चेन्नई: अन्नाद्रमुक (AIADMK) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री एम.आर. विजयभास्कर ने सोमवार को करूर विधानसभा सीट से विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. वह विपक्षी पार्टी छोड़ने वाले नेताओं की लंबी सूची में शामिल होने वाले सबसे नए नेता हैं.
उम्मीद है कि वह इस हफ्ते विजय की टीवीके में शामिल हो जाएंगे. इसके बाद अन्नाद्रमुक की विधानसभा में संख्या घटकर 41 रह जाएगी. यह घटनाक्रम डीएमके के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस से नौ साल पुराने रिश्ते खत्म कर मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके) के बाहर होने के दो दिन बाद सामने आया है.
एमडीएमके नेता वाइको ने टीवीके को समर्थन देने का ऐलान किया है, खासकर उपचुनावों में. हालांकि, एमडीएमके के दो विधायकों ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि वे हालिया विधानसभा चुनाव राइजिंग सन चुनाव चिन्ह पर जीतकर आए थे.
ये दोनों घटनाएं मुख्यमंत्री विजय की उस रणनीति के अनुरूप हैं, जिसके तहत वह 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके की संख्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि पार्टी गठबंधन सहयोगियों पर निर्भरता कम कर सके और अधिक आरामदायक बहुमत हासिल कर सके.
अन्नाद्रमुक के छह नेताओं के इस्तीफे और विजय द्वारा तिरुचि ईस्ट सीट खाली करने से जो सीटें खाली हुई हैं, उन पर टीवीके अपने ही उम्मीदवार उतारेगी.
इन रिक्तियों के कारण विधानसभा की मौजूदा प्रभावी संख्या घटकर 227 रह गई है और बहुमत का आंकड़ा भी घटकर 114 हो गया है. फिलहाल टीवीके के पास अकेले 107 विधायक हैं, यानी बहुमत से सिर्फ सात सीटें कम.
अगर टीवीके उपचुनाव में खाली हुई सभी सात सीटें जीत लेती है, तो उसकी संख्या 114 हो जाएगी. हालांकि, 234 सदस्यीय विधानसभा में यह अभी भी मूल बहुमत के आंकड़े 118 से चार सीट कम होगी. हालांकि, यह सब “अगर” पर निर्भर करता है.
अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन वह 118 सीटों के बहुमत से पीछे रह गई थी. इसके बाद टीवीके ने डीएमके के पूर्व सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार बनाई. पांच सीटों वाली कांग्रेस गठबंधन में शामिल हुई और उसे दो मंत्री पद मिले. विदुथलाई चिरुथैगल काची (वीसीके) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने दो-दो सीटों के साथ समर्थन दिया.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [सीपीआई (एम)] ने भी दो-दो सीटों के साथ बाहर से समर्थन दिया. इस समर्थन से टीवीके ने आसानी से विश्वास मत हासिल कर लिया, लेकिन पार्टी ने दूसरे दलों का समर्थन जुटाने की कोशिशें बंद नहीं कीं.
वाइको ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री विजय ने उन्हें भरोसा दिया था कि अगर एमडीएमके के दोनों विधायक इस्तीफा देते हैं और उपचुनाव होते हैं, तो वह खुद उनके लिए प्रचार करेंगे. वाइको ने रविवार को मीडिया से कहा, “आने वाले उपचुनावों में हम टीवीके को समर्थन देंगे. मैं उनकी सरकार की सराहना करता हूं. उन्होंने लोकतंत्र की दो बड़ी बुराइयों—कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार—को खत्म किया है. उन पर ऐसे आरोप नहीं हैं.”
इससे पहले अन्नाद्रमुक के विधायक के. मरगथम कुमारवेल, पी. सत्यभामा, एस. जयकुमार और एसाक्की सुब्बैया विधानसभा से इस्तीफा देकर औपचारिक रूप से सत्तारूढ़ टीवीके में शामिल हो चुके हैं, जिससे उपचुनाव की स्थिति बनी.
अन्नाद्रमुक ने चुनाव में 47 सीटें जीती थीं, लेकिन अंदरूनी कलह और दल-बदल के कारण अब उसके पास केवल 41 विधायक बचे हैं. एडप्पाडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) और एस.पी. वेलुमणि के नेतृत्व वाले गुट पहले आपस में टकराते रहे थे. हालांकि अब वे एकजुट हैं, लेकिन कई नेता ईपीएस खेमे में लौट गए जबकि कुछ ने पार्टी ही छोड़ दी.
ईपीएस ने टीवीके पर विधायकों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) का आरोप लगाया है और कुछ इस्तीफों को स्वीकार किए जाने का विरोध करते हुए विधानसभा अध्यक्ष से दल-बदल कानून के तहत शिकायत भी की है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि टीवीके गठबंधन सहयोगियों पर निर्भरता कम करना चाहती है और पार्टी के फैसलों से यह भी दिखता है कि सहयोगी दलों पर पूरी तरह भरोसा नहीं है.
यह बात विशेष कार्य अधिकारी (OSD) और अन्य प्रतिनिधियों की नियुक्तियों में भी दिखाई देती है.
राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार कहते हैं, “अगर बीजेपी की नीतियों का समर्थन करने वाले किसी राजनीतिक फैसले की बात आती है, तो वीसीके और वामपंथी दल टीवीके का समर्थन वापस ले सकते हैं. विजय यह बात अच्छी तरह जानते हैं. इसलिए उन्होंने सभी नियुक्तियां बहुत सोच-समझकर की हैं.”
उन्होंने कहा, “विजय ने प्रशासन और राजनीति का अनुभव कम होने के बावजूद केवल अपने करीबी लोगों को विशेष सलाहकार और प्रतिनिधि बनाया है. वह किसी दूसरे दल के व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहते, क्योंकि समर्थन खोने का जोखिम नहीं ले सकते.”
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि हाल में ठोस कचरा प्रबंधन जैसी कुछ सरकारी परियोजनाओं के निजीकरण के फैसलों का गठबंधन सहयोगियों ने विरोध किया था, जिसके बाद सरकार को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा.
ऐसे मामलों में टीवीके के लिए विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाना महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि अगर वीसीके या वामपंथी दल समर्थन वापस ले लें, तब भी सरकार मजबूत बनी रहे.
अरुण कुमार ने कहा, “वाइको के रुख से साफ है कि टीवीके उन दलों से संपर्क कर रही है जो ज़रूरत पड़ने पर समर्थन देकर विधानसभा में उसकी स्थिति मजबूत कर सकते हैं. एमडीएमके और अन्नाद्रमुक नेताओं के अलावा पीएमके नेताओं के साथ भी टीवीके की नजदीकियां बढ़ती दिख रही हैं.”
राजनीतिक विश्लेषक सुनील कुमार कहते हैं, “टीवीके और विजय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि बहुमत टीवीके की अपनी पहचान के आधार पर हो, न कि जैसा डीएमके कहती है, ‘डीएमके की मेहरबानी पर’.”
उन्होंने कहा, “टीवीके गठबंधन सरकार जारी रखेगी, लेकिन वह यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसके पास विधानसभा में पर्याप्त सीटें हों, ताकि उसकी स्थिति मजबूत रहे और वह अगले पांच साल तक सरकार बनाए रख सके.”
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