नई दिल्ली: एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम शुरू होने के आठ साल बाद केंद्र सरकार ने नई ऑपरेशनल गाइडलाइंस जारी की हैं, जो यह बदलेंगी कि कार्यक्रम के तहत एनीमिया की पहचान, इलाज और निगरानी कैसे की जाएगी.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने सोमवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण परिषद (CCHFW) की 16वीं बैठक के दौरान एनीमिया मुक्त भारत अभियान की ऑपरेशनल गाइडलाइंस जारी कीं. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि ये गाइडलाइंस कार्यक्रम के एनीमिया मुक्त भारत से एनीमिया मुक्त भारत अभियान में बदलाव को दर्शाती हैं.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा, “एनीमिया मुक्त भारत अभियान और संशोधित ऑपरेशनल गाइडलाइंस का उद्देश्य एनीमिया प्रबंधन का फोकस केवल रोकथाम आधारित देखभाल से हटाकर इलाज आधारित देखभाल पर लाना है. इसके लिए जांच, इलाज, ट्रैकिंग और केस-आधारित प्रबंधन को और मजबूत किया जाएगा.”
एनीमिया आज भी भारत की सबसे बड़ी पोषण और जनस्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है. यह तब होता है जब किसी व्यक्ति के शरीर में हीमोग्लोबिन बहुत कम हो जाता है या स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं पर्याप्त नहीं होतीं. इसके कारण शरीर के अंगों तक ज़रूरत के मुताबिक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती.
इससे थकान, कमजोरी और ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है. बच्चों में एनीमिया विकास और दिमागी वृद्धि को प्रभावित कर सकता है, जबकि गर्भावस्था के दौरान यह मां और बच्चे दोनों के लिए जटिलताओं का खतरा बढ़ा देता है.
मंत्रालय पहले भी कह चुका है कि आयरन की कमी, फोलेट (विटामिन B9), विटामिन B12 और विटामिन A की कमी भी एनीमिया के पोषण संबंधी कारण हैं.
मंत्रालय ने पहले कहा था, “एनीमिया के व्यापक प्रसार की वजह खराब पोषण, कम उम्र में गर्भधारण, मातृ देखभाल की कमी और आयरन युक्त भोजन तक सीमित पहुंच है. यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती है, जिस पर तुरंत और लगातार कार्रवाई की जरूरत है.”
इसीलिए संशोधित गाइडलाइंस में सप्लीमेंट देने के साथ-साथ जांच और केस-आधारित प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया गया है.
क्या है 7x7x7 फ्रेमवर्क
पहले यह कार्यक्रम 6x6x6 फ्रेमवर्क पर चलता था, जिसमें छह लाभार्थी समूह, छह हस्तक्षेप और छह संस्थागत व्यवस्थाएं शामिल थीं. नई गाइडलाइंस में इसे बढ़ाकर 7x7x7 फ्रेमवर्क कर दिया गया है.
इसमें जो नया लाभार्थी समूह जोड़ा गया है, वह है जन्म के समय कम वजन वाले छह महीने तक के शिशु. मंत्रालय ने कहा कि ऐसे बच्चों के शरीर में आयरन का भंडार कम होता है और उन्हें जीवन के शुरुआती चरण में ही एनीमिया होने का ज्यादा खतरा रहता है. मंत्रालय के अनुसार, इन्हें शामिल करने का उद्देश्य “पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाले एनीमिया के चक्र को तोड़ना” है.
गाइडलाइंस में “ईटिंग राइट” को भी एक नए कार्यक्रम हस्तक्षेप के रूप में जोड़ा गया है, जिसके तहत आयरन युक्त और विविध प्रकार का भोजन नियमित रूप से खाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.
इसके अलावा डिजिटल ट्रैकिंग के साथ मजबूत मॉनिटरिंग और मूल्यांकन को एक नए संस्थागत तंत्र के रूप में जोड़ा गया है.
T4 तरीका
कार्यक्रम के पुराने T3 तरीके — टेस्ट, ट्रीट एंड टॉक की जगह अब T4 तरीका लागू किया गया है: टेस्ट, ट्रीट, टॉक एंड ट्रेक.
मंत्रालय ने कहा कि इस तरीके के तहत लाभार्थियों की एनीमिया के लिए जांच की जाएगी, तय मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार इलाज दिया जाएगा, भोजन संबंधी सलाह दी जाएगी और फिर उनकी निगरानी की जाएगी ताकि जरूरत पड़ने पर आगे इलाज और रेफरल सुनिश्चित किया जा सके.
गाइडलाइंस में गंभीर एनीमिया से पीड़ित गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं या उन महिलाओं के लिए, जिन पर आयरन की गोलियों का असर नहीं हो रहा, नस (IV) के जरिए आयरन देने की भी सिफारिश की गई है.
डिजिटल ट्रैकिंग
नई गाइडलाइंस एनीमिया प्रबंधन के लिए एक साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार करती हैं.
गर्भवती महिलाओं के हीमोग्लोबिन रिकॉर्ड को JANANI पोर्टल से जोड़ा जाएगा, जो मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए सरकार का डिजिटल प्लेटफॉर्म है.
बच्चों के रिकॉर्ड राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK) पोर्टल से लिए जाएंगे, जो बच्चों की स्वास्थ्य जांच और सेवाओं का रिकॉर्ड रखता है. इसके अलावा U-WIN (Universal Immunisation WIN) पोर्टल से भी जानकारी ली जाएगी, जहां टीकाकरण का रिकॉर्ड रखा जाता है.
इन सभी रिकॉर्ड्स को एक ही एनीमिया मुक्त भारत अभियान पोर्टल में जोड़ा जाएगा.
मंत्रालय के अनुसार, इससे “पूरी देखभाल प्रक्रिया” यानी जांच, परामर्श, इलाज और फॉलो-अप तक की निगरानी डिजिटल रूप से की जा सकेगी.
एनीमिया को शारीरिक विकास में रुकावट, कमजोर मानसिक विकास, कम उत्पादकता और गर्भावस्था में खराब परिणामों से जोड़ा गया है.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि संशोधित कार्यक्रम से अलग-अलग आयु वर्गों में एनीमिया कम होने की उम्मीद है. साथ ही मातृ और शिशु स्वास्थ्य में सुधार होगा तथा शिशु मृत्यु दर (IMR) और मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) में भी कमी आने की संभावना है.
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, 6 से 59 महीने की उम्र के 67.1 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से प्रभावित हैं. यह समस्या 15-49 वर्ष की 57 प्रतिशत महिलाओं, 52.2 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं और 15-19 वर्ष की 59.1 प्रतिशत किशोरियों को भी प्रभावित करती है. ये अभी भी देश के सबसे ताजा राष्ट्रीय आंकड़े हैं, क्योंकि पिछले महीने जारी NFHS-6 फैक्ट शीट्स में एनीमिया के प्रसार के आंकड़े शामिल नहीं किए गए थे.
सरकार ने कहा कि पहले के सर्वेक्षणों में इस्तेमाल होने वाली उंगली में सुई चुभोकर खून लेने की पद्धति को लेकर चिंता के कारण हीमोग्लोबिन जांच को हटा दिया गया. अब एनीमिया के नए अनुमान भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के डाइट एंड बायोमार्कर सर्वे से मिलेंगे, जिसमें नस से खून लिया जाता है. सरकार का कहना है कि यह तरीका ज्यादा सटीक है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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