लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा 22 अगस्त को पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान महिलाओं से “पितृसत्ता को तोड़ने” और “मनुस्मृति वाली सोच” को नकारने की अपील करने के बाद मनुस्मृति फिर चर्चा में आ गई है. एक हफ्ते बाद उन्होंने हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के भाषण के बाद हुए ‘शुद्धिकरण’ के अनुष्ठान की निंदा करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की. खरगे दलित हैं.
बीजेपी-आरएसएस ने तुरंत उनकी मनुवादी सोच वाली बात को सही साबित कर दिया. जेपी नड्डा की आधे-अधूरे मन से की गई माफी के बावजूद बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने इस समारोह का बचाव और जोर-शोर से किया. एफआईआर भी कानून तोड़ने वालों के खिलाफ नहीं, बल्कि गांधी के खिलाफ दर्ज की गई.
यह सब सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि गांधी ने युवा महिलाओं से अपने भाषण में उस बात को खुलकर कह दिया, जो आमतौर पर खुलकर नहीं कही जाती. उन्होंने महिलाओं के अनुभवों को उस सोच और परंपरा से जोड़ा, जो उनके दबाव और अधीनता को सही ठहराती है.
लोकतंत्र के खिलाफ चुपचाप खड़ा विचार
कानून और नैतिकता पर करीब 2,000 साल पुराना ग्रंथ मनुस्मृति आज भले ही बहुत ज्यादा लोग नहीं पढ़ते हों, लेकिन इसकी ऊंच-नीच वाली सोच हमारे समाज की व्यवस्था को प्रभावित करती है. यह WhatsApp पर ज्ञान देने वाले अंकलों और दबाव बनाने वाले परिवारों की आम सोच जैसी बन गई है. यह इंसानों को जन्म लेते ही एक ऊंच-नीच वाले ढांचे में रखती है और हर वर्ण के लिए अलग नियम और सजा तय करती है. ग्रंथ के अनुसार शूद्र, अतिशूद्र और महिलाएं ‘द्विजों’, यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों की सेवा के लिए पैदा हुए हैं.
इसमें चांडालों (दलितों) को समाज से बाहर रखा गया है और उनकी स्थिति कुत्तों और दूसरे जानवरों के बराबर बताई गई है. उन्हें गांवों के बाहर रहने, मृत लोगों के कपड़े पहनने और शवों को संभालने वाला बताया गया है. एक ब्राह्मण दूसरे द्विजों को गुलाम नहीं बना सकता, लेकिन वह शूद्र को गुलाम बना सकता है, जिसे “सिर्फ ब्राह्मण के लिए गुलामी का काम करने” के लिए पैदा किया गया बताया गया है. इस नियम-कायदे की किताब के जरिए सभी पर नियंत्रण रखा जाता है और नियम तोड़ने पर सज़ा दी जाती है.
इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि जाति विरोधी आंदोलन में यह लंबे समय से एक बड़ा मुद्दा रही है. करीब सौ साल पहले महाड़ सत्याग्रह के दूसरे सम्मेलन में डॉ. बीआर आंबेडकर की मौजूदगी में मनुस्मृति को प्रतीक के तौर पर जलाया गया था.
अगर आज़ाद भारत का संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं इस विचार पर बनी हैं कि सभी भारतीयों की राजनीतिक अहमियत बराबर है, तो मनुस्मृति इसके खिलाफ चुपचाप खड़ा विचार है, जिसके पीछे सदियों की सामाजिक ताकत है. 1949 में आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने कहा था: “भारतीय संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है” और शिकायत की थी कि इसमें मनुस्मृति को नज़रअंदाज़ किया गया है. राजस्थान हाई कोर्ट के बाहर कानून देने वाले मनु की प्रतिमा इस बात की याद दिलाती है कि संविधान चाहे जो वादा करे, यह गहरी सामाजिक व्यवस्था अब भी बनी हुई है.
कुछ दक्षिणपंथी आवाज़ें अब मनुस्मृति के प्रभाव को कम बताने या यह कहने की कोशिश करती हैं कि इसे ‘उस दौर के संदर्भ’ में देखना चाहिए. लेकिन आइए आज के संदर्भ को देखें. आज बोर्डरूम, यूनिवर्सिटी, सेना और सफाई के कामों में कौन-कौन से सामाजिक समूह किस जगह पर हैं? यही वजह है कि जाति जनगणना की संभावना उन्हें इतनी परेशान करती है और मोदी सरकार इसे रोकने की पूरी कोशिश कर रही है. आंकड़े हमारे समाज में ताकत का असली बंटवारा सामने ला देंगे.
महिलाओं की तथाकथित ‘सुरक्षा’
महिलाएं इस सामाजिक व्यवस्था के केंद्र में हैं क्योंकि वे परिवार और वंश को आगे बढ़ाने से जुड़ी हैं. यही वजह है कि मनुस्मृति महिलाओं को बांधकर रखने, उनके ‘चंचल और कामुक’ स्वभाव को नियंत्रित करने और यह सब सुरक्षा के नाम पर करने की एक तरह की नियम-किताब है.
महिलाओं की आज़ादी पूरी सामाजिक व्यवस्था को हिला सकती है और वंश तथा जाति की ‘शुद्धता’ की सोच को बिगाड़ सकती है. यही वजह है कि राहुल गांधी का महिलाओं को दिया गया साधारण संदेश—“आप खुद की हैं” 2026 में भी एक बड़ा और क्रांतिकारी बयान है.
‘अच्छी महिलाओं’ और ‘बदचलन महिलाओं’ के बीच मनुस्मृति का फर्क महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर आने वाली रूढ़िवादी प्रतिक्रियाओं में भी दिखाई देता है. जैसे 2013 के दिल्ली गैंगरेप पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की प्रतिक्रिया. उन्होंने कहा था: “ऐसे अपराध ‘भारत’ में मुश्किल से होते हैं, लेकिन ‘इंडिया’ में अक्सर होते हैं.” इसका मतलब यह निकलता है कि जो महिलाएं पारंपरिक भूमिकाएं नहीं निभातीं या अपनी तय सीमा में रहने से इनकार करती हैं, वे किसी तरह यौन हिंसा को खुद बुलावा देती हैं.
हाल में रक्षाबंधन के एक विज्ञापन में एक अभिनेत्री के कपड़ों को लेकर दक्षिणपंथी लोगों की नाराज़गी को देखिए. मनुस्मृति वाली सोच में एक महिला अपने शरीर के साथ स्वाभाविक रूप से नहीं रह सकती और किसी भी मौके पर अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकती. उसे या तो परिवार की इज्जत का प्रतीक बनना होगा या फिर उसे चरित्रहीन कहकर शर्मिंदा किया जाएगा.
राहुल गांधी ने पुणे में कहा था, “मैं यहां मनुस्मृति का ज़िक्र करना चाहूंगा, जिसमें साफ कहा गया है कि बचपन में महिला पिता के अधीन रहेगी, जवानी में वह पति के अधीन होगी और पति की मौत के बाद बेटों के अधीन होगी. महिला कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती.”
यह मनुस्मृति के श्लोक 5.147, 5.148 और 9.3 का सही सार है (महिलाओं के प्रति इसकी सोच के और उदाहरण यहां देखे जा सकते हैं).
पुणे के कार्यक्रम में बोलने वाली युवा महिलाओं ने बताया कि पढ़ाई, यात्रा या काम के लिए अकेले बाहर निकलने पर उन्हें हिंसा और डर का सामना करना पड़ता है. बीजेपी का इसका जवाब ‘सुरक्षा’ है, जो असल में अधीनता है. यह मनुस्मृति की उसी सोच को दोहराता है कि महिलाओं को हिंसक पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय उनकी ‘रक्षा’ की ज़रूरत है.
याद कीजिए कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुछ समय पहले महिलाओं के बारे में क्या लिखा था: “जिस तरह उर्जा (ऊर्जा) को खुला और बिना नियंत्रण के छोड़ देने से विनाश होता है, उसी तरह महिलाओं को भी आजादी की जरूरत नहीं है; उन्हें सुरक्षा और सही दिशा देने की ज़रूरत है. स्त्री शक्ति की रक्षा बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में बेटा करता है. महिलाओं को स्वतंत्र या आजाद नहीं छोड़ा जा सकता.”
‘भारतीय मूल्य’ और ‘संस्कार’ अक्सर इसी सोच के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द हैं. यह सोच समाज और परंपरा में फैली हुई है और राजनीतिक दायरे के अलग-अलग पक्षों में ऐसे लोग आसानी से मिल जाते हैं, जो इसकी सोच को मानते हैं. सेक्सिज्म भी सिर्फ किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है—पितृसत्ता सभी धर्मों में मौजूद है.
लेकिन कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि बीजेपी-आरएसएस मनुस्मृति की सोच का सबसे साफ रूप है. वीडी सावरकर ने मनुस्मृति को “हिंदू कानून” बताया था और इसे “हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज, विचार और व्यवहार का आधार” कहा था. आरएसएस के दूसरे प्रमुख एमएस गोलवलकर ने मनु को “दुनिया का पहला और सबसे महान कानून देने वाला” बताया था और मनुस्मृति में बताए गए वर्ण व्यवस्था को “हमारे ‘राष्ट्र’ की अवधारणा का सबसे मुख्य हिस्सा” कहा था.
यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवा महिलाओं के गालियां देने पर “सांस्कृतिक झटका” महसूस करते हैं, लेकिन उनकी अपनी आईटी सेल की हरकतें सिर्फ ‘लड़के तो लड़के हैं’ जैसी मानी जाती हैं. यही वजह है कि खड़गे के खिलाफ साफ तौर पर जातिवादी काम होने पर बीजेपी की पहली प्रतिक्रिया ऐसा करने वालों का बचाव करना होती है. बीजेपी-आरएसएस असल में संवैधानिक समानता के खिलाफ प्रतिक्रिया देने वाली ताकत है. वहीं, मनुस्मृति की ओर से तय की गई भूमिकाओं को मानने से इनकार करने वाली महिलाएं, शूद्र और अतिशूद्र, और लोकतंत्र की परवाह करने वाले सभी लोग उन्हें अपने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई दे रहे हैं.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. उनका एक्स हैंडल @dubeyamitabh है. यह लेखक के निजी विचार हैं.
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