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Tuesday, 30 June, 2026
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राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस: वकीलों के बहिष्कार वाले फैसले का VHP प्रमुख ने किया विरोध

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) प्रमुख आलोक कुमार ने 2011 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया, साथ ही कहा कि उन्हें 'इस घिनौने अपराध के किसी भी आरोपी से कोई सहानुभूति नहीं है.'

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नई दिल्ली: अयोध्या बार एसोसिएशन द्वारा राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले के आरोपियों की पैरवी कोई वकील नहीं करेगा, यह घोषणा किए जाने के एक दिन बाद, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) प्रमुख आलोक कुमार ने कहा कि यह प्रस्ताव संवैधानिक सिद्धांतों और पेशेवर नैतिकता का उल्लंघन करता है.

बार एसोसिएशन ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर कोई वकील आरोपियों का बचाव करने का फैसला करता है, तो उस पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. सोमवार को अयोध्या की एक स्थानीय अदालत ने राम मंदिर मामले के सभी आठ आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था.

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के वकील रहे वीएचपी प्रमुख ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि 2011 के एक मामले—ए. एस. मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु राज्य—की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर विचार किया था कि क्या कोई वकील, जब मुवक्किल फीस देने को तैयार हो, तब भी मामला लेने से इनकार कर सकता है. अदालत ने फैसला दिया था कि बार एसोसिएशन ऐसे प्रस्ताव पारित नहीं कर सकते.

उन्होंने लिखा कि 2011 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह देखा था कि “कोयंबटूर बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित किया था कि उसका कोई भी सदस्य इस मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों का बचाव नहीं करेगा.”

कुमार ने आगे लिखा कि अदालत ने यह भी कहा था कि भारत भर में कई बार एसोसिएशन, जिनमें हाई कोर्ट और जिला अदालतों के बार एसोसिएशन भी शामिल हैं, ऐसे प्रस्ताव पारित कर चुके हैं.

उन्होंने लिखा, “कभी-कभी पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच टकराव हो जाता है और बार एसोसिएशन प्रस्ताव पारित कर देता है कि कोई भी पुलिसकर्मियों का बचाव नहीं करेगा. इसी तरह कभी बार एसोसिएशन यह भी तय कर देता है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति का बचाव नहीं करेगा जिस पर आतंकवादी होने, किसी क्रूर या जघन्य अपराध या बलात्कार के मामले में आरोपी होने का आरोप हो.”

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे “बहुत महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक महत्व का मामला माना, जिसने हमें (अदालत को) गहरी चिंता में डाल दिया.”

कुमार ने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे प्रस्तावों को “पूरी तरह अवैध, बार की परंपराओं के खिलाफ और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ” बताया था.

उन्होंने अदालत की टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि “हर व्यक्ति, चाहे समाज उसे कितना भी बुरा, भ्रष्ट, घृणित, पतित, विकृत या निंदनीय क्यों न मानता हो, उसे अदालत में बचाव का अधिकार है और उसी के अनुरूप वकील का कर्तव्य है कि वह उसका बचाव करे.”

वीएचपी प्रमुख ने दिप्रिंट से कहा, “चढ़ावे की चोरी के आरोपी किसी भी व्यक्ति के प्रति हमारी कोई सहानुभूति नहीं है. उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए, लेकिन क्या कोई वकील उस अदालत में, जहां वह प्रैक्टिस करता है, कोई मामला लेने से इनकार कर सकता है? मेरा मानना है कि अयोध्या बार एसोसिएशन को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का अध्ययन करना चाहिए.”

अयोध्या बार एसोसिएशन ने यह भी तय किया है कि वह राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य चंपत राय, गोपाल राव और अनिल मिश्रा के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175 के तहत कार्रवाई शुरू कराने की संभावनाएं तलाशेगा. यह धारा न्यायिक मजिस्ट्रेट को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और संज्ञेय अपराध की जांच का आदेश देने का अधिकार देती है.

चंपत राय, जो वीएचपी के उपाध्यक्ष भी हैं, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव हैं, जबकि अनिल मिश्रा ट्रस्टी हैं. दोनों ने इस्तीफा देने की पेशकश की है.

आलोक कुमार ने अपनी एक्स पोस्ट में आगे लिखा कि राम जन्मभूमि मंदिर में “चढ़ावा चोरी जैसे घिनौने अपराध” के किसी भी आरोपी के प्रति उन्हें कोई सहानुभूति नहीं है.

उन्होंने लिखा, “हम जोर देकर मांग करेंगे कि जांच जल्द पूरी हो, मामले की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट में हो और दोषी व्यक्तियों को अगले चार-पांच महीनों के भीतर जेल भेजा जाए, लेकिन इससे मैं ऐसे रुख का समर्थन नहीं कर सकता जो अनैतिक और गैरकानूनी दोनों हो. मुझे उम्मीद है कि अयोध्या बार एसोसिएशन इस फैसले पर विचार करेगा.”

कुमार ने अपने तर्क के समर्थन में संविधान के अनुच्छेद 21 का भी हवाला दिया. उन्होंने कहा: “जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है, उसे बिना गिरफ्तारी के कारण बताए हिरासत में नहीं रखा जाएगा और उसे अपनी पसंद के कानूनी सलाहकार से परामर्श लेने तथा उसके द्वारा बचाव करवाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा.”

उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा बनाए गए ‘पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानकों’ से जुड़े नियमों के अध्याय-II का भी जिक्र किया. इसमें कहा गया है कि:

“एक वकील उन अदालतों, ट्रिब्यूनलों या अन्य प्राधिकरणों के समक्ष, जहां वह प्रैक्टिस करता है या करना चाहता है, अपनी स्थिति और मामले की प्रकृति के अनुरूप फीस मिलने पर कोई भी ब्रीफ स्वीकार करने के लिए बाध्य है.”

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2011 के मामले में यह भी घोषित किया था कि:

“भारत के सभी बार एसोसिएशनों द्वारा पारित ऐसे प्रस्ताव शून्य और अमान्य हैं. यदि इस देश में लोकतंत्र और कानून का राज कायम रखना है, तो सही सोच रखने वाले वकीलों को ऐसे प्रस्तावों को नजरअंदाज करना चाहिए और उनका विरोध करना चाहिए. वकील का कर्तव्य है कि वह परिणाम चाहे जो भी हों, बचाव करे. जो वकील ऐसा करने से इनकार करता है, वह गीता के संदेश का पालन नहीं कर रहा है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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