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Wednesday, 5 August, 2026
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इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट पर नियंत्रण वाले बिल का कर्मचारी क्यों कर रहे हैं विरोध?

आलोचकों का कहना है कि यह बिल उस संस्थान के मूल ढांचे में बदलाव करता है जिसकी स्थापना पी.सी. महालनोबिस ने की थी, क्योंकि यह केंद्र द्वारा गठित किए जाने वाले प्रस्तावित 'बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स' में सारी शक्तियां केंद्रित कर देता है.

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नई दिल्ली: सोमवार को लोकसभा में पेश किए गए इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (ISI) बिल 2026 का विपक्ष और संस्थान के फैकल्टी सदस्यों ने कड़ा विरोध किया है. उनका कहना है कि यह बिल देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक की स्वायत्तता को कमजोर करेगा और उसके रोजमर्रा के कामकाज में केंद्र सरकार का दखल बढ़ा देगा.

आलोचकों का कहना है कि यह बिल 95 साल पुराने संस्थान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ करता है. इसमें केंद्र सरकार द्वारा बनाए जाने वाले प्रस्तावित बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (BoG) में लगभग सारी शक्तियां केंद्रित कर दी गई हैं.

1931 में पी.सी. महालनोबिस ने ISI की स्थापना की थी. उन्हें भारतीय सांख्यिकी का जनक भी कहा जाता है. ISI ने भारत की कई अहम आर्थिक नीतियों को बनाने में योगदान दिया है. नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (NSSO) की शुरुआत भी ISI से ही हुई थी. इसका मुख्यालय कोलकाता में है और नई दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और तेजपुर में इसके क्षेत्रीय केंद्र हैं. भारत के मशहूर सांख्यिकीविद और गणितज्ञ जैसे सी.आर. राव, एस.आर. श्रीनिवास वरधन और राज चंद्र बोस भी ISI के पूर्व छात्र रहे हैं.

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा लाया गया यह बिल ISI एक्ट 1959 को खत्म करने का प्रस्ताव रखता है. इसी कानून के तहत ISI को “राष्ट्रीय महत्व का संस्थान” घोषित किया गया था और उसे सांख्यिकी में डिग्री और डिप्लोमा देने का अधिकार मिला था.

नए बिल में प्रस्ताव है कि भारत के राष्ट्रपति संस्थान के विजिटर होंगे. वे संस्थान के कामकाज और प्रगति की समीक्षा के लिए एक या अधिक लोगों की नियुक्ति कर सकेंगे और संस्थान के मामलों की जांच भी करा सकेंगे.

शक्तियों का केंद्रीकरण

सबसे बड़ा विवाद ISI काउंसिल को खत्म करने को लेकर है. यह संस्थान की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था है, जिसमें 33 सदस्य हैं. इनमें 10 सदस्य चुने हुए होते हैं.

काउंसिल की अध्यक्षता एक चेयरपर्सन करता है, जो शिक्षाविद, राजनेता या नौकरशाह हो सकता है. उसका चयन काउंसिल के सदस्य करते हैं. हालांकि यह एक निर्वाचित पद है, लेकिन व्यवहार में चुनाव बहुत कम होते हैं. आमतौर पर सभी सदस्य सर्वसम्मति से एक व्यक्ति का चयन करते हैं. फिलहाल ISI काउंसिल के चेयरपर्सन के. राधाकृष्णन हैं, जो स्पेस कमीशन के पूर्व चेयरमैन और ISRO के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं.

नया बिल 33 सदस्यीय काउंसिल की जगह 11 सदस्यीय बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (BoG) बनाने का प्रस्ताव करता है. इसकी अध्यक्षता एक चेयरपर्सन करेगा. सभी 11 सदस्य चुने नहीं जाएंगे, बल्कि नामित किए जाएंगे.

चेयरपर्सन की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सिफारिश पर करेंगे. इसके लिए शिक्षा, उद्योग, पब्लिक पॉलिसी, सांख्यिकी, संबंधित विज्ञान या अन्य क्षेत्रों के प्रतिष्ठित लोगों में से किसी एक को चुना जाएगा.

11 सदस्यों में तीन केंद्र सरकार के अधिकारी होंगे, जिनका पद जॉइंट सेक्रेटरी से नीचे का नहीं होगा. इन्हें चेयरपर्सन नामित करेंगे. इसके अलावा चार प्रतिष्ठित विशेषज्ञ होंगे, जिनमें एक महिला भी होगी और वे ISI से नहीं होंगे. बाकी चार सदस्य ISI के प्रतिनिधि होंगे. इनमें संस्थान के निदेशक, एक सेंटर डायरेक्टर और अकादमिक काउंसिल के दो सदस्य शामिल होंगे.

ISI के रजिस्ट्रार BoG के सदस्य-सचिव होंगे. BoG संस्थान के सभी मामलों की सामान्य निगरानी, संचालन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार होगा. उसे संस्थान के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नियम बनाने, उनमें संशोधन करने या उन्हें खत्म करने का अधिकार भी होगा.

BoG राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी से ISI के निदेशक की नियुक्ति करेगा, जो संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी होंगे. इसके अलावा बोर्ड डीन, सेंटर डायरेकर्स और रजिस्ट्रार की भी नियुक्ति करेगा.

कोलकाता स्थित ISI में पढ़ाने वाले प्रोफेसर अरिजीत चक्रवर्ती ने द प्रिंट से कहा कि यह बिल देश के सबसे पुराने सांख्यिकी संस्थान की पूरी संरचना बदल देगा और इससे संस्थान की स्वायत्तता कमजोर हो जाएगी.

उन्होंने कहा, “पहले ISI काउंसिल, जिसमें चुने हुए और नामित दोनों तरह के सदस्य होते थे, संस्थान की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था थी. अब सरकार उसकी जगह बोर्ड ऑफ गवर्नर्स बनाना चाहती है, जिसमें सभी सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नामित होंगे.”

उन्होंने कहा कि इससे केंद्र सरकार का पूरा नियंत्रण हो जाएगा. सरकार चेयरमैन चुनेगी और चेयरमैन निदेशक का चयन करेगा.

प्रोफेसर ने यह भी कहा कि ISI पश्चिम बंगाल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1961 के तहत रजिस्टर्ड एक सोसाइटी है, जबकि इसे फंडिंग MoSPI से मिलती है.

उन्होंने कहा, “अब ISI सोसाइटी का क्या होगा, यह साफ नहीं है.”

उन्होंने कहा कि ISI एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग के तहत चलता है.

उन्होंने कहा, “हमारी सारी शक्तियां और नियम इसी सोसाइटी से आते हैं.”

इस सोसाइटी की अध्यक्षता एक प्रेसिडेंट करता है. फिलहाल इसके प्रेसिडेंट मशहूर कंप्यूटर वैज्ञानिक डॉ. शंकर कुमार पाल हैं.

अकादमिक काउंसिल की शक्तियां भी कम होंगी

ISI बिल कानून बनने के बाद सिर्फ ISI काउंसिल ही खत्म नहीं होगी. मौजूदा अकादमिक काउंसिल की शक्तियां भी कम हो जाएंगी.

अब उसकी भूमिका सिर्फ सिफारिश देने तक सीमित रहेगी. अंतिम फैसला BoG करेगा. जबकि अभी नए कोर्स शुरू करने जैसे सभी अकादमिक मामलों में आखिरी फैसला अकादमिक काउंसिल का होता है.

नए बिल में प्रस्ताव है कि अकादमिक काउंसिल संस्थान की मुख्य अकादमिक संस्था होगी और इसकी अध्यक्षता संस्थान के निदेशक करेंगे. सेंटर डायरेक्टर, सभी पूर्णकालिक प्रोफेसर और BoG द्वारा तय किए गए अन्य पूर्णकालिक फैकल्टी सदस्य इसके सदस्य होंगे.

File photo of the Indian Statistical Institute in Kolkata | Commons
कोलकाता में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट की फ़ाइल फ़ोटो | कॉमन्स

डीन ऑफ अकादमिक अफेयर्स अकादमिक काउंसिल के सदस्य-सचिव होंगे. इसकी बैठक साल में कम से कम एक बार होगी. जरूरत पड़ने पर संस्थान के विभिन्न केंद्रों पर भी बैठकें हो सकेंगी.

अभी अकादमिक मामलों में अंतिम फैसला अकादमिक काउंसिल का होता है. लेकिन ड्राफ्ट बिल के तहत वह सिर्फ BoG को सिफारिश करेगी. इसके अलावा एक मैनेजमेंट काउंसिल भी होगी और ISI के निदेशक की नियुक्ति BoG करेगा.

कोलकाता स्थित ISI के एक प्रोफेसर, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर बात की, ने कहा कि नए कानून के तहत ISI का संचालन मौजूदा व्यवस्था से बिल्कुल अलग होगा.

उन्होंने कहा, “जब केंद्र सरकार का इतना सीधा दखल होगा, तब ISI जैसे अकादमिक संस्थान आगे नहीं बढ़ सकते. यह बहुत मुश्किल होगा.”

उन्होंने कहा कि प्रस्तावित ढांचा काफी हद तक IIM की व्यवस्था जैसा है.

उन्होंने कहा, “लेकिन हम और IIM दो बिल्कुल अलग तरह के संस्थान हैं. यह साफ है कि यह मॉडल IIM में भी ठीक से काम नहीं कर पाया. IIM कोलकाता को ही देख लीजिए. वहां डायरेक्टर टिक नहीं पाए.”

उन्होंने कहा कि इस बिल से संस्थान नौकरशाही के हाथों में चला जाएगा.

उन्होंने कहा, “यह ठीक नहीं है. हम इसी का विरोध कर रहे हैं.”

प्रोफेसर ने कहा कि बिल में यह नहीं बताया गया है कि मौजूदा सोसाइटी का क्या होगा. लेकिन ऐसा लगता है कि इसे एक बॉडी कॉरपोरेट में बदल दिया जाएगा.

उन्होंने कहा, “यह कानूनी रूप से सही नहीं है. इसी व्यवस्था ने ISI को दुनिया में पहचान दिलाई है. इसी वजह से हम आगे बढ़ सके. ISI एक छोटा लेकिन बेहद विशेष संस्थान है और इसने देश का नाम रोशन किया है. गणित और सांख्यिकी के क्षेत्र में हम देश में सबसे आगे हैं. भारत की सांख्यिकी व्यवस्था, जिससे दुनिया भी सीखती है, उसकी नींव हमने रखी. NSSO की शुरुआत भी ISI से हुई थी.”

नए कानून की जरूरत क्यों?

ISI बिल 2026 के उद्देश्य और कारणों में कहा गया है कि सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा डॉ. आर.ए. माशेलकर की अध्यक्षता में बनाई गई चौथी समीक्षा समिति ने जुलाई 2021 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अगर संस्थान अपनी संरचना, व्यवस्था और प्रक्रियाओं में कुछ बुनियादी बदलाव करे तो वह अपनी पूरी क्षमता हासिल कर सकता है और बड़ा बदलाव ला सकता है.

समिति ने सिफारिश की थी कि ISI को खुद को नए सिरे से तैयार करना चाहिए ताकि वह अपनी नेतृत्व की स्थिति फिर हासिल कर सके और बदलते समय में प्रासंगिक बना रहे. 2031 में अपनी शताब्दी तक पहुंचने से पहले उसे ISI@100 का नया विजन तैयार करना चाहिए और अच्छे संस्थान से दुनिया के सबसे बेहतरीन संस्थानों में शामिल होने का लक्ष्य रखना चाहिए.

हालांकि ISI के एक तीसरे प्रोफेसर ने कहा कि माशेलकर समिति ने कमियों की ओर जरूर ध्यान दिलाया और आधुनिकीकरण की सिफारिश की, लेकिन उसने नया कानून लाने की बात कहीं नहीं कही.

उन्होंने कहा, “माशेलकर समिति ने कहीं भी नहीं कहा कि नया कानून जरूरी है. उन्होंने कुछ छोटे संशोधनों की बात की थी. उन्होंने काउंसिल का आकार कम करने की सिफारिश की थी. यह मौजूदा कानून के तहत भी किया जा सकता है. इसके लिए एक अच्छी तरह से काम कर रहे संस्थान को खत्म करने की जरूरत नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, “हमें डर है कि आंकड़ों का गलत इस्तेमाल हो सकता है. अगर नियंत्रण किसी गलत व्यक्ति के हाथ में हुआ तो उसका दुरुपयोग हो सकता है.”

ISI के प्रोफेसर मांग कर रहे हैं कि सरकार इस बिल पर उनसे चर्चा करे.

उन्होंने कहा, “अब तक कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है. ISI की सभी वैधानिक संस्थाओं ने इस बिल को लगभग खारिज कर दिया है. किसी ने हमसे राय नहीं मांगी. केंद्र ने कहा कि एक ब्रेनस्टॉर्मिंग मीटिंग में यह फैसला हुआ था. लेकिन हम जानना चाहते हैं कि वह बैठक कौन सी थी.”

1959 के कानून में 1995 में संशोधन किया गया था. इसके बाद संस्थान को सांख्यिकी, गणित, क्वांटिटेटिव इकोनॉमिक्स, कंप्यूटर साइंस और सांख्यिकी से जुड़े अन्य विषयों में डिग्री और डिप्लोमा देने का अधिकार मिला था.

विपक्ष का विरोध

विपक्ष ने भी ISI बिल का कड़ा विरोध किया है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि विपक्ष चाहता है कि इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट बिल 2026 को विस्तार से जांच और व्यापक चर्चा के लिए संबंधित संसदीय स्थायी समिति, यानी इस मामले में वित्त संबंधी समिति, के पास भेजा जाए.

तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष ने कहा कि इस बिल को संसद में लाने से पहले सभी संबंधित पक्षों से व्यापक चर्चा होनी चाहिए.

उन्होंने लिखा, “देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक पर इसका दूरगामी असर पड़ेगा. इसलिए इस पर गंभीरता से विचार और चर्चा होनी चाहिए. हमें उम्मीद है कि सरकार हमारी इस उचित मांग को मानेगी.”

ISI कोलकाता और उसके क्षेत्रीय केंद्रों के वरिष्ठ फैकल्टी सदस्यों ने बुधवार को राजधानी में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की योजना बनाई थी, ताकि वे ISI बिल को लेकर अपनी चिंताओं को सामने रख सकें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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