लखनऊ/अयोध्या: अयोध्या के राम मंदिर में दान राशि के कथित गबन का मामला सामने आने, एफआईआर दर्ज होने और आठ लोगों की गिरफ्तारी के तीन हफ्ते बाद ट्रस्ट से जुड़े वर्तमान और पूर्व पदाधिकारियों से हुई बातचीत से संकेत मिलता है कि प्रबंधन के अंदर की आपसी खींचतान ने ही कथित गड़बड़ी का पर्दाफाश किया.
अयोध्या में ट्रस्ट से जुड़े कई सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि यह मामला तब सामने आया जब ट्रस्ट के तीन प्रमुख चेहरों—महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा और आमंत्रित सदस्य गोपाल राव के करीबी माने जाने वाले लोगों के बीच मतभेद बढ़ गए.
गिरफ्तार किए गए आठ लोगों में टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा और अनुकल्प मिश्रा शामिल हैं. माना जाता है कि तीनों का संबंध ट्रस्ट के इन प्रभावशाली लोगों से था. सूत्रों का दावा है कि दान की नकदी के प्रबंधन में कथित गड़बड़ियों को लेकर सबसे पहले इन्हीं लोगों के बीच विवाद शुरू हुआ था.
ट्रस्ट प्रबंधन से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि यह विवाद करीब दो महीने से अंदर ही अंदर चल रहा था, लेकिन बाद में सार्वजनिक हो गया. अधिकारी ने कहा, “हर समूह दूसरे पर दान की व्यवस्था से पैसा कमाने का आरोप लगा रहा था. शिकायतें बार-बार चंपत राय और अनिल मिश्रा तक पहुंचीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.”
चंपत राय के करीबी माने जाने वाले टिन्नू यादव और उनके भतीजे मनीष यादव पर अन्य लोगों को शक हुआ. आरोप था कि उन्होंने अयोध्या और आसपास के इलाकों में तेज़ी से संपत्तियां खरीदी हैं. इसके जवाब में टिन्नू और मनीष ने कथित तौर पर अनुकल्प मिश्रा पर इसी तरह के आरोप लगाए. अनुकल्प, लवकुश मिश्रा के रिश्तेदार हैं.
अनुकल्प और लवकुश मिश्रा को ट्रस्टी अनिल मिश्रा का करीबी माना जाता है. इसके बाद दोनों गुटों ने एक-दूसरे के खिलाफ बाहरी लोगों से सबूत जुटाने शुरू कर दिए और आरोप सार्वजनिक हो गए.

13 जून को राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) से जुड़े सूत्र भी इस आकलन से सहमत हैं. उनका दावा है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा दोनों अपने-अपने करीबी लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, जिसके कारण उस समय कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई.
मंदिर परिसर की सुरक्षा चार अलग-अलग एजेंसियों के जिम्मे है—उत्तर प्रदेश स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स (एसएसएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), प्रादेशिक सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) और एक निजी सुरक्षा एजेंसी.
सूत्रों के अनुसार, 5 जून को विवाद तब बढ़ गया जब निजी सुरक्षा एजेंसी के कर्मचारियों ने कुछ कर्मचारियों की जेबों में नकदी पाई. इसके बाद मंदिर प्रशासन के अलग-अलग समूहों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए.
7 जून को समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या के एक स्थानीय पार्टी नेता से जानकारी मिलने के बाद सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह मुद्दा उठाया. इसके साथ ही यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया.
उसी दिन, 7 जून को, चंपत राय ने सार्वजनिक रूप से दान प्रबंधन व्यवस्था में किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया था. हालांकि, एसआईटी की शुरुआती जांच से परिचित सूत्रों का कहना है कि जांच में इन दावों की पुष्टि नहीं हुई.
इसके बाद 9 जून को एक वीडियो सामने आया, जिसमें महिपाल सिंह दिखाई दिए. वह पहले मंदिर की नकदी प्रबंधन व्यवस्था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े रहे हैं.
वीडियो में उन्होंने दान राशि के प्रबंधन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का आरोप लगाया. 30-वर्षीय एक पूर्व आउटसोर्स कर्मचारी ने दिप्रिंट को बताया कि उन्होंने अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक मंदिर की नकदी गिनने वाली टीम में 15,000 रुपये मासिक वेतन पर काम किया था.
उनके अनुसार, कथित गड़बड़ी उस समय होती थी जब दान में मिली नकदी को गिनकर बंडलों में बांधा जाता था और फिर बैंक में जमा करने के लिए बक्सों में पैक किया जाता था. नाम न छापने की शर्त पर कर्मचारी ने कहा, “मैंने कई बार कुछ लोगों को नकदी के बंडलों में हेरफेर करते देखा था.”
नकदी गिनने वाली टीम के इस पूर्व सदस्य ने कहा कि इन चिंताओं की जानकारी नकदी गिनने वाली टीम के प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव को दी गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई और यह भी आरोप लगाया कि नकदी प्रबंधन टीम के कुछ सदस्य उसे बार-बार चुप रहने की सलाह देते थे.
जो कुछ उन्होंने कथित तौर पर देखा, उससे परेशान होकर उन्होंने आखिरकार नौकरी छोड़ दी. उनके अनुसार, इसी वजह से चार अन्य युवकों ने भी नौकरी छोड़ दी थी.

मंदिर की ‘त्रिमूर्ति’
ट्रस्ट के कामकाज से परिचित सूत्रों का कहना है कि चंपत राय को लंबे समय से ट्रस्ट का सबसे प्रभावशाली पदाधिकारी माना जाता रहा है. साल 2021 में कर्नाटक के रहने वाले और आरएसएस पृष्ठभूमि से जुड़े गोपाल राव को ट्रस्ट में आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किया गया था.
ट्रस्ट से जुड़े लोगों के अनुसार, गोपाल राव को चंपत राय के बराबर अधिकार दिए गए थे और वह मंदिर निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में शामिल हो गए थे. मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने मंदिर के प्रशासनिक कामकाज में बड़ी भूमिका निभाई. अयोध्या के निवासी होने के कारण उन्होंने अपने परिचित कई लोगों को नकदी प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े पदों पर नियुक्त कराने में मदद की.
समय के साथ ट्रस्ट के अंदर तीन अलग-अलग गुट बन गए—एक चंपत राय के समर्थकों का, दूसरा अनिल मिश्रा के समर्थकों का और तीसरा गोपाल राव के समर्थकों का. ट्रस्ट के वरिष्ठ सदस्य और निर्मोही अखाड़ा के महंत आचार्य दिनेंद्र दास ने दिप्रिंट को बताया कि चंपत राय, अनिल मिश्रा और कुछ अन्य ट्रस्ट सदस्यों के बीच संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहते थे.
उन्होंने याद करते हुए कहा कि ट्रस्ट के शुरुआती दिनों में उन्हें और उनके साथ जुड़े लोगों को कथित तौर पर अपने वाहन ट्रस्ट परिसर के अंदर ले जाने की अनुमति नहीं दी जाती थी. दिनेंद्र दास ने कहा, “एक दिन मैंने खुलकर इसका विरोध किया और दोनों का कड़ा सामना किया. उसके बाद वे पीछे हट गए.”
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निर्मोही अखाड़े को ट्रस्ट में स्थायी प्रतिनिधित्व मिला था, लेकिन उन्हें लगता था कि ट्रस्ट के कुछ पदाधिकारी अखाड़े की भागीदारी से सहज नहीं थे.
उन्होंने कहा, “भगवान राम को इस विवाद के दाग से बचा लिया गया है. जो भी दोषी है, उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए.”
सूत्रों का यह भी दावा है कि दिनेंद्र दास के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ अच्छे संबंध हैं, जबकि ट्रस्ट के अंदर चंपत राय और अनिल मिश्रा को आमतौर पर केंद्र सरकार का मजबूत समर्थन प्राप्त माना जाता था.

ट्रस्ट से जुड़े सूत्रों के अनुसार, वरिष्ठ सदस्यों के बीच मतभेद पहले से ही किसी से छिपे नहीं थे. जब चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे सौंपे गए, तब उन्हें आधिकारिक रूप से स्वीकार किए जाने की पुष्टि में असामान्य देरी हुई. आखिरकार इसकी पुष्टि ट्रस्ट के आधिकारिक एक्स अकाउंट के जरिए की गई और ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने इसकी घोषणा की. सूत्रों का कहना है कि यह घटना भी ट्रस्ट के भीतर मौजूद अंदरूनी मतभेदों को दिखाती है.
SOPs का पालन नहीं किया गया
एसआईटी से जुड़े सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि उनकी शुरुआती जांच में डोनेशन गिनने के प्रोसेस को कंट्रोल करने वाले स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs) के कई उल्लंघनों की ओर इशारा किया गया है. सूत्रों के अनुसार, कैश गिनने के दौरान सिक्योरिटी गार्ड की तैनाती, काउंटिंग रूम में अंदर जाने से पहले और बाहर जाने के बाद कर्मचारियों की तलाशी लेना और काउंटिंग प्रोसेस की सीसीटीवी फुटेज को 180 दिनों तक सुरक्षित रखने जैसे ज़रूरी प्रोटोकॉल का कथित तौर पर पालन नहीं किया गया.
एसआईटी की जांच से वाकिफ एक सूत्र ने कहा, “SOPs के तहत डोनेशन गिनने वाले स्टाफ को बिना जेब वाले कपड़े पहनने थे, सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज (एसआईएस) एजेंसी के ज़रिए सिक्योरिटी तैनात करनी थी, काउंटिंग रूम में अंदर आने और बाहर जाने वाले हर व्यक्ति की ज़रूरी तलाशी लेनी थी और रैंडम सिक्योरिटी चेकिंग करनी थी. इनमें से किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया. डोनेशन गिनने के प्रोसेस की सीसीटीवी फुटेज को ज़रूरी 180 दिनों के बजाय सिर्फ 45 दिनों के लिए रखा गया.”
संतोष दुबे, जिन्होंने मंदिर के दान में हेराफेरी का आरोप लगाते हुए राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन में फॉर्मल शिकायत दर्ज कराई थी, ने दिप्रिंट को बताया कि जांच अब तक हुई गिरफ्तारियों पर ही नहीं रुकनी चाहिए. दुबे ने कहा, “यह एक बड़ा स्कैम है. अब तक सिर्फ छोटी मछलियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है. ट्रस्ट के सीनियर अधिकारियों से भी पूछताछ होनी चाहिए.”
राम मंदिर कंस्ट्रक्शन कमिटी के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा के पब्लिक बयान का ज़िक्र करते हुए, जिसमें उन्होंने माना था कि गड़बड़ियां हुई हैं, दुबे ने कहा, “अगर ऐसा गड़बड़झाला करीब दो साल से चल रहा था, तो यह मानना मुश्किल है कि चेयरमैन को इसकी पूरी जानकारी नहीं थी. जांच से यह पता चलना चाहिए कि किसे क्या और कब पता था.”
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