सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों में भारी अंतर पर केंद्र सरकार और निजी अस्पतालों से कड़े सवाल किए और गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने पूछा कि 15 रुपये में मिलने वाली ड्रिप ट्यूब मरीज को 250 रुपये में और 11,000 रुपये की कैंसर दवा 1.3 लाख रुपये में कैसे बेची जा सकती है. कोर्ट ने कहा कि मरीजों की तुलना व्यापार से नहीं की जा सकती और दवाओं पर इतने बड़े मार्जिन को सिर्फ अस्पतालों के संचालन के खर्च से सही नहीं ठहराया जा सकता.
इस मामले की सुनवाई को कई अखबारों और समाचार संस्थानों ने प्रमुखता से रिपोर्ट किया है. द इंडियन एक्सप्रेस ने भी दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था पर विस्तार से लिखा है. पूर्व स्वास्थ्य सचिव सी.के. मिश्रा ने भी इंडियन एक्सप्रेस में कहा है कि कैंसर की दवाओं पर 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन की सीमा जरूरी कदम है, लेकिन दवाओं के साथ मेडिकल डिवाइस और दूसरे मेडिकल सामान के ट्रेड मार्जिन की भी व्यापक समीक्षा की जरूरत है.
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि केंद्र ने कुछ गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 फीसदी तक सीमित करने की बात कही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर ज्यादा ट्रेड मार्जिन समस्या है, तो नियंत्रण सिर्फ कैंसर की दवाओं तक क्यों सीमित रहे. अब फैसला यह तय कर सकता है कि भारत की मौजूदा दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था को व्यापक बनाया जाएगा या नहीं.
पूरा मामला
केरल की रहने वाली और बैंक से रिटायर हो चुकीं सरोजम राधाकृष्णन को 2021 में स्तन कैंसर होने का पता चला था. इसके बाद उन्हें कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली खास दवाओं के लिए हर महीने 63,000 रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़ते थे. इन खर्चों के कारण उनके परिवार की बचत और पेंशन की रकम जल्द ही खत्म हो गई.
यह समझते हुए कि हज़ारों परिवारों को भी ऐसी ही स्थिति के कारण गरीबी में धकेला जा रहा है, उन्होंने 2022 में केरल हाई कोर्ट में व्यक्तिगत याचिका दायर की. सितंबर 2022 में मामले की शुरुआती सुनवाई के दौरान ही उनकी मौत हो गई, लेकिन उनकी याचिका ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन बचाने वाली दवाओं तक आम लोगों की पहुंच को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा किया.
केरल हाई कोर्ट ने उनकी मौत के बाद भी इस मामले को बंद नहीं होने दिया. अदालत ने इसे जनहित याचिका (पीआईएल) में बदल दिया. इस मामले का नाम In Re: Exorbitant Pricing of Life Saving Patented Medicines (इन री: जीवन बचाने वाली पेटेंट वाली दवाओं की बहुत ज्यादा कीमतें) रखा गया.
17 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर खुद संज्ञान लिया. मामले के तथ्यों को देखने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता यह देखकर हैरान रह गए कि दवा की खुदरा दुकानों को जिस कीमत पर दवा बेची जाती है (पीटीआर) और ग्राहकों से ली जाने वाली अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) के बीच 1,000 प्रतिशत से भी ज्यादा का अंतर था.
न्यायाधीशों ने इस तरीके को सीधे तौर पर “दिनदहाड़े डकैती” और “कत्लेआम” जैसा बताया.
वैध मुनाफा, अचानक होने वाली कमाई और ग्राहकों को लूटने वाला मुनाफा
किसी भी कारोबार में सही तरीके से मुनाफा कमाना जरूरी है. जो कारोबारी अपना पैसा लगाता है, कारोबार के जोखिम उठाता है, लोगों को रोजगार देता है और कोई नई चीज़ या सेवा उपलब्ध कराता है, उसे बैंक से कर्ज लेने पर मिलने वाली ब्याज दर से कहीं ज्यादा मुनाफा कमाने का हक है. दुनिया में राजनीतिक तनाव या अचानक सप्लाई चेन में रुकावट आने जैसी बाहरी वजहों से होने वाला बहुत ज्यादा मुनाफा भी कारोबार की एक समझ में आने वाली स्थिति है. सरकारें और रेगुलेटरी संस्थाएं ऐसे मुनाफे से निपटने के लिए कुछ समय के लिए अतिरिक्त मुनाफे पर टैक्स लगाने या निर्यात शुल्क लगाने जैसे कदम उठाती हैं.
इसके बाद एक ऐसी स्थिति आती है, जिसमें किसी आविष्कारक को पेटेंट कानून के तहत कुछ समय तक अपने प्रोडक्ट पर खास अधिकार मिलता है. इस दौरान वह बाजार में दूसरी कंपनियों की सस्ती जेनेरिक दवाएं आने से पहले रिसर्च और विकास पर किए गए अपने बड़े खर्च की भरपाई करता है.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले में जो स्थिति आई, वह न तो नए आविष्कार से होने वाला सही मुनाफा था और न ही एकाधिकार के कारण मिलने वाला सामान्य मुनाफा. यह ग्राहकों को लूटने जैसा था, जो डकैती की हद तक पहुंचता है. कोर्ट ने कहा कि दवाओं की कीमत में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी उस कारोबारी प्रक्रिया के दौरान हुई, जिसमें दवा बनाने वाली कंपनी किसी दुकानदार को दवा की शीशी जिस कीमत पर देती है (पीटीआर) और पैकेट पर लिखी अंतिम अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) के बीच बड़ा अंतर होता है.
जब कैंसर का एक इंजेक्शन अस्पताल की फार्मेसी को 2,700 रुपये में दिया जाता है, लेकिन उस पर अधिकतम खुदरा कीमत 27,000 रुपये लिखी होती है, तो 900 प्रतिशत का मुनाफा न तो दवा के क्लीनिकल ट्रायल्स पर खर्च हो रहा होता है और न ही लैब के इक्विप्मेंट्स पर. इसके बजाय, इतना बड़ा मुनाफा अस्पतालों के समूहों और दवा की सप्लाई से जुड़े बिचौलियों को फायदा पहुंचा सकता है. इससे उन्हें किसी सस्ते विकल्प के बजाय एक खास कंपनी की दवा लिखने और मरीज को वही दवा देने के लिए बढ़ावा मिल सकता है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि मरीजों और स्वास्थ्य सेवाएं देने वालों के बीच ताकत और जानकारी का बड़ा अंतर है. अगर किसी आम ग्राहक से किसी सामान के लिए ज्यादा पैसे लिए जाते हैं, तो वह उसे खरीदने से मना कर सकता है, लेकिन कैंसर का गंभीर इलाज करा रहे मरीज के पास दवा छोड़ने का लगभग कोई विकल्प नहीं होता.
क्या यह उस दमनकारी नमक पर लगे टैक्स जैसा नहीं है, जिसे ब्रिटिश शासन ने महात्मा गांधी की दांडी यात्रा तक भारतीयों पर लगाया हुआ था? गांधी का कहना था कि जब सरकार किसी ऐसी चीज़ पर टैक्स लगाने की अनुमति देती है या खुद ऐसा करती है, जो ज़िंदा रहने के लिए जरूरी है, तो कारोबार समाज के काम आने के बजाय लोगों से जबरन पैसा वसूलने का तरीका बन जाता है.
घरों के कुल खर्च में दवाओं का आर्थिक बोझ
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने मई 2026 में भारत के लिए 2022-23 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) के अनुमान जारी किए. इनके मुताबिक, स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च में से 43.4 प्रतिशत खर्च लोगों को अपनी जेब से करना पड़ा. यह 2013-14 में 64.2 प्रतिशत के सबसे ऊंचे स्तर से काफी कम है, लेकिन 2021-22 की पिछली रिपोर्ट के मुकाबले यह बढ़ा है. उस समय लोगों की जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च घटकर 39.4 प्रतिशत के अस्थायी निचले स्तर पर आ गया था.
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के 75वें दौर के सर्वेक्षण में पाया गया कि स्वास्थ्य सेवाओं पर लोगों की जेब से होने वाले खर्च में अकेले दवाओं का हिस्सा करीब 70 प्रतिशत है. इसी तरह, 2025 के घरेलू सामाजिक उपभोग सर्वेक्षण से पता चला कि दवाएं खरीदने पर ग्रामीण परिवारों के अस्पताल में भर्ती होने के कुल खर्च का करीब 20 प्रतिशत और शहरी परिवारों के खर्च का 15 प्रतिशत लगता है.
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की स्टडीज़ के मुताबिक, हर साल इलाज पर होने वाला खर्च करीब 5.5 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से नीचे धकेल देता है. आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) जैसी सरकारी योजनाएं भी इस बोझ को पूरी तरह कम नहीं कर पातीं. इस योजना के तहत हर परिवार को सालाना 5 लाख रुपये तक के इलाज की सुविधा मिलती है. इसके बावजूद, कैंसर के गंभीर इलाज के कुछ ही दौर में परिवार को मिलने वाली पूरे साल की सुविधा खत्म हो सकती है.
2015 में शुरू की गई प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना का मकसद दवाओं को सस्ता और आम लोगों की पहुंच में लाना है, लेकिन राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (एनएलईएम) में शामिल दवाओं के कुल मूल्य में इसका हिस्सा सिर्फ 1 प्रतिशत और दवाओं की कुल मात्रा में 4 प्रतिशत है.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट की ओर से बार-बार सवाल पूछे जाने के बाद केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि उसने दवाओं के वितरकों से खुदरा दुकानदारों तक के मुनाफे को 30 प्रतिशत तक सीमित करने के लिए ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (टीएमआर) का इस्तेमाल किया है. यह नियम कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 137 दवाओं पर लागू किया गया है. इससे पहले 42 तरह की दवाओं पर इसका शुरुआती परीक्षण किया गया था. फार्मास्यूटिकल्स विभाग का अनुमान था कि इस कदम से खुदरा कीमतें 70 प्रतिशत तक कम हो सकती हैं और मरीजों के हर साल 2,500 करोड़ रुपये बच सकते हैं.
इसके बाद पीठ ने एक अहम सवाल उठाया: दवाओं की खरीद-बिक्री के दौरान मुनाफे को नियंत्रित करने का यह कदम सिर्फ कैंसर की दवाओं तक सीमित क्यों रहना चाहिए? इसे जरूरत के हिसाब से कभी-कभार उठाए जाने वाले कदम के बजाय व्यापक रूप से क्यों नहीं लागू किया जाना चाहिए?
ड्रग्स (प्राइस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (डीपीसीओ) के तहत, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (एनएलईएम) में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत तय करते समय खुदरा दुकानदार के लिए 16 प्रतिशत मुनाफा जोड़ सकता है, लेकिन एनएलईएम में सिर्फ करीब 388 तरह के दवा के मोलिक्यूल्स शामिल हैं. इनका हिस्सा भारत के दवा बाजार के कुल कारोबार का करीब 17 से 20 प्रतिशत है. बाकी 80 प्रतिशत बाजार में ऐसी दवाएं हैं, जिनकी कीमत तय करने के लिए यह नियम लागू नहीं होता. इन दवाओं को बाजार में पहली बार उतारते समय कंपनियां अपनी मर्जी से शुरुआती कीमत तय कर सकती हैं. हालांकि, बाद के वर्षों में इनकी कीमत हर साल अधिकतम 10 प्रतिशत बढ़ाने की कानूनी सीमा है.
आइए, भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे को समझते हैं. इसकी बुनियाद आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में है, जिसके तहत डीपीसीओ जारी किया जाता है. इसके साथ ही, रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत 1997 में बनाए गए एनपीपीए का प्रशासनिक ढांचा भी इसमें शामिल है.
कई दशकों तक डीपीसीओ का पूरा ध्यान लगभग सिर्फ राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची में साफ तौर पर शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने पर रहा. डीपीसीओ, 2013 के तहत इन कीमतों को बाजार पर आधारित एक फॉर्मूले से तय किया जाता था. इसमें उन सभी ब्रांडों की खुदरा दुकानदारों को दी जाने वाली कीमतों (पीटीआर) का साधारण औसत निकाला जाता था, जिनकी बाजार में कम से कम 1 प्रतिशत हिस्सेदारी होती थी. इसके बाद इसमें खुदरा दुकानदार के लिए 16 प्रतिशत मुनाफा जोड़ दिया जाता था.
इस फॉर्मूले में एक ऐसी कमी थी, जिसका पहले ध्यान नहीं रखा गया. दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) तय करते समय उनके वास्तविक उत्पादन खर्च के बजाय बाजार में पहले से चल रही औसत कीमतों को आधार बनाया जाता था.
2016 और 2017 में एनपीपीए के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह ने इस व्यवस्था को चुनौती दी. उन्होंने समझा कि जिन दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं था, उन पर बहुत ज्यादा मुनाफा लिया जा रहा था. इससे जीवन बचाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच प्रभावित हो रही थी. इसलिए नियामक संस्था ने अपना ध्यान सिर्फ बुनियादी दवाओं तक सीमित रखने के बजाय मेडिकल उपकरणों और इलाज में इस्तेमाल होने वाली दूसरी जरूरी चीजों पर भी बढ़ाया.
डीपीसीओ, 2013 के पैराग्राफ 19 का इस्तेमाल करते हुए एनपीपीए ने फरवरी 2017 में दिल की धमनियों में लगाए जाने वाले स्टेंट की कीमतें 85 प्रतिशत तक घटा दीं. यह नियम आपात स्थिति में जनहित के लिए सरकार को दवाओं और मेडिकल उपकरणों की अधिकतम कीमत तय करने का अधिकार देता है. अगस्त 2017 में एनपीपीए ने घुटने के जोड़ को बदलने के लिए लगाए जाने वाले कृत्रिम इम्प्लांट की कीमतें भी सीमित कर दीं. इससे उनकी कीमतें 70 प्रतिशत तक कम हो गईं.
एनपीपीए के इन कदमों के खिलाफ तेजी से और मिलकर विरोध किया गया. दुनिया भर की मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों और भारत के निजी अस्पतालों के समूहों ने बड़े स्तर पर लॉबिंग की, यानी सरकार पर अपने पक्ष में फैसले लेने का दबाव बनाया. 2018 की शुरुआत में भूपेंद्र सिंह का अचानक एनपीपीए से तबादला कर दिया गया. ऐसा उस समय हुआ, जब इस नियामक व्यवस्था को इलाज के दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता था.
इस बार न्यायाधीशों ने कदम उठाया है और इस मुद्दे के बारे में लोगों में जागरूकता भी बढ़ी है. उम्मीद है कि सरोजम राधाकृष्णन का संघर्ष और उनका बलिदान दवाओं और मेडिकल उपकरणों के क्षेत्र में एक बेहतर और ज्यादा पारदर्शी व्यवस्था बनाने में मदद करेगा.
संजीव चोपड़ा सेंटर फॉर कंटेंपररी स्टडीज़, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज़ एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)