Monday, 23 May, 2022
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84 दिन, कोर्ट में पांच तारीखें, जमानत पर सुनवाई नहीं-केस डायरी ने इंदौर के चूड़ी विक्रेता का मामला अटकाया

कथित तौर पर खुद को हिंदू बताकर महिलाओं को चूड़ियां बेचने के आरोप में पीटा गया तसलीम अली 23 अगस्त से जेल में है. प्रक्रियागत देरी के कारण मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में पांच तारीखों के बावजूद जमानत पर सुनवाई नहीं हो पाई है.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में चूड़ी बेचनेवाले तसलीम अली की इंदौर के बाणगंगा इलाके में बच्ची से छेड़छाड़ के आरोप में भीड़ द्वारा पिटाई और कथित तौर पर अली के धर्म के कारण निशाना बनाने के बाद गिरफ्तारी के 84 दिन बीत चुके हैं और पांच बार अदालत में तारीखें पड़ चुकी हैं. उसे पीटने के आरोपी जहां जमानत पर बाहर हैं. वहीं अली की जमानत पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई तक नहीं हो सकी है.

राज्य की एक जिला कोर्ट ने 1 सितंबर को अली की जमानत याचिका खारिज कर दी थी जिसके बाद उसने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. वहां भी पांच तारीखें पड़ने के बावजूद इस पर सुनवाई होनी बाकी है.

आखिरी तारीख 9 नवंबर को पड़ी थी लेकिन मामले की सुनवाई नहीं हुई जिसके बाद जज ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया.

4 से 28 अक्टूबर के बीच पिछली चार तारीखों के दौरान केस डायरी उपलब्ध न होने जैसी प्रक्रियागत देरी के कारण मामले को स्थगित कर दिया गया था.

किसी भी मामले की केस डायरी पुलिस अधिकारियों द्वारा तैयार की जाती है जिसमें जांच कैसे की गई समेत अन्य पूरा ब्यौरा होता है जैसे कि जांच किस तारीख को शुरू हुई, जांच के एक हिस्से के तौर पर किन स्थानों का दौरा किया गया आदि. केस डायरी अदालत के लिए किसी मामले की जांच या कार्यवाही के बारे में जानने का एक साधन है. हालांकि, यह सबूत के तौर पर अस्वीकार्य है.

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दिप्रिंट के पास इस मामले में अब तक की सभी तारीखों पर जारी अदालती आदेश की कॉपी मौजूद है.

दिप्रिंट से बातचीत के दौरान लोक अभियोजन और मध्य प्रदेश पुलिस दोनों ने देरी के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया. अभियोजन पक्ष ने जहां कोर्ट को बताया कि सुनवाई की तारीखों पर केस डायरी उपलब्ध नहीं थी, जो दो बार तारीखें टलने का कारण बनी. वहीं मध्य प्रदेश पुलिस ने कहा कि देरी उनकी ओर से नहीं हुई है और जब मांगा गया तो दस्तावेज मुहैया कराए गए थे.

संयोग से, हाईकोर्ट में तसलीम की जमानत पर सुनवाई की दो तारीखों पर जो केस डायरी उपलब्ध नहीं थी, वह जिला अदालत में सुनवाई के दौरान मौजूद थी.

अली के वकील एहतेशाम हाशमी ने अपने मुवक्किल पर लगे आरोपों को मनगढ़ंत करार देते हुए कहा कि उसे ‘अज्ञात कारणों’ से जमानत नहीं दी जा रही है. उन्होंने कहा कि अली के खिलाफ कोई सबूत नहीं है और अगर उनके कथित हमलावरों को जमानत दी जा सकती है तो उसे भी मिलनी चाहिए.

इस बीच, अली की जमानत के लिए दर-दर भटक रहे उसके परिवार ने सवाल उठाया है कि क्या उन्हें ‘मुसलमान होने’ की सजा दी जा रही है.

यह मामला 22 अगस्त की एक घटना से जुड़ा है जब मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के शब्दों में अली ‘एक अन्य समुदाय’ का होने के बावजूद कथित तौर पर हिंदू के रूप में महिलाओं को चूड़ियां बेच रहा था. अली की पिटाई की घटना का एक वीडियो तुरंत वायरल हो गया और नतीजतन पुलिस को एफआईआर दर्ज करनी पड़ी. इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

हालांकि, 24 घंटे के भीतर ही अली को भी गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन एक नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में जो चूड़ी-विक्रेता पर हमले के आरोपी एक व्यक्ति की बेटी थी. जैसा कि दिप्रिंट पहले ही जानकारी दे चुका है कि इस घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठे थे.

अली के खिलाफ 22 अक्टूबर को यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण संबंधी पोक्सो कानून के अलावा भारतीय दंड संहिता के तहत महिला के शील भंग, जालसाजी और आपराधिक धमकी जैसी धाराओं में आरोप पत्र दायर किया गया था. पोक्सो एक गैर-जमानती अपराध है जिसमें आरोपी को जमानत पाने का अधिकार नहीं होता. ऐसे मामलों में जमानत देना या खारिज करना सुनवाई के दौरान मामले के तथ्यों को सुनने वाले जज के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है.

पिटाई के मामले में अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है.


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अभियोजन और पुलिस का क्या है तर्क

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अली की जमानत पर सुनवाई की तारीखें प्रक्रियात्मक देरी के जाल में फंस गई हैं.

4 अक्टूबर को पहली तारीख पर अभियोजक ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की जिसे मंजूर कर लिया गया. चार दिन बाद मामले को फिर से स्थगित कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष का कहना था कि केस डायरी उपलब्ध नहीं है.

तीसरी तारीख 25 अक्टूबर को लोक अभियोजक ने अदालत को सूचित किया कि इस बार काउंटर केस डायरी उपलब्ध नहीं है.

28 अक्टूबर (चौथी तारीख) को बेंच मामले की सुनवाई नहीं कर सकी. इस हफ्ते की शुरुआत में जज द्वारा खुद को मामले से अलग कर लिए जाने के बाद सुनवाई टली.

देरी के बारे में पूछे जाने पर एडिशनल एडवोकेट जनरल पुष्यमित्र भार्गव ने अभियोजन पक्ष की ओर से किसी भी तरह की देर करने की बात से इनकार किया.

उन्होंने कहा, ‘निश्चित तौर पर हमारी ओर से कोई देरी नहीं की गई है. हमने पुलिस को बता दिया है और उन्होंने केस डायरी समय पर नहीं दी. जब भी हमें मामला कोर्ट में सूचीबद्ध होने की जानकारी मिलती है हम उसकी एक कॉपी पुलिस को भेजते हैं.

उन्होंने कहा, ‘केस डायरी उन्हीं के संरक्षक में रहती है और यह सामान्य है क्योंकि पुलिस से केस डायरी लेना एक कठिन काम ही होता है लेकिन हम हमेशा सुनवाई से पहले प्रक्रियात्मक तौर पर उन्हें सूचित करते हैं. हम नहीं जानते कि सुनवाई की तारीखों पर केस डायरी उपलब्ध न होने का कारण क्या था.’

वहीं, मध्य प्रदेश पुलिस ने भी देरी की बात से इनकार किया. पुलिस अधीक्षक, इंदौर (पूर्व) आशुतोष बागरी ने कहा, ‘पुलिस की तरफ से कोई देरी नहीं की गई है. हम खुद तो केस डायरी नहीं देंगे. जब-जब इसके लिए हमसे कहा गया, हमने इसे अभियोजन पक्ष को उपलब्ध कराया है.’

आईजी, इंदौर हरिनारायण चारी मिश्रा ने भी दिप्रिंट से कहा, ‘पुलिस की ओर से देरी की कोई गुंजाइश नहीं है. केस डायरी हम जब सेशन कोर्ट में दे देते तो हाई कोर्ट में देने में क्या दिक्कत होगी लेकिन देरी का कारण कौन है, यह जानने के लिए मुझे सरकारी वकील से बात करनी होगी.’

‘मानसिक सेहत’ के आधार पर ‘हमलावरों’ को जमानत

अली पर हमले के चार आरोपियों में से एक राकेश पवार को 23 सितंबर को पहली सुनवाई के दौरान ही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जमानत दे दी थी जबकि जिला कोर्ट ने उनकी जमानत अर्जी कर दी थी. आदेश का आधार यह था कि अदालती कार्यवाही में ‘काफी’ समय लग सकता है.

तीन दिन बाद ही अन्य आरोपियों—विवेक व्यास, राजकुमार भटनागर और विकास मालवीय—को जिला कोर्ट ने उनके वकील की ओर से दायर एक ही याचिका पर जमानत दे दी जिसमें आरोपियों में से एक को हाई कोर्ट से जमानत मिल जाने और मामले में जांच पूरी हो जाने को आधार बनाया गया था. साथ ही कहा गया था कि अधिकांश आरोप जमानती हैं  इसलिए उन्हें हिरासत में रखे जाने की कोई ज़रूरत नहीं है.

दिप्रिंट को मिले जमानत आदेश के मुताबिक बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि आरोपी ‘संभ्रांत परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और उन्हें हिरासत में रखने से उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होगा.’


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वकील ने कहा अली को ‘फंसाया’ गया

अली के वकील एहतेशाम हाशमी ने कहा कि कानून के मुताबिक, ‘जमानत एक अधिकार है’ और इस मामले में कोई सबूत भी नहीं है.

हाशमी ने कहा, ‘(नाबालिग) लड़की जो कह रही है, उसका कोई एक तो सबूत होना चाहिए था. दूसरी तरफ, हमारे पास सबूत हैं कि तसलीम ने किसी के साथ छेड़छाड़ नहीं की और न ही किसी को परेशान किया बल्कि अपने धर्म के कारण सार्वजनिक रूप से हमला झेला. उसके खिलाफ पोक्सो के तहत आरोप बाद में उसे सबक सिखाने के उद्देश्य से लगाए गए क्योंकि उसने एफआईआर दर्ज करा दी थी.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अगर हम लड़की की एफआईआर की भी बात करें तो तसलीम ने उसके हाथ और गाल को छुआ, किसी निजी अंग को नहीं लेकिन मेरे मुवक्किल को खुलेआम पीटा गया, लूटा गया और सांप्रदायिक गालियां दी गईं. अगर उसके दोषियों को जमानत मिल सकती है, तो उसे भी मिलनी चाहिए.’

उन्होंने आगे कहा कि उन्हें न्यायपालिका में पूरा भरोसा है लेकिन ‘कुछ तो ऐसा चल रहा है जिसके कारण जमानत अटक रही है लेकिन मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूं.’ उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई ‘पुख्ता सबूत’ न हो तो भी उसे जेल के अंदर रखने का कोई ‘तार्किक कारण’ नजर नहीं आता है.

हाशमी ने कहा, ‘केस डायरी देना कुछ घंटों का काम है लेकिन वह सुनवाई की दो तारीखों पर उपलब्ध नहीं थी जिससे जमानत मिलने में हफ्तों से देरी हो रही है. सरकारी वकील और पुलिस मिलकर काम करते हैं, फिर भी इस तरह की अनावश्यक और बेवजह की देरी होती रही. यह सब जमानत में देरी के हथकंडे हैं.’

अली के परिवार ने पूछा-क्या मुस्लिम होने की सजा मिल रही?

अली की पत्नी और पांच बच्चे, जिनमें से सबसे छोटा दो साल का है, यूपी के हरदोई जिले के बृज मऊ गांव में रहते हैं. अपने परिवार में कमाने वाले एकमात्र सदस्य के जेल जाने से उनके लिए तो खाने के भी लाले पड़ गए हैं.

उसकी 22 वर्षीय पत्नी नीता ने रोते हुए पूछा, ‘क्या हमें मुस्लिम होने की सजा मिल रही है?’

नीता ने दिप्रिंट से कहा, ‘तसलीम तीन बेटियों और दो बेटों के पिता हैं. उन्होंने हजारों महिलाओं को चूड़ियां बेची हैं. आप खुद देख लीजिए, उनके खिलाफ कभी किसी के साथ अनुचित व्यवहार की कोई शिकायत नहीं आई है. वह बस नफरत का शिकार हो गए जिसका हम मुसलमानों को हर दिन सामना करना पड़ता है. क्या हमारा धर्म हमारी गलती है?’

उन्होंने आगे कहा, ‘क्या भूख से तड़प रहे इस दो साल के बच्चे का यही दोष है कि उसके पिता एक मुसलमान हैं?’

अली के माता-पिता और छोटा भाई सलमान, जो पास के एक गांव में रहते हैं, घटना के बाद से ही उसकी पत्नी और बच्चों के साथ रह रहे हैं. इस बीच उसके बड़े भाई जमाल जमानत के लिए कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं.

सलमान ने कहा, ‘जबसे यह घटना हुई है, गांव और आसपास के इलाकों के सभी मुसलमान, जिनमें कई चूड़ी-विक्रेता हैं, बाहर निकलने तक से डरते हैं. किसी ‘हिंदू’ इलाके में जाकर चूड़ियां बेचने की तो बात छोड़ ही दीजिए. पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था.’

सलमान ने कहा, ‘अगर इस तरह का अन्याय जारी रहा, तो गरीब परिवार अपने ही देश में भूखों मर जाएंगे.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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