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Sunday, 8 November, 2026
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मेकेदातु बांध के साइट निरीक्षण पर विजय ने जताई आपत्ति, पीएम मोदी को लिखा पत्र

तमिलनाडु लंबे समय से मेकेदातु जलाशय का विरोध कर रहा है, जिसका कारण यह है कि इससे निचले बहाव वाले राज्य को छोड़े जाने वाले पानी की मात्रा और समय में बदलाव आ सकता है.

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चेन्नई: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कर्नाटक में प्रस्तावित मेकेदातु बांध की जगह पर केंद्र सरकार के अधिकारियों की ओर से निरीक्षण किए जाने की खबरों पर चिंता जताई है.

शनिवार को लिखे अपने पत्र में विजय ने मांग की कि इस निरीक्षण के बाद होने वाली किसी भी प्रशासनिक या तकनीकी कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया जाए.

उन्होंने प्रधानमंत्री से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि दूसरे नदी बेसिन वाले राज्यों की सहमति के बिना कर्नाटक के प्रस्तावित मेकेदातु जलाशय के लिए कोई कानूनी या प्रशासनिक मंजूरी न दी जाए. उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के कावेरी बेसिन में लगातार पानी की उपलब्धता से जुड़ा मुद्दा ध्यान देने की मांग करता है. साथ ही, उन्होंने कहा कि कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर तमिलनाडु के किसानों की चिंता बढ़ रही है.

मेकेदातु बहुउद्देशीय जलाशय का प्रस्ताव मुख्य रूप से बेंगलुरु की पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने और जलविद्युत उत्पादन के लिए रखा गया है. तमिलनाडु लंबे समय से इसका विरोध करता रहा है. राज्य का कहना है कि इस परियोजना से नीचे की ओर स्थित राज्य में पानी छोड़े जाने की मात्रा और समय पर असर पड़ सकता है.

विजय ने अपने पत्र में कहा, “अंतरराज्यीय सीमा से ठीक पहले 67.16 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) पानी जमा करने की क्षमता वाला जलाशय बनाने की कर्नाटक की योजना न सिर्फ तमिलनाडु के हिस्से के पानी के प्रवाह को रोकेगी, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक तमिलनाडु के कावेरी बेसिन के लोगों को हर महीने मिलने वाले पानी पर भी बुरा असर डालेगी.”

उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री और जल शक्ति मंत्रालय तथा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधिकारियों के बीच विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को मंजूरी देने को लेकर हुई बैठकों की खबरों पर भी चिंता जताई. उन्होंने लिखा कि इस तरह के घटनाक्रम ने तमिलनाडु के किसानों को “लगातार चिंता” में डाल दिया है. उन्होंने बताया कि कावेरी डेल्टा के किसान पहले से ही 2026-27 में पानी की कमी वाले साल में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. विजय ने यह भी लिखा कि कर्नाटक ने अनुपात के हिसाब से भी तमिलनाडु को कावेरी के पानी का उसका तय हिस्सा नहीं दिया है. इससे किसानों में असुरक्षा की भावना और बढ़ गई है.

केंद्र सरकार के अधिकारियों की टीम के साइट निरीक्षण का जिक्र करते हुए विजय ने लिखा, “तमिलनाडु के चिंतित किसान इस साइट निरीक्षण को ऐसी परियोजना पर चुपचाप आगे बढ़ने के संकेत के तौर पर देख रहे हैं, जिससे उनकी रोजी-रोटी ही खतरे में पड़ जाएगी.”

28 जुलाई 2026 को लिखे अपने पहले के पत्र का जिक्र करते हुए विजय ने फिर कहा कि कोई भी कानूनी या प्रशासनिक मंजूरी तब तक नहीं दी जानी चाहिए, जब तक यह साफ तौर पर साबित न हो जाए कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के अंतिम फैसले और 16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप है.

उन्होंने तमिलनाडु की ओर से उठाए गए कानूनी और विधायी कदमों का भी जिक्र किया. इनमें 27 मई को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दायर याचिका शामिल है. इस याचिका में अंतरराज्यीय विवादों का समाधान होने तक पर्यावरण मंत्रालय को मंजूरी देने से रोकने की मांग की गई थी. इसके अलावा, 19 जून को तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें दोहराया गया था कि कर्नाटक या उसकी एजेंसियों को कोई मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए.

इसके अलावा, 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका भी दायर की गई थी. इसमें कावेरी बेसिन की परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के संबंध में जल शक्ति मंत्रालय के दिसंबर 2025 के दिशानिर्देशों को चुनौती दी गई थी. यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

विजय ने लिखा, “यह बेहद जरूरी है कि नदी के निचले हिस्से में स्थित राज्यों के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाए. इसमें पानी की मात्रा और हर महीने पानी छोड़ने के तय तरीके, दोनों शामिल हैं.” उन्होंने कहा कि इस समय मेकेदातु की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट पर विचार करना और केंद्रीय एजेंसियों की ओर से एकतरफा तकनीकी मूल्यांकन या साइट निरीक्षण करना “पूरी तरह अनुचित” है.

विजय ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि वे जल शक्ति मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश दें कि नदी के निचले हिस्से में स्थित राज्यों की सहमति के बिना आगे कोई साइट निरीक्षण, तकनीकी मूल्यांकन या मंजूरी न दी जाए. उन्होंने प्रधानमंत्री से कर्नाटक सरकार को भी सलाह देने की अपील की कि वह दूसरे नदी बेसिन वाले राज्यों की सहमति के बिना इस परियोजना पर आगे न बढ़े.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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