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Friday, 9 October, 2026
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घर से लैंडफिल तक—दिल्ली की सड़कों पर क्यों लौट आता है कचरा?

दो हिस्सों वाली इस सीरीज़ के पार्ट 2 में दिप्रिंट देख रहा है कि कॉलोनी स्तर पर कचरा उठाने में हो रही अनियमितताएं कचरा प्रोसेस करने की क्षमता की कमी से पैदा हुए संकट को और बढ़ा रही हैं.

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यह दो पार्ट की सीरीज़ का पार्ट 2 है. पार्ट 1 यहां पढ़ें.

नई दिल्ली: सुबह के 7:30 बजे हैं और वसंत कुंज में दिन शुरू हो रहा है, लेकिन दीपक कुमार पहले से ही समय के खिलाफ दौड़ लगा रहे हैं.

सेक्टर-सी में अपनी तीन पहियों वाली गाड़ी चलाते हुए वह एक घर से दूसरे घर जाते हैं. पहले वह गीला कूड़ा मांगते हैं, फिर घरों के दरवाजों के बाहर से सूखा कूड़ा उठाते हैं. वह ज्यादातर भरे हुए बैग अपनी गाड़ी में रखते हैं, पीछे बचा हुआ कूड़ा साफ करते हैं और जल्दी से आगे बढ़ जाते हैं.

उन्होंने कहा, “हमारे पास सांस लेने तक का समय नहीं है. हमें जल्दी करनी पड़ती है क्योंकि नगर निगम का ट्रक सुबह जल्दी ढलाव पर आ जाता है.” ढलाव कचरा डालने की तीन तरफ से बनी हुई ऐसी जगहें हैं, जो राजधानी के रिहायशी इलाकों में जगह-जगह बनी हैं.

कुमार की यह जल्दी उन कारणों में से एक है, जिनकी वजह से दिल्ली की सड़कों के किनारे कचरा जमा हो रहा है. आसपास के ढलावों पर लगातार कचरा पहुंचता रहता है, लेकिन उसे उठाकर ले जाने वाले ट्रक सिर्फ तय चक्करों में ही आते हैं.

इन ट्रकों के बीच के समय में कचरा उठाने वाले लोग सैकड़ों घरों से नया कूड़ा लेकर लगातार आते रहते हैं और उसे ढलाव में डालते रहते हैं. अगर कोई ट्रक देर से आता है, तो उसका एक चक्कर छूट जाता है. अगर दो बार कूड़ा उठाने के बीच का अंतर बढ़ जाता है, तो कचरा रखने की जगह नहीं बचती. इससे कूड़ा जमा होता रहता है और आखिरकार सड़क पर फैल जाता है.

लोधी रोड पर सड़क पर बने ढलाव से बाहर फैलता कचरा | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
लोधी रोड पर सड़क पर बने ढलाव से बाहर फैलता कचरा | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

दिप्रिंट को मिले डेटा से पता चलता है कि अभी राजधानी के दक्षिण जिले के 23 वार्डों में से सिर्फ पांच वार्डों का काम एक निजी संस्था Revnion के पास है. इसके लिए 150 प्राथमिक वाहन और 26 सेकेंडरी वाहन हैं. वहीं, मध्य जिले में अभी तक संसाधन जुटाए ही नहीं गए हैं. ये वही दो जिले हैं, जहां दिप्रिंट ने बड़े-बड़े ढलाव देखे हैं.

वसंत कुंज के सेक्टर-सी के ढलाव पर दिप्रिंट ने कुछ ही मिनटों में इस पूरे चक्र को होते देखा. कर्मचारी कचरे के एक बड़े ढेर को जल्दी-जल्दी अलग करने लगे, इससे पहले कि कचरा उठाने वाले ठेकेदार का ट्रक वहां पहुंचता. करीब 15 मिनट में कचरा ट्रक में भर दिया गया और ढलाव पूरी तरह साफ हो गया, लेकिन जैसे ही ट्रक वहां से चला गया, कुछ और कचरा उठाने वाले लोग नया कूड़ा लेकर पहुंचने लगे. कचरे का ढेर फिर से बढ़ने लगा.

यह चक्र ऐसे शहर में बार-बार दोहराया जाता है, जहां हर दिन करीब 13,500 मीट्रिक टन नगर निगम का ठोस कचरा निकलता है, लेकिन इसे प्रोसेस करने की क्षमता सिर्फ करीब 8,000 मीट्रिक टन है.

यह कचरा किसी प्रोसेसिंग प्लांट या दिल्ली के ऊंचे-ऊंचे लैंडफिल तक पहुंचने से काफी पहले, निजी कचरा उठाने वालों, कूड़ा बीनने वालों, ढलावों, कॉम्पैक्टरों, ट्रकों और सफाई कर्मचारियों की एक कमजोर व्यवस्था से होकर गुज़रता है. कचरे को सड़कों से दूर रखना इस बात पर निर्भर करता है कि इस व्यवस्था की हर कड़ी अगली कड़ी के लिए पर्याप्त तेजी से काम करे.

दिप्रिंट ने दिल्ली के कचरे का सफर एक समृद्ध वसंत कुंज के घर के दरवाजे से शुरू करके एक स्थानीय ढलाव, फिर कचरा उठाने वाले ठेकेदार के ट्रक, एक प्रोसेसिंग सेंटर और आखिर में एक लैंडफिल तक देखा, ताकि यह समझा जा सके कि रोजाना कचरा उठाए जाने के बावजूद वह बार-बार राजधानी की सड़कों पर क्यों लौट आता है.

घर के दरवाजे से ढलाव तक की दौड़

उत्तर प्रदेश के बनारस के रहने वाले दीपक कुमार दो साल पहले दिल्ली में काम की तलाश में थे. इसी दौरान उन्होंने निजी तौर पर कचरा उठाने का काम शुरू किया. अब वह महीने में करीब 12,000 रुपये कमाते हैं. इसके लिए वह हर घर से कचरा उठाने के 100 से 200 रुपये लेते हैं.

एक घर से कचरा उठाने के बाद एक कलेक्टर | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट
एक घर से कचरा उठाने के बाद एक कलेक्टर | फोटो: अलीशा दत्ता/दिप्रिंट

वह अकेले नहीं हैं. सुबह होते-होते सेक्टर C में कम से कम 10 निजी कचरा कलेक्टर घूमते हुए देखे जा सकते हैं.

उनका पहला काम यह होता है कि कचरा व्यवस्था की अगली कड़ी के पहुंचने से पहले घरों का कचरा बाहर निकाल दिया जाए.

सुबह करीब 9 बजे, यानी कुमार के अपना चक्कर शुरू करने के करीब डेढ़ घंटे बाद ही, रोजाना आने वाले इस कचरे का असर सेक्टर C के ढलाव पर दिखाई देने लगता है. एक DDA पार्क की चारदीवारी के पास कचरे से भरे बैगों का एक बड़ा ढेर लगा हुआ है. करीब एक दर्जन कर्मचारी इसे छांटना शुरू कर देते हैं. कुछ जमीन पर बैठकर नंगे हाथों से कचरे को अलग करते हैं. उनके पास दस्ताने, मास्क या सुरक्षा के दूसरे सामान नहीं हैं.

काम का बंटवारा जल्दी-जल्दी होता है. कुछ कर्मचारी रिहायशी ब्लॉकों से कचरा उठाना जारी रखते हैं, जबकि कुछ ढलाव पर ही रहते हैं और कचरे को छांटकर बड़े नीले और हरे डिब्बों में डालते हैं.

वे भी समय के खिलाफ दौड़ रहे हैं.

25 से 30 मिनट के अंदर कचरे का ढेर छांट दिया जाता है.

जब कचरा उठाने वाली कंपनी का कॉम्पैक्टर वहां पहुंचता है, तो ड्राइवर और दो सहायक डिब्बों को उसके हाइड्रोलिक लिफ्ट तक खींचकर ले जाते हैं और एक-एक करके उन्हें खाली करते हैं.

कचरे को छांटने के बाद डिब्बों को MCD के ट्रक में खाली करते कर्मचारी | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
कचरे को छांटने के बाद डिब्बों को MCD के ट्रक में खाली करते कर्मचारी | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

करीब 15 मिनट में कचरे से भरा ढलाव लगभग पूरी तरह साफ हो जाता है. लेकिन यह ज्यादा देर तक नहीं रहता.

जैसे ही ट्रक प्रोसेसिंग सेंटर की ओर चला जाता है, और कचरा कलेक्टर वहां पहुंचने लगते हैं. बैग फिर से जमा होने लगते हैं और कर्मचारी अगले नगर निगम के वाहन का इंतजार करते हैं.

कमजोर कड़ी

दिल्ली की नगर निगम की कचरा व्यवस्था मुख्य रूप से दो चरणों में काम करती है: घरों से कचरा उठाना और फिर उसे प्रोसेसिंग सेंटर तक पहुंचाने के लिए आगे ले जाना.

आदर्श स्थिति में, घरों से इकट्ठा किया गया कचरा फिक्स्ड कॉम्पैक्टर ट्रांसफर स्टेशन (FCTS) तक पहुंचना चाहिए. वहां से इसे आगे ले जाया जा सकता है. लेकिन हर जगह FCTS उपलब्ध नहीं हैं.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दिल्ली में अभी करीब 500 ढलाव हैं, लेकिन FCTS की संख्या करीब 350 ही है. पुराने और खुले ढलावों को हटाकर उनकी जगह नए ढलाव बनाना मुश्किल है. FCTS जोड़ना भी आसान नहीं है, क्योंकि इसके लिए जमीन चाहिए, जो दिल्ली में कम है.

इसका नतीजा यह है कि आसपास के ढलाव कचरा इकट्ठा करने की जगह के तौर पर काम करते रहते हैं. दिल्ली के कुछ सबसे महंगे इलाकों में भी ऐसा ही हो रहा है.

यही वजह है कि समय का सही होना बहुत ज़रूरी है. घरों से कचरा लगातार आता रहता है, चाहे उसे उठाकर ले जाने वाला अगला ट्रक वहां पहुंचा हो या नहीं.

जब कचरा उठाने और उसे आगे ले जाने की व्यवस्था एक-दूसरे के साथ सही तालमेल में रहती है, तो वसंत कुंज जैसा कचरे का ढेर कुछ ही मिनटों में गायब हो सकता है. लेकिन जब ऐसा नहीं होता, तो वही कचरा उठाने वाली जगह पर पड़ा रहता है और बाहर फैलने लगता है.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

दूसरी बड़ी रुकावट

सुबह करीब 11 बजे तक वसंत कुंज से इकट्ठा किया गया कचरा एक कचरा उठाने वाली कंपनी के कॉम्पैक्टर में पहुंच चुका होता है, जो ओखला की ओर जा रहा होता है.

कुछ नए वाहनों में गीले, सूखे, सैनिटरी और घरेलू खतरनाक कचरे के लिए अलग-अलग हिस्से होते हैं. गीले कचरे से खाद बनाई जा सकती है और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले सूखे कचरे को अलग किया जा सकता है, जबकि बाकी तरह का कचरा निपटारे की प्रक्रिया में आगे भेज दिया जाता है.

गीले और सूखे कचरे के लिए अलग-अलग हिस्सों वाला वाहन | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
गीले और सूखे कचरे के लिए अलग-अलग हिस्सों वाला वाहन | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

दक्षिण दिल्ली का कचरा उन कचरों में शामिल है, जो तिमारपुर-ओखला वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी के वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट में पहुंचता है. दिल्ली में चार बड़े वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट हैं—नरेला-बवाना, गाजीपुर, ओखला और तेहखंड में. दिल्ली नगर निगम (MCD) का कहना है कि कचरा प्रोसेस करने की अतिरिक्त क्षमता तैयार की जा रही है.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

दोपहर तक कचरे का यह सफर अपनी आखिरी जगह तक पहुंच जाता है.

ओखला लैंडफिल पर कचरा उठाने वाली कंपनियों के ट्रक बाहर कतार में खड़े रहते हैं. इसके बाद वे धीरे-धीरे कचरे के बड़े भूरे-धूसर पहाड़ की ओर बढ़ते हैं. भारी मशीनें इसकी ढलानों पर चलती रहती हैं, जबकि पूरे इलाके में धूल, डीजल का धुआं और सड़ रहे कचरे की बदबू फैली रहती है.

इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

कृष्णानंद करीब एक दशक से नगर निगम के कचरा ट्रक चला रहे हैं. उनका काम उस जगह से शुरू होता है, जहां दूसरे कर्मचारी का काम खत्म होता है—कचरा इकट्ठा करने वाली जगहों पर जमा कचरे को उठाना, सहायकों के साथ भारी डिब्बों को ले जाना और कचरे को आगे पहुंचाना.

वह कहते हैं, “जिस कचरे को कहीं और प्रोसेस नहीं किया जा सकता, वह आखिरकार इसी पहाड़ पर पहुंच जाता है.”

आमतौर पर उनकी टीम करीब दो चक्कर लगाती है. जब वार्डों में कचरा जमा हो जाता है, तो कर्मचारियों पर काम का दबाव भी बढ़ जाता है.

लैंडफिल पर काम करने वाले कर्मचारियों ने दिप्रिंट को बताया कि वे रोजाना कम सुरक्षा उपकरणों के साथ कचरे और बदबू के बीच काम करते हैं. एक कर्मचारी ने बताया कि कुछ कर्मचारी इन हालात से निपटने के लिए शिफ्ट से पहले या बाद में शराब पीते हैं.

ओखला लैंडफिल के नीचे हरियाली की एक छोटी सी झलक | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
ओखला लैंडफिल के नीचे हरियाली की एक छोटी सी झलक | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

कचरे का ढेर कभी खत्म नहीं होता

दिल्ली ने अपने 12 नगर निगम जोन में कचरा उठाने, उसे ले जाने और प्रोसेस करने के लिए हर साल करीब 1,000 करोड़ रुपये का बजट रखा है. सरकार अपने तीन लैंडफिल साइटों पर जमीन वापस पाने और कचरा प्रोसेस करने की क्षमता बढ़ाने की कोशिश भी कर रही है.

लेकिन जब तक यह क्षमता तैयार की जा रही है, तब तक न तो घरों से निकलने वाला कचरा रुकता है और न ही उसे लेकर आने वाले ट्रक.

यही वजह है कि दिल्ली की कचरे की समस्या मोहल्लों की सड़कों के किनारे कचरे के बढ़ते ढेरों से लेकर गाजीपुर, भलस्वा और ओखला के विशाल कचरे के पहाड़ों तक दिखाई देती है.

इन दोनों के बीच कर्मचारियों की एक पूरी व्यवस्था है, जो हर सुबह हजारों टन कचरे को शहर में कचरा पैदा होने की रफ्तार से भी तेज गति से आगे ले जाने की कोशिश करती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: दिल्ली का कचरा संकट क्यों नहीं हो रहा खत्म? 13,500 टन कचरा, 8,000 टन की ही प्रोसेसिंग क्षमता


 

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