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Thursday, 8 October, 2026
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दिल्ली का कचरा संकट क्यों नहीं हो रहा खत्म? 13,500 टन कचरा, 8,000 टन की ही प्रोसेसिंग क्षमता

दिल्ली के पास अपने हाथों, सड़कों और लगभग हर घर के पास कचरे का संकट है. पॉश कॉलोनियों से लेकर भीड़भाड़ वाले बाजारों तक, कचरे के ये ढेर स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं. यह 2 हिस्सों वाली सीरीज का पहला भाग है.

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नई दिल्ली: सुबह के 11:30 बजे हैं और दक्षिण दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में से एक आनंद लोक में लगातार भनभनाहट सुनाई दे रही है. यह भनभनाहट कचरे के ढेर से उठने वाली बदबू की वजह से वहां जमा हो रही मक्खियों के झुंड की है. हर दिन बदबू बढ़ती जा रही है. दोपहर होते-होते लोगों को ‘ढलाव’ के आसपास संभलकर चलना पड़ता है. ढलाव राजधानी में कचरा जमा करने की तीन तरफ से बनी आम जगहें हैं.

डिफेंस कॉलोनी के ब्लॉक A में भी ऐसी ही स्थिति है. यह भी एक पॉश इलाका है, जहां अलग-अलग फ्लोर या फ्लैट की कीमत 15 करोड़ रुपये से ज्यादा है. यहां रहने वाले लोग कचरे के ढेर के पास पहुंचते ही अपनी नाक ढक लेते हैं और कचरे के इन पुराने और लगातार बने हुए ढेरों के पास से जल्दी-जल्दी निकल जाते हैं, जैसे ‘तकैशीज़ कास्टल’ के कचरे वाले किसी खेल में हिस्सा ले रहे हों.

शाम 4 बजे तक न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी इलाके में कचरा सड़क पर फैलना शुरू हो गया है. वहां से गुज़रने वाली गाड़ियां कचरे के छोटे-छोटे टुकड़ों को इधर-उधर उड़ा रही हैं, जबकि आलीशान घर ज़मीन पर चल रहे इस गंदे नज़ारे को देख रहे हैं.

शाम 5 बजे तक अलकनंदा के ग्रेटर कैलाश-II इलाके और उसके आसपास, जहां सजे-संवरे लॉन के अंदर लिलि के फूल खिलते हैं, कचरे की बदबू बाकी हर चीज़ पर भारी पड़ रही है. यह बदबू सरकारी अधिकारियों, कारोबारियों और दिल्ली के कुछ सबसे प्रभावशाली लोगों के घरों तक पहुंच रही है.

यहां एक-एक घर तक बदबू पहुंचती है. जब बारिश होती है, तो कचरा बहने लगता है और जब तेज़ हवा चलती है, तो कचरे के छोटे-छोटे कण उड़ने लगते हैं.

—ग्रेटर कैलाश 1 में रहने वाले एक बुजुर्ग

दिल्ली के पास अपने हाथों, सड़कों और लगभग हर घर के पास कचरे का संकट है.

अरावली अपार्टमेंट्स की RWA की महासचिव मधुलिका सिंह ने कहा, “मैं अप्रैल 2026 से रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) का हिस्सा हूं और कचरे की समस्या को हल करने की कोशिश में लगातार व्यस्त हूं. हमने अपनी जेब से कचरा उठाने से लेकर ढलाव की सफाई तक के लिए कई फोन किए हैं, लेकिन यह बार-बार होने वाली समस्या है और हमने पिछले कुछ महीनों में कई शिकायतें दर्ज कराई हैं.”

30 अगस्त को दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा था कि दिल्ली सरकार ने ओखला, भलस्वा और गाजीपुर लैंडफिल से 2.16 मीट्रिक टन कचरा हटाने के बाद 100 एकड़ ज़मीन वापस हासिल की है.

गुप्ता का दावा है कि दिल्ली के तीन लैंडफिल—गाजीपुर, भलस्वा और ओखला से कचरा घट रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि कचरा इन इंसानों द्वारा बनाए गए गंदगी और कचरे के पहाड़ों से निकलकर राजधानी की सड़कों पर पहुंच रहा है. यह ढलाव से बाहर निकल रहा है, सड़कों और फुटपाथों के किनारे जमा हो रहा है और इलाकों के कोनों को छोटे लैंडफिल में बदल रहा है.

डिफेंस कॉलोनी, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, लोधी कॉलोनी, हौज खास जैसी पॉश कॉलोनियों से लेकर व्यस्त बाजारों तक, अब राजधानी में जगह-जगह कचरे के ढेर दिखाई दे रहे हैं. इससे दिल्ली का कचरा संकट सिर्फ देखने में खराब नहीं लग रहा, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन गया है.

नई दिल्ली में लोधी रोड पर सड़क पर फैला कचरा | सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
नई दिल्ली में लोधी रोड पर सड़क पर फैला कचरा | सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

नगर निगम दिल्ली (MCD) के अधिकारियों से बातचीत और दिप्रिंट को मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि कचरा प्रबंधन व्यवस्था में कई जगहों पर परेशानी है.

कचरा इकट्ठा करने, उसे ले जाने और प्रोसेस करने के लिए हर साल 1,000 करोड़ रुपये का बजट होने के बावजूद, दिल्ली में जगह-जगह कचरा जमा होता जा रहा है.

अधिकारी व्यवस्था में कई कमियों की ओर इशारा करते हैं: नए टेंडर जारी करने में 1.5-2 साल की देरी, पुराने ठेकेदारों को बार-बार एक्सटेंशन देना और नए कॉन्ट्रैक्ट को लागू करने में धीमी गति. कचरे को सही तरीके से अलग नहीं करना भी समस्या को बढ़ा रहा है.

एक आंकड़ा इस संकट की गंभीरता को दिखाता है. राजधानी में हर दिन करीब 13,500 मीट्रिक टन कचरा पैदा होता है, लेकिन सिर्फ 8,000 मीट्रिक टन कचरे को प्रोसेस किया जाता है. बचे हुए कचरे को दिनों, हफ्तों, महीनों और सालों से जोड़कर देखें, तो दिल्ली के सामने ऐसी समस्या है जो लगातार बढ़ती जा रही है.

न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी से लोधी: पूरी दिल्ली में कचरे का पहाड़

साउथ-ईस्ट दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में, जहां एक स्क्वेयर फुट ज़मीन की कीमत 60,000 रुपये से ज़्यादा है, कचरे का पहाड़ आस-पास के चमकदार घरों और महंगे खाने की दुकानों में आने वाले लोगों, विज़िटर्स और राहगीरों का स्वागत करता है.

आस-पास के रिहायशी ब्लॉक और रेस्टोरेंट से निकलने वाला कचरा यहां पहुंचता है. इलाके के सफाई कर्मियों ने दिप्रिंट को बताया कि इतनी ज़्यादा बदबू वाली जगह पर काम करने के लिए, उन्हें “ढलाव कॉम्प्लेक्स” में “नशे में” घुसना पड़ता है.

नई दिल्ली के नेहरू एन्क्लेव में रोड डिवाइडर पर जमा हो रहा कचरा | सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
नई दिल्ली के नेहरू एन्क्लेव में रोड डिवाइडर पर जमा हो रहा कचरा | सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

कुछ किलोमीटर दूर डिफेंस कॉलोनी में, एक मस्जिद के एंट्रेंस के बगल में बना ढलाव बंद है. बंद दरवाज़ों के सामने बिना अलग किए कचरे का पहाड़ है, जिसके आस-पास नंगे पैर बच्चे घूमते हैं और बिल्लियां, कुत्ते और कीड़े-मकोड़े घूमते हैं.

डिफेंस कॉलोनी में काम करने वाली एक वकील ने दिप्रिंट को बताया कि कचरे का ढेर पिछले एक साल से वहीं पड़ा है. उन्होंने कहा, “मैं पिछले एक साल से यहां काम कर रही हूं और यह (कचरे की ओर इशारा करते हुए) और भी खराब हो गया है. हवा चलने पर, कण और सूखा कचरा हवा के साथ उड़ जाता है, जबकि बारिश के दिन, बाढ़ का पानी इसे हमारे ऑफिस के दरवाज़े तक ले आता है. वहीं, नमी वाले दिनों में, तीखी गंध से लोगों का चलना भी मुश्किल हो जाता है.”

सेंट्रल दिल्ली के लोधी आर्ट डिस्ट्रिक्ट में भी नज़ारा अलग नहीं है. बहुत सारे रेस्टोरेंट, कैफे और दुकानों के बीच एक ढलाव भरा हुआ है, जिससे लीचेट सड़कों और फुटपाथ पर बह रहा है.

दिप्रिंट ने जिन आठ ढलाव का दौरा किया, उनमें से यह अकेला ढलाव था जो दो तरफ से हरे कपड़े से ढका हुआ था, जिससे यह आंखों को चुभने वाली चीज़ आने-जाने वालों से बच रही थी.

1.9 लाख शिकायतें, लेकिन कचरा वापस आ रहा है

राजधानी की सड़कों पर कचरे के छोटे-छोटे पहाड़ एक ऐसी समस्या बन गए हैं जिसके बारे में सोशल मीडिया सहित हर जगह बात हो रही है.

कचरे से भरी गलियों से गुज़रने वाले लोग अक्सर “कचरे के संकट” के वीडियो अपलोड करते हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर एमसीडी को टैग करने वाले पोस्ट भरे पड़े हैं, साथ ही लोकेशन दिखाने वाले जियोटैग भी हैं.

इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

एक एक्स यूज़र, सजल अजमानी ने वसंत कुंज के सेक्टर-सी से अपनी शिकायत शेयर की. उन्होंने लिखा, “शिकायत अधिकारियों को सौंपी गई थी और अब इसे ‘बंद / पूरा हुआ’ मार्क कर दिया गया है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ. तय ढलाव के बाहर कचरा ओवरफ्लो होता रहता है, जिससे स्कूली बच्चों और माता-पिता द्वारा रोज़ इस्तेमाल की जाने वाली सड़क पर बहुत ज़्यादा बदबू और गंदगी फैलती है.” उन्होंने आगे कहा: “आपसे रिक्वेस्ट है कि आप शिकायत को फिर से खोलें, साइट का इंस्पेक्शन करें, और एडमिनिस्ट्रेटिव तरीके से शिकायत बंद करने के बजाय एक परमानेंट सॉल्यूशन लागू करें.”

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ही ऐसी शिकायतों से भरे नहीं हैं, बल्कि प्राइवेट RWA WhatsApp ग्रुप्स में भी लोग अक्सर घरों से कचरा कम या बिल्कुल नहीं उठाए जाने की शिकायत करते हैं. चित्तरंजन पार्क में RWA ग्रुप में एक रहने वाले ने पूछा, “कल कचरा वाला क्यों नहीं आया?” दूसरे ने कहा, “मेरा कचरा कल से उसी जगह पर पड़ा है. प्लीज़ चेक करें,” तीसरे ने कहा, “हमारी बिल्डिंग नंबर एक्स में भी यही हाल है, हमारा कचरा ओवरफ्लो हो रहा है.”

ग्रेटर कैलाश-1 में रहने वाले एक सीनियर सिटिज़न ने दिप्रिंट को बताया कि कचरे की समस्या सिर्फ “टेम्पररी तौर पर हल” होती है.

सीनियर सिटिज़न ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “कचरा एक स्कूल और मंदिर के बगल में है, ज़रा सोचिए! बदबू यहां हर घर तक पहुंचती है. जब बारिश होती है, तो कचरा बहने लगता है और जब हवा चलती है, तो छोटे-छोटे कण उड़ने लगते हैं. यह अब एक गंभीर हेल्थ हैज़र्ड है और ऐसा नहीं है कि हमने शिकायत नहीं की है, लेकिन डंप सिर्फ रिक्वेस्ट करने पर टेम्पररी तौर पर साफ किए जाते हैं और फिर वे फिर से दिखने लगते हैं.”

नई दिल्ली के ग्रेटर कैलाश 1 में एक कचरा कलेक्शन पॉइंट (ढलाव) | फोटो:सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
नई दिल्ली के ग्रेटर कैलाश 1 में एक कचरा कलेक्शन पॉइंट (ढलाव) | फोटो:सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

दिप्रिंट को मिले एमसीडी डेटा के मुताबिक, जनवरी 2026 से अब तक नगर निगम को अपने 12 ज़ोन के लोगों से 1.9 लाख से ज़्यादा शिकायतें मिली हैं.

एमसीडी के मेयर प्रवेश वाही ने दिप्रिंट को बताया कि नगर निगम को हर दिन कम से कम 200 शिकायतें मिलती हैं. वाही ने कहा, “हमें हर दिन कचरे से जुड़ी 150-200 शिकायतें मिलती हैं और हम उनमें से ज़्यादातर को हल कर देते हैं, लेकिन कम क्षमता के कारण हम 24 घंटे के अंदर सभी शिकायतों को हल नहीं कर पाते हैं.”

सीएम रेखा गुप्ता के ऑफिस के एक सीनियर अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि, हालांकि, कचरा कलेक्शन और ट्रांसपोर्टेशन की मुख्य ज़िम्मेदारी MCD के दायरे में आती है, लेकिन मुख्यमंत्री इस प्रोसेस पर करीब से नज़र रख रहे हैं. अधिकारी ने कहा, “इस महीने (अक्टूबर) की शुरुआत में एक मीटिंग में रेखा गुप्ता ने MCD के टॉप अधिकारियों को शहर की सफाई का रिव्यू करने और बेहतर वेस्ट मैनेजमेंट स्ट्रेटेजी बनाने का निर्देश दिया था.”

दिल्ली की कचरा चेन और यह कहां टूटती है

MCD के डेटा के मुताबिक, राजधानी में हर दिन 13,500 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जिसमें नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली ज़ोन में 1,500 मीट्रिक टन कचरा निकलता है जो सबसे ज़्यादा है और सेंट्रल नॉर्थ ज़ोन में 800 मीट्रिक टन कचरा निकलता है, जो सबसे कम है.

दिल्ली में इस कचरे का सिर्फ लगभग 8,000 टन प्रोसेस करने की कैपेसिटी है, लेकिन प्रोसेसिंग एक चुनौती है जो बाद में आती है–तुरंत की समस्या यह है कि कचरा इतनी अच्छे से इकट्ठा और ट्रांसपोर्ट भी नहीं किया जा रहा है कि उसे ट्रीटमेंट फैसिलिटी तक पहुंचाया जा सके.

कचरा पहले प्राइवेट तौर पर रखे गए कचरा बीनने वाले लोगों द्वारा अलग-अलग घरों से इकट्ठा किया जाता है और छोटी गाड़ियों में ढलाव तक पहुंचाया जाता है. आम तौर पर, ढलाव पर कचरे को गीले और सूखे कचरे में अलग किया जाता है और फिर म्युनिसिपल ट्रकों में लोड करके ट्रीटमेंट प्लांट या लैंडफिल में भेजा जाता है.

कचरा इकट्ठा करने और ट्रांसपोर्ट करने के लिए टेंडर बनाने और भेजने में 1.5-2 साल का गैप था.

—MCD के सीनियर अधिकारी

कलेक्ट करने से लेकर प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्टेशन तक, MCD ने यह काम पांच अलग-अलग प्राइवेट कंपनियों को आउटसोर्स किया है: M/s मेट्रो वेस्ट, M/s AG एनवायरो, M/s DMSWSL, M/s J S एनवायरो सर्विसेज़, और M/s DWMN. ये कॉन्ट्रैक्ट कम से कम 10 साल और ज़्यादा से ज़्यादा 20 साल के लिए दिए गए हैं.

कॉन्ट्रैक्टर को 12 ज़ोन में से हर एक में पैदा होने वाले कचरे के हिसाब से पेमेंट किया जाता है. दिप्रिंट को मिले एमसीडी डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 12 ज़ोन में पैदा होने वाले प्रति मीट्रिक टन कचरे का पेमेंट 1,445 रुपये से 2,809 रुपये तक है.

टेंडर में देरी, एक्सटेंशन और मुश्किल बदलाव

अधिकारी दिल्ली की सड़कों पर कचरे का एक और बड़ा कारण बताते हैं—कचरे के कलेक्शन और ट्रांसपोर्टेशन के लिए नए टेंडर बनाने और जारी करने में लगभग 1.5-2 साल की देरी.

MCD के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “कचरा इकट्ठा करने और ट्रांसपोर्ट करने के लिए टेंडर बनाने और भेजने में 1.5-2 साल का गैप था. नए टेंडर भेजने से पहले पिछली ऑर्गनाइज़ेशन को बार-बार एक्सटेंशन दिया गया.”

नई दिल्ली के कालकाजी में कलेक्शन गाड़ी पर कचरा लोड किया जा रहा है | सूरज सिंह बिष्ट/दप्रिंट
नई दिल्ली के कालकाजी में कलेक्शन गाड़ी पर कचरा लोड किया जा रहा है | सूरज सिंह बिष्ट/दप्रिंट

MCD मेयर प्रवेश वाही ने दिप्रिंट को बताया कि टेंडर का समय खत्म होने पर, पुरानी ऑर्गनाइज़ेशन काम में ढिलाई बरतती हैं. वाही ने कहा, “बदलाव के महीने एडमिनिस्ट्रेशन और शहर के लिए खास तौर पर मुश्किल होते हैं. जहां जाने वाली ऑर्गनाइज़ेशन खराब काम करती है, वहीं आने वाली ऑर्गनाइज़ेशन को काम शुरू करने में कुछ समय लगता है.”

दिप्रिंट को मिले एक डॉक्यूमेंट के मुताबिक, 11 जून को तीन ज़ोन—साउथईस्ट, साउथ और वेस्ट—के लिए दो अलग-अलग टेंडर पाने वालों के साथ एक नया कंसेशन एग्रीमेंट साइन किया गया, जिसका कलेक्शन और ट्रांसपोर्टेशन 15 अक्टूबर से शुरू होगा. डॉक्यूमेंट में लिखा है, “अभी, वेस्ट ज़ोन में 12 वार्ड और साउथ ज़ोन में पांच वार्ड में काम शुरू हो गया है.”

इसमें यह भी बताया गया है कि इन ज़ोन के दूसरे वार्ड में मोबिलाइज़ेशन का काम चल रहा है.

ज़मीन की कमी, कचरे को अलग करने का तरीका नहीं होना

टेंडरिंग और कलेक्शन तो समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा है. एमसीडी में डिपार्टमेंट ऑफ एनवायर्नमेंटल मैनेजमेंट सर्विसेज़ (DEMS) के एक सीनियर अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि कई वजहों से शहर में “कचरा संकट” पैदा हुआ है.

अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “2.3 करोड़ की आबादी वाली राजधानी, जिसमें 60 लाख घर हैं, 13,500 मीट्रिक टन कचरा पैदा करती है. इसका मतलब है कि हर व्यक्ति लगभग आधा किलो कचरा पैदा करता है, लेकिन MCD के पास अभी सिर्फ़ 8,000 मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस करने की कैपेसिटी है, जिससे 5,500 मीट्रिक टन कचरा बच जाता है.”

DEMS के एक सीनियर अधिकारी का कहना है कि ढलावों से छुटकारा पाने का काम इतना सीधा-सादा नहीं है. उन्होंने कहा, “दिल्ली में करीब 500 ढालाओ और 350 फिक्स्ड कॉम्पैक्टर ट्रांसफर सेंटर (FCTs) हैं. ढलाव को धीरे-धीरे हटाने के लिए, FCTs बनाने होंगे, जिसके लिए कम से कम 10,000 स्क्वायर मीटर जगह चाहिए, लेकिन दिल्ली में ज़मीन की कमी है, इसलिए ऐसे कंस्ट्रक्शन मुश्किल हैं.”

इसके अलावा, यह भी एक मुद्दा है कि लोग अपने आस-पड़ोस में वेस्ट प्लांट नहीं चाहते हैं. अधिकारी ने कहा, “हालांकि, हम डीडीए से बात कर रहे हैं कि क्या इस मकसद के लिए ज़मीन के टुकड़े पहचाने जा सकते हैं.”

आनंद लोक रेजिडेंशियल कॉलोनी के सामने ढलाव, दोनों तरफ हरे कपड़े से ढका हुआ, नई दिल्ली | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
आनंद लोक रेजिडेंशियल कॉलोनी के सामने ढलाव, दोनों तरफ हरे कपड़े से ढका हुआ, नई दिल्ली | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

एनवायर्नमेंटल मैनेजमेंट सर्विसेज डिपार्टमेंट के अधिकारी ने कहा कि ढलाव को बड़ी समस्या बनाने वाली एक बड़ी रुकावट उन्हें अलग-अलग करने की कमी है. उन्होंने आगे कहा, “जब लोग गीला और सूखा कचरा अलग नहीं करते हैं, तो इसका मतलब है कि किचन का कचरा खुले में सड़ेगा, जिससे मक्खियां, कीड़े और जानवर आकर्षित होंगे और बदबू आएगी. अगर वे अलग करते हैं, और खाद बनाते हैं, तो पैदा होने वाले कचरे की मात्रा बहुत कम हो जाती है.”

एक और MCD अधिकारी ने कहा कि जब यह सब किया जाता है, तब भी “राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी” से देरी होती है. उन्होंने आगे कहा, “हमने एक पेनल्टी बनाई थी जो उन लोगों से ली जानी थी जो सबसे ज़्यादा कचरा पैदा करते हैं. हमने एक बार इसे हाउस टैक्स में जोड़ने का भी फैसला किया था, लेकिन नेताओं को वोट चाहिए और उनका मानना ​​है कि लोगों से पैसे लेना वोट इकट्ठा करने में रुकावट डालता है.”

NGT को डेडलाइन मिस करना: दिल्ली की लंबी ढलाव लड़ाई

ढलावों के ओवरफ्लो होने की समस्या नई नहीं है, न ही उन्हें खत्म करने के वादे. दिल्ली को ढलाव-मुक्त बनाने का पहला टारगेट 2008 में उस समय के लेफ्टिनेंट गवर्नर (L-G) तेजेंद्र खन्ना ने तय किया था. कई सालों तक कई डेडलाइन मिस होने के बाद, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को दिए गए अंडरटेकिंग के ज़रिए मार्च 2022 और आखिरकार 31 दिसंबर 2024 डेडलाइन तय की गईं. भारतीय जनता पार्टी की एमसीडी ने अब सभी ढलावों को हटाने के लिए जनवरी 2027 की डेडलाइन तय की है.

यह मामला कई बार कोर्ट में भी जा चुका है.

एक एप्लीकेंट, नील मणि ने NGT में एक एप्लीकेशन फाइल करके न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में अपने घर के एंट्री गेट के सामने बने ढलाव को दूसरी जगह शिफ्ट करने की मांग की थी. उनके घर के बगल में एक सर्विस लेन, एक नाला और फिर फ्रेंड्स कॉलोनी क्लब है.

इससे पहले, मणि ने 2006 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक रिट पिटीशन फाइल की थी, जिसके बाद कोर्ट ने 2 फरवरी, 2010 को साउथ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (SDMC) को ढलाव पर साफ-सफाई बनाए रखने का निर्देश दिया था. इसके बाद, मणि ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक और रिट पिटीशन फाइल की, जहां कोर्ट ने 5 फरवरी, 2020 के एक ऑर्डर में नगर निगम को साफ-सफाई बनाए रखने का निर्देश दिया.

वसंत कुंज, नई दिल्ली में एक कचरा कलेक्शन पॉइंट (ढलाव) | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट
वसंत कुंज, नई दिल्ली में एक कचरा कलेक्शन पॉइंट (ढलाव) | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट/दिप्रिंट

चार सितंबर, 2023 के एक और ऑर्डर में, कोर्ट ने कहा कि यह “ज़रूरी है कि MCD जल्द से जल्द एक टाइमफ्रेम के अंदर खुले ढलाव को खत्म करे और समय-समय पर सॉलिड वेस्ट भी साफ करे. घरों से रेगुलर और असरदार तरीके से डोर-टू-डोर कलेक्शन होना चाहिए और MCD को इसे लागू करना चाहिए.”

कोर्ट ने MCD को ढालों को बंद करने और अच्छी साफ-सफाई और हाइजीनिक हालत बनाए रखने का आदेश दिया. “हमें पता चला है कि MCD ने स्टेटस रिपोर्ट में बताए गए ढलाव के दूसरे इस्तेमाल का सुझाव दिया है. हालांकि, हमारा मानना ​​है कि MRF, डीसेंट्रलाइज़्ड कम्पोस्टिंग पिट्स और सफाई कर्मचारियों की अटेंडेंस के लिए ढालों का इस्तेमाल सही नहीं होगा और इससे वही हालात बने रहने की संभावना है, जिन्हें ठीक करने के लिए ढलाव को बंद किया जा रहा है. इसलिए, यह सही होगा कि बंद होने पर ऐसे ढलाव का इस्तेमाल मिल्क बूथ, EV इंफ्रास्ट्रक्चर (IGL), लाइब्रेरी, रीडिंग रूम, ज़रूरतमंद महिलाओं और बच्चों के लिए ट्रेनिंग सेंटर या सीनियर सिटिजन रिक्रिएशन सेंटर के तौर पर किया जाए.”

कोर्ट ने आगे कहा: “MCD बाकी ढालों को भी खास टाइमलाइन के साथ बंद करने के लिए सही कदम उठाएगी, जैसा कि चीफ सेक्रेटरी, NCT दिल्ली सरकार के निर्देशों और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 का पालन पक्का करने के लिए इस ट्रिब्यूनल के दिए गए निर्देशों के अनुसार किया जाएगा.”

दिप्रिंट ने कमेंट के लिए दिल्ली के एनवायरनमेंट, फॉरेस्ट और वाइल्डलाइफ मिनिस्टर मनजिंदर सिंह सिरसा से संपर्क किया, लेकिन खबर छपने तक कोई जवाब नहीं मिला था. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

इंदौर क्यों काम करता है—और क्या दिल्ली इसे दोहरा सकती है?

पिछले साल 17 जुलाई को, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 के अवॉर्ड दिए, तो इंदौर, सूरत और नवी मुंबई 10 लाख से ज़्यादा आबादी वाले शहरों की कैटेगरी में “प्रीमियर सुपर स्वच्छ लीग” में शामिल हुए. वहीं, नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल (NDMC) 50,000 से 3 लाख के बीच आबादी वाली कैटेगरी में “सुपर स्वच्छ लीग शहरों” का हिस्सा थी.

“इंदौर मॉडल” भारत में साफ शहरों के लिए एक सफल उदाहरण बन गया है. इंदौर दूसरे भारतीय शहरों के लिए भी एक सबक हो सकता है कि ये स्टैंडर्ड हासिल किए जा सकते हैं. पहले, लोगों ने कहा था कि 30 लाख से ज़्यादा आबादी वाला मध्य प्रदेश की कमर्शियल राजधानी किसी भी दूसरे भारतीय शहर जैसा ही था. कूड़े के ढेर हमेशा भरे रहते थे.

इंदौर 17 सितंबर, 2026 को स्वच्छता ही सेवा कैंपेन में हिस्सा ले रहा है | एक्स/@SwachhIndore
इंदौर 17 सितंबर, 2026 को स्वच्छता ही सेवा कैंपेन में हिस्सा ले रहा है | एक्स/@SwachhIndore

लेकिन धीरे-धीरे कचरा कम करने की पॉलिसी, कचरे को अलग-अलग करने पर ज़ोर और सोच में बदलाव ने इंदौर को वह हासिल करने में मदद की है जो कभी नामुमकिन लगता था.

भारत का सबसे साफ शहर बनने की ओर इंदौर का सफर 2015 की शुरुआत में शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को साफ और खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया था.

दिल्ली में कई एजेंसियां ​​हैं, और रैंकिंग कचरा उठाने पर निर्भर नहीं करती है.

—MCD के पूर्व चेयरमैन जगदीश ममगाईं

तब शहर के म्युनिसिपल कमिश्नर मनीष सिंह ने इंदौर को पटरी पर लाने को एक चुनौती के तौर पर लिया. अब, 2026 में, यह मॉडल राजधानी में असर डाल रहा है.

27 जुलाई, 2026 को, दिल्ली के एलजी तरनजीत सिंह संधू ने एक पूरी रिव्यू मीटिंग की अध्यक्षता की और MCD से दिल्ली के किसी एक इलाके में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर सफाई के ‘इंदौर मॉडल’ को लागू करने की संभावना तलाशने को कहा.

उन्होंने कहा था, “इस बात पर ज़ोर दिया गया कि हर MCD अधिकारी को अच्छी नागरिक सेवाएं देने में सतर्क, सक्रिय और जवाबदेह रहना चाहिए. एक साफ, सुरक्षित और ज़्यादा लचीली दिल्ली सिर्फ समय पर काम करने और ज़िम्मेदारी की मज़बूत भावना से ही हासिल की जा सकती है.”

लेकिन दिल्ली इंदौर नहीं है

इंदौर मॉडल को दिल्ली में कैसे फॉलो किया जाता है? MCD के लिए, यह उतना सीधा-सादा नहीं है जितना लगता है. MCD के एक अधिकारी ने कहा, “दिल्ली एक बड़ा शहर है, जहां अलग-अलग तरह की आबादी रहती है और कचरा प्रोडक्शन और कलेक्शन इंदौर से ज़्यादा होता है, ज़ोन अलग हैं, इसलिए लोगों के बीच कचरा अलग करने को लेकर व्यवहार और जागरूकता भी अलग है.”

हम ओखला और तेहखंड प्लांट को 1,000-1,000 मीट्रिक टन और बढ़ा रहे हैं

—MCD अधिकारी

अधिकारी के अनुसार, दिल्ली में लगभग 1,611 अनऑथराइज़्ड कॉलोनियां हैं, जिनमें से कई में संकरी गलियां हैं जहां से कचरा नहीं उठाया जा सकता. दिल्ली में 853 कॉलोनियां ऐसी हैं जहां ज़ीरो वेस्ट है.

जैसा कि MCD के पूर्व चेयरमैन जगदीश ममगाईं ने कहा, “दिल्ली में कई एजेंसियां ​​हैं, और रैंकिंग कचरा उठाने पर निर्भर नहीं करती है. हम NDMC में देख सकते हैं, हरियाली वाला एक छोटा इलाका, और एक कैटेगरी वाला कलेक्शन और सेग्रीगेशन प्रोसेस, कचरा मैनेज किया जा सकता है और इसने इंदौर मॉडल जैसे ही स्टेप्स को सफलतापूर्वक फॉलो किया है.”

MCD क्या करने की योजना बना रही है?

MCD की कचरा प्रोसेस करने की क्षमता अभी कम है, लेकिन अब वह प्रोसेसिंग यूनिट बढ़ाने की योजना बना रहा है. अधिकारी ने कहा, “फिलहाल दिल्ली में चार वेस्ट-टू-एनर्जी (WTE) प्लांट चल रहे हैं. ये नरेला-बवाना (2,400 मीट्रिक टन क्षमता), गाजीपुर (1,350 मीट्रिक टन), ओखला (2,000 मीट्रिक टन) और तेहखंड (1,450 मीट्रिक टन) में हैं.”

उन्होंने कहा कि इन प्लांट की क्षमता बढ़ाने की योजना पर काम चल रहा है. अधिकारी ने आगे कहा, “हम ओखला और तेहखंड प्लांट की क्षमता में 1,000-1,000 मीट्रिक टन की बढ़ोतरी कर रहे हैं.”

उन्होंने कहा, “इसके अलावा, दो नए प्लांट बनाए जा रहे हैं. इनमें नरेला में 3,000 TPD और गाजीपुर में 2,000 TPD का प्लांट शामिल है. इसके साथ ही पूरे शहर में करीब 200 स्थानीय विकेंद्रीकृत कंपोस्टिंग यूनिट चल रही हैं.”

तीनों मुख्य लैंडफिल—ओखला, भलस्वा और गाजीपुर—को साफ करने की मुहिम के बाद दिल्ली के ओखला लैंडफिल के नीचे हरियाली की एक झलक | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
तीनों मुख्य लैंडफिल—ओखला, भलस्वा और गाजीपुर—को साफ करने की मुहिम के बाद दिल्ली के ओखला लैंडफिल के नीचे हरियाली की एक झलक | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

इस बीच, MCD के पास 60,000 सफाई कर्मचारी और सड़क की सफाई के लिए 66 मशीनें हैं. अधिकारी ने कहा कि 70 और मशीनें खरीदने की प्रक्रिया चल रही है.

MCD के एक सूत्र के मुताबिक, नए कॉन्ट्रैक्ट में हर साल प्राथमिक कचरा संग्रह करने वाले वाहनों और उनसे जुड़े कर्मचारियों की संख्या 5 प्रतिशत बढ़ाने पर ध्यान दिया गया है, ताकि नगर निगम के ठोस कचरे की बढ़ती मात्रा को संभाला जा सके.

उन्होंने कहा, “अच्छी स्थिति वाले वाहनों की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए चौथे साल के अंत में प्राथमिक कचरा संग्रह करने वाले 25 प्रतिशत वाहनों को नए वाहनों से बदला जाएगा. अगर कचरे की मात्रा बढ़ती है, तो COD से 39वें महीने के अंत तक सेकेंडरी कचरा संग्रह और परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी.”

इसके अलावा, नए कॉन्ट्रैक्ट में हर जोन में ऑटो-टिपर की संख्या 70-100 बढ़ाने और संकरी गलियों वाले इलाकों में ई-रिक्शा लगाने की जरूरत बताई गई है. उन्होंने कहा, “चार फीट से कम गहराई वाली छोटी नालियों से निकलने वाली गाद के लिए अलग कचरा संग्रह और परिवहन व्यवस्था होगी.”

MCD की योजना तीनों जोन में FCT की संख्या 118 से बढ़ाकर 166 करने की भी है.

अधिकारी ने आगे कहा, “हर जोन में कम से कम एक इंटीग्रेटेड ट्रांसफर स्टेशन बनाया जाएगा, जिसकी क्षमता 150-200 टन होगी. यह सेकेंडरी ट्रांसपोर्टेशन की जरूरतों के लिए बफर के तौर पर काम करेगा. अगर कचरे की मात्रा बढ़ती है, तो COD से 39वें महीने के अंत तक सेकेंडरी कचरा संग्रह और परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाएगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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