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Wednesday, 28 October, 2026
होमदेशसोशल मीडिया पर CAPF एक्ट की आलोचना करने वाले CRPF DIG का निलंबन राष्ट्रपति ने रद्द किया

सोशल मीडिया पर CAPF एक्ट की आलोचना करने वाले CRPF DIG का निलंबन राष्ट्रपति ने रद्द किया

DIG पात्रा उस समय त्रिपुरा में तैनात थे, जब उन्होंने सोशल मीडिया पर नए कानून के खिलाफ पोस्ट किए थे. इस कानून के तहत वरिष्ठ CAPF पदों पर IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को औपचारिक रूप दिया गया है.

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नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) रैंक के उस अधिकारी का निलंबन रद्द कर दिया है, जिसे इस साल की शुरुआत में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बाद निलंबित किया गया था. यह पोस्ट अप्रैल में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम के तहत भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों की इन बलों में वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति को औपचारिक रूप दिए जाने के बाद की गई थी.

राष्ट्रपति द्वारा निलंबन रद्द किए जाने के बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने भी मंगलवार को अधिकारी बिधान चंद्र पात्रा का निलंबन रद्द कर दिया और इसकी जानकारी त्रिपुरा में स्थानीय इकाई को भेज दी.

बल के सूत्रों ने बताया कि CRPF मुख्यालय ने राष्ट्रपति द्वारा अगस्त के अंत में निलंबन रद्द किए जाने के करीब दो हफ्ते बाद यह फैसला लिया. इस फैसले की जानकारी बल को 27 अगस्त को दी गई थी.

निलंबन के समय अधिकारियों ने कहा था कि पात्रा ने कथित तौर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री शेयर की थी, जिसमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 को संसद में पेश किए जाने के दौरान देश की कानूनी रूप से चुनी हुई सरकार को “बदलने” की बात कही गई थी. पात्रा के निलंबन के साथ ही CAPF एक्ट के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों के बाद बल ने करीब दो दर्जन अधिकारियों और कर्मचारियों का तबादला भी किया था.

बल के 1994 बैच के इन-हाउस कैडर के DIG रैंक के अधिकारी पात्रा इस साल जून में निलंबन के समय अगरतला में त्रिपुरा सेक्टर मुख्यालय में तैनात थे. पात्रा को 17 जून को बल के महानिदेशालय की ओर से जारी एक आंतरिक प्रशासनिक आदेश के जरिए तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था. यह आदेश CCS (CCA) नियम, 1965 के नियम 10 की उप-नियम (1) के तहत शुरुआती जांच पूरी होने तक जारी किया गया था.

CRPF की ओर से मंगलवार को जारी एक आदेश में कहा गया, “क्योंकि, त्रिपुरा सेक्टर हार्स, CRPF, अगरतला के DIG (IRLA 40618) श्री बिधान चंद्र पात्रा को 17.06.2026 के P/Order के ज़रिए सस्पेंड करने का आदेश दिया गया था…”

एक और DIG लेवल के अधिकारी की ओर से बल के हेडक्वार्टर में पढ़े गए आदेश में कहा गया, “और जबकि, राष्ट्रपति ने CCS(CA) रूल्स, 1965 के रूल 10 के सब-रूल (5) के क्लॉज़ (c) के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए उस सस्पेंशन ऑर्डर को तुरंत प्रभाव से रद्द करने की मंज़ूरी दी. अब, इसलिए, श्री बिधान चंद्र पात्रा, DIG के संबंध में सस्पेंशन का वह आदेश तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाता है. 18.06.2026 (सस्पेंशन की प्रभावी तारीख) से रद्द करने की तारीख तक का सस्पेंशन का समय, पेंडिंग मामलों को फाइनल करने के बाद, नियमों के अनुसार रेगुलर किया जाएगा.”

राष्ट्रपति ने अप्रैल में विधेयकों को मंजूरी दी थी. इसके साथ ही वे कानून बन गए और IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को नियंत्रित करने लगे. यह विधेयक पिछले साल मई में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद लाया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि वह सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (SAG) तक के स्तर पर प्रतिनियुक्ति पर तैनात IPS अधिकारियों की संख्या को धीरे-धीरे कम करे.

नए कानून के तहत केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) के शीर्ष पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति सुनिश्चित की गई है. इसके लिए निदेशक और विशेष महानिदेशक के पदों पर IPS अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त करना अनिवार्य किया गया है. कानून में अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के कम से कम 67 प्रतिशत पदों पर प्रतिनियुक्ति पर आए IPS अधिकारियों के लिए आरक्षण को भी औपचारिक रूप दिया गया है. इंस्पेक्टर जनरल के पद के लिए यह सीमा 50 प्रतिशत तय की गई है.

इस अधिनियम की सेवा में मौजूद और रिटायर्ड CAPF अधिकारियों ने व्यापक स्तर पर आलोचना की थी. सरकार द्वारा संसद में विधेयक पेश किए जाने से एक दिन पहले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) के पूर्व अधिकारियों ने कहा था कि वे केवल रैंक और प्रमोशन के लिए ही नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और CAPFs से जुड़ी नीतियों में अपनी बात रखने के अधिकार के लिए भी विरोध कर रहे हैं.

रिटायर्ड BSF अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) संजीव कृष्ण सूद ने कहा था, “सीधे शब्दों में कहें तो हमारा कोई लॉबी नहीं है—हमारी आवाज सीधे सरकार तक नहीं पहुंचती. वह थोपी गई लीडरशिप के जरिए पहुंचती है.” उन्होंने कहा था कि यह विधेयक “CAPF अधिकारियों पर अविश्वास” की वजह से नहीं आया, बल्कि यह “दबाव समूहों का नतीजा” था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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