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Wednesday, 26 August, 2026
होममत-विमतराहुल गांधी मनुस्मृति और पितृसत्ता को चुनौती दे रहे हैं. यह एक नई राजनीतिक भाषा है

राहुल गांधी मनुस्मृति और पितृसत्ता को चुनौती दे रहे हैं. यह एक नई राजनीतिक भाषा है

राहुल गांधी BJP को एक सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी और हिंदू राष्ट्रवाद को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर बचाव की स्थिति में लाने की कोशिश कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि इसका उन्हें चुनावी फायदा मिलेगा.

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22 अगस्त को ‘छात्रों की गूंज’ नाम के एक छात्र संपर्क कार्यक्रम के दौरान पुणे में बड़ी संख्या में जुटी युवा महिलाओं को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि भारत में एक “आदर्श नारी” को “तीन खानों में डाल दिया जाता है.” उसे सिर्फ “बेटी, पत्नी या मां” के रूप में देखा जाता है. गांधी ने आगे कहा कि “इनमें से किसी एक के रूप में देखे जाने में कोई गलत बात नहीं है, लेकिन यही आपकी एकमात्र पहचान नहीं हो सकती.”

कई महिलाएं शानदार प्रोफेशनल हैं, जिनकी महत्वाकांक्षाएं और सपने इन पारंपरिक भूमिकाओं से आगे हैं, लेकिन अपने प्रोफेशनल लक्ष्यों को हासिल करने की उनकी कोशिश अक्सर उन रुकावटों से भरी होती है, जो भारतीय समाज और उसे चलाने वाली सोच उनके सामने खड़ी करती है. इन रुकावटों और इस सोच के खिलाफ लड़ना और उन्हें दूर करना जरूरी है. महिला दर्शकों की जोरदार तालियों के बीच गांधी का आखिरी संदेश था: “पिंजरा तोड़ो”, “पितृसत्ता को खत्म करो.”

अब तक, इस तरह की बातें और तर्क दुनिया भर में अकादमिक सेमिनारों और कॉन्फ्रेंस में लगातार सुनने को मिलते रहे हैं. लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, पहली बार इन्हें भारत की मुख्यधारा की राजनीति में लाया गया है.

राहुल गांधी का नया कदम

अकादमिक और राजनीतिक मुख्यधारा अक्सर सामाजिक और राजनीतिक जीवन के दो अलग-अलग हिस्से होते हैं. अमेरिका की Ivy League यूनिवर्सिटीज में MAGA की सोच का बहुत कम या बिल्कुल असर दिखाई नहीं देता. भारत में जेएनयू को भी अक्सर एक अलग दुनिया माना गया है. केरल या पश्चिम बंगाल (जब राज्य में सीपीएम की सरकार थी) को छोड़ दें तो जेएनयू की प्रमुख राजनीतिक संस्कृति का राष्ट्रीय मुख्यधारा से बहुत कम मेल रहा है. दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (और सोशियोलॉजी) का रिकॉर्ड भी कुछ ऐसा ही रहा है—मुख्यधारा की राजनीति में उसकी भूमिका शायद ही कभी उसकी बौद्धिक चमक के बराबर रही हो.

इसलिए राहुल गांधी का पितृसत्ता के खिलाफ कदम नया और अलग है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि “पितृसत्ता को खत्म करो” की अपील को ऊपर से थोपी गई कोई बौद्धिक बात न माना जाए, जिसका महिलाओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कोई लेना-देना नहीं है, पुणे में गांधी का बात रखने का तरीका काफी अलग था. उन्होंने इसे किसी यूनिवर्सिटी की ऊंची अकादमिक दुनिया से सीधे निकले राजनीतिक भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक बड़े जन कार्यक्रम की तरह पेश किया.

मंच पर कई युवा महिलाओं को बुलाया गया था. इनमें लगभग सभी छात्राएं या हाल ही में पढ़ाई पूरी करने वाली युवा महिलाएं थीं. उन्होंने अपनी पढ़ाई और दूसरे लक्ष्यों के बारे में बताया और उन रुकावटों के बारे में भी बताया, जिनका उन्हें सामना करना पड़ा. इनमें शहर और गांव, दोनों जगहों से आई महिलाएं थीं. कुछ अंग्रेज़ी अच्छी तरह बोल रही थीं, कुछ हिंदी में और कुछ मराठी में. कुछ ऊपरी-मध्यम वर्ग के परिवारों से थीं; एक आदिवासी महिला थीं और दूसरी महाराष्ट्र के एक छोटे शहर के एक सफाई कर्मचारी की बेटी थीं. सफाई कर्मी की बेटी ने दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पढ़ाई की थी और पत्रकार बनना चाहती हैं, लेकिन उन्हें बार-बार कहा जाता है कि उनके जैसी लड़की या तो पत्रकार नहीं बन सकती या उन्हें पत्रकार नहीं बनना चाहिए—बल्कि उन्हें शादी के बारे में सोचना चाहिए.

सभी महिलाओं ने अपनी बात इस तरह रखी कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पितृसत्ता के बुरे असर को समझा जा सके. उन्होंने बताया कि गांव से बाहर के स्कूलों में जाना कितना मुश्किल था; सार्वजनिक परिवहन कितना असुरक्षित था, चाहे बसें भरी हों या खाली; सोशल मीडिया का इस्तेमाल उन्हें शर्मिंदा करने और दबाव बनाने के लिए कैसे किया जाता था, सिर्फ लिखकर ट्रोल करने के जरिए नहीं, बल्कि तस्वीरों और वीडियो के साथ छेड़छाड़ करके भी; महिला वकीलों को कमतर मानने वाली सोच के कारण कानूनी मामले योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि लिंग के आधार पर दिए जाते थे; कैसे नागरिक के तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल करने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी जाती थी, और यह कहा जात्ता था ही महिलाओं को अभिव्यक्ति इतनी स्वतंत्रत नहीं दी जा सकती.

इस कार्यक्रम का मकसद सिर्फ किसी विचार को उदाहरणों के जरिए समझाना नहीं था. इस पूरी कवायद का मकसद गहराई से राजनीतिक था. पश्चिम बंगाल में जीत के बाद बीजेपी का राजनीतिक प्रभाव बहुत तेजी से बढ़ गया था. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन, खासकर जंतर-मंतर का प्रदर्शन, ने राष्ट्रीय राजनीतिक बहस पर बीजेपी के नियंत्रण को तोड़ दिया.

इस राजनीतिक मौके का फायदा उठाते हुए राहुल गांधी राजनीतिक बहस में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. वह बीजेपी को एक सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी और हिंदू राष्ट्रवाद को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर बचाव की स्थिति में लाना चाहते हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि इससे उन्हें चुनावी फायदा मिलेगा. 2027 में कई विधानसभा चुनाव होने हैं. वह छात्रों और अब शायद महिलाओं को भी महत्वपूर्ण वोटर समूह के तौर पर ध्यान में रख रहे हैं.

‘मनुस्मृति की सोच’ पर हमला

पुणे के कार्यक्रम में दो आपस में जुड़े मामलों से इस राजनीतिक कोशिश को कुछ और साफ दिखाया गया. उनका पहला राजनीतिक हमला मनुस्मृति पर था. यह एक हिंदू ग्रंथ है, जिसका बीजेपी अक्सर और आरएसएस पारंपरिक रूप से समर्थन करता रहा है. यह वही ग्रंथ है, जिसे BR अंबेडकर घोर नापसंद करते थे और कांग्रेस पार्टी आम तौर पर इस मुद्दे पर चुप रहती थी. राहुल गांधी इस परंपरा से अलग रास्ता अपना रहे हैं.

उन्होंने कहा कि पितृसत्ता की जड़ें मनुस्मृति में हैं. उन्होंने इसकी एक प्रमुख बात का हवाला दिया: “बचपन में महिला को अपने पिता के अधीन रहना चाहिए; युवावस्था में अपने पति के अधीन; और जब उसका पति यानी उसका स्वामी मर जाए, तो अपने बेटों के अधीन; एक महिला को कभी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए.”

उन्होंने इन शब्दों को “शर्मनाक” बताया. उन्होंने जोर देकर कहा कि “आपका अपने पिता के साथ रिश्ता है…अपने पति के साथ रिश्ता है…अपने बेटे के साथ रिश्ता है, लेकिन आप उनकी नहीं हैं, आप सिर्फ अपनी हैं.” इस दौरान भीड़ ने जोरदार प्रतिक्रिया दी.

इसके बाद उन्होंने पितृसत्तात्मक सोच के उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समेत कई लोगों पर अपना हमला केंद्रित किया.

उन्होंने मोदी का वह वीडियो चलाया, जिसमें मोदी ने कहा था कि जंतर-मंतर पर युवा महिलाओं यानी “हमारी बेटियों” ने जिस बेशर्मी से उन्हें गालियां दीं, उससे उन्हें दुख और हैरानी हुई. उन्होंने इस बात को नजरअंदाज किया कि ऐसा युवा पुरुषों ने भी किया था, लेकिन ज़ाहिर तौर पर उससे मोदी को न तो दुख हुआ और न ही हैरानी.

इसलिए राहुल गांधी के मुताबिक, मोदी की सोच है कि पुरुष गालियां दे सकते हैं, लेकिन महिलाएं नहीं दे सकतीं, क्योंकि महिलाओं का ऐसा करना भारतीय संस्कृति की मूल मान्यताओं के खिलाफ है. इसके बाद उन्होंने भागवत के उस बयान को लेकर उनकी आलोचना की, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में (देश के उन हिस्सों में जो अंग्रेजी सोच से प्रभावित और अपनी जड़ों से दूर हैं) बलात्कार होते हैं, भारत में नहीं (समाज के उन हिस्सों में जो असली और अपनी जड़ों से जुड़े हैं). यह साफ तौर पर सच नहीं है. गांधी ने बीजेपी नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ज्यादातर बलात्कारों के लिए महिलाएं ही जिम्मेदार होती हैं, क्योंकि वे किस तरह के कपड़े पहनती हैं और किस तरह बात करती हैं.

आगे चलकर एक बेहद अहम सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक बहस में मिलती हुई बढ़त का चुनावी फायदा मिलेगा. क्या BJP को इससे नुकसान होगा?

काफी हद तक इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि महिला वोटर खुद इस पर कैसी प्रतिक्रिया देती हैं. प्रगतिशील महिलाओं को अक्सर उन ज्यादा पारंपरिक महिलाओं से रुकावट मिली है, जिन्होंने पितृसत्ता को एक ऐतिहासिक सच्चाई मानकर उसे अपने भीतर स्वीकार कर लिया. 2016 में डोनाल्ड ट्रंप की महिलाओं के प्रति खुली और साफ तौर पर भेदभाव वाली और भद्दी सोच के बावजूद, उन्हें युवा महिलाओं की तुलना में उम्रदराज महिलाओं से काफी ज्यादा वोट मिले थे. भारत में क्या उम्रदराज और/या ग्रामीण महिलाएं बीजेपी के खिलाफ वोट करेंगी?

एक और उतना ही, बल्कि शायद इससे भी ज्यादा, अहम चुनावी सवाल यह भी है कि क्या मुख्य राजनीतिक नैरेटिव बदलेगा. बीजेपी चाहेगी कि कोई दूसरा मुद्दा—राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रवाद, विकास, कल्याण—चुनाव करीब आने पर शिक्षा, रोजगार और पितृसत्ता से जुड़े बढ़ते नैरेटिव पर हावी हो जाए. राजनीतिक नैरेटिव अपने आप नहीं बनते, उन्हें बनाया जाता है. लगभग तय है कि बीजेपी राष्ट्रीय नैरेटिव पर अपना दबदबा फिर से बनाने की कोशिश करेगी. क्या वह इसमें सफल होगी?

आने वाले महीनों में इन सवालों के जवाब क्या होंगे, यह भरोसे के साथ कोई नहीं कह सकता. लेकिन अभी की स्थिति में बीजेपी का नैरेटिव पर दबदबा बुरी तरह कमजोर हुआ है.

आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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