नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपने पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण के दौरान लाल किले की प्राचीर से कहा था, “जैसे मैं दुनिया से कहता हूं, ‘आइए, मेक इन इंडिया कीजिए’, वैसे ही मैं देश के युवाओं से कहता हूं कि हमारा सपना होना चाहिए कि यह संदेश दुनिया के हर कोने तक पहुंचे—‘मेड इन इंडिया’. यह हमारा सपना होना चाहिए.”
PM मोदी ने मई 2020 में कोविड-19 महामारी शुरू होने के समय इस आह्वान को और आगे बढ़ाया. उन्होंने कहा, “आज दुनिया की स्थिति हमें सिखाती है कि आत्मनिर्भर भारत ही एकमात्र रास्ता है.”
इस भाषण से 55 साल पहले जनसंघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय, जिनकी 110वीं जयंती शुक्रवार को है, ने कहा था कि “हमारी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की नींव के रूप में ‘स्वदेशी’ के सकारात्मक विचार का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.” उन्होंने इसे अपने ‘एकात्म मानववाद’ या ‘Integral Humanism’ के दर्शन का हिस्सा बताया था. उन्होंने अप्रैल 1965 में बॉम्बे में चार भाषणों के जरिए यह दर्शन रखा था. इसमें उन्होंने ‘चिति’ यानी राष्ट्र की आत्मा और ‘धर्म’ जैसे विचारों पर भी बात की थी.
समय के साथ उपाध्याय की छाप भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार की ओर से उन्हें याद करने के तरीकों में भी दिखाई देती रही है. इनमें ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुंचाने के लिए दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और कौशल प्रशिक्षण व आजीविका के लिए दीनदयाल अंत्योदय योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के नाम रखना, हर साल 25 सितंबर को उनकी जयंती मनाना और नई दिल्ली में पार्टी कार्यालय के सामने उनकी 72 फुट ऊंची प्रतिमा लगाना शामिल है.
कई मायनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार भी एकात्म मानववाद के दर्शन के कम से कम कुछ हिस्सों—स्वदेशी और अंत्योदय को अपनी नीतियों में अपनाती दिखती है. इनमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाएं शामिल हैं. इसके अलावा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी), डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और आयुर्वेद व योग को बढ़ावा देना भी इसका हिस्सा है.
हालांकि, उपाध्याय के एकात्म मानववाद की विचारधारा का दूसरा हिस्सा—विकेंद्रीकरण, अब भी विवाद का विषय बना हुआ है. पिछले 12 वर्षों में केंद्र के पास राजनीतिक और वित्तीय ताकत के ज्यादा केंद्रीकरण को लेकर आलोचना हुई है. उपाध्याय की विचारधारा को जातिगत अंतर को मजबूत करने के लिए भी आलोचना का सामना करना पड़ा है. कई विद्वानों ने उनकी तुलना महात्मा गांधी से किए जाने को भी खारिज किया है.
आरएसएस पर किताबें लिख चुके अरुण आनंद ने दिप्रिंट से कहा, “दुनिया की पारंपरिक आर्थिक सोच को खारिज करते हुए मोदी सरकार ने एकात्म मानववाद पर आधारित सार्वजनिक नीति का रास्ता तैयार किया है. यह रणनीति स्वदेशी यानी आत्मनिर्भरता और अंत्योदय यानी सबसे पीछे खड़े व्यक्ति की सेवा, इन दो बुनियादी स्तंभों पर टिकी है.”
उन्होंने आगे कहा, “आत्मनिर्भर भारत जैसे कार्यक्रम सैद्धांतिक आत्मनिर्भरता को जमीन पर लागू होने वाली नीति में बदलते हैं. इससे जमीनी स्तर पर लोगों को मजबूत करना और आर्थिक आत्मनिर्भरता एक बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य के आपस में जुड़े हिस्से बन जाते हैं.”
कहां से आया यह विचार
बीजेपी के संविधान के अनुच्छेद 3 के मुताबिक, एकात्म मानववाद BJP का मूल दर्शन है. पार्टी की वेबसाइट के मुताबिक, उपाध्याय ने “लंबे समय तक सोचने, अध्ययन और विचार करने” के बाद इस विचारधारा को सामने रखा था.
हालांकि, लेखक विनय सीतापति ने अपनी किताब Jugalbandi: The BJP Before Modi में दावा किया है कि उपाध्याय के चार भाषणों का शीर्षक और उनमें बताए गए विचार “बिना श्रेय दिए” Integral Humanism: Temporal and Spiritual Problems of a New Christendom नाम की किताब से काफी मिलते-जुलते हैं. यह किताब कैथोलिक विचारक जैक्स मैरिटेन ने लिखी थी और 1936 में प्रकाशित हुई थी—उपाध्याय के इस विचार को भाषणों की सीरीज के जरिए पेश करने से करीब तीन दशक पहले.
सीतापति लिखते हैं कि “मैरिटेन का ‘Integral Humanism’ बाद में यूरोप की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टियों का मार्गदर्शक बन गया, जबकि उपाध्याय का ‘Integral Humanism’ बीजेपी की घोषित विचारधारा है.”
सीतापति ने कहा, “किसी भी नीति को सही ठहराने में इसकी लचक इसे चुनावी घोषणापत्र के लिए आदर्श बनाती है.”
उन्होंने आगे कहा, “दीनदयाल उपाध्याय का ‘Integral Humanism’ (‘एकात्म मानववाद’) क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक विचारक जैक्स मैरिटेन की 1936 में प्रकाशित इसी नाम की किताब से लिया गया था. उपाध्याय ने जो परिभाषा ली थी—पूंजीवाद और साम्यवाद के भौतिकवाद के जवाब में एक आध्यात्मिक विकल्प की जरूरत—उसे क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टियों ने ऐसी नीतियों में बदल दिया था, जिनमें मुक्त बाजार, कल्याणकारी योजनाओं और सामाजिक रूढ़िवाद को बढ़ावा दिया गया था.”
स्वदेशी
उपाध्याय ने अपने बताए आर्थिक सिस्टम के छह उद्देश्यों को समझाने के लिए दो शब्दों—स्वदेशी और विकेंद्रीकरण—का इस्तेमाल किया था.
उपाध्याय के लिए स्वदेशी देश के लिए सही आर्थिक नीतियों में से एक था. उन्होंने कहा था कि स्वदेशी के विचार का मजाक उड़ाया गया और इसे पुराने जमाने का और बदलाव के खिलाफ बताया गया.
उन्होंने कहा था, “हम गर्व से विदेशी चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं. सोच, मैनेजमेंट, पूंजी, उत्पादन के तरीकों, तकनीक आदि से लेकर यहां तक कि चीज़ों के इस्तेमाल के मानकों और तरीकों तक, हम हर चीज के लिए विदेशी मदद पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गए हैं. यह तरक्की और विकास का रास्ता नहीं है. हम अपनी पहचान भूल जाएंगे और एक बार फिर लगभग गुलाम बन जाएंगे.”
उन्होंने आगे कहा था, “स्वदेशी के सकारात्मक विचार को हमारी अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की नींव के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए.”
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विचार मोदी सरकार के शासन मॉडल में गहराई से शामिल है. पंजाब के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव और पंजाब के मुख्यमंत्री के पूर्व मुख्य प्रधान सचिव सुरेश कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “छोटी-छोटी चीजों में, हर पहल, हर नीति और हर सुधार में जो वे कर रहे हैं, उसमें उन्होंने इस विचारधारा को काफी हद तक शामिल किया है.”
उन्होंने कहा, “इस विचारधारा की बुनियादी बातें भारत की आत्मनिर्भरता, घरेलू क्षमता और आंतरिक ताकत हैं. अगर आप आर्थिक नीतियों, खाद्य नीतियों, कृषि नीतियों, नई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, कौशल आधारित आजीविका कार्यक्रमों और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को देखें, तो वे इसे (उपाध्याय की विचारधारा को लागू) कर रहे हैं.”
समय के साथ उपाध्याय के बताए स्वदेशी विचार को दिखाने वाली कई योजनाएं शुरू की गई हैं. उदाहरण के लिए, प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना 2020 में शुरू की गई थी. इसका मकसद मैन्युफैक्चरिंग पर ध्यान बढ़ाना और अलग-अलग क्षेत्रों में लक्ष्य के आधार पर, काम के प्रदर्शन से जुड़े प्रोत्साहन देकर घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना था.
यह योजना 14 मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों को कवर करती है. इसमें कंपनियों को उनके वास्तविक उत्पादन के आधार पर लाभ दिया जाता है. 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी खरीद में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता देने की नीति को भी मंजूरी दी थी. सरकार ने कहा था कि इस नई नीति से घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं की व्यवस्था को काफी बढ़ावा मिलेगा और इससे रोजगार पैदा होंगे.
2020 में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) ने सभी नए प्रोडक्ट को GeM पर रजिस्टर करते समय विक्रेताओं के लिए अपने देश का नाम बताना जरूरी कर दिया. इसका मकसद ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा देना बताया गया. पोर्टल पर ‘मेक इन इंडिया’ का फिल्टर भी दिया गया, जिससे खरीदार केवल उन्हीं प्रोडक्ट को खरीद सकते हैं, जिनमें कम से कम 50 प्रतिशत स्थानीय सामग्री हो.
न समाजवाद, न पूंजीवाद
राजनीतिक और आर्थिक विचारधाराओं की बात करें तो उपाध्याय ने समाजवाद और पूंजीवाद, दोनों विचारधाराओं को साफ तौर पर खारिज किया था. उन्होंने कहा था कि दोनों व्यवस्थाएं “समग्र इंसान, उसके असली और पूरे व्यक्तित्व और उसकी आकांक्षाओं को ध्यान में रखने में नाकाम रही हैं.”
उन्होंने समझाया था, “एक व्यवस्था इंसान को सिर्फ पैसे के पीछे भागने वाला स्वार्थी व्यक्ति मानती है, जिसके लिए सिर्फ एक ही कानून है—तेज प्रतिस्पर्धा का कानून, यानी असल में जंगल का कानून. वहीं दूसरी व्यवस्था उसे पूरी व्यवस्था में एक कमजोर और बेजान पुर्जे की तरह देखती है, जो कड़े नियमों से चलता है और जिसे निर्देश दिए बिना वह कोई अच्छा काम नहीं कर सकता.” उन्होंने आरोप लगाया था कि दोनों व्यवस्थाओं से इंसान की इंसानियत खत्म होती है.
उपाध्याय ने कहा था कि “हमें न पूंजीवाद चाहिए और न समाजवाद.” उन्होंने कहा था, “हम ‘इंसान’, यानी पूरे इंसान की तरक्की और खुशी चाहते हैं.”
जिंदल स्कूल ऑफ गवर्नमेंट एंड पॉलिसी के फैकल्टी सदस्य डॉ. प्रणव गुप्ता के मुताबिक, यह एकात्म मानववाद का एक बड़ा हिस्सा है, जो BJP की सोच में दिखाई देता है. उनके मुताबिक, इसमें व्यक्ति को केंद्र में रखने वाले पूंजीवाद और समाजवाद, दोनों को खारिज किया गया है. उन्होंने कहा, “यह तथ्य कि पार्टी की विचारधारा को इन दोनों प्रमुख विचारधाराओं में से किसी एक में आसानी से नहीं रखा जा सकता, यह भी एकात्म मानववाद की झलक है.”
इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि एकात्म मानववाद का दर्शन विकास को समझने का एक अलग तरीका देता है, जो पूंजीवाद या समाजवाद से अलग है. आनंद बताते हैं, “यह व्यक्ति को सिर्फ एक उपभोक्ता, कर्मचारी या सरकारी कल्याण का लाभ पाने वाला व्यक्ति नहीं मानता. इंसान एक-दूसरे से जुड़े सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे का हिस्सा है, जिसमें परिवार, समुदाय, राष्ट्र और प्रकृति शामिल हैं. इसलिए आर्थिक तरक्की के साथ हर व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक मेल-जोल और अवसर भी होने चाहिए.”
आनंद के मुताबिक, मोदी सरकार का शासन चलाने का तरीका भी इस विचारधारा को दिखाता है. चाहे सरकार का अंत्योदय, वित्तीय समावेशन, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) या डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर हो. उनके मुताबिक, यह सोच विकास को सबसे आखिरी व्यक्ति की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश दिखाती है. आनंद ने कहा, “ये पहल एकात्म मानववाद का पूरा हिस्सा नहीं हैं, लेकिन ये दिखाती हैं कि इसके कुछ सिद्धांत आधुनिक सरकारी नीतियों को दिशा दे सकते हैं.”
अंत्योदय
उपाध्याय के एकात्म मानववाद के दर्शन से निकला एक और विचार ‘अंत्योदय’ है. इसका मतलब समाज में सबसे आखिरी व्यक्ति का विकास और उसे ऊपर उठाना है.
उपाध्याय ने एकात्म मानववाद पर अपने भाषणों में सीधे तौर पर ‘अंत्योदय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था. हालांकि, वक्त के साथ यह विचार उनके बड़े दर्शन के एक हिस्से के तौर पर सामने आया. इस विचार की शुरुआत समझाने के लिए इसके समर्थक अक्सर उपाध्याय के नाम से कही जाने वाली एक बात का हवाला देते हैं. बीजेपी की वेबसाइट अंत्योदय के विचार को समझाते हुए उपाध्याय के हवाले से लिखती है, “आर्थिक योजना और आर्थिक प्रगति की सफलता समाज की सीढ़ी के सबसे ऊपर मौजूद लोगों से नहीं मापी जाएगी, बल्कि समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर मौजूद लोगों से मापी जाएगी.”
विशेषज्ञों के मुताबिक, मोदी सरकार की कल्याणकारी नीतियों को इसी सिद्धांत से जोड़ा जा सकता है. डॉ. गुप्ता इस बात को मानते हैं कि अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि कल्याणकारी योजनाएं मौजूदा सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खातीं. हालांकि, उनका कहना है कि यह तर्क दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद से निकले अंत्योदय के सिद्धांत की जानकारी न होने से आता है.
एकात्म मानववाद पर विस्तार से लिख चुके डॉ. गुप्ता ने दिप्रिंट से कहा, “इसलिए जब बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकारें कल्याणकारी योजनाएं चलाती हैं, तो यह किसी भी दूसरी पार्टी की तरह सिर्फ व्यावहारिक राजनीति नहीं है, बल्कि विचारधारा के साथ भी मेल खाता है.”
आनंद का भी कहना है कि अंत्योदय का विचार यह सुनिश्चित करने पर आधारित है कि विकास का फायदा उन लोगों तक पहुंचे, जो लंबे समय से औपचारिक आर्थिक और संस्थागत व्यवस्थाओं से बाहर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर वह कहते हैं कि मोदी सरकार का ‘सबका साथ, सबका विकास’ पर जोर इसी संदर्भ में समझा जा सकता है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाएं अभाव की अलग-अलग समस्याओं को दूर करने की कोशिश करती हैं. जन-धन योजना ने कम आय वाले और पहले से बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रहे लोगों के लिए बैंक खाते और औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाई है. उज्ज्वला योजना ने योग्य परिवारों, खासकर गरीब परिवारों की महिलाओं के लिए एलपीजी कनेक्शन तक पहुंच बेहतर करने की कोशिश की है. आवास और स्वच्छता से जुड़ी योजनाएं उन परिस्थितियों को बेहतर बनाने पर ध्यान देती हैं, जिनमें लोग रहते हैं.”
आनंद कहते हैं कि इस विचारधारा के नजरिए से देखें तो ये कल्याणकारी योजनाएं इस सोच को दिखाती हैं कि इंसान की गरिमा और आर्थिक व सामाजिक जीवन में उसकी भागीदारी के लिए सुरक्षित घर, साफ-सफाई वाला माहौल, वित्तीय सेवाओं तक पहुंच और घर की जरूरी सुविधाओं जैसी बुनियादी चीजों तक पहुंच जरूरी है.
कश्मीर, गोवा के सवाल
उपाध्याय का विचार था कि देशों की भी एक आत्मा या ‘चिति’ होती है. उन्होंने ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक विलियम मैकडूगल के इस सिद्धांत का जिक्र किया था कि हर व्यक्ति के समूह की एक जन्मजात प्रकृति होती है. इसी तरह, उपाध्याय ने कहा था कि “हर समाज की एक जन्मजात प्रकृति होती है, जो उसके अंदर से आती है और ऐतिहासिक परिस्थितियों का नतीजा नहीं होती.”
उन्होंने समझाया, “चिति बुनियादी है और शुरुआत से ही राष्ट्र के केंद्र में है. चिति यह तय करती है कि राष्ट्र को सांस्कृतिक रूप से किस दिशा में आगे बढ़ना है. जो कुछ चिति के अनुरूप है, वह संस्कृति का हिस्सा है.” उन्होंने कहा कि जो कानून राष्ट्र की चिति को सामने लाने और बनाए रखने में मदद करते हैं, उन्हें राष्ट्र का धर्म कहा जाता है.
उपाध्याय ने कहा था, “इसलिए यही धर्म सर्वोच्च है. धर्म राष्ट्र की आत्मा को संभालकर रखता है. अगर धर्म नष्ट हो जाता है तो राष्ट्र खत्म हो जाता है. जो कोई धर्म को छोड़ देता है, वह राष्ट्र के साथ विश्वासघात करता है.” उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा था कि “राष्ट्रीय एकता हमारा धर्म है” और यह भी बताया था कि कश्मीर या गोवा में जनमत संग्रह की मांग करना हमारे धर्म के खिलाफ था.
उन्होंने समझाया, “अगर कश्मीर के 40 लाख लोग कहते हैं कि वे अलग होना चाहते हैं, अगर गोवा के लोग कहते हैं कि वे अलग होना चाहते हैं, कुछ लोग कहते हैं कि वे पुर्तगालियों को वापस बुलाना चाहते हैं, तो यह सब धर्म के खिलाफ है.”
जहां उपाध्याय ने ‘चिति’ को राष्ट्र की आत्मा बताया, वहीं उन्होंने ‘विराट’ की बात भी की—यानी “राष्ट्र को सक्रिय करने वाली ताकत और ऊर्जा.” उन्होंने इसकी तुलना शरीर के प्राण या जीवन शक्ति से की.
राम माधव के मुताबिक, चिति से प्रेरित राष्ट्र के ‘विराट’ के जागने के उदाहरण आजादी के बाद कई मौकों पर देखने को मिले हैं. अपनी किताब The Hindutva Paradigm: Integral Humanism and the Quest for a Non-Western Worldview में माधव ने लिखा है कि ऐसे उदाहरण पड़ोसी देशों के साथ हुए युद्धों और स्वच्छ भारत जैसे अभियानों के दौरान देखने को मिले.
कुमार सरकार के संस्कृति और धार्मिक पूजा स्थलों पर जोर की ओर भी ध्यान दिलाते हैं. उन्होंने कहा, “राम जन्मभूमि इसका एक उदाहरण है. वे सांस्कृतिक राजधानियों में अच्छा काम कर रहे हैं. बनारस इसका अच्छा उदाहरण है, मथुरा भी अच्छा उदाहरण है. इसलिए वे ऐतिहासिक जगहों और इंसानी जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं का ध्यान रख रहे हैं. लेकिन इसके आगे, इंसान के पूरे आध्यात्मिक विकास का काम शायद सरकार के दायरे से थोड़ा बाहर है.”
कुमार ने आगे कहा, “वे मानववाद को ला रहे हैं और इसे शासन का एक जरूरी हिस्सा बना रहे हैं, जिस पर वे काफी सक्रिय रहे हैं…उन्होंने योग को भी शामिल किया है और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था और आयुर्वेद को बढ़ावा दे रहे हैं.”
विकेंद्रीकरण की भावना
स्वदेशी के साथ-साथ उपाध्याय ने सत्ता के विकेंद्रीकरण की भी बात की थी. हालांकि वह संविधान को संघीय के बजाय एकात्मक बनाने के पक्ष में थे, लेकिन उन्होंने समझाया था कि एकात्मक राज्य का मतलब बहुत ज्यादा तानाशाही वाला केंद्र नहीं है. उनका मानना था कि अधिकार सबसे निचले स्तर तक बांटे जाने चाहिए.
उन्होंने अपने भाषण में कहा था, “इन सभी वर्षों में, जाने-अनजाने केंद्रीकरण और एकाधिकार का चलन रहा है. योजनाकार इस सोच के शिकार हो गए हैं कि केवल बड़े स्तर पर केंद्रीकृत उद्योग ही आर्थिक रूप से फायदेमंद है और इसलिए इसके बुरे प्रभावों की चिंता किए बिना, या जानबूझकर लेकिन मजबूरी में, वे उसी दिशा में आगे बढ़ते रहे हैं. स्वदेशी का भी यही हाल रहा है.”
विकेंद्रीकरण बीजेपी सरकार के लक्ष्यों में से एक भी है. प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 की शुरुआत में कहा था, “मैं अधिकार सौंपने, विकेंद्रीकरण और सशक्तिकरण में भी विश्वास करता हूं. हमें इस सिद्धांत के साथ काम करना चाहिए कि जो काम निचले स्तर पर किया जा सकता है, उसे कभी भी ऊपरी स्तर तक नहीं ले जाना चाहिए.”
कुमार का कहना है कि बीजेपी की ग्रामीण विकास और जमीनी स्तर की आर्थिक रणनीति में सहकारी क्षेत्र को मुख्य जगह देना दिखाता है कि उसका ध्यान विकेंद्रीकृत आर्थिक व्यवस्था पर है.
हालांकि, बीजेपी सरकार को अक्सर केंद्र में शक्तियां केंद्रित करने और संघवाद को कमजोर करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा है. इसमें विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों में राज्यपाल के पद के गलत इस्तेमाल के आरोप और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय जैसी केंद्रीय एजेंसियों के इस्तेमाल के आरोप शामिल हैं.
आलोचक वित्तीय विकेंद्रीकरण के बजाय वित्तीय केंद्रीकरण की भी बात करते हैं. उनका कहना है कि सेस, सरचार्ज और शर्तों के साथ दिए जाने वाले अनुदानों पर बढ़ती निर्भरता के जरिए भारत के राज्यों से केंद्र की ओर वित्तीय शक्तियों का संतुलन बदला गया है. उनका आरोप है कि राज्यों की संसाधनों तक पहुंच ‘डबल इंजन सरकार’ होने पर निर्भर हो सकती है. उनका यह भी आरोप है कि केंद्र अपने पास संसाधनों का ज़रूरत से ज्यादा हिस्सा रख रहा था, जबकि राज्यों को संसाधनों का एक हिस्सा ऐसी “पीछे ले जाने वाली शर्तों” के साथ दिया जा रहा था, जो उनके लिए नुकसानदेह थीं.
विपक्ष ने मोदी सरकार पर यह भी आरोप लगाया है कि उसने अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा को व्यवस्थित तरीके से खत्म किया, ताकि दो या तीन पसंदीदा उद्योगपतियों के नियंत्रण वाले एकाधिकार, दो कंपनियों के वर्चस्व या कुछ कंपनियों के वर्चस्व का रास्ता साफ हो सके.
‘गांधीवादी विचारों के समर्थक’
उपाध्याय के दर्शन की एक बड़ी आलोचना उनके एकात्म मानववाद में वर्ण व्यवस्था या जाति व्यवस्था पर की गई उनकी टिप्पणियों से जुड़ी है.
फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जाफ्रेलो ने 2016 में इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में कहा था कि वर्ण व्यवस्था की जैविक एकता उनके एकात्म मानववाद के दर्शन के प्रमुख विचारों में से एक है.
अपने तीसरे भाषण में उपाध्याय ने कहा था, “चार जातियों की हमारी सोच में, उन्हें विराट पुरुष के अलग-अलग अंगों के समान माना जाता है. ऐसा कहा गया कि विराट पुरुष के सिर से ब्राह्मण, हाथों से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और पैरों से शूद्र पैदा हुए…ये अंग केवल एक-दूसरे के पूरक ही नहीं हैं, बल्कि इनके बीच व्यक्तिगत एकता भी है. हितों की पूरी समानता है, एक-दूसरे से जुड़े होने की पूरी भावना है.”
इसका ज़िक्र करते हुए जाफ्रेलो ने कहा था कि “वर्ण व्यवस्था की जैविक एकता उनके एकात्म मानववाद के दर्शन के प्रमुख विचारों में से एक है.” उन्होंने लिखा था, “उनके लिए वर्ण व्यवस्था ऐसी जैविक एकता से जुड़ी थी, जो राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती थी.”
अपनी किताब में माधव ने उपाध्याय की तारीफ करते हुए उन्हें “गांधीवादी विचारों का समर्थक” बताया है. उन्होंने लिखा है, “गांधी की तरह दीन दयाल ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए स्वदेशी और विकेंद्रीकरण को रामबाण माना था.” हालांकि, इस तुलना की भी आलोचना हुई है.
मशहूर विद्वान एजी नूरानी ने फ्रंटलाइन में ‘Deendayal Upadhyaya: Merchant of Hate’ शीर्षक से लिखे एक कड़े लेख में जाफ्रेलो के तर्कों का जिक्र किया और उपाध्याय को भारत में महात्मा गांधी जैसा सम्मान देने की बीजेपी की कोशिश पर आपत्ति जताई. नूरानी ने लिखा कि उपाध्याय “बहुत कट्टर सांप्रदायिक” थे और “मुसलमानों से नफरत करते थे और उन पर भरोसा नहीं करते थे.”
हालांकि, अपने भाषण के आखिर में उपाध्याय ने संस्कृति की रक्षा करने के साथ-साथ उसे फिर से जीवंत करने की बात भी कही थी, ताकि उसे “गतिशील और समय के अनुसार” बनाया जा सके. उन्होंने कहा था, “अगर आज समाज में छुआछूत जैसी बुराइयां हैं, जिनकी वजह से लोग दूसरे इंसानों को खुद से नीचे समझते हैं और इस तरह राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा पैदा होता है, तो हमें ऐसी बुराइयों को खत्म करना होगा.”
हालांकि, व्यक्ति और समाज की तुलना करते हुए उपाध्याय ने विनोबा भावे और आरएसएस के सर संघचालक के बीच हुई एक बातचीत का भी जिक्र किया था कि हिंदुओं और मुसलमानों के सोचने के तरीके में क्या अंतर है. उपाध्याय ने अपने भाषण में कहा, “गुरुजी ने विनोबा जी से कहा कि हर समाज में अच्छे और बुरे लोग होते हैं. हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों में भी ईमानदार और अच्छे लोग मिल सकते हैं. इसी तरह दोनों समाजों में बदमाश लोग भी देखे जा सकते हैं. किसी खास समाज का अच्छाई पर एकाधिकार नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “हालांकि, यह देखा जाता है कि हिंदू, भले ही वे व्यक्तिगत जीवन में बदमाश हों, जब वे एक समूह में साथ आते हैं, तो वे हमेशा अच्छी चीजों के बारे में सोचते हैं. दूसरी ओर, जब दो मुसलमान साथ आते हैं, तो वे ऐसी चीजों का प्रस्ताव और समर्थन करते हैं, जिनके बारे में वे खुद अपने व्यक्तिगत जीवन में सोच भी नहीं सकते. वे पूरी तरह अलग तरीके से सोचने लगते हैं.”
उन्होंने कहा कि विनोबा भावे ने माना था कि इस बयान में सच्चाई थी, लेकिन उनके पास इसे समझाने की कोई वजह नहीं थी.
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