Saturday, 2 July, 2022
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पॉक्सो मामले में 2 चार्जशीट की कहानी: क्यों दिल्ली की अदालत ने दिल्ली पुलिस की ‘दगाबाज़ी, धोखाधड़ी’ के लिए खिंचाई की

स्थानीय अदालत ने यह पाया कि उसके समक्ष दायर आरोपपत्र में कई महत्वपूर्ण चूकें हुई थी और आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के प्रति 'पूर्वाग्रह' वाला व्यवहार किया गया था.

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नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने दक्षिण-पूर्व दिल्ली जिले की डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (डीसीपी) ईशा पांडे को तलब किया और पॉक्सो के एक ही मामले में दो अलग-अलग आरोप पत्र दाखिल करने के लिए शहर के पुलिस आयुक्त को जांच अधिकारी, जामिया नगर पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी और न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस (एसीपी) के खिलाफ जांच शुरू करने को कहा है.

यह मामला कथित तौर पर मदनपुर खादर जेजे कॉलोनी में एक 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के अपहरण और बलात्कार से जुड़ा है. इस मामले में 23 मार्च 2021 को जामिया नगर पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई थी.

आरोपी को पुलिस ने 25 मार्च को भारतीय दंड संहित (आईपीसी) की धारा 363 (अपहरण); 376 (बलात्कार); 366 (किसी महिला का अपहरण करना या उसे शादी के लिए मजबूर करना); 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) और 506 (आपराधिक धमकी) के अलावा और पॉक्सो अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों के साथ गिरफ्तार किया था. पुलिस ने अपने आरोप पत्र में दावा किया है कि आरोपी ने कथित तौर पर नाबालिग लड़की को छह दिनों तक कैद में रखा और उसके साथ कई बार बलात्कार भी किया.

लेकिन अब यह बात सामने आई है कि वास्तव में इस मामले में दो अलग-अलग आरोप पत्र थे – एक जिसे अदालत में प्रस्तुत किया गया और जिसकी प्रति आरोपी के वकील को दी गयी, और दूसरी वह जो शिकायतकर्ता और लोक अभियोजक को सौंपी गई. ये दोनों आरोप पत्र एक ही तारीख – 1 जून 2021 – को दायर किए गए थे और एक ही जांच अधिकारी, थाना प्रभारी और एसीपी द्वारा अधोहस्ताक्षरित किए गए थे.

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गौरव राव की अदालत ने दो अलग-अलग आरोप पत्र दाखिल करने को ‘झूठी गवाही, कपट और धोखाधड़ी’ पूर्ण कार्य के रूप में देखते हुए, पिछले सोमवार को एक आदेश पारित किया जिसमें इसे ‘उच्चतम दर्जे की धोखाधड़ी’ करार दिया गया है और साथ ही इसे ‘पुलिस द्वारा अपने शक्ति के दुरुपयोग का सटीक मामला’ कहा गया है.

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अदालत ने जांच अधिकारी, थाना प्रभारी और एसीपी के आचरण को ‘विश्वासघाती और निंदनीय’ बताते हुए, कहा कि ऐसा करके पुलिस ने आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के प्रति ‘पूर्वाग्रह’ वाला वयवहार किया है.

दिप्रिंट से बात करते हुए, दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा कि उन्हें यह आदेश प्राप्त हो गया है और संबंधित डीसीपी को 20 जनवरी 2022 को अदालत में अगली सुनवाई के लिए उपस्थित होने को कहा गया है. अधिकारी ने कहा ‘हमारे स्तर से भी जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.’


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दोनों आरोप पत्रों में अंतर

पीड़िता के बयान और मामले की जांच के आधार पर दायर इन दोनों आरोपपत्रों के अनुसार, पीड़िता को छह दिनों तक कैद रखने के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर उसके साथ कई बार बलात्कार किया.

हालांकि, अदालत का कहना है कि सरकारी वकील और शिकायतकर्ता को दिए गए आरोपपत्र की तुलना में अदालत और बचाव पक्ष के वकील को सौंपे गए आरोपपत्र में ‘मामले से जुड़े कई तथ्यों को छोड़ दिया गया है’.

लोक अभियोजक और शिकायतकर्ता को दिए गए आरोप पत्र, जिसके आधार पर आरोपी के वकील ने अदालत में तथ्यों में अंतर की ओर इशारा किया, पुलिस ने यह उल्लेख किया है कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (सीडीआर) के आधार पर आरोपी के मोबाइल स्थान का विश्लेषण किया गया है और यह अपराध के समय अपराध स्थल – मदनपुर खादर जेजे कॉलोनी – पर नहीं था

अदालत में दायर और आरोपी को उपलब्ध कराए गए आरोप पत्र में इस तरह के किसी विवरण का उल्लेख नहीं किया गया है.

हालांकि, दोनों आरोप पत्रों में इस बात का उल्लेख है कि आरोपी और पीड़िता दोनों के फोन के बारे में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट का अभी इंतजार है.

लोक अभियोजक और शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराये गए आरोप पत्र में इस बात का भी विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है कि जिस कमरे में नाबालिग को कथित तौर पर रखा गया था, उसके मकान मालिक और किरायेदार ने उसके साथ वहां एक अन्य व्यक्ति की तस्दीक़ (पहचान) की थी, और यह भी कहा कि वे दोनों केवल दो घंटे ही उस कमरे में रहे. इस आरोप पत्र के मुताबिक पुलिस ने दूसरे शख्स के मोबाइल का सीडीआर भी मंगवाया है और उसके बाद पूरक आरोप पत्र (सप्लीमेंट्री आरोप पत्र) दाखिल करेगी.

हालांकि अदालत में दाखिल किये गए और आरोपी के वकील को प्रदत्त आरोप पत्र में किसी दूसरे शख्स का कोई जिक्र नहीं है.

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि, ‘मौजूदा मामले में कई अन्य खामियां हैं, जो महत्वपूर्ण और गंभीर प्रकृति की हैं और जो जानबूझकर और इरादतन की गयी प्रतीत होती हैं.’

इस आदेश में कहा गया है, ‘कम-से-कम, काउंसलर (परामर्शदाता) और उस मकान के मालिक जहां पीड़ित को कथित तौर पर रखा गया था के बयानों में आरोपी को साफ़-साफ़ बरी करते हुए किसी और (दूसरे व्यक्ति) की संलिप्तता की ओर इशारा किया गया है. इस पहलू पर जांच रिपोर्ट बिल्कुल खामोश है.’

इस बारे में दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने बताया कि आरोप पत्र में बदलाव इसलिए किए गए क्योंकि शिकायतकर्ता ने कभी भी किसी दूसरे व्यक्ति का उल्लेख या पहचान नहीं की. उन्होंने कहा कि पुलिस ने इस संबंध में कानूनी सलाह ली है.

इस मामले की पूरी जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने कहा, ‘पीड़िता ने पुलिस के सामने अथवा मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करवाते हुए दिए गए अपने किसी भी बयान में किसी दूसरे शख्स का नाम नहीं लिया.’

इस अधिकारी ने अपनी बात जारी रखते हुए बताया कि, ‘इस मामले में लड़की की मां ने फरवरी की शुरुआत में उसके ‘लापता होने’ की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन नाबालिग ने घर लौटने के बाद कहा था कि वह अपने एक दोस्त के घर गई थी. फिर 23 मार्च को नाबालिग और उसकी मां ने बलात्कार का आरोप लगाते हुए एक और शिकायत दर्ज कराई. पीड़िता ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयानों में साफ़ तौर पर आरोपी का नाम लिया.’

अधिकारी ने कहा, ’हालांकि, भूतल पर रहने वाले मकान मालिक ने कहा कि उसने पीड़िता को पहले कभी नहीं देखा है. किरायेदार, जो उस कमरे में रहता था और बाद में बाहर चला गया था, ने बताया कि वह लड़की केवल दो घंटे के लिए दूसरे आदमी के साथ वहां आई थी. इस दूसरे व्यक्ति को कभी भी गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया गया था. वह और आरोपी एक दूसरे को जानते हैं और दोनों मेरठ के रहने वाले हैं. पुलिस आगे की जांच के बाद पूरक आरोप पत्र दाखिल करेगी.‘

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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