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Friday, 9 October, 2026
होमराजनीतिEXCLUSIVE: मणिपुर संकट का हल सुरक्षा बलों से ही संभव, पर नेतृत्व में दूरदृष्टि की कमी: बीरेन सिंह

EXCLUSIVE: मणिपुर संकट का हल सुरक्षा बलों से ही संभव, पर नेतृत्व में दूरदृष्टि की कमी: बीरेन सिंह

दिप्रिंट से बातचीत में एन. बीरेन सिंह ने दरकिनार किए जाने की बात से इनकार किया. उन्होंने कहा कि समस्या 'जटिल' है और शांति तभी आएगी जब राज्य पुलिस बलों को मज़बूत किया जाएगा और उन्हें केंद्रीय बलों का समर्थन मिलेगा.

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इंफाल: मणिपुर में वहां के तीन मुख्य जातीय समुदायों—मैतेई, कुकी और नागा के बीच पिछले तीन साल से भी ज्यादा समय से चल रहा संघर्ष “बहुत उलझा हुआ” और “जटिल” है. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने बुधवार को दिप्रिंट को दिए एक खास इंटरव्यू में कहा कि अगर इस समस्या को सुलझाना है, तो कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य पुलिस को दी जानी चाहिए और केंद्रीय सुरक्षा बलों को उनकी मदद करनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि बाहर से आने वाले सुरक्षा बलों, जिनमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की विशेष CoBRAS इकाई भी शामिल है, को यह पहचानने में मुश्किल होती है कि कौन कौन है. इसकी वजह यह है कि उन्हें यहां की भाषा नहीं आती और वे मैतेई और कुकी के बीच का अंतर नहीं जानते. वे यह भी नहीं पहचान पाते कि मणिपुर में लंबे समय से रह रहा कुकी कौन है और म्यांमार से आया कुकी कौन है.

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, “हम लोगों को पहचान सकते हैं, क्योंकि हम उनकी भाषा बोलने के तरीके से उन्हें पहचान लेते हैं. जब वे मणिपुरी, हिंदी या अंग्रेजी बोलते हैं, तो हम पहचान सकते हैं कि वह मणिपुर में लंबे समय से रह रहा कुकी है या म्यांमार या बांग्लादेश से आया है. लेकिन बाहर से आने वाले सुरक्षा कर्मियों को यह पता नहीं होता. उन्हें हमारी भाषा भी नहीं आती. उन्हें यह अंतर नहीं पता कि म्यांमार के लोग कैसे बोलते हैं और मणिपुर में लंबे समय से रह रहे पुराने कुकी लोग कैसे बोलते हैं.”

सिंह ने कहा कि ऐसी स्थिति को संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ राज्य सरकार की होनी चाहिए. उन्होंने कहा, “अगर हम राज्य पुलिस को मजबूत बनाएं और उसे अधिकार दें, राज्य पुलिस इंफाल घाटी और पहाड़ी इलाकों, दोनों जगहों पर आगे रहकर काम करे और केंद्रीय सुरक्षा बल उसकी मदद करें, तभी इस समस्या को सुलझाया जा सकता है.” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं लगता कि ऐसा हो पाएगा, क्योंकि राज्य के नेतृत्व के पास “दूरदृष्टि नहीं है”.

उन्होंने कहा, “ऐसा करने के लिए नेता की सोच साफ होनी चाहिए. तभी हम इस समस्या को सुलझा सकते हैं. इस तरह की दूरदृष्टि होनी चाहिए. लेकिन फिलहाल मुझे ऐसा नहीं दिखता.” यह बात कहकर उन्होंने बिना नाम लिए राज्य के मौजूदा नेतृत्व पर निशाना साधा.

फरवरी 2025 में सिंह के इस्तीफे के बाद मणिपुर में एक साल के लिए राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. इस साल फरवरी में युमनाम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री बनाया गया.

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वह यह नहीं कह सकते कि पिछले फरवरी में दोनों जातीय समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के दौरान उन्हें पद से हटाकर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने उनके साथ गलत किया था या नहीं.

उन्होंने कहा, “नहीं, मैं यह नहीं कह सकता कि उन्होंने मेरे साथ गलत किया. केंद्रीय नेता चाहते थे कि मणिपुर में हालात सामान्य हों. इसलिए उन्होंने शायद सोचा होगा कि अगर मैं मुख्यमंत्री बना रहा, तो कुछ समुदाय हिंसा के लिए बीरेन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. शायद इसी वजह से मुझे हटाया गया, ऐसा मेरा मानना है. इसके अलावा कोई और वजह नहीं है. वे शांति को प्राथमिकता दे रहे हैं.”

सिंह ने कहा कि वह हाल ही में राज्यपाल अजय भल्ला से मिलने गए थे और उन्हें मणिपुर की समस्या सुलझाने के लिए कुछ सुझाव दिए थे. इनमें राज्य पुलिस को आगे रहकर कार्रवाई करने का अधिकार देना भी शामिल था. उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि हथियारबंद उग्रवादियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके उन्हें खत्म किया जाए. यह कार्रवाई सिर्फ हथियारबंद कुकी उग्रवादियों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी समुदायों के हथियारबंद संगठनों के सदस्यों के खिलाफ होनी चाहिए.

सिंह ने कहा, “जिन संगठनों ने केंद्र के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस (SoO) समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, उनके सभी हथियारबंद सदस्यों को उनके कैंपों के अंदर बंद करके रखा जाए. इसके बाद दूसरे हथियारबंद संगठनों के सदस्यों की पहचान की जाए. फिर हम घाटी और पहाड़ी इलाकों में तलाशी अभियान चलाएं और जो भी वहां मौजूद हो, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें. इसके बाद ही, जब सैन्य कार्रवाई के जरिए अवैध हथियारों को हटाया जाएगा, तभी शांति लौटेगी.”

सिंह ने कहा कि इसके बाद ही अपने घरों से विस्थापित हुए लोगों के पुनर्वास का काम शुरू किया जा सकता है. उन्होंने कहा, “बहुत से लोग राहत शिविरों, क्लबों और सामुदायिक भवनों में रह रहे हैं. वे अभी अपनी सामान्य जिंदगी नहीं जी पा रहे हैं.”

मई 2023 में मैतेई और आदिवासी कुकी-जो समुदाय के बीच शुरू हुई जातीय हिंसा के बाद मणिपुर में 60,000 से ज्यादा लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं. कुकी-जो समुदाय के लोग घाटी में अपने घर छोड़कर उन पहाड़ी जिलों में चले गए, जहां उनके समुदाय के लोग रहते हैं. वहीं, मैतेई लोग इंफाल लौट आए.

पिछले फरवरी में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के बाद करीब एक साल तक हालात अपेक्षाकृत शांत रहे. लेकिन खेमचंद सिंह सरकार के सत्ता संभालने के कुछ ही समय बाद हिंसा फिर शुरू हो गई. हालांकि, इस बार संघर्ष का रुख मैतेई समुदाय से हटकर कुकी और नागा समुदायों की ओर हो गया है.

पूर्व मुख्यमंत्री के मुताबिक, इसके बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “अगर हम NRC शुरू करें और अवैध प्रवासियों की पहचान करके उन्हें देश से बाहर भेज दें, तो मणिपुर अपने आप एक शांतिपूर्ण राज्य बन जाएगा, जहां सभी समुदाय साथ रह सकेंगे.” उन्होंने कहा कि अगर समय पर NRC की प्रक्रिया शुरू कर दी गई होती, तो इस तरह के मौजूदा संघर्ष को रोका जा सकता था.

हाल ही में केंद्र सरकार को मणिपुर में जनगणना की प्रक्रिया टालनी पड़ी. इसकी वजह तीन मुख्य जातीय समुदायों में से दो, मैतेई और नागा समुदायों के विरोध प्रदर्शन थे. इन समुदायों की मांग थी कि जनगणना कराने से पहले NRC को अपडेट किया जाए.

‘मैंने सभी कुकियों को अवैध प्रवासी नहीं कहा’

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि उन पर कुकी समुदाय के खिलाफ होने और पहाड़ी इलाकों में उनकी जमीन से उन्हें हटाने के जो आरोप लगाए जाते हैं, वे सही नहीं हैं. उन्होंने कहा कि कुछ नेता अपने निजी राजनीतिक हितों के लिए उनकी बातों का “गलत मतलब निकाल रहे हैं”.

उन्होंने कहा, “उस समय राज्य का मुख्यमंत्री होने के नाते मुझे इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ती है.” उन्होंने आगे कहा कि जो लोग जमीनी हकीकत जानते हैं, वे समझते हैं कि अवैध प्रवासियों से लोगों की रक्षा करना उनकी जिम्मेदारी थी.

सिंह ने कहा, “मैंने सभी कुकियों को अवैध प्रवासी नहीं कहा था. मैंने सिर्फ उन लोगों को अवैध कहा था, जो म्यांमार में अशांति के कारण मणिपुर आए थे.”

उन्होंने कहा, “म्यांमार में 1988 में भी अशांति थी. 1962 में भी वहां सैन्य तख्तापलट हुआ था. इससे पहले आंग सान सू ची के नेतृत्व में लोकतंत्र के लिए आंदोलन भी हुआ था. 2021 में वहां सैन्य शासन और अलगाववादियों के बीच अशांति हुई. इन सभी मौकों पर म्यांमार के बहुत से लोग भारतीय सीमा में आ गए थे. मैं उन्हीं लोगों की बात कर रहा था, पूरे कुकी समुदाय की नहीं. मैंने बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोगों के लिए अवैध प्रवासी शब्द का इस्तेमाल किया था, अपने मूल निवासियों के लिए नहीं.”

पूर्व मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि उन्होंने कभी भी उन लोगों को नहीं हटाया था, जो कानूनी तरीके से वहां बसे हुए थे.

उन्होंने कहा, “मैंने सिर्फ हमारे संरक्षित और आरक्षित जंगलों को बचाने की कोशिश की थी. मैंने अफीम की खेती को खत्म करने की भी कोशिश की थी, जो राज्य में बड़े पैमाने पर की जाती है. इसके लिए आरक्षित जंगलों को साफ किया जा रहा था. मैंने किसी भी पुराने गांव या कानूनी रूप से बसे गांव को नहीं छुआ. मैंने संविधान के खिलाफ कुछ नहीं किया.”

उन्होंने आगे कहा, “मुख्यमंत्री के तौर पर मैंने सिर्फ अपने लोगों को गोल्डन ट्रायंगल के ड्रग्स के कारोबार के दबदबे और अवैध प्रवास से बचाने की कोशिश की. मैं इनके खिलाफ हूं, न कि मूल कुकी लोगों, थाडौ, नागा, मैतेई या पंगल (मुस्लिम) समुदाय के खिलाफ.”

The former CM says that charges that he was anti-Kuki and evicted them from their land in the hills are not correct, and have been “misinterpreted by some of the politicians with vested interests” | Praveen Jain/ThePrint
पूर्व मुख्यमंत्री का कहना है कि उन पर कुकी विरोधी होने और पहाड़ी इलाकों में उनकी जमीन से उन्हें हटाने के आरोप सही नहीं हैं. उन्होंने कहा कि कुछ नेता अपने निजी हितों के लिए उनकी बातों का ‘गलत मतलब निकाल रहे हैं’. | प्रवीन जैन/दिप्रिंट

‘केंद्र ने काफी किया लेकिन उसका संदेश लोगों तक नहीं पहुंच रहा’

अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा कि यह “बहुत मुश्किल सवाल” है.

उन्होंने कहा, “हमारी कमजोरी यह है कि केंद्र की बीजेपी सरकार ने राज्य के कल्याण के लिए जो भी काम किए हैं, उनका फायदा जमीनी स्तर पर लोगों तक नहीं पहुंच रहा है.”

उन्होंने आगे कहा, “हम लोगों को यह समझा नहीं पाए हैं कि हम उनके लिए क्या कर रहे हैं. इसकी वजह यह है कि हम आपस में ही लड़ रहे हैं. कुछ लोग मंत्री बनने के पीछे भाग रहे हैं, तो कुछ पैसे के पीछे. इस वजह से मुख्य मुद्दे पीछे छूट जाते हैं.”

उन्होंने विस्तार से बताया कि इनर लाइन परमिट (ILP) मणिपुर के लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांग थी.

उन्होंने कहा, “1950 से पहले ILP लागू था. मणिपुर में लोगों के आने-जाने पर पाबंदियां थीं. लेकिन 1950 के बाद इसे हटा दिया गया. तब से मणिपुर के लोग इसकी मांग कर रहे थे, लेकिन पिछले 60-70 सालों से उन्हें यह नहीं दिया गया. 2019 में बीजेपी की केंद्र सरकार ने ही इसे लागू किया, ताकि राज्य, यहां के लोगों और अल्पसंख्यकों की रक्षा की जा सके.”

इसी तरह, केंद्र में बीजेपी सरकार आने के बाद ही गृह मंत्रालय ने पहले से लागू फ्री मूवमेंट रिजीम (FMR) को खत्म किया. इस व्यवस्था के तहत भारत और म्यांमार, दोनों देशों की सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग बिना रोक-टोक एक-दूसरे के इलाके में 16 किलोमीटर तक आ-जा सकते थे.

उन्होंने कहा, “कोई पाबंदी नहीं थी. दोनों तरफ से कोई भी आ-जा सकता था. किसी की जांच नहीं होती थी. केंद्र में हमारी सरकार ने ही इसमें बदलाव किया. अब बायोमेट्रिक पहचान और वीजा के बिना कोई भी अंदर नहीं आ सकता. इस व्यवस्था को लागू कर दिया गया है.”

उन्होंने कहा कि अब सीमा पर बाड़ लगाने का काम भी तेजी से हो रहा है. पहले सिर्फ दो या तीन किलोमीटर तक ही बाड़ लगी थी.

उन्होंने कहा, “बाकी पूरी सीमा खुली हुई थी. लेकिन अब कम से कम 60-70 किलोमीटर तक बाड़ लगाई जा चुकी है. अगले तीन साल में यह काम पूरा हो जाएगा. इसके लिए बजट भी मंजूर हो चुका है.”

सिंह ने कहा कि अब जनगणना को भी टाल दिया गया है.

उन्होंने कहा, “लेकिन हम ये सारी बातें जमीनी स्तर पर लोगों तक नहीं पहुंचा रहे हैं. हम उन्हें नहीं बता रहे हैं कि हम क्या-क्या कर रहे हैं. अगर हम तथ्यों के साथ अपनी बात लोगों तक पहुंचा दें, तो बीजेपी को कोई नहीं रोक सकता.”

सिंह ने कहा कि उनका मानना है कि मणिपुर में आज जो कुछ हो रहा है, उसकी वजह राज्य में पार्टी के नेताओं के बीच एकता की कमी है, न कि केंद्र के नेताओं की वजह से.

उन्होंने कहा, “मौजूदा हालात में घाटी में शांति लौट आई है, लेकिन लोग अंदर से सरकार से खुश नहीं हैं. इसका असर चुनावों पर पड़ेगा. इसलिए हमें व्यावहारिक और पारदर्शी होना चाहिए. हमारे पास कम से कम चार-पांच महीने हैं. अगर हमें दोबारा सत्ता में आना है, तो हमें व्यावहारिक और पारदर्शी बनना होगा.”

मुझे पार्टी में किनारे नहीं किया

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि उन्हें पार्टी में किनारे कर दिया गया है.

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि मुझे किनारे किया गया है.”

उन्होंने बताया कि 2017 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जब वह कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे, तब कांग्रेस के पास 44 विधायक थे, जबकि बीजेपी के पास सिर्फ एक विधायक था.

उन्होंने कहा, “घर पर लोगों ने मुझसे कहा था, ‘क्या तुम पागल हो? तुम ऐसी पार्टी में क्यों शामिल हो रहे हो, जिसके पास सिर्फ एक विधायक है? तुम वहां जाकर क्या करोगे?’ लेकिन मैंने कहा कि मैं मणिपुर को बचाना चाहता हूं. मैंने कांग्रेस को देखा है. वह लंबे समय तक सत्ता में रही है. मैंने कांग्रेस की सरकार भी देखी है, उस समय जब ओकराम इबोबी सिंह मुख्यमंत्री थे, लेकिन मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं था. मैं बीजेपी में शामिल होऊंगा, क्योंकि मुझे उसके नेतृत्व पर भरोसा है और मुझे विश्वास है कि सिर्फ उनके जरिए ही मणिपुर को बचाया जा सकता है. इसी वजह से मैं बीजेपी में शामिल हुआ.”

सिंह ने कहा कि अगर NRC की प्रक्रिया शुरू की जाए और अवैध प्रवासियों की पहचान करके उन्हें देश से बाहर भेजा जाए, तो इस संघर्ष को आसानी से सुलझाया जा सकता है.

उन्होंने कहा, “अगर हमारे कुकी भाई, जो यहां लंबे समय से रह रहे हैं, ईमानदारी से साथ दें, तो इस मामले को आसानी से सुलझाया जा सकता है. उन्हें NRC को स्वीकार करना होगा और अवैध प्रवासियों को बाहर भेजने में हमारा साथ देना होगा.”

सिंह ने कहा कि मणिपुर में शांति जरूर लौटेगी.

उन्होंने कहा, “इसकी प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. लेकिन इसके लिए हमें अपने सम्मान से समझौता नहीं करना चाहिए और न ही राज्य की पहचान को छोड़ना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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