नई दिल्ली: 2014 से 2021 के बीच कांग्रेस के कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए. कुछ मुख्यमंत्री बने, कुछ को कैबिनेट में जगह मिली, और कुछ को बाद में किनारे कर दिया गया.
कई लोगों के लिए बीजेपी में शामिल होना तुरंत फायदे लेकर आया, जैसे कैबिनेट पद, राज्यसभा सीट, संगठन में भूमिका या चुनाव टिकट. लेकिन कुछ लोग सिर्फ प्रतीकात्मक भूमिकाओं तक ही सीमित रह गए.
“भारतीय राजनीति में दलबदल अब विचारधारा से ज्यादा सत्ता का मामला बन गया है,” दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह ने दिप्रिंट से कहा.
“बीजेपी जैसी पार्टियां सिर्फ उन्हीं नेताओं को जगह देती हैं जो कुछ बड़ा लेकर आते हैं, जैसे सामाजिक आधार, संगठनात्मक नेटवर्क, क्षेत्रीय प्रभाव या चुनावी उपयोगिता. जो सिर्फ संख्या बढ़ाते हैं, वे अक्सर तब किनारे कर दिए जाते हैं जब उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है.”
गैर लाभकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के अनुसार, 2014 से 2021 के बीच कांग्रेस में सबसे ज्यादा दलबदल हुए. इस दौरान उसने 222 चुनावी उम्मीदवार और 177 सांसद और विधायक अन्य पार्टियों को खो दिए. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इन दलबदलों की सबसे बड़ी लाभार्थी बनी, जिसमें 253 उम्मीदवार और 173 विधायक या सांसद उसके साथ जुड़ गए.
कांग्रेस से दलबदलों का स्तर अक्सर सरकारें गिराने तक के लिए पर्याप्त था. 2016 में अरुणाचल प्रदेश में 43 विधायक बीजेपी में चले गए, 2017 में गुजरात में 35, और 2020 में मध्य प्रदेश में 22 विधायकों के जाने से कांग्रेस सरकार गिर गई.
ADR विश्लेषण के अनुसार, असम में 15, कर्नाटक में 13, तेलंगाना में 12, उत्तराखंड में 11 और गोवा तथा मणिपुर में 8-8 विधायकों के दलबदल ने भी राजनीतिक समीकरण बदल दिए.
कांग्रेस के अलावा भी बड़े दलबदल हुए, जैसे तृणमूल कांग्रेस से सुवेंदु अधिकारी और आरजेडी/JDU से सम्राट चौधरी, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ.
विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह ने कहा कि कांग्रेस दूसरी पार्टियों की तुलना में ज्यादा दलबदलों की शिकार इसलिए है क्योंकि यह एक बड़ी अखिल भारतीय पार्टी है, लेकिन इसका संगठन कमजोर हो गया है. क्षेत्रीय पार्टियों के मुकाबले इसमें नियंत्रण कम है, जिससे असंतोष और दूरी बढ़ी है.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंह देव ने एक अलग कारण बताया. उन्होंने कहा, “ईडी और सीबीआई का बहुत दबाव है. कुछ लोग छोटे फायदे के लिए जाते हैं, लेकिन कई लोग इसलिए जाते हैं क्योंकि दबाव असहनीय हो जाता है.”
एक पूर्व मुख्यमंत्री ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पार्टी अब अपने ही नेताओं के लिए पहुंच से बाहर हो गई है.
उन्होंने कहा, “लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मिलना भी अब मुश्किल हो गया है. पुराने नेताओं के लिए भी पहुंच कठिन है, तो युवा नेताओं की स्थिति समझी जा सकती है. कई लोगों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जाती. कुछ इसी निराशा में छोड़ देते हैं, और कुछ बीजेपी के अवसरों और ताकत की ओर आकर्षित हो जाते हैं. आखिर उनके पास पैसा और संसाधन सब है.”
बीजेपी प्रवक्ता अजय आलोक ने दिप्रिंट से कहा कि पार्टी की बढ़त और कांग्रेस की गिरावट का सबसे बड़ा कारण नेतृत्व है.
उन्होंने कहा, “मजबूत नेतृत्व पार्टी को निर्णायक बनाता है और कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करता है. पिछले दो दशकों में कांग्रेस का नेतृत्व उसकी सबसे कमजोर कड़ी रहा है, जिससे असंतोष बढ़ा. जबकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने बीजेपी को गति, स्थिरता और जनता का भरोसा दिया है.”
विजेता
सबसे साफ फायदा उन लोगों को मिला जिन्होंने पूरी विधायक इकाइयों के साथ पार्टी बदली और बदले में उन्हें कार्यकारी शक्ति मिली.
हिमंत बिस्वा सरमा, जो असम में तरुण गोगोई के कार्यकाल 2011 से 2015 के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री थे, अब बीजेपी के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में से एक हैं. उन्होंने दो लगातार कार्यकाल जीते और हाल ही में हुए असम विधानसभा चुनाव में गोगोई के बेटे गौरव गोगोई को हराया.

फिर पेमा खांडू थे, जिन्होंने 2016 में 43 कांग्रेस विधायकों को बीजेपी में ले जाकर अरुणाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री पद बरकरार रखा.
एन. बीरेन सिंह और माणिक साहा भी दलबदल के बाद मुख्यमंत्री बने. बीरेन सिंह पिछले साल तक मणिपुर के मुख्यमंत्री थे और साहा अब त्रिपुरा के मौजूदा मुख्यमंत्री हैं.

आगे ज्योतिरादित्य सिंधिया का 2020 का विद्रोह था, जिसमें 22 कांग्रेस विधायक बीजेपी में चले गए और कमलनाथ सरकार गिर गई. इसके बाद उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया. सिंधिया अब संचार और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री हैं.
लेकिन सिंधिया, जिन्हें कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली युवा नेताओं में गिना जाता था, बीजेपी में वैसी हैसियत नहीं बना पाए.
इस विद्रोह से लाभ पाने वालों में गोविंद सिंह राजपूत (2020 से 2023 तक राजस्व और परिवहन मंत्री), तुलसी सिलावट (2020 से जल संसाधन मंत्री) और प्रधुम्न सिंह तोमर (2020 से ऊर्जा मंत्री) शामिल हैं.
अन्य नेताओं में प्रभुराम चौधरी और ऐदल सिंह कंसाना भी शामिल हैं, जिन्हें मंत्री या संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलीं.
अन्य प्रमुख लाभार्थियों में जितिन प्रसाद शामिल हैं, जो कांग्रेस के ग्रुप ऑफ 23 से बीजेपी में आए और 2021 में केंद्रीय राज्य मंत्री बने. रवनीत सिंह बिट्टू, जो पंजाब से कांग्रेस सांसद थे और बाद में बीजेपी में गए, उन्हें 2024 में केंद्रीय राज्य मंत्री बनाया गया.
जगदंबिका पाल, जो 2014 में बीजेपी में आए, कई बार लोकसभा सांसद बने और वक्फ संशोधन बिल की संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष बने.

सुनील जाखड़, जो पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष थे और 2022 में बीजेपी में आए, उन्हें पंजाब बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया और 2023 में वे राज्य में प्रमुख चेहरों में से एक बने. इस सप्ताह उन्हें राज्य अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.
राधाकृष्ण विखे पाटिल, जो महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता थे और 2019 में पार्टी छोड़ी, अब राज्य में जल संसाधन विभाग संभाल रहे वरिष्ठ मंत्री हैं.
रमेश जारकीहोली, जो 2019 कर्नाटक दलबदल में प्रमुख भूमिका में थे, उन्हें भी कैबिनेट में जगह मिली और वे बीजेपी के प्रभावशाली नेता हैं.
दिगंबर कामत, जो गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री थे, 2022 में बीजेपी में शामिल होने के बाद राज्य मंत्री बनाए गए, लेकिन अब उनकी पहले जैसी पकड़ नहीं रही.
दिलीप राय, जो ओडिशा के पूर्व कांग्रेस नेता थे, उन्हें इस साल बीजेपी ने राज्यसभा सीट दी.
इनमें से कई मामलों में एंटी-डिफेक्शन कानून प्रभावी नहीं रहा. विधायकों ने अयोग्यता की प्रक्रिया शुरू होने से पहले इस्तीफा दे दिया, स्पीकर के फैसले में देरी हुई, या विलय के प्रावधानों का उपयोग किया गया. कानूनी चुनौतियों के बावजूद ज्यादातर दलबदल सफल रहे.
हारने वाले
एक और समूह के लिए, बीजेपी में जाने से बहुत कम फायदा मिला या फिर जल्दी ही उन्हें किनारे कर दिया गया.
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और आंध्र प्रदेश के नल्लारी किरण कुमार रेड्डी, पार्टी बदलने के बावजूद आज किसी खास राजनीतिक महत्व में नहीं हैं.
बहुगुणा, जो कभी उत्तराखंड में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, अब बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी तक सीमित हैं और उनके पास कोई बड़ा चुनावी या संगठनात्मक पद नहीं है.
अशोक चव्हाण, जो कभी महाराष्ट्र में कांग्रेस के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे, 2024 में बीजेपी में शामिल हुए और उन्हें राज्यसभा में जगह मिली, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अब उनका वह प्रभाव नहीं रहा जो पहले था.
कैप्टन अमरिंदर सिंह, जो दो बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे, 2022 में कांग्रेस नेतृत्व से टकराव के बाद पार्टी छोड़ दी. उन्होंने अपनी पार्टी बनाई, फिर उसे 2022 में बीजेपी में मिला दिया और अब वे पंजाब की सक्रिय राजनीति से लगभग गायब हैं. उनकी पत्नी परनीत कौर, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री और पंजाब से कांग्रेस सांसद थीं और 2024 में बीजेपी में शामिल हुईं, उन्हें भी कोई बड़ा संगठनात्मक या चुनावी पद नहीं मिला.
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी, जो कभी पार्टी हाईकमान के करीबी माने जाते थे, 2024 में कांग्रेस छोड़ चुके थे और अब बीजेपी में भी उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंच नहीं मिला.
रामनिवास रावत, जो मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री थे और 2024 में पार्टी बदली, उनके पास अभी कोई महत्वपूर्ण पार्टी भूमिका नहीं है. कृपाशंकर सिंह, जो महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री थे और 2019 में बीजेपी में आए, उन्हें केवल राज्य उपाध्यक्ष जैसा प्रतीकात्मक पद दिया गया.
सबसे साफ पैटर्न उन लोगों में दिखता है जिन्होंने राजनीतिक संकट के दौरान दलबदल किया और बाद में उन्हें कोई बड़ा फायदा नहीं मिला. मध्य प्रदेश में महेंद्र सिंह सिसोदिया, इमरती देवी, गिर्राज दंडोतिया, रघुराज सिंह कंसाना और कमलेश जाटव या तो चुनाव हार गए या फिर 2020 में कांग्रेस सरकार गिराने में मदद करने के बाद उन्हें कोई बड़ा मंत्री या संगठनात्मक पद नहीं मिला.
कर्नाटक में बी.सी. पाटिल, आनंद सिंह, नारायण गौड़ा और रोशन बेग 2019 में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिराने के बाद धीरे-धीरे महत्व खोते चले गए.
गोवा में चंद्रकांत कवलेकर, जेनिफर मोनसेरेट और क्लाफासियो डायस, 2019 में कांग्रेस को कमजोर करने में अहम भूमिका निभाने के बावजूद बीजेपी में कोई खास प्रभाव नहीं बना पाए.
राष्ट्रीय स्तर पर, टोम वडक्कन, जो कभी कांग्रेस के सबसे प्रमुख प्रवक्ताओं में से एक थे और 10 जनपथ के करीबी माने जाते थे, 2019 में बीजेपी में आए लेकिन अब सिर्फ प्रवक्ता की भूमिका तक सीमित हैं.
अनिल एंटनी, जो पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी के बेटे हैं, उन्होंने 2023 में कांग्रेस छोड़ दी जब वे केरल में डिजिटल कम्युनिकेशन सेल के प्रमुख थे और बीजेपी में उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता और राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि अगर वे पार्टी में रहते तो उनके पास ज्यादा बेहतर भविष्य होता.
बीच में रहने वाले
एक और समूह उन दलबदलुओं का है जो एक राजनीतिक ग्रे ज़ोन में हैं, यानी न तो उन्हें बहुत फायदा मिला और न ही वे बहुत कमजोर हुए.
हरियाणा के राव इंद्रजीत सिंह सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री बने रहे और लगभग वही स्थिति बनाए रखी जो कांग्रेस में थी, जहां वे राज्यसभा में चीफ व्हिप थे. उद्योगपति-राजनेता नवीन जिंदल सांसद बने रहे लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका में कोई बड़ा विस्तार नहीं हुआ.
गौरव वल्लभ कांग्रेस प्रवक्ता से बीजेपी में जाकर भी लगभग वही मीडिया से जुड़ी भूमिका में बने रहे. हार्दिक पटेल, जो कभी गुजरात में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष थे और ओबीसी समुदाय के एक प्रमुख युवा चेहरे थे, अब बीजेपी विधायक हैं लेकिन उनके पास कोई बड़ा संगठनात्मक या मंत्री पद नहीं है.
मध्य प्रदेश में बिसाहूलाल सिंह विधायक और राज्य कार्यकारिणी सदस्य बने रहे, जबकि मनोज चौधरी मुख्य रूप से विधायक ही रहे और उनके प्रभाव में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई.
कर्नाटक के मुनिरत्न, डॉ. के. गोपालैया और बायरथी बसवराज 2019 के दलबदल के बाद भी विधायक बने रहे लेकिन बीजेपी में बड़े पावर सेंटर नहीं बन पाए.
गोवा में माइकल लोबो, डेलिला लोबो, राजेश फालदेसाई और एलेक्सियो सेकीरा विधायक बने रहे लेकिन उनकी स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ.
गुजरात में अल्पेश ठाकोर और सी.जे. चावड़ा की स्थिति लगभग वैसी ही रही जैसी कांग्रेस में थी. कोण्डा विश्वेश्वर रेड्डी, अदिति सिंह, राज कुमार चौहान और नीरज बासोया राजनीतिक रूप से सक्रिय और चुनावी रूप से प्रासंगिक तो हैं लेकिन संगठनात्मक प्रभाव या राष्ट्रीय पहचान में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया.
वो लोग जो वापस लौटे
कुछ ही दलबदलू अंततः वापस कांग्रेस में लौट आए.
हरियाणा में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद अशोक तंवर कुछ समय बीजेपी में रहने के बाद वापस लौट आए. मध्य प्रदेश में बैजनाथ सिंह यादव, जो 2020 के विद्रोह में ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी थे, वे भी वापस आ गए.
दिल्ली में पूर्व विधायक अमरीश सिंह गौतम और भीष्म शर्मा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में लौट आए. पंजाब में बलविंदर सिंह लड्डी बीजेपी में शामिल होने के कुछ ही दिनों बाद वापस कांग्रेस में लौट आए, जो दलबदल के गणित पर एक स्पष्ट टिप्पणी मानी जाती है.
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