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Tuesday, 30 June, 2026
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बंगाल बॉर्डर फेंसिंग प्रोजेक्ट: चुनावी वादे पूरे करने की BJP सरकार की दौड़, लेकिन ज़मीन पर चुनौतियां

नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने की प्रक्रिया तेज़ कर दी है, जो कई वर्षों से विवाद का विषय रही है. लेकिन अभी भी कई बाधाएं बाकी हैं.

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मुर्शिदाबाद/उत्तर 24 परगना/सिलीगुड़ी/कूचबिहार: जून की एक उमस भरी दोपहर में सफेद और काले बालों वाला एक व्यक्ति साइकिल से मुर्शिदाबाद के जलंगी गांव की 44 फीट चौड़ी सड़क से गुज़र रहा था. यह गांव सीधे बांग्लादेश सीमा पर स्थित है.

वह कुछ देर के लिए रुका और अपने चेहरे पर गमछा बांध लिया. चल रहे निर्माण कार्य से उड़ रही धूल को देखकर उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ दिख रही थी.

सड़क के दाईं ओर कंसर्टिना तार का एक बंडल पड़ा था, जबकि बाईं ओर एक बुलडोजर और बराबर दूरी पर लगाए गए लोहे के खंभे दिखाई दे रहे थे, जो जमीन में गाड़कर सीमा को चिन्हित कर रहे थे. करीब 130 मीटर दूर एक बीएसएफ अधिकारी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर नज़र रख रहा था. पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जलंगी गांव में ये हरे लोहे के खंभे पहली बार अक्टूबर 2024 में लगाए गए थे. यह काम 2019 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा शुरू की गई स्मार्ट फेंसिंग परियोजना के तहत किया गया था.

पिछले हफ्ते जब दिप्रिंट की टीम जलंगी गांव पहुंची, तब उसी इलाके में नई स्मार्ट फेंसिंग का काम अभी भी जारी था. बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद स्मार्ट फेंसिंग के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया तेज़ हो गई है. अधिकारियों के अनुसार, 9 मई को सरकार बनने के बाद से शुभेंदु अधिकारी सरकार ने बीएसएफ को 474.50 एकड़ ज़मीन सौंप दी है.

इस ज़मीन का एक हिस्सा सीमा के 15 किलोमीटर क्षेत्र में स्मार्ट फेंसिंग के लिए और बाकी हिस्सा सुरक्षा ढांचे के निर्माण के लिए निर्धारित किया गया है. स्मार्ट बॉर्डर फेंसिंग एक आधुनिक सीमा सुरक्षा प्रणाली है, जिसमें थर्मल इमेजर, इन्फ्रारेड और लेजर आधारित घुसपैठ अलार्म, एयरोस्टेट, बिना मानव निगरानी वाले ग्राउंड सेंसर, रडार और सोनार सिस्टम को एक केंद्रीय कमांड और कंट्रोल नेटवर्क से जोड़ा जाता है. यह प्रणाली वास्तविक समय में निगरानी और घुसपैठ की पहचान करने में मदद करती है.

दिप्रिंट ने पाया कि जलंगी की तरह ही मुर्शिदाबाद के चकमुथुरा सहित कई इलाकों में नया बाड़ निर्माण कार्य चल रहा है.

वहीं कूचबिहार के कुचलीबाड़ी गांव जैसे इलाकों में पुराने कंसर्टिना तार वाले बाड़ को हटाकर नई स्मार्ट फेंसिंग लगाई जा रही है. जब तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पश्चिम बंगाल में सत्ता में थी, तब तक भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का मुद्दा राज्य सरकार और केंद्र की बीजेपी सरकार के बीच विवाद का विषय बना रहा.

ममता सरकार पर आरोप लगाए जाते थे कि उसने बाड़ लगाने के लिए ज़मीन देने में केंद्रीय बलों के साथ सहयोग नहीं किया. उस पर यह आरोप भी लगाए गए कि बिना बाड़ वाले इलाकों से बांग्लादेशी नागरिकों के प्रवेश को उसने बढ़ावा दिया या उससे फायदा उठाया. धीरे-धीरे ये आरोप बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गए और अप्रैल में हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में भी प्रमुख चुनावी मुद्दों में शामिल रहे.

बीजेपी ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि सत्ता में आने पर सीमा बाड़बंदी का काम तेज किया जाएगा. बीजेपी ने चुनाव में ममता बनर्जी की टीएमसी को करारी हार दी. इसके बाद मुख्यमंत्री बनने के दो दिन बाद, 11 मई को सुवेंदु अधिकारी ने घोषणा की कि उनकी सरकार “45 दिनों (26 जून) के भीतर फेंसिंग के लिए ज़मीन बीएसएफ को सौंप देगी.”

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जलंगी गांव में लगाई जा रही फेंसिंग | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जलंगी गांव में लगाई जा रही फेंसिंग | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

27 मई को शुभेंदु अधिकारी ने एक्स पर लिखा कि पश्चिम बंगाल सरकार राज्यभर में 142.79 एकड़ ज़मीन बीएसएफ को सौंप चुकी है. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को तेज करने के लिए सक्रिय कदम उठा रही है. वर्तमान में भारत और बांग्लादेश के बीच 4,097 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है. इसमें से 2,217 किलोमीटर हिस्सा पश्चिम बंगाल के अधिकार क्षेत्र में आता है. गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में 569 किलोमीटर सीमा पर अभी बाड़ नहीं लगी है. इनमें से 456 किलोमीटर क्षेत्र बाड़ लगाने के लिए उपयुक्त है, जबकि 113 किलोमीटर क्षेत्र में बाड़ लगाना संभव नहीं माना गया है.

इस प्रक्रिया में सर्वे ऑफ इंडिया की टीमें नई फेंसिंग की लाइन तय करती हैं और जमीन को सफेद झंडों से चिन्हित किया जाता है. इसके बाद जमीन मालिकों को बुलाकर स्वामित्व की पुष्टि की जाती है. फिर मुआवजे को लेकर बातचीत शुरू होती है.

बिक्री दस्तावेज़ों का रजिस्ट्रेशन होने के बाद ज़मीन बीएसएफ को सौंप दी जाती है. मुख्यमंत्री अधिकारी द्वारा तय की गई 45 दिन की समयसीमा 26 जून को समाप्त हो गई. राज्य सरकार के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि अगस्त तक लगभग 85 प्रतिशत ज़मीन हस्तांतरण का काम पूरा हो जाएगा. ज़मीन चिन्हित करने से लेकर बीएसएफ को सौंपने तक मुआवजे को लेकर कई दौर की बातचीत चल रही है. कुछ मामलों में समझौते शांति से हो रहे हैं, लेकिन दिप्रिंट ने कुछ गांवों में कम मुआवजे के विरोध में प्रदर्शन भी देखा.

बांग्लादेश सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के जलंगी गांव में फेंसिंग का काम | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
बांग्लादेश सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के जलंगी गांव में फेंसिंग का काम | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

राजनीतिकरण और बार-बार चूकी समय-सीमाएं

इतिहास में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का मुद्दा हमेशा विवादित रहा है. 1960 के दशक में क्षेत्रीय नेताओं और उस समय असम के कांग्रेस मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद चलीहा ने सबसे पहले सीमा पर बाड़ लगाने का प्रस्ताव रखा था. उनका आरोप था कि पूर्वी पाकिस्तान (जो बाद में बांग्लादेश बना) से “अवैध प्रवासी” असम में प्रवेश कर रहे हैं. बाद में यह मांग 1985 के असम समझौते का हिस्सा बनी. इसी समझौते में 24 मार्च 1971 को राज्य में नागरिकता तय करने की अंतिम तिथि भी माना गया.

साल 1989 में राजीव गांधी की सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने का बड़ा काम शुरू किया. उस समय पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में यह काम 2007 तक पूरा करने की समय-सीमा तय की गई थी, लेकिन यह समय-सीमा कई बार चूक गई.

मुर्शिदाबाद के लालगोला में टूटी हुई बाड़ | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
मुर्शिदाबाद के लालगोला में टूटी हुई बाड़ | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

दिप्रिंट को मिले पश्चिम बंगाल सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार, 2017 से 2023 के बीच बीएसएफ ने 273 किलोमीटर सीमा पर बाड़ लगाने का प्रस्ताव भेजा था. पश्चिम बंगाल सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “बीएसएफ ने 273 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़ लगाने का विस्तृत प्रस्ताव भेजा था. इसमें से गृह मंत्रालय ने 238 किलोमीटर के लिए भुगतान कर दिया था, जबकि 35 किलोमीटर का भुगतान अभी मिलना बाकी है.”

ममता बनर्जी सरकार ने 238 किलोमीटर क्षेत्र में बाड़ लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. हालांकि, बीजेपी के सत्ता में आने तक इस 238 किलोमीटर में से 86 किलोमीटर क्षेत्र की ज़मीन बीएसएफ को सौंपना बाकी था. चुनावी वादा पूरा करने के तहत मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में लंबित 86 किलोमीटर हिस्से में से 15 किलोमीटर क्षेत्र में फेंसिंग को मंजूरी दी. इसके लिए 69 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित करनी होगी.

एक राज्य सरकारी अधिकारी ने कहा, “2017 से 22 जून 2026 के बीच बीएसएफ को फेंसिंग के लिए कुल 869.5 एकड़ जमीन मिली है. इसमें 820.5 एकड़ निजी जमीन और 49 एकड़ सरकारी जमीन शामिल है.”

इन 869.5 एकड़ में से टीएमसी सरकार ने 395.02 एकड़ जमीन सौंपी थी. वहीं, 9 मई को सत्ता में आने के बाद बीजेपी सरकार ने 22 जून तक 474.50 एकड़ ज़मीन बीएसएफ को सौंप दी.

एक अन्य अधिकारी ने कहा, “टीएमसी सरकार के दौरान जिन बिना बाड़ वाले इलाकों के लिए प्रस्ताव मिले थे, उनमें से 64 प्रतिशत हिस्से में फेंसिंग हो गई थी. बाकी 36 प्रतिशत जमीन सौंपने में देरी हुई क्योंकि कई निजी जमीन मालिक विभिन्न कारणों से सहमत नहीं थे.”

उन्होंने आगे कहा, “बीएसएफ द्वारा चिन्हित बची हुई जमीन सिर्फ फेंसिंग के लिए नहीं थी. कुछ जगहों पर खेती वाली जमीन के अंदर काफी दूर तक सुरक्षा ढांचे बनाने की योजना थी, जिसका गांव वालों ने विरोध किया.”

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

अधिकारी ने कहा कि ममता सरकार ने इन विरोध प्रदर्शनों को गंभीरता से लिया और ग्रामीणों की मांगें बीएसएफ अधिकारियों तक पहुंचाईं, लेकिन शुभेंदु अधिकारी की नई सरकार भूमि अधिग्रहण के मामले में कहीं अधिक सख्त रुख अपना रही है. इसी वजह से पिछली सरकार की तुलना में कम लंबाई की सीमा को कवर करने के लिए भी बड़े भू-भाग बीएसएफ को सौंपे गए हैं.

उत्तर 24 परगना के सागरपाड़ा ब्लॉक में भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित काली मंदिर | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
उत्तर 24 परगना के सागरपाड़ा ब्लॉक में भारत-बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित काली मंदिर | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

इस बीच पश्चिम बंगाल सरकार अभी भी बीएसएफ से राज्य की बची हुई 183 किलोमीटर बिना बाड़ वाली सीमा के लिए नए प्रस्ताव का इंतज़ार कर रही है. साथ ही 35 किलोमीटर सीमा के लिए भुगतान भी अभी बाकी है, जिसका प्रस्ताव पिछली राज्य सरकार पहले ही मंजूर कर चुकी थी.

बीएसएफ उस 113 किलोमीटर सीमा क्षेत्र का भी सर्वे कर रही है जिसे पहले फेंसिंग के लिए अनुपयुक्त माना गया था. अधिकारी ने कहा, “इसमें नदी वाले इलाके भी शामिल हैं. नई तकनीकों की मदद से बीएसएफ भविष्य में इन क्षेत्रों में भी फेंसिंग करने में सक्षम हो सकती है.”

सर्वे, सीमांकन और ज़मीन अधिग्रहण

ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाली राष्ट्रीय मैपिंग एजेंसी सर्वे ऑफ इंडिया (SoI) के अधिकारी जमीन का सर्वे करते हैं.

बीएसएफ के एक अधिकारी ने कहा, “हमारा काम SoI अधिकारियों को सीमा क्षेत्र तक ले जाना और सर्वे के दौरान उन्हें सुरक्षा देना होता है.”

इसके बाद SoI के अधिकारी अंतरराष्ट्रीय सीमा से 150 गज की दूरी बनाए रखते हुए ऐसे हिस्सों की पहचान करते हैं, जिन्हें जोड़कर जमीन पर लगातार बाड़ बनाई जा सके.

बीएसएफ अधिकारी ने कहा, “कई बार 150 गज के नियम का पालन करने पर बाड़ लगाने की जगह नदी के बहुत करीब होती है या कटाव वाले क्षेत्र में होती है. ऐसे मामलों में बाड़ की लाइन थोड़ी अंदर की ओर तय की जाती है.”

जब SoI अधिकारी इलाके की मैपिंग पूरी कर लेते हैं, तब ब्लॉक लैंड एंड लैंड रिफॉर्म्स ऑफिस (BLRO) और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) के अधिकारी बीएसएफ अधिकारियों के साथ उस क्षेत्र का दौरा करते हैं और सफेद झंडे लगाकर उस हिस्से को चिन्हित करते हैं जहां फेंसिंग की जाएगी.

बीएसएफ अधिकारी ने कहा, “हम बांस के डंडों पर सफेद झंडे लगाकर उस क्षेत्र को चिन्हित करते हैं.”

इसके बाद BLRO जमीन मालिकों को नोटिस भेजता है और उन्हें मालिकाना हक के दस्तावेजों के साथ अधिकारियों के सामने उपस्थित होने के लिए कहता है.

जालंगी के BLRO अधिकारी बाबू लाल मंडल ने कहा, “मालिकों से उनकी जमीन के दस्तावेज मांगे जाते हैं और उन्हें बताया जाता है कि उनकी जमीन का एक हिस्सा फेंसिंग या बीएसएफ के ढांचे बनाने के लिए चाहिए.”

उन्होंने कहा, “मालिकों को सरकार द्वारा तय जमीन की कीमत की जानकारी भी दी जाती है.”

सागरपाड़ा ब्लॉक में अंतरराष्ट्रीय सीमा का चिन्हांकन | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
सागरपाड़ा ब्लॉक में अंतरराष्ट्रीय सीमा का चिन्हांकन | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

इसके बाद दस्तावेजों की जांच की जाती है ताकि मालिकाना हक की पुष्टि हो सके.

मंडल ने कहा, “इसके बाद जमीन मालिक अपनी जमीन की तय कीमत पर आपत्ति जताते हैं. कई दौर की बातचीत के बाद उन्हें शुरुआती तय कीमत से लगभग ढाई गुना ज्यादा भुगतान किया जाता है, ताकि वे अपनी जमीन सौंप दें.” इसके बाद जमीन मालिकों को रजिस्ट्री कार्यालय बुलाया जाता है, जहां वे नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जमा करते हैं और बदले में उन्हें जमीन का चेक दिया जाता है. BLRO अधिकारी ने बताया कि इसके बाद जमीन बीएसएफ को फेंसिंग के लिए सौंप दी जाती है.

मंडल ने दिप्रिंट को बताया कि यह प्रक्रिया लंबी होती है क्योंकि ग्रामीण अक्सर विरोध करते हैं, खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय सीमा और फेंसिंग लाइन के बीच ज्यादा दूरी हो या बीएसएफ अपने कैंप (छावनी) बनाने के लिए जमीन मांगे.

ग्रामीणों का कहना है कि इससे उनकी और ज्यादा जमीन चली जाती है.

मुर्शिदाबाद में जालंगी और घोष पाड़ा के बीच स्थित भूतगाड़ी मैदान में बीएसएफ की प्रस्तावित छावनी के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हुए विरोध का उदाहरण देते हुए मंडल ने कहा कि ऐसे प्रदर्शन आम बात हैं.

उन्होंने कहा, “छावनी भूतगाड़ी मैदान में बनाने का प्रस्ताव था, जो अंतरराष्ट्रीय सीमा से 4-5 किलोमीटर दूर खेती और दलदली जमीन के बीच स्थित है. इसलिए लोगों ने विरोध किया.”

पिछले कुछ वर्षों से BLRO अधिकारी के रूप में काम कर रहे मंडल ने कहा कि ग्रामीणों ने टीएमसी सरकार के समय भी विरोध किया था और बीजेपी सरकार आने के बाद भी विरोध जारी है.

उन्होंने कहा, “इसी वजह से नई चिन्हित जमीनों का अधिग्रहण करने में समय लगता है.”

दूसरी चुनौतियां

सिर्फ जमीन अधिग्रहण ही नहीं, पश्चिम बंगाल में फेंसिंग परियोजना को असम की तरह कई दूसरी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है.

इनमें 69 साल पुरानी रैडक्लिफ लाइन, सीमा के गांवों के लोगों का विरोध, लगातार अपना रास्ता बदलने वाली नदियां और सीमा तथा बाड़ के बीच पड़ने वाले चार (नदी के बीच बनने वाले टापू) शामिल हैं.

फेंसिंग के लिए चिन्हित जमीन पर लगा सफेद झंडा | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
फेंसिंग के लिए चिन्हित जमीन पर लगा सफेद झंडा | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

1947 में दिल्ली के रायसीना हिल्स स्थित अपने कार्यालय में बैठे Cyril Radcliffe ने नक्शे पर लाल पेंसिल से एक रेखा खींची थी, जिसने ब्रिटिश भारत को भारत और पाकिस्तान में बांट दिया. समय की कमी और जमीन की वास्तविक स्थिति की सीमित जानकारी के बीच उन्होंने ऐसी सीमा तय की, जिसने वहां रहने वाले लाखों लोगों की किस्मत बदल दी. रैडक्लिफ अवॉर्ड की भाषा बहुत स्पष्ट थी. इसकी शुरुआत इन शब्दों से हुई थी: “एक रेखा खींची जाएगी…” इसके बाद थाना-दर-थाना सीमा का विवरण दिया गया था. हर पैराग्राफ में बताया गया था कि “रेखा कहां जाएगी” और “कहां खींची जाएगी”.

जब इस सीमा को जमीन पर लागू किया गया, तो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के कई एन्क्लेव भारतीय क्षेत्र के अंदर रह गए, जबकि भारत के कई एन्क्लेव पूर्वी पाकिस्तान के अंदर फंस गए.

भारत और बांग्लादेश ने 2015 के India-Bangladesh Land Boundary Agreement के जरिए इस समस्या को हल करने की कोशिश की. इसके तहत बांग्लादेश में मौजूद भारत के 111 एन्क्लेव के बदले भारत में मौजूद बांग्लादेश के 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया गया. फिर भी कुछ इलाके आज भी दोनों तरफ फंसे हुए हैं. उदाहरण के तौर पर, उत्तर बंगाल के चिलाहाटी, बोरोशोशी, नाओतोरी-देबोत्तर और परानीग्राम जैसे इलाके 1974 के Indira-Mujib Land Boundary Agreement के बाद भारत का हिस्सा बन गए थे, लेकिन उन्हें भारतीय नक्शे में शामिल नहीं किया गया. इस कारण वहां के लोगों के पास भारतीय नागरिकता के दस्तावेज तो हैं, लेकिन जमीन के रिकॉर्ड में अभी भी बांग्लादेश का नाम दर्ज है.

दिप्रिंट से बात करते हुए बेरुबाड़ी प्रतिरोखा कमेटी के अध्यक्ष जगदीश रॉय प्रधान ने कहा कि जब तक जमीन के रिकॉर्ड को भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्ज कर नक्शे में शामिल नहीं किया जाता, तब तक ग्रामीण फेंसिंग नहीं होने देंगे.

उत्तर बंगाल के मेखलीगंज क्षेत्र में फेंसिंग; सड़क भारत में है जबकि खेत बांग्लादेश के दहाग्राम-अंगरपोटा एन्क्लेव में हैं | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
उत्तर बंगाल के मेखलीगंज क्षेत्र में फेंसिंग; सड़क भारत में है जबकि खेत बांग्लादेश के दहाग्राम-अंगरपोटा एन्क्लेव में हैं | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

इसी तरह उत्तर 24 परगना के स्वरूपनगर ब्लॉक में घोष पाड़ा, राजबंशी पाड़ा और मंडल पाड़ा के ग्रामीणों के घर अंतरराष्ट्रीय सीमा के बिल्कुल पास बने हुए हैं.

यहां जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया लगभग ठप पड़ गई है.

पश्चिम बंगाल सरकार के एक अधिकारी ने कहा, “ग्रामीणों ने जमीन देने से पहले पुनर्वास की मांग की है. इनमें से कई लोगों के पास सीमा के अंदर की तरफ कोई दूसरी जमीन नहीं है.”

उन्होंने कहा, “ये वे लोग हैं जिनके घर अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हैं और फेंसिंग बनने के बाद वे बाड़ के बाहर चले जाएंगे. इसी कारण जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया धीमी हो रही है.”

कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और मुर्शिदाबाद के कई इलाकों में बीएसएफ के अतिरिक्त ढांचे बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण और सरकार द्वारा कम मुआवजा तय करने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी बड़ी बाधा बने हुए हैं.

कूचबिहार के मेखलीगंज में 42-वर्षीय अमूल्य सिंहसरकार को BLRO ने बुलाकर बताया कि बाड़ के बाहर पड़ने वाली उनकी दो एकड़ जमीन के लिए उन्हें एनओसी देना होगा.

उन्होंने कहा, “हमारी जमीन की बहुत कम कीमत लगाई जा रही है. हमने साफ कह दिया है कि जब तक उचित मुआवजा नहीं मिलेगा, हम एनओसी नहीं देंगे…चाहे कितना भी दबाव डाला जाए.”

सरकारी अधिकारी ने कहा, “ग्रामीण मूल रूप से फेंसिंग के खिलाफ नहीं हैं. उनमें से कई किसान हैं और चाहते हैं कि उनकी कम से कम खेती वाली जमीन बाड़ के बाहर जाए, क्योंकि इससे जमीन की कीमत कम हो जाती है.”

उन्होंने कहा, “कुछ लोग BSF की छावनी के लिए जमीन नहीं देना चाहते. कुछ इलाकों में लोग सरकार द्वारा तय कीमत से दोगुना मुआवजा मांग रहे हैं.”

मुर्शिदाबाद के चकमुथुरा निवासी मोहम्मद अज़ीरुल मंडल की तीन एकड़ जमीन फेंसिंग के बाहर चली जाएगी.

वह मानते हैं कि फेंसिंग जरूरी है, लेकिन उनका कहना है कि राज्य सरकार और बीएसएफ को फेंसिंग लाइन तय करते समय लोगों का ध्यान रखना चाहिए. उन्होंने कहा, “मैं किसान हूं और साल में तीन फसलें—केला, जूट और सब्जियां—उगाता हूं. इसी से हमारे घर का खर्च चलता है.”

“हम उनसे अनुरोध कर रहे हैं कि फेंसिंग को बहुत अंदर की तरफ न बनाया जाए, क्योंकि इससे ज्यादातर खेती वाली जमीन बाड़ के बाहर चली जाएगी.”

अज़ीरुल के भाई ने भी यही बात कही. उन्होंने कहा कि जब जमीन फेंसिंग के बाहर चली जाती है तो उसकी कीमत कम हो जाती है, जिससे जरूरत के समय उसे बेचना मुश्किल हो जाता है. फेंसिंग के सामने एक और बड़ी चुनौती वहां की भौगोलिक स्थिति है. यह इलाका भूस्खलन वाले क्षेत्रों, चार भूमि और कई बड़ी-छोटी नदियों से घिरा हुआ है.

बीएसएफ के एक अधिकारी ने कहा, “मुर्शिदाबाद के लालगोला क्षेत्र में जिस जमीन पर बीएसएफ की सड़क और पुरानी बाड़ थी, वह पद्मा नदी में आई बाढ़ के दौरान कटाव में बह गई और बाड़ टूट गई.” उन्होंने कहा, “तैनात अधिकारियों ने बाड़ को बचाने की कोशिश की, लेकिन सड़क भी बह गई. नदी के लगातार रास्ता बदलने के कारण यहां कोई भी बाड़ लंबे समय तक टिक नहीं सकती.”

इसी तरह चार भूमि में भी फेंसिंग करना मुश्किल है. बीएसएफ सूत्रों के अनुसार, “चार भूमि नदियों के पास की ऐसी जमीन होती है जो मानसून के दौरान पूरी तरह पानी में डूब जाती है. उस समय स्थानीय लोग और बीएसएफ नाव से आवाजाही करते हैं.” एक अन्य बीएसएफ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “यही जमीन सूखे मौसम में रेत का मैदान बन जाती है. इसलिए यहां फेंसिंग करना बेहद कठिन है.”

जमीनी स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों ने द प्रिंट को बताया कि जमीन हस्तांतरण और फेंसिंग का काम पूरा करना बहुत बड़ी चुनौती होगी. एक अधिकारी ने कहा, “गृह मंत्रालय द्वारा भुगतान की जा चुकी 86 किलोमीटर (52 एकड़) जमीन में से लगभग 85 प्रतिशत अगस्त तक बीएसएफ को सौंप दी जाएगी.”

उन्होंने कहा, “बाकी 200 किलोमीटर से अधिक सीमा क्षेत्र की जमीन का अधिग्रहण और पूरी फेंसिंग का काम ज्यादा समय लेगा और यह तभी आगे बढ़ेगा जब हमें नया प्रस्ताव प्राप्त होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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