पांच अगस्त को अपनी पॉलिसी के बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा से सीधे पूछा गया था कि बड़ी मात्रा में पैसा आने के कारण क्या केंद्रीय बैंक की खास NRI डिपॉजिट योजना को समय से पहले बंद किया जा सकता है. उनका जवाब बिल्कुल साफ था: योजना को समय से पहले बंद करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. लेकिन नौ दिन बाद, 14 अगस्त को RBI ने इस योजना के तहत नई जमा राशि लेने की आखिरी तारीख एक महीने पहले कर दी. यानी 30 सितंबर से घटाकर 31 अगस्त कर दी.
घोषणा के कुछ ही समय बाद रुपया तीन हफ्ते के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, जबकि पांच साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में भी इसी तरह की अवधि में सबसे तेज़ बढ़ोतरी हुई और उनकी कीमतें गिर गईं. केंद्रीय बैंक के लिए ऐसी घटनाएं संयोग नहीं होतीं; ये ऐसे वादे के पूरे न होने के नतीजे हैं, जिसे निभाने की बात कही गई थी.
असल में क्या हुआ
जून में पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण तेल की बढ़ती कीमतों और रुपये पर दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अनिवासी भारतीयों (NRI) के लिए एक खास सुविधा शुरू की. इसके तहत वे Foreign Currency Non-Resident (Bank) यानी FCNR(B) खातों में तीन से पांच साल के लिए बेहद आकर्षक ब्याज दरों पर पैसा जमा कर सकते थे. कुछ मामलों में यह दर करीब 7 प्रतिशत तक थी और इस पर टैक्स नहीं लगता था.
RBI ने यह सुविधा इस तरह दी कि बैंकों को आमतौर पर जमाकर्ताओं से वसूली जाने वाली करेंसी हेजिंग की लागत खुद उठानी पड़ी. इससे ब्याज दर को प्रभावी रूप से सब्सिडी मिली. इस योजना को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली.
21 अगस्त तक बैंकों ने सिर्फ FCNR(B) जमा के जरिए 65.4 अरब डॉलर जुटा लिए थे. External Commercial Borrowings (ECBs) और Overseas Foreign Currency Borrowings (OFCBs) को भी जोड़ दें तो पूरी स्वैप सुविधा के तहत कुल राशि 72.85 अरब डॉलर हो गई थी. यह रकम उस 50-70 अरब डॉलर की सीमा से काफी ज्यादा थी, जिसका अनुमान विश्लेषकों ने पूरे चार महीने के लिए लगाया था. यह रकम करीब 10 हफ्तों में ही जुट गई.
यही वजह है कि FCNR(B) की यह सुविधा बंद किया जाना खास तौर पर ध्यान देने वाली बात है. यह कोई ऐसी योजना नहीं थी जो परेशानी में थी और जिसे तुरंत बंद करना जरूरी था. बल्कि यह उम्मीद से कहीं बेहतर काम कर रही थी. इसके बावजूद इसे समय से पहले बंद कर दिया गया, वह भी RBI गवर्नर के समय से पहले बंद किए जाने की संभावना को खारिज करने के तुरंत बाद.
टूटे वादे की अर्थव्यवस्था
मौद्रिक अर्थशास्त्र में ऐसी स्थिति में ‘टाइम इनकंसिस्टेंसी’ यानी समय के साथ नीति बदलने की समस्या की अवधारणा काफी पुरानी और स्थापित है. 1977 में फिन काइडलैंड और एडवर्ड प्रेस्कॉट ने बताया था कि परिस्थितियां बदलने के बाद नीति बनाने वालों के पास पहले घोषित योजना से हटने का तर्कसंगत कारण हो सकता है. बाद में इसी काम के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला. रॉबर्ट बैरो और डेविड गॉर्डन ने मौद्रिक नीति के संदर्भ में इस विचार को आगे बढ़ाया. उनका कहना था कि केंद्रीय बैंक का भरोसा किसी एक फैसले पर नहीं, बल्कि समय के साथ उसके बयानों और काम के बीच लगातार बनी समानता पर टिका होता है.
पांच अगस्त से पहले ही योजना को समय से पहले बंद किए जाने की संभावना की चर्चा हो रही थी. जब मल्होत्रा ने बयान दिया, तब तक करीब 28 अरब डॉलर का पैसा आ चुका था और मार्केट में यह चर्चा थी कि यह सुविधा तय समय से पहले बंद हो सकती है. बाद में जिस बड़ी रकम के आने को फैसले में बदलाव का कारण बताया गया, वह आश्वासन दिए जाने के समय ही साफ दिखाई दे रही थी.
केंद्रीय बैंक की बातचीत का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ इस स्थिति में एक और अंतर बताते हैं: ‘ओडिसियन गाइडेंस’, जिसमें नीति बनाने वाला भविष्य में कोई कदम उठाने की प्रतिबद्धता करता है, बिल्कुल वैसे जैसे ओडिसियस ने खुद को जहाज के मस्तूल से बांध लिया था. इसके उलट ‘डेल्फिक गाइडेंस’ किसी प्रतिबद्धता से ज्यादा एक अनुमान या भविष्यवाणी जैसा होता है. संयोग से क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘द ओडिसी’ भी इसी जुलाई में रिलीज हुई और उसमें ओडिसियस को मस्तूल से बंधा दिखाया गया था.
5 अगस्त को आरबीआई के गवर्नर के बयान को ‘ओडिसियन’ माना जा सकता है—यानी ऐसा इरादा जिसे आधार बनाकर बाजार अपनी रणनीति बना सकता था, लेकिन जब आरबीआई ने नौ दिन के अंदर अपना फैसला बदल दिया, तो यह ‘डेल्फिक गाइडेंस’ जैसा हो गया, यानी ऐसा अनुमान जो गलत साबित हुआ. बाजार केंद्रीय बैंकों को अपना रुख बदलने के लिए सजा नहीं देता. वह उस अंतर पर प्रतिक्रिया देता है जो किसी बयान से बनी उम्मीद और उसके असल में लागू होने के बीच होता है.
रुपया और यील्ड कर्व वास्तव में क्यों बदले
आरबीआई के यू-टर्न के दो अलग-अलग असर को समझना जरूरी है, क्योंकि दोनों अलग-अलग तरीकों से काम करते हैं.
पहला असर सीधा है. पूरी योजना भारत में विदेशी मुद्रा लाने के लिए बनाई गई थी. डॉलर का ज्यादा आना रुपये को स्थिर करने में मदद करता है, ठीक उसी तरह जैसे किसी चीज की सप्लाई बढ़ने से उसकी कीमत पर दबाव कम होता है. बाजार को उम्मीद थी कि सितंबर तक डॉलर का आना जारी रहेगा, लेकिन जब आरबीआई ने इस सुविधा को एक महीने पहले ही बंद कर दिया, तो यह उम्मीद अचानक कम हो गई. कम डॉलर आने की उम्मीद अपने आप में रुपये के कमजोर होने की एक वजह है.
दूसरा असर ज्यादा बारीक है और मौजूदा मामले के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण भी है: यह भरोसे से जुड़ी कमी है. इसका असर डॉलर के जरिए नहीं, बल्कि आरबीआई के आगे के बयानों पर बाजार के भरोसे के स्तर के जरिए होता है. जब किसी सार्वजनिक आश्वासन को नौ दिन के अंदर ही बदल दिया जाता है, तो निवेशक सिर्फ उस एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं देते. वे आगे के लिए संस्था के फैसलों की विश्वसनीयता को लेकर अपनी सोच में थोड़ा बदलाव करते हैं. यह बदलाव जोखिम प्रीमियम के रूप में दिखाई देता है. यानी जब नीतियों के बारे में भरोसा कम होता है, तो निवेशक रुपये की संपत्ति और भारतीय सरकारी बॉन्ड को अपने पास रखने के लिए ज्यादा रिटर्न की मांग करते हैं.
इसी वजह से असर सिर्फ मुद्रा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पांच साल के बॉन्ड की यील्ड पर भी पड़ा. पांच साल के बॉन्ड की कीमत कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उस अवधि में नीतियों के रास्ते को लेकर कितना भरोसा है. और इस भरोसे में अभी साफ कमी आई थी.
ये दोनों असर एक-दूसरे को और मजबूत करते हैं. लेकिन दूसरा असर खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह योजना बंद होने के बाद भी बना रहता है. यह आरबीआई के हर अगले बयान के साथ जुड़ा रहेगा, जब तक संस्था आगे के बयानों के बजाय लगातार अपने काम के जरिए यह साबित नहीं कर देती कि उस पर फिर से भरोसा किया जा सकता है.
आगे इसका क्या मतलब है
तेल की कीमतों के लगातार ऊंचे रहने और दुनिया भर में पूंजी के आने-जाने में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, आने वाले महीनों में आरबीआई से ब्याज दरों की दिशा, बाजार में नकदी की मदद और NRI या विदेशी मुद्रा से जुड़े संभावित कदमों पर आगे के संकेत देने की उम्मीद है. अब इन बयानों को जुलाई की तुलना में ज्यादा गंभीरता से जांचा जाएगा.
भरोसा वापस लाने के लिए किसी बड़े कदम की जरूरत नहीं है. जरूरत है कि घोषित समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाए, भले ही परिस्थितियां योजना को समय से पहले बंद करने का सुझाव देती हों. इसके अलावा, अगर किसी योजना को समय से पहले बंद किया जा सकता है तो किन परिस्थितियों में ऐसा होगा, यह पहले से साफ तौर पर बताना जरूरी है, न कि पहले आश्वासन देना और फिर फैसला बदल देना.
इसका मतलब यह नहीं है कि आर्थिक कारणों से योजना को समय से पहले बंद करने का RBI का फैसला गलत था. रुपये को अस्थिर कर सकने वाली सब्सिडी वाली देनदारी का आकार सीमित करना एक सही फैसला हो सकता है. समस्या फैसले के क्रम में थी: पहले बाजार को सार्वजनिक रूप से भरोसा दिलाना और फिर फैसला बदल देना. केंद्रीय बैंक लगातार एक जैसे बयान देकर कई सालों में अपना भरोसा बनाते हैं. आने वाले महीने बताएंगे कि आरबीआई ने इस सीख को समझा है या मार्केट को उसके वादों पर शक करने की और वजहें देगा.
बिदिशा भट्टाचार्य चिंतन रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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