नई दिल्ली: पिछले साल, नीरज चौधरी यूपीएससी सिविल सर्विसेज़ इंटरव्यू तक पहुंच गए थे. इस साल, उन्हें डर है कि शायद वे प्रीलिम्स एग्जाम भी पास न कर पाएं.
रुकावट सिविल सर्विसेज़ एप्टीट्यूड टेस्ट, या CSAT है, जिसने 15 साल पहले शुरू होने के बाद से लाखों एस्पिरेंट्स को परेशान किया है. इस क्वालिफाइंग टेस्ट में फेल होने पर, कैंडिडेट के जनरल स्टडीज़ स्कोर पर भी विचार नहीं किया जाता है. उनके कैलकुलेशन के आधार पर, 24 साल के इस एस्पिरेंट को क्वालिफाइंग मार्क से एक पॉइंट कम मिल सकता है.
दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहने वाले और प्रीलिम्स रिजल्ट का इंतज़ार कर रहे चौधरी ने कहा, “मैंने कुछ बेवकूफी भरी गलतियां कीं. एग्जाम साइंस बैकग्राउंड वाले स्टूडेंट्स को फायदा देता है. इसलिए, हिंदी मीडियम के एस्पिरेंट्स को ज़्यादा मेहनत करनी होगी. मैंने पिछले अटेम्प्ट्स में इसकी तैयारी की थी और अच्छे नंबर लाए थे, लेकिन इस साल मैं इससे बेहतर नहीं कर सका.”
CSAT UPSC सिविल सर्विसेज़ एग्जाम का सबसे ज़्यादा विवादित पेपर बना हुआ है. 15 सालों से, मुखर्जी नगर की कोचिंग गलियों से लेकर पार्लियामेंट और कोर्ट तक, इसके इर्द-गिर्द ज़ोरदार विरोध और बहस होती रही है. सपोर्टर इसे भविष्य के ब्यूरोक्रेट्स के लिए एक ज़रूरी फिल्टर कहते हैं. क्रिटिक्स इसे एक ऐसा रोड़ा कहते हैं जो ह्यूमैनिटीज़, हिंदी-मीडियम और ग्रामीण कैंडिडेट्स को बाहर रखता है, जबकि एक नया महंगा कोचिंग मार्केट पैदा करता है.
अब, एक नई पार्लियामेंट्री सिफारिश ने लड़ाई को फिर से शुरू कर दिया है, जिसमें बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृज लाल की हेडिंग वाली एक कमेटी ने UPSC से बराबरी का मौका देने के लिए पेपर का रिव्यू करने को कहा है. इस अप्रैल में पार्लियामेंट में, बृज लाल एक कदम और आगे बढ़ गए. उन्होंने CSAT को “डायवर्सिटी के लिए सबसे बड़ी रुकावट” कहा और कहा कि इसे या तो खत्म कर देना चाहिए या रैशनलाइज़ करना चाहिए.
उनकी यह बात CSAT पर नाराज़गी के एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद आई है, जो UPSC के इतिहास में सबसे बड़े प्रोटेस्ट में बदल गई थी, जिसमें स्टूडेंट लीडर्स ने रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, मुरली मनोहर जोशी और मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े नेताओं की लॉबिंग की थी. हालांकि, इस दबाव में CSAT ने दो बार अपना रूप बदला, लेकिन पुरानी शिकायतें दूर नहीं हुई हैं.
CSAT को एग्जाम को और ज़्यादा एक्सक्लूज़नरी बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था. सिस्टम ठीक उसी तरह काम कर रहा है जिस तरह से इसे काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था. पिछले 15 सालों में, आप देख सकते हैं कि हिंदी मीडियम और रीजनल भाषा वाले बैकग्राउंड के कैंडिडेट मेन्स या इंटरव्यू स्टेज तक भी कम पहुंच रहे हैं.
-विजेंद्र चौहान, एसोसिएट प्रोफेसर और UPSC मॉक इंटरव्यू मेंटर
बड़ी लड़ाई भारत की ब्यूरोक्रेसी की बेसिक पहचान को लेकर है. 2011 में रट्टा मारने की आदत को खत्म करने के लिए जो सुधार शुरू हुआ था, क्रिटिक्स का कहना है कि उसने इसे पास करने वालों के सोशल और एकेडमिक मिक्स को बदल दिया है, जहां पहले प्रीलिमिनरी कैंडिडेट जनरल स्टडीज़ (GS) और चुने हुए ऑप्शनल सब्जेक्ट के ज़रिए अपनी ताकत पर भरोसा करते थे, वहीं CSAT ने लॉजिक, रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन और क्वांटिटेटिव एप्टीट्यूड की ज़रूरी स्क्रीनिंग शुरू की.
तब से, सिविल सर्विसेज़ में इंजीनियरिंग और दूसरे टेक्निकल बैकग्राउंड से सिलेक्शन का हिस्सा बढ़ा है, जबकि कई दूसरे लोग कहते हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है. 2009 में, ह्यूमैनिटीज़ ग्रेजुएट्स का सिलेक्शन 44 परसेंट था. 2011 में, उनका हिस्सा घटकर 27 परसेंट रह गया, और तब से 30 परसेंट तक भी नहीं पहुंचा है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर और कई सालों से मॉक इंटरव्यू कर रहे विजेंद्र चौहान ने कहा, “CSAT को परीक्षा को और ज़्यादा एक्सक्लूसिव बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया था. सिस्टम ठीक वैसे ही काम कर रहा है जैसे इसे काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया था. पिछले 15 सालों में, आप देख सकते हैं कि हिंदी मीडियम और रीजनल भाषा के बैकग्राउंड से कम कैंडिडेट मेन्स या इंटरव्यू स्टेज तक भी पहुंच रहे हैं.”

इस बीच, CSAT के सपोर्टर कहते हैं कि अगर कोई आने वाला आईएएस ऑफिसर 33 परसेंट वाला एप्टीट्यूड पेपर पास नहीं कर पाता है, तो वह शायद काम की एनालिटिकल डिमांड के लिए तैयार नहीं है.
इस मार्च में राज्यसभा में एक लिखित जवाब में यूनियन मिनिस्टर जितेंद्र सिंह ने कहा, “CSAT एक क्वालिफाइंग पेपर है और इसका मकसद क्वालिटी और एनालिटिकल कॉम्पिटेंस का मिनिमम स्टैंडर्ड पक्का करना है. सवालों का लेवल मैट्रिक लेवल जैसा है.”
चार साल पहले, चौधरी आईएएस ऑफिसर बनने का सपना लेकर जयपुर से दिल्ली आए थे. एक प्राइवेट कॉलेज से बीएससी ग्रेजुएट, उन्होंने पॉलिटिकल साइंस और इंटरनेशनल रिलेशंस को अपना ऑप्शनल सब्जेक्ट चुना और 2023 में अपना पहला अटेम्प्ट दिया.
उस साल, CSAT उनकी हार का कारण बना. उन्होंने जनरल स्टडीज़ का पेपर 79.45 मार्क्स के साथ पास किया, लेकिन CSAT में सिर्फ 55.83 मार्क्स लाए, जो क्वालिफाइंग मार्क 66 से कम है.

इसके बाद, उन्होंने अपना परफॉर्मेंस बदल दिया, जनरल स्टडीज़ में 118 और CSAT में 108.33 मार्क्स लाए. अब उन्हें डर है कि वह फिर से वहीं पहुँच गए हैं जहाँ से शुरू हुआ था. कई दूसरे स्टूडेंट्स की तरह, उनका भी दावा है कि इस साल CSAT ज़्यादा मुश्किल था.
चौधरी ने कहा, “उन्होंने कॉम्प्रिहेंशन सेक्शन को कम कर दिया, जिससे आमतौर पर ह्यूमैनिटीज़ के स्टूडेंट्स को मदद मिलती है. मैथ्स का हिस्सा लंबा था और क्लास 10-लेवल के पेपर से कहीं ज़्यादा था. इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले मेरे दोस्तों को इसके लिए ज़्यादा तैयारी नहीं करनी पड़ी, लेकिन मुझे सिर्फ़ CSAT के लिए काफी समय देना पड़ा.”
CSAT का सफर: कैसे शुरू हुआ विवाद और क्यों आज भी जारी है बहस
यूपीएससी की परीक्षा में शायद ही कोई ऐसा बदलाव हुआ हो जिसने सिविल सेवा एस्पिरेंट्स के बीच सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट (CSAT) जितना विरोध और गुस्सा पैदा किया हो.
इस परीक्षा की अवधारणा पहली बार 2001 में सामने आई थी, जब अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री वाई.के. अलघ की अध्यक्षता वाली सिविल सर्विसेज रिव्यू कमेटी ने सुझाव दिया था कि एस्पिरेंट्स का मूल्यांकन किसी एक समान विषय के आधार पर किया जाना चाहिए.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, “एस्पिरेंट्स की उनके अपने विषयों में दोबारा परीक्षा लेना ज्यादा उपयोगी नहीं लगता. विश्वविद्यालय पहले ही यह काम कर चुके हैं. महत्वपूर्ण यह है कि किसी विषय का सिविल सेवक की नौकरी की आवश्यकताओं से कितना संबंध है, खासकर बदलते समय में.”
हालांकि, इस विचार को लागू होने में लगभग एक दशक लग गया.
2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रारंभिक परीक्षा में CSAT लागू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी. यह प्रस्ताव विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व उपाध्यक्ष एस.के. खन्ना की अध्यक्षता वाली एक सदस्यीय समिति की सिफारिशों पर आधारित था.
इसका उद्देश्य रटकर याद की गई जानकारी की बजाय उम्मीदवारों की अवधारणात्मक समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता की जांच करना था.

24 साल के नीरज चौधरी ने CSAT की तैयारी के लिए जो मटीरियल इस्तेमाल किया, उसे UPSC प्रीलिम्स क्वालिफाइंग मार्क से एक पॉइंट कम होने का डर है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंटउस समय तक यूपीएससी प्रीलिम्स में दो पेपर होते थे. पहला जनरल स्टडीज (GS) और दूसरा उम्मीदवार द्वारा चुना गया वैकल्पिक विषय, जैसे इतिहास, समाजशास्त्र, भूगोल या लोक प्रशासन. दोनों पेपर मेरिट में शामिल होते थे, लेकिन 2011 में वैकल्पिक विषय का पेपर हटा दिया गया और उसकी जगह CSAT को शामिल किया गया. उस समय CSAT के अंक भी मेरिट में जोड़े जाते थे.
कई अधिकारियों और कोचिंग संस्थानों ने इस बदलाव का स्वागत किया. उनका मानना था कि इससे चयन प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी.
चाणक्य आईएएस अकादमी के संस्थापक ए.के. मिश्रा ने कहा था, “यह उम्मीदवारों को प्रशासकों की तरह सोचने में मदद करेगा.” राव स्टडी सर्किल के वी.के. गुप्ता ने कहा था, “इससे चयन प्रक्रिया अधिक वस्तुनिष्ठ, मानवीय और पारदर्शी बनेगी.”
हालांकि, छात्रों की राय बंटी हुई थी. कुछ एस्पिरेंट्स ने रटने पर निर्भरता कम होने का स्वागत किया, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों और हिन्दी माध्यम के छात्रों ने अंग्रेज़ी पर आधारित प्रश्नों और STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) पृष्ठभूमि वाले छात्रों को मिलने वाले कथित लाभ का विरोध किया.
CSAT काफी हद तक इसलिए विवादित हो गया है क्योंकि कई एस्पिरेंट अपनी तैयारी के दौरान इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं…किसी भी कॉम्पिटिटिव परीक्षा का मतलब है एलिमिनेशन के ज़रिए सिलेक्शन, और CSAT इसी मकसद को पूरा करता है
-सुबूर शर्मा, IIT रुड़की ग्रेजुएट और UPSC एस्पिरेंट
यह असंतोष 2013 और 2014 में अपने चरम पर पहुंच गया. संसद और यूपीएससी कार्यालय के बाहर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने भी ‘ब्लैक डे’ धरने का ऐलान किया. संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर भारी हंगामा हुआ. 1 अगस्त 2014 को राज्यसभा में विपक्ष ने विरोध स्वरूप वॉकआउट किया. वहीं अभ्यर्थियों ने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं भी दायर कीं.
बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने 2014 में आंशिक रूप से पीछे हटते हुए फैसला किया कि अंग्रेज़ी कॉम्प्रिहेंशन के अंकों को मेरिट में नहीं जोड़ा जाएगा. हालांकि, CSAT को पूरी तरह नहीं हटाया गया.
इसके अगले वर्ष 2015 में CSAT को पूरी तरह क्वालिफाइंग पेपर बना दिया गया. यानी इसके अंक अंतिम मेरिट में शामिल नहीं किए जाते, लेकिन एस्पिरेंट्स को जनरल स्टडीज की उत्तर पुस्तिका जांचे जाने के लिए 200 में से कम से कम 66 अंक यानी 33 प्रतिशत अंक हासिल करना अनिवार्य है.
इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ.
आज भी लगभग हर साल यूपीएससी एस्पिरेंट्स के बीच CSAT को लेकर असंतोष देखने को मिलता है. सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर इसकी कठिनाई और प्रकृति को लेकर लगातार बहस होती रहती है.
कुछ हफ्ते पहले रेडिट पर एक एस्पिरेंट ने लिखा, “CSAT इतना मुश्किल क्यों है? GS में अच्छे अंक आने के बावजूद CSAT में पास नहीं हो पा रहा हूं.” पिछले वर्ष एक अन्य एस्पिरेंट ने इसे “खामोश तरीके से बाहर कर देने वाला पेपर” बताया था और लिखा था कि यह “बिना शोर किए आपके यूपीएससी के सपने को खत्म कर सकता है.”
CSAT के बाद यूपीएससी चयन में क्या बदला
CSAT को लेकर एस्पिरेंट्स की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक यह है कि इसके बाद सिविल सेवा में चयनित एस्पिरेंट्स की प्रोफाइल बदल गई है. खासकर इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई.
2023 में संसद की एक स्थायी समिति के सामने रखे गए आंकड़ों के अनुसार, 2011 में सफल एस्पिरेंट्स में इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले अभ्यर्थियों की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत थी. 2020 तक यह बढ़कर 65 प्रतिशत हो गई.
इसी अवधि में मानविकी विषयों से आने वाले एस्पिरेंट्स की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत से घटकर 23 प्रतिशत रह गई. हालांकि, यूपीएससी की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी घटकर 53.1 प्रतिशत रह गई है.

इसके बावजूद विज्ञान विषयों से आने वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 11.2 प्रतिशत और मेडिकल पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत रही. यानी कुल मिलाकर 71 प्रतिशत चयनित उम्मीदवार विज्ञान, इंजीनियरिंग और मेडिकल पृष्ठभूमि से थे, जबकि मानविकी विषयों से आने वाले उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 29 प्रतिशत रही.
भाषा का मुद्दा भी इस बहस का एक अहम हिस्सा है.
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) के आंकड़ों के अनुसार, 2013 में हिन्दी माध्यम में परीक्षा देने वाले उम्मीदवार सिविल सेवा में चयनित अभ्यर्थियों का लगभग 17 प्रतिशत थे.
लेकिन 2014 में यह संख्या घटकर सिर्फ 2.11 प्रतिशत रह गई. इसके बाद अगले पांच वर्षों तक हिन्दी माध्यम के सफल उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत से नीचे ही बनी रही.
अब CSAT को कथित रूप से भेदभावपूर्ण और बहिष्करणकारी बताने वाली बहस एक बार फिर संसद तक पहुंच गई है.
मार्च 2026 में सांसद बृजलाल की अध्यक्षता वाली विभाग संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने यूपीएससी से CSAT की समीक्षा करने की सिफारिश की.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “यूपीएससी को CSAT के पाठ्यक्रम और कठिनाई स्तर सहित इसके पूरे ढांचे की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए, ताकि इसे अधिक संतुलित और तर्कसंगत बनाया जा सके.”
रिपोर्ट में दिव्यांगता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) प्रमाणपत्रों के कथित दुरुपयोग का मुद्दा भी उठाया गया. समिति ने इन प्रमाणपत्रों के सत्यापन की प्रक्रिया को और मजबूत बनाने की सिफारिश की.
समिति ने यह भी कहा कि CSAT की किसी भी समीक्षा को उम्मीदवारों के प्रदर्शन से जुड़े ठोस आंकड़ों और अनुभवजन्य विश्लेषण पर आधारित होना चाहिए, ताकि चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता, समावेशिता और समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकें.
फिलहाल यूपीएससी की ओर से इस सिफारिश पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है.
दिप्रिंट ने ईमेल और फोन के जरिए यूपीएससी से संपर्क किया है. यदि आयोग की ओर से कोई जवाब मिलता है तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
CSAT ने खड़ा किया नया कोचिंग कारोबार
CSAT ने जहां एक बड़े वर्ग के एस्पिरेंट्स में निराशा पैदा की है, वहीं इसने एक नए कोचिंग उद्योग को भी जन्म दिया है. इसका खर्च मुख्य रूप से हिन्दी माध्यम और गैर-इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के छात्रों को उठाना पड़ रहा है.
2010 के दशक के मध्य तक मुखर्जी नगर और अन्य कोचिंग केंद्रों में संस्थान मुख्य रूप से जनरल स्टडीज और वैकल्पिक विषयों की तैयारी कराते थे. अभ्यर्थी CSAT की तैयारी खुद करते थे, लेकिन जैसे-जैसे इसकी कठिनाई को लेकर शिकायतें बढ़ीं, खासकर 2023 की प्रारंभिक परीक्षा के बाद, अलग से CSAT बैच आम हो गए.
बिहार के किसान परिवार से आने वाले और फिलहाल मुखर्जी नगर में रहकर तैयारी कर रहे यूपीएससी एस्पिरेंट सचिन पांडे ने कहा, “हमारी बुनियादी तैयारी उतनी मजबूत नहीं होती और हमारा ज्यादा ध्यान जनरल स्टडीज पर रहता है, इसलिए कोचिंग मदद करती है. लेकिन यह हमारी जेब पर अतिरिक्त बोझ भी डालती है, खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए. आईआईटी और बड़े संस्थानों से पढ़े छात्र अक्सर ऐसी कोचिंग के बिना भी काम चला लेते हैं.”

कोचिंग संस्थानों का कहना है कि जिन छात्रों की गणित और रीजनिंग में पकड़ कमजोर होती है, उनके लिए ये कक्षाएं जरूरी हैं.
CSAT कोर्स की फीस संस्थान, अवधि और टेस्ट सीरीज के आधार पर लगभग 8,000 रुपये से 25,000 रुपये तक होती है. प्रीलिम्स से पहले एक महीने के क्रैश कोर्स भी चलाए जाते हैं. इनमें मात्रात्मक योग्यता, तार्किक क्षमता, कॉम्प्रिहेंशन, पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र और मॉक टेस्ट शामिल होते हैं.
हमारे बेसिक्स उतने क्लियर नहीं हैं और हम ज़्यादातर जनरल स्टडीज़ पर फोकस करते हैं, इसलिए कोचिंग से मदद मिलती है, लेकिन यह हमारी जेब पर एक और प्रेशर है, खासकर उन लोगों के लिए जो गांव के बैकग्राउंड से आते हैं. जो एस्पिरेंट्स IITs और बड़े इंस्टीट्यूशन्स से पढ़े हैं, उन्हें इसकी ज़रूरत नहीं है
– सचिन पांडे, UPSC एस्पिरेंट
हरियाणा के एक निजी कॉलेज से मानविकी विषय में ग्रेजुएट 26-वर्षीय लक्ष्मी योगी के लिए यह खर्च दो बार CSAT में असफल होने के बाद मजबूरी बन गया.
लक्ष्मी योगी ने कहा, “मैं लगातार दो बार CSAT पास नहीं कर पाई. उसके बाद मैंने तय किया कि मुझे कोचिंग जॉइन करनी चाहिए. आखिरकार मैंने 25,000 रुपये फीस देकर कोचिंग शुरू की.”
दिल्ली के नजफगढ़ में अपने पति के साथ रहने वाली लक्ष्मी रोज करीब एक घंटे का सफर तय करके कोचिंग जाती हैं. साथ ही घर की जिम्मेदारियों और यूपीएससी की तैयारी भी संभालती हैं.
हालांकि, 2014 के बाद यूपीएससी ने CSAT के पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन कई एस्पिरेंट्स और कोचिंग विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवहारिक तौर पर यह पेपर पहले से अधिक गणित आधारित हो गया है.
यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एडटेक प्लेटफॉर्म टेस्टबुक के विश्लेषण के अनुसार 80 प्रश्नों वाले CSAT पेपर में गणित के सवालों का हिस्सा लगातार बढ़ा है. 2015 में जहां गणित के 15 प्रश्न थे, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 37 हो गई. 2020 में यह संख्या 40 तक पहुंच गई थी. वहीं रीजनिंग के प्रश्न 2015 में 35 से घटकर 2024 में 16 रह गए. कॉम्प्रिहेंशन के प्रश्नों की संख्या अपेक्षाकृत स्थिर रही और 30 से घटकर 27 हुई.
जो एस्पिरेंट गणित की बजाय कॉम्प्रिहेंशन पर अधिक निर्भर रहते हैं, उनके बीच इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि बिना आधिकारिक बदलाव के भी CSAT लगातार कठिन होता जा रहा है.
छात्रों की बंटी हुई राय
सांसद बृजलाल की सिफारिश ने मुखर्जी नगर में पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है.
हिंदी मीडियम और छोटे शहरों से आने वाले एस्पिरेंट्स के लिए यह संकेत है कि संसद ने आखिरकार उनकी बात सुनी है, लेकिन विज्ञान और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के कई छात्र मानते हैं कि गंभीर तैयारी करने वाला कोई भी उम्मीदवार CSAT आसानी से पास कर सकता है.
29 साल के सचिन पांडे अब तक सिविल सेवा परीक्षा के पांच प्रयास दे चुके हैं. दो बार वे CSAT में असफल हुए और दो बार जनरल स्टडीज में पीछे रह गए, लेकिन उनके मुताबिक सबसे ज्यादा अन्यायपूर्ण पेपर CSAT ही है.
सचिन पांडे ने कहा, “गणित के कई प्रश्न इंजीनियरिंग स्तर के लगते हैं. पेपर बहुत कठिन होता है. साफ है कि इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले छात्रों को इसका फायदा मिलता है. 2023 में भी ऐसा ही था और इस साल भी स्थिति वैसी ही रही. हमें बराबरी का मौका नहीं मिलता.”
पिछले वर्ष मुख्य परीक्षा लिख चुके सचिन ने दिल्ली के हिन्दू कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ग्रेजुएशन किया है.

छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से आने वाले अभ्यर्थियों का कहना है कि अंग्रेजी कॉम्प्रिहेंशन और कठिन गणितीय प्रश्नों वाला यह पेपर उन छात्रों को नुकसान पहुंचाता है जिन्हें प्रतिष्ठित स्कूलों या तकनीकी शिक्षा तक पहुंच नहीं मिली.
2014 के CSAT विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहे और अब उत्तर प्रदेश सरकार में कार्यरत अविनाश सिंह ने कहा, “ऐसा नहीं होना चाहिए था. परीक्षा का स्तर बहुत ऊंचा है. कोई निश्चित पैटर्न नहीं है. क्या पूछा जाएगा, यह भी स्पष्ट नहीं होता. इसे मेरिट से हटाकर क्वालिफाइंग तो बना दिया गया, लेकिन मानविकी और हिन्दी माध्यम के छात्रों का नुकसान आज भी जारी है.”
हालांकि, कुछ एस्पिरेंट्स का मानना है कि एक साल की व्यवस्थित तैयारी CSAT पास करने के लिए पर्याप्त है.
आईआईटी रुड़की से ग्रेजुएट और यूपीएससी एस्पिरेंट सुबूर शर्मा ने कहा, “CSAT विवादित इसलिए हुआ है क्योंकि कई एस्पिरेंट्स अपनी तैयारी के दौरान इसे गंभीरता से नहीं लेते. पेपर की समीक्षा हो सकती है और मात्रात्मक योग्यता वाले हिस्से में बदलाव भी किया जा सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करना गलती होगी. किसी भी प्रतियोगी परीक्षा का उद्देश्य चयन और छंटनी होता है, और CSAT वही भूमिका निभाता है.”
2015 में सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले एक आईएएस अधिकारी ने भी CSAT का बचाव किया. पहचान उजागर न करने की शर्त पर उन्होंने कहा कि 33 प्रतिशत का क्वालिफाइंग मानक कोई बहुत कठिन लक्ष्य नहीं है
आईएएस अधिकारी ने कहा, “जो व्यक्ति CSAT के सवाल नहीं हल कर सकता, वह एक नौकरशाह के तौर पर रिपोर्टों में दिए गए आंकड़ों को भी ठीक से नहीं समझ पाएगा. CSAT पास करने के लिए जरूरी प्रतिशत काफी कम है और सवाल भी इतने मुश्किल नहीं होते. आराम से पेपर दीजिए, सही सवाल हल कीजिए और जो प्रश्न शुरुआत से ही लंबे लगें उन्हें छोड़ दीजिए.”
उन्होंने कहा कि 15 साल किसी भी परीक्षा के लिए पर्याप्त समय होता है ताकि अभ्यर्थी उसके अनुरूप खुद को ढाल सकें.
आईएएस अधिकारी ने कहा, “हमने मुखर्जी नगर के आंदोलन देखे हैं. यह यूपीएससी के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन था. उससे कुछ बदलाव भी हुए, लेकिन अब 15 साल हो चुके हैं और किसी भी परीक्षा के अनुरूप खुद को ढालने के लिए यह पर्याप्त समय है.”
क्या CSAT विरोध अब भी अधूरा है?
2014 में CSAT के खिलाफ हुए बड़े छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक नीलोत्पल मृणाल थे, जो आज लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं.
नीलोत्पल मृणाल ने 2008 में यूपीएससी की तैयारी शुरू की थी. लेकिन 2011 में CSAT लागू होने के बाद उनकी तैयारी की दिशा बदल गई. 2012 में उन्होंने प्रीलिम्स तो पास कर लिया, लेकिन मुख्य परीक्षा में सफल नहीं हो सके. इसके बाद CSAT को लेकर उनका संघर्ष और गहरा हो गया. हालांकि विरोध धीरे-धीरे विकसित हुआ.
नीलोत्पल मृणाल ने कहा, “यह एक नया सुधार था, इसलिए हमें इसे समझने में समय लगा. हमने शुरुआत में इसका विरोध नहीं किया. लेकिन फिर मैंने देखा कि जो अभ्यर्थी पहले इंटरव्यू तक पहुंच चुके थे, वे भी परीक्षा में सफल नहीं हो पा रहे थे. कई मेधावी छात्र संघर्ष कर रहे थे. इसी वजह से तीन साल बाद छात्र सड़कों पर उतर आए.”

मृणाल के अनुसार, 2011 से 2013 के बीच हिन्दी माध्यम के कम अभ्यर्थी प्रीलिम्स पास कर पा रहे थे. लेकिन जो उम्मीदवार मुख्य परीक्षा तक पहुंचते थे, उनमें बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की थी जिन्होंने भारतीय भाषा के रूप में हिन्दी चुनी थी.
उनके मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता था कि समस्या छात्रों की योग्यता नहीं, बल्कि नई स्क्रीनिंग व्यवस्था थी.
उन्होंने यह भी कहा कि इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले कई उम्मीदवार मुख्य परीक्षा में समाजशास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे मानविकी विषयों को वैकल्पिक विषय के रूप में चुनते हैं क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत अधिक अंक दिलाने वाला माना जाता है.
नीलोत्पल मृणाल ने कहा, “निराशा धीरे-धीरे गुस्से में बदली और फिर आंदोलन का रूप ले लिया.”
उन दिनों अभ्यर्थी मुखर्जी नगर से जंतर-मंतर तक मार्च निकालते थे. कई छात्रों ने सिर मुंडवाए, नौ दिन तक भूख हड़ताल की और तिरपाल के नीचे रातें बिताईं. उनकी मांग थी कि CSAT में बदलाव किए जाएं.
आखिरकार इस आंदोलन के दबाव में सरकार को परीक्षा में CSAT की भूमिका कम करनी पड़ी.
आज यह आंदोलन यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्रों के बीच एक तरह की दास्तान बन चुका है. लेकिन मुखर्जी नगर के हॉस्टलों और कोचिंग कक्षाओं में CSAT को लेकर बहस आज भी उतनी ही तीखी है जितनी एक दशक पहले थी.
यूपीएससी अभ्यर्थी सचिन पांडे ने कहा, “छात्रों ने यह स्वीकार कर लिया है कि CSAT उस सपने का हिस्सा है जिसे पाने के लिए वे संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन आज भी उन्होंने इसे पूरी तरह निष्पक्ष नहीं माना है.”
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