव पर होना चाहिए.

बिल के पक्ष में तर्क देते हुए आंबेडकर ने कहा था, “उन्होंने (बर्क ने) कहा था कि जो लोग किसी व्यवस्था को बचाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसमें सुधार करने के लिए तैयार रहना चाहिए और मैं इस सदन से बस इतना कह रहा हूं: अगर आप हिंदू व्यवस्था, हिंदू संस्कृति, हिंदू समाज को बनाए रखना चाहते हैं, तो जहां सुधार की जरूरत है, वहां सुधार करने से न हिचकिचाएं. यह बिल हिंदू व्यवस्था के उन हिस्सों में सुधार के अलावा और कुछ नहीं मांगता, जो लगभग जर्जर हो चुके हैं.”

साहू बताते हैं कि खुद को प्रगतिशील रूढ़िवादी बताकर आंबेडकर का मतलब था कि वह “हिंदू समाज में जो अच्छा है, उसे बनाए रखना चाहते थे और इसलिए उनका उद्देश्य हिंदू समाज में सुधार करना था ताकि उसे बचाए रखा जा सके.”

इसी चर्चा के दौरान एक अन्य सदस्य एच.वी. कामथ ने बताया कि आंबेडकर ने स्मृतियों के कुछ संदर्भ देने का वादा किया था. उन्होंने पूछा, “क्या वह अपना वादा पूरा करेंगे?”

जवाब में आंबेडकर ने कहा कि वह अंत में ऐसा करेंगे. उन्होंने कहा, “मैं कुछ ऐसे ग्रंथों का हवाला देने वाला था, जिनसे पता चलता है कि वे अधिकार जो वेदों ने महिलाओं को दिए थे, उन्हें बाद में स्मृतियों ने ले लिया और कुछ दूसरी स्मृतियों ने उन अधिकारों को वापस देने की कोशिश की. मैं अपने भाषण के दौरान इनका हवाला दूंगा.”

स्मृतियों पर उनकी रणनीतिक निर्भरता उनके उन तर्कों में भी दिखाई दी, जिनमें उन्होंने महिलाओं को संपत्ति के अधिकार देने की बात आगे बढ़ाने के लिए स्त्रीधन का हवाला दिया.

उसी दिन आंबेडकर ने बताया कि महिलाओं को संपत्ति पर पूरा अधिकार देने के खिलाफ तर्क इस सोच पर आधारित थे कि महिलाएं “कमजोर बुद्धि” की होती हैं, “हर तरह के लोगों के प्रभाव में आसानी से आ जाती हैं” और “चालाक पुरुष” महिलाओं को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं कि वे अपने और दूसरों के नुकसान के लिए अपनी संपत्ति को दे दें.

हालांकि, उन्होंने कहा कि “कुछ तरह की संपत्ति, जिसे स्त्रीधन कहा जाता है, उसमें स्मृतियां महिलाओं को पूरा अधिकार देने के लिए तैयार हैं.”

उन्होंने कहा, “इसमें बिल्कुल कोई सवाल नहीं हो सकता कि एक महिला को अपनी स्त्रीधन संपत्ति पर पूरा अधिकार है. वह इसे अपनी इच्छा के मुताबिक किसी भी तरह से दे सकती है. सदन के सामने मेरा तर्क यह है. अगर महिला को अपनी स्त्रीधन संपत्ति को अपनी इच्छा के मुताबिक सबसे अच्छे तरीके से इस्तेमाल करने के लिए भरोसेमंद माना जा सकता है और किसी ने भी मिताक्षरा के इस नियम को खत्म करने के पक्ष में कभी तर्क नहीं दिया है, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी उन विरोधियों पर है, जो कहते हैं कि संपत्ति का दूसरा हिस्सा, यानी विधवा की संपत्ति, जो महिला को विरासत में मिली है, उसकी पूरी तरह अपनी संपत्ति नहीं होनी चाहिए.”

रूढ़िवादी लोगों ने सुधार का विरोध करने के लिए मनुस्मृति का हवाला दिया

हिंदू कोड बिल पर बहस के दूसरे पक्ष के सदस्यों ने भी स्मृतियों के उन्हीं संदर्भों का इस्तेमाल किया. जब आंबेडकर ने 137 स्मृतियों के होने की बात कही और महिलाओं के अधिकारों के समर्थन में मनु और याज्ञवल्क्य का हवाला दिया, तो कुछ सदस्यों ने उनके इन ग्रंथों के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाया.

बहस के दौरान आंबेडकर ने कहा था, “मैं नहीं जानता कि हमारे पुराने ब्राह्मण स्मृतियां लिखने में इतने व्यस्त क्यों रहते थे और अपना समय कुछ और करने में क्यों नहीं लगाते थे. अगर यह मान भी लें कि उस समय यही सबसे ज़रूरी काम था, तो भी यह कहना मुश्किल है.”

इसके जवाब में, एक दिन बाद 25 फरवरी 1949 को महाराष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानी वी.एस. सरवटे, जो आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक रह चुके थे, ने कहा कि आंबेडकर का यह बयान उनके बाकी साफ और समझने में आसान भाषण में “बहुत गैर-ज़रूरी” था.

उन्होंने आगे कहा, “मैं उन्हें याद दिलाना चाहता हूं कि ये 137 स्मृतियां एक साथ नहीं लिखी गई थीं. इन्हें कम से कम 250 साल से ज्यादा समय के दौरान लिखा गया. इस हिसाब से हर स्मृति को लिखने में औसतन करीब 20 साल लगे. यानी हर पीढ़ी के लिए एक, लेकिन…एक साल के दौरान माननीय डॉक्टर ने एक से ज्यादा स्मृतियां तैयार कर दीं. इसलिए उन्हें…ऐसी गैर-जरूरी टिप्पणी करने से बचना चाहिए.”

एक अन्य सदस्य गोकुलभाई दौलतराम भट्ट ने भी स्मृतियों पर आंबेडकर के बयान पर आपत्ति जताई. उन्होंने सवाल किया, “वह (आंबेडकर) कहते हैं, ‘स्मृतियां बनती रहीं. ब्राह्मण लिखते रहे. आखिर उनके पास और क्या काम था?’ आपका विभाग क्या काम करता है? स्मृतियों के लेखकों ने भी बिल्कुल यही काम किया. यह ऐसा विभाग था, जो समय-समय पर कानूनों और नियमों में बदलाव करता था.”

भट्ट ने स्मृतियों और स्मृतिकारों यानी उनके लेखकों की समझदारी के बारे में भी बात की. उन्होंने बताया कि स्मृतिकारों ने कहा था कि अगर किसी महिला को उसका स्त्रीधन नहीं दिया जाता है, तो उसे बेटे के बराबर संपत्ति में हिस्सा दिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, “यह सोचना गलत है कि हमारे स्मृतिकारों ने कुछ भी बिना सोचे-समझे लिखा था. हमारे स्मृतिकार यूजेनिक्स (वंश सुधार विज्ञान) के विज्ञान के बहुत बड़े जानकार थे. वे आम लोग नहीं थे. वे बहुत पढ़े-लिखे और अच्छी जानकारी रखने वाले लोग थे. उन्होंने जो भी सिद्धांत बनाए, वे हर तरह से सही थे और उन्हें पूरी सोच-विचार के बाद बताया गया था.”

भट्ट ने कहा कि उनके फैसले इतने सही थे कि 6, 8, 10 या 12 महीने बाद उनमें कोई बदलाव करना ज़रूरी नहीं माना जाता था.

उन्होंने कहा, “हमारे स्मृतिकार बहुत समझदार और बुद्धिमान थे. उन्होंने जो लिखा है, उसमें बदलाव का सुझाव देने के लिए सैकड़ों साल की गहरी सोच जरूरी है. इसमें कोई शक नहीं कि आप समय के हिसाब से इसमें उचित बदलाव कर सकते हैं, क्योंकि समय-समय पर इन स्मृतियों में बदलाव किए गए हैं, लेकिन हमें पूरी तरह से सोचना होगा कि इन बदलावों को लागू करने से समाज को फायदा होगा या नुकसान.”

सेंट्रल प्रोविंसेज और बरार से संविधान सभा के लिए चुने गए सेठ गोविंद दास के मुताबिक, हिंदू कोड बिल का विरोध करने वाले समूहों में वही लोग शामिल थे, “जो इसी सोच के साथ इस कानून का विरोध कर रहे हैं, जैसी सोच सती प्रथा खत्म करने वाले कानून के समय कुछ विरोधियों ने दिखाई थी, जिस कानून को स्वर्गीय श्री ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए पास करवाया था और जिस कानून को श्री शारदा ने बाल विवाह रोकने के लिए सामने रखा था.”

उन्होंने कहा कि इस समूह का मानना था कि वेदों, शास्त्रों और स्मृतियों में जो लिखा गया है, उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता.

हालांकि, दास ने बताया कि अगर कोई स्मृतियों को पढ़े, तो एक स्मृति में बताए गए नियम दूसरी स्मृति से अलग थे. उन्होंने आंबेडकर की इस बात को दोहराया कि स्मृतियों ने महिलाओं को संपत्ति में एक-चौथाई हिस्से तक विरासत का अधिकार दिया था.

दास ने कहा कि महिलाओं को संपत्ति में विरासत का अधिकार नहीं देना “सबसे बड़ा अन्याय” होगा, लेकिन “विरासत के मामले में कुछ सुधार जरूर किए जाने चाहिए, भले ही मनु और याज्ञवल्क्य के विचार यही क्यों न हों.”

दास का मानना था कि पुराने समय की मातृसत्तात्मक व्यवस्था से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में बदलाव के कारण महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने ससुर की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए.

बहस सिर्फ विरासत तक सीमित नहीं थी

स्मृतियों का ज़िक्र विवाह, समान नागरिक संहिता और इस सवाल पर भी हुई बहस में आया कि व्यक्तिगत कानून किस हद तक धार्मिक परंपराओं पर आधारित रहना चाहिए.

बहुविवाह और बहुपति विवाह की अनुमति देने वाले प्रावधान के पक्ष में तर्क देते हुए, अगर दोनों पति-पत्नी इसके लिए सहमत हों, कामथ ने कहा, “यह हमारे इतिहास—हमारे लंबे और पुराने हिंदू इतिहास की एक दुखद बात या बदलाव रहा है कि आर्य युग के शुरुआती समय, वैदिक, उपनिषद और स्मृति युग में महिलाओं को जो भी अधिकार मिले हुए थे, वे बाद में खत्म हो गए और मध्यकाल में उन्हें लागू नहीं किया गया. मुझे उम्मीद है कि यह कोड ऐसा काम करेगा कि जिन महिलाओं का स्वर्ग अंधकारमय मध्यकाल में खो गया था, उन्हें आधुनिक युग में वह वापस मिल सके.”

के.एम. मुंशी ने भी समान नागरिक संहिता के लिए संविधान में प्रावधान के पक्ष में तर्क देते हुए पुराने ग्रंथों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि अगर पुराने समय की धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या इतनी व्यापक तरीके से की गई थी कि उसमें जीवन का हर हिस्सा शामिल हो गया, तो अब एक सीमा तय करने का समय आ गया है. उन्होंने कहा, “हम उस स्थिति तक पहुंच गए हैं, जब हमें साफ तौर पर कहना होगा कि ये मामले धर्म का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष कानून से जुड़े मामले हैं.”

इसलिए, कुछ सदस्यों ने स्मृतियों और धार्मिक अधिकारियों के बताए नियमों से आगे देखने की बात कही और विवाह और तलाक जैसे व्यक्तिगत मामलों को भी आधुनिक और लोकतांत्रिक कानून से चलाने के पक्ष में तर्क दिया.

मनु और जाति का सवाल

अगर हिंदू कोड बिल की बहस में आंबेडकर ने सुधार के समर्थन में पारंपरिक ग्रंथों का “रणनीतिक” तरीके से इस्तेमाल किया, तो मनुस्मृति का उनका व्यापक विरोध जाति व्यवस्था से उसके संबंध से अलग नहीं था.

भास्कर ने कहा कि आंबेडकर “मनुस्मृति के सबसे कड़े विरोधियों में से एक थे और शायद आधुनिक भारतीय इतिहास में किसी भी व्यक्ति ने उनकी तरह व्यवस्थित तरीके से इसकी आलोचना और चुनौती नहीं दी.”

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “अपने पूरे लेखन में उन्होंने मनुस्मृति को जाति व्यवस्था, छुआछूत और महिलाओं तथा शोषित जातियों पर अत्याचार को सही ठहराने वाले स्रोत के रूप में सामने रखा. उन्होंने ‘जाति का विनाश’ में मनु की कड़ी आलोचना की. उनके नेतृत्व में महाड़ में मनुस्मृति जलाना इस विरोध का सबसे साफ सार्वजनिक उदाहरण था.”

खास बात यह है कि संविधान बनाने वालों के सामने एक बड़ा मुद्दा उन लोगों की स्थिति सुधारना भी था, जिन्हें देश में सदियों से भेदभाव का सामना करना पड़ा था.

27 नवंबर 1947 को वी.आई. मुनीस्वामी ने अनुसूचित जातियों की स्थिति सुधारने और जाति आधारित भेदभाव के लगातार जारी असर को दूर करने के लिए कदम उठाने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव रखा. उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार अगले 10 साल तक हर साल कम से कम 1 करोड़ रुपये खर्च करे, ताकि SCs की स्थिति सुधारी जा सके. इसके लिए उन्हें घर बनाने की ज़मीन और पीने का पानी दिया जाए और प्रांतीय सरकारों की ओर से दी जाने वाली शिक्षा संबंधी सहायता में भी अतिरिक्त मदद दी जाए. दिसंबर 1947 में 1 करोड़ रुपये खर्च करने की तय रकम की जगह “पर्याप्त कदम” उठाने का संशोधन लाया गया और उसे स्वीकार कर लिया गया.

इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान पंजाब के दलित नेता प्रोफेसर यशवंत राय ने कहा कि हिंदू समाज ने हज़ारों सालों से “इन गरीब लोगों को निचली जाति का मानकर उनके साथ व्यवहार किया है और उनके बराबरी के अधिकार छीन लिए हैं.”

उन्होंने कहा, “…मनुस्मृति में साफ तौर पर लिखा है कि पहली तीन श्रेणियां यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य द्विज हैं, चौथी शूद्र है और पांचवीं कोई श्रेणी नहीं है. इसलिए हरिजन चौथे समूह में आते हैं और हिंदू समाज का हिस्सा हैं.”

मनुस्मृति का ज़िक्र करते हुए राय ने शूद्रों के साथ खाना खाने को लेकर उठाए गए सवालों का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा, “भगवान मनु ने कहा है—हमें शूद्रों के हाथ से बना खाना खाना चाहिए, खास तौर पर तब जब शूद्र ने खुले तौर पर अपनी पहचान बताई हो.”

राय ने यह भी कहा कि पुराने समय में जो वर्गीकरण था, वह काम के आधार पर था, न कि किसी व्यक्ति के जन्म के आधार पर. उन्होंने कहा, “यह हमारे लिए शर्म की बात है. इसलिए हम छुआछूत खत्म करके हिंदू समाज से इस बदनामी के दाग को मिटाएंगे. जाति के भेद को खत्म करते हुए हमें आपस में साथ बैठकर खाना खाने की व्यवस्था को फिर से बनाना होगा.”

संशोधनों के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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