नई दिल्ली: तहखंड गांव, ओखला में अपनी ऑमलेट की रेहड़ी से सुंदर लाल अब सात मंजिला ESI अस्पताल को साफ देख सकते हैं. उनका कहना है कि अब यह अस्पताल पास के ओखला लैंडफिल के कचरे के पहाड़ से आखिरकार ज्यादा ऊंचा दिखाई देता है. उनके आसपास की हवा में भी पहले जितनी बदबू नहीं रही.
“मैंने पिछले एक साल में यह बदलाव देखा है. मेरे लिए यह बेहतर है, क्योंकि अब मुझे मोबाइल नेटवर्क मिलता है और मच्छर भी पहले जितना नहीं काटते,” लाल ने कहा.
दिल्ली के कचरे के पहाड़ लंबे समय से शहर की खराब कचरा प्रबंधन व्यवस्था की पहचान रहे हैं. अब इन्हें हटाने के लिए चल रहे अभियान के कारण तीन मुख्य लैंडफिल – ओखला, भलस्वा और गाजीपुर – में पिछले करीब एक साल में कचरे के ढेर साफ तौर पर छोटे हुए हैं. सवाल यह है कि यह कितने समय तक रहेगा?
इस महीने की शुरुआत में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने X पर लिखा कि राजधानी में वर्षों से बढ़ते हुए “कूड़े के पहाड़” अब “आखिरकार कम हो रहे हैं”. उन्होंने दावा किया कि 1.5 साल में 217.17 लाख MT पुराने कचरे की बायोमाइनिंग की गई है – यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें भारी मशीनों से जमीन के अंदर दबे कचरे को खोदकर बाहर निकाला और प्रोसेस किया जाता है – और 100 एकड़ जमीन को वापस इस्तेमाल लायक बनाया गया है. दिल्ली 2026 के अंत तक ओखला और भलस्वा लैंडफिल से पुराने कचरे को हटाने का काम पूरा करने की कोशिश कर रही है, जबकि गाजीपुर की समय सीमा दिसंबर 2027 है.

दिल्ली की हर लगातार आने वाली सरकार के लिए कचरे की इन चोटियों को खत्म करना किसी चुनौती से कम नहीं रहा है. ये सिर्फ देखने में खराब नहीं लगते, बल्कि लगातार कचरा डालने से जहरीला लीचेट निकलता है, जो भूजल को दूषित करता है, मीथेन गैस से आग लगने की स्थिति पैदा करता है और वायु प्रदूषण को और खराब करता है. लेकिन इससे पहले भी जीत की घोषणा समय से पहले की जा चुकी है.
2023 में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि भलस्वा से करीब 30 लाख MT कचरा हटाया जा चुका है और बाकी कचरा मार्च 2024 तक हटा दिया जाएगा. ऐसा कभी नहीं हुआ. काम सिर्फ रुक-रुक कर आगे बढ़ता है. असली समस्या यह है कि ये कचरे के पहाड़ फिर से बढ़ने लगते हैं, क्योंकि दिल्ली में हर दिन लगभग 11,000 से 12,000 टन नया नगरपालिका ठोस कचरा पैदा होता है.
इस बार गुप्ता ने एक वीडियो संदेश में वादा किया कि उनकी सरकार के पास “वैज्ञानिक रोडमैप” और “समय सीमा के अंदर काम करने का तरीका” है. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार चार नए वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट लगाने के लिए “पूरी तरह तैयार” है.
“एक बार ये चालू हो गए, तो कचरे के कोई नए पहाड़ फिर कभी नहीं बनेंगे,” उन्होंने कहा.
#WATCH | Delhi Chief Minister Rekha Gupta says, "For years, people had been seeing mountains of garbage in Delhi. When our government came to power, we pledged to remove these garbage mountains. People wondered if we could actually fulfill such a massive promise, but we did. We… pic.twitter.com/RzCvHNtomN
— ANI (@ANI) August 30, 2026
दिल्ली नगर निगम (MCD) 2019 से बायोमाइनिंग के जरिए पुराने कचरे को कम करने की कोशिश कर रहा है. अधिकारियों का कहना है कि अब यह काम पहले से तेज गति से चल रहा है.
“कॉन्ट्रैक्ट और प्रक्रिया को समझने में कई समस्याएं थीं, लेकिन अब काम ज्यादा व्यवस्थित हो गया है, खासकर गाजीपुर में, जहां ठेकेदार कई बार बदले गए हैं,” MCD के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया.

दिल्ली आर्थिक सर्वे के अनुसार, अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच 74.11 लाख MT पुराने कचरे को हटाया गया. सर्वे ने इसे “अब तक एक साल में हासिल की गई सबसे ज्यादा प्रोसेसिंग” बताया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में 29.93 लाख MT और 2023-24 में 54.34 लाख MT कचरा हटाया गया था.
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हालांकि हाल में काम तेज हुआ है, लेकिन सर्वे के आंकड़े यह भी बताते हैं कि मुख्यमंत्री गुप्ता का “सिर्फ 1.5 साल में” 217.17 लाख MT कचरा हटाने का दावा उस काम को भी शामिल करता है जो BJP सरकार के सत्ता में आने से पहले किया गया था. जून 2022 में किए गए ड्रोन सर्वे में तीनों लैंडफिल में कुल पुराने कचरे की मात्रा उस समय 203 लाख MT पाई गई थी. मार्च 2025 तक 106.17 लाख MT कचरा हटाया जा चुका था.
इसका असर ओखला में सबसे ज्यादा दिखाई देता है, जहां कचरे का पहाड़ अब आसमान को छूता हुआ नहीं लगता. गाजीपुर में बदलाव उतना साफ नहीं है. जानी-पहचानी सड़ी हुई बदबू अभी भी हवा में है और कुत्ते कचरे में खाना तलाशते हैं.
भलस्वा में शेख अकबर अली को इस पर भरोसा नहीं है. दिल्ली के लैंडफिल के आसपास रहने वाले लोगों के साथ काम करने वाली संस्था बस्ती सुरक्षा मंच के कोऑर्डिनेटर के तौर पर वह कहते हैं कि कचरे को अक्सर सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा रहा है और नए लैंडफिल भी बन रहे हैं.
“मैं करीब 15 से 20 साल से भलस्वा में काम कर रहा हूं और जो मैं देख रहा हूं, वह यह है कि कचरा एक जगह से उठाकर दूसरी जगह डाल दिया जाता है. उन्होंने लैंडफिल की ऊंचाई एक तरफ कम कर दी है, लेकिन दूसरी तरफ कचरा काफी बढ़ गया है,” उन्होंने कहा. “आज भलस्वा में छह या सात जगहें ऐसी हैं जहां यह कचरा डाला गया है और इससे वहां रहने वाले लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है. अब रोहिणी के सानोट गांव में एक और लैंडफिल बन गया है. तो क्या हम सच में लैंडफिल खत्म कर रहे हैं, या सिर्फ कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हैं?”
जमीन को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाना
ओखला में जहां पहले कचरा था, वहां अब थोड़ी हरियाली दिखाई देने लगी है. इसे कुछ हद तक एक छोटे हरे इलाके की तरह बनाने की योजना थी. पिछले साल दिल्ली सरकार ने दोबारा इस्तेमाल लायक बनाई गई जमीन पर 8,000 बांस के पौधे लगाने की घोषणा की थी. इसके साथ 8,000 लेमनग्रास और वेटिवर के पौधे भी लगाने थे. MCD ने कहा था कि इन पौधों की जड़ें भारी धातुओं को भूजल में जाने से रोकती हैं और हवा में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाती हैं.
लेकिन बांस के कई पौधे मुश्किल में हैं. कई पौधे कमजोर और सूखे हुए दिखाई दिए.

अली कहते हैं कि उन्हें इससे हैरानी नहीं है. वह पूछते हैं कि जब जमीन के नीचे माइक्रोप्लास्टिक, ई-वेस्ट और दूसरे खतरनाक और ठीक से प्रोसेस न किए गए कचरे की मौजूदगी है, तो पौधों के अच्छी तरह बढ़ने की उम्मीद कैसे की जा सकती है. उन्होंने भलस्वा में भी ऐसी कोशिशों को नाकाम होते देखा है.
“उन्होंने भलस्वा के पाइपलाइन इलाके में भी बड़ी संख्या में पेड़ लगाए थे. पर्यावरण दिवस पर मंत्री आए और उन्होंने अपने हाथों से पेड़ लगाए. लेकिन उसके बाद क्या हुआ? यह देखने कोई वापस नहीं आया कि वे पेड़ जिंदा भी हैं या नहीं. अगर कचरे का इलाज नहीं किया जाता और पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल नहीं होती, तो सिर्फ कार्यक्रम के लिए पेड़ लगाने का क्या फायदा?” उन्होंने कहा.
MCD अधिकारियों ने भी कथित तौर पर माना है कि पांच एकड़ का वह हिस्सा, जहां पिछले साल 6,000 बांस के पौधे लगाए गए थे, अब करीब 30 फीट ऊंचे नए कचरे के पहाड़ से ढक गया है.
ओखला की दोबारा इस्तेमाल लायक बनाई गई जमीन पर लेमनग्रास और वेटिवर जैसे पौधे लगाए गए. MCD का कहना है कि इनकी जड़ें भारी धातुओं को भूजल में जाने से रोकने में मदद कर सकती हैं | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट
सरकारी आंकड़ों में अभी इस बात को शामिल नहीं किया गया है. MCD के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2019 से मार्च 2026 के बीच तीनों लैंडफिल से करीब 214.5 लाख MT कचरा हटाया गया. पिछले महीने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि तीनों जगहों पर वापस इस्तेमाल लायक बनाई गई 100 एकड़ जमीन में से 45 एकड़ भलस्वा में, 35 एकड़ ओखला में और 20 एकड़ गाजीपुर में है.
पौधे लगाना जमीन को वापस इस्तेमाल लायक बनाने की प्रक्रिया का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है. इससे पहले बायोमाइनिंग होती है. जुलाई 2019 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली को तीनों बड़े लैंडफिल साफ करने का निर्देश दिया था. उसी साल अक्टूबर तक ट्रॉमेल मशीनें काम करने लगी थीं. ये बड़ी घूमने वाली छलनियां होती हैं जो दबे हुए पुराने कचरे को अंदर लेकर उसे अलग-अलग करती हैं. बारीक मिट्टी जैसी सामग्री नीचे से निकल जाती है, जबकि निर्माण का मलबा, प्लास्टिक, कपड़ा, रबर और दूसरे कचरे को अलग कर दिया जाता है. अलग होने के बाद इन सामग्रियों को दोबारा इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग, प्रोसेसिंग या कहीं और निपटाने के लिए भेजा जाता है.

अधिकारियों ने बताया कि जब MCD ने खुदाई शुरू की थी, तब उसे सीमित मशीनों और कम अनुभवी ठेकेदारों की समस्या का सामना करना पड़ा. गाजीपुर में एक ठेकेदार को आखिरकार दिसंबर 2024 में हटा दिया गया, क्योंकि उसने 30 लाख MT के अपने लक्ष्य के आधे से भी कम कचरे को प्रोसेस किया था. लेकिन अब अधिकारियों का कहना है कि प्रक्रिया ज्यादा व्यवस्थित हो गई है, हालांकि बारिश, नया कचरा और ठेकेदारों से जुड़ी समस्याएं अभी भी काम की रफ्तार कम करती हैं.

ट्रॉमेल मशीनों की संख्या जून 2022 में 25 से बढ़कर पिछले साल 58 हो गई. लेकिन दशकों से दबे हुए कचरे को अलग करना न आसान है और न तेज. मौसम, जगह की कमी और कचरे को अलग करने की प्रक्रिया, इन सभी के कारण अलग-अलग समस्याएं आती हैं. बारिश पुराने कचरे को गीला और चिपचिपा बना देती है, जिससे मशीनें जाम हो सकती हैं. कई बार अलग किए गए कचरे को रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती. कचरे को प्रोसेस करने की क्षमता भी सीमित है.
बायोमाइनिंग में एक बड़ी रुकावट यह रही है कि कचरा अलग होने के बाद उस सामग्री का क्या किया जाए. 2022 में उपराज्यपाल वीके सक्सेना के निर्देश पर MCD ने लैंडफिल से निकलने वाले बेकार और निर्माण के कचरे को निजी कंपनियों, बिल्डरों और सरकारी एजेंसियों को दोबारा इस्तेमाल के लिए मुफ्त में देना शुरू किया. एक महीने के अंदर निजी संस्थाओं ने 8,421.75 MT सामग्री उठा ली, जबकि PWD और DDA जैसी एजेंसियों ने भी इस सामग्री का इस्तेमाल करने का फैसला किया.
इसके कई इस्तेमाल हैं. प्लास्टिक कचरे को छोटे टुकड़ों में काटकर सड़क की बिटुमिन वाली परतों में मिलाया जा सकता है, जबकि बेकार और निर्माण के कचरे का इस्तेमाल भराव या बेस सामग्री के रूप में किया जा सकता है. NHAI ने कराला माजरी, बुराड़ी, कुंडली, होलंबी और फरीदाबाद-मिठापुर में लैंडफिल से निकली सामग्री का इस्तेमाल किया. वहीं C&D कचरे को खामपुर और केशव नगर-बुराड़ी की प्रोसेसिंग साइटों पर भेजा गया. अलीपुर, उत्तर दिल्ली से महिपालपुर के पास NH-48 तक जाने वाली अर्बन एक्सटेंशन रोड-II परियोजना में भी दिल्ली के लैंडफिल से निकली सामग्री का इस्तेमाल किया गया.
2023 में NGT की एक समिति ने सिफारिश की कि लैंडफिल साफ होने के बाद करीब एक-तिहाई जमीन पर घना जंगल बनाया जाना चाहिए, एक-तिहाई जमीन का इस्तेमाल एक साथ कई तरह की कचरा प्रोसेसिंग सुविधाओं के लिए किया जाना चाहिए और बाकी एक-तिहाई जमीन का इस्तेमाल “किसी दूसरे उद्देश्य… जिसमें उससे कमाई करना भी शामिल है” के लिए किया जा सकता है.
ओखला का फायदा
ओखला लैंडफिल साइट पर, MCD के एक छोटे से ऑफिस के अंदर एक बड़ा बोर्ड लगा है. उस पर ड्रोन से ली गई पहले और बाद की तस्वीरें हैं, जो दिखाती हैं कि कचरे का बहुत बड़ा पहाड़ कितना छोटा हो गया है. जहां पहले यह एक खड़ी और डरावनी चट्टान की तरह पूरे इलाके पर छाया रहता था, अब वहां कुछ हल्की ऊंचाई वाली पहाड़ियां दिखाई देती हैं.
MCD अधिकारियों का दावा है कि पिछले छह साल में तीनों कचरे के पहाड़ करीब 30 मीटर तक कम हुए हैं. लेकिन ओखला में कमी सबसे तेज हुई, क्योंकि इसका आकार छोटा है और यह कचरा प्रोसेसिंग प्लांट के पास है.
MCD अधिकारी ने कहा, “ओखला के मामले में कचरा प्लांट एक फायदा है, इसलिए प्रोसेसिंग तेजी से होती है.”


तीनों में गाजीपुर सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल है. 2019 में जब बायोमाइनिंग शुरू हुई थी, तब यह 70 एकड़ में फैला था और इसकी ऊंचाई 65 मीटर थी. भलस्वा 36 एकड़ में फैला था और 62 मीटर ऊंचा था, जबकि ओखला 46 एकड़ में फैला था और इसकी ऊंचाई करीब 40 मीटर थी.
अगले दो साल में सभी लैंडफिल के लिए कचरा प्रोसेस करने की क्षमता बढ़ाई जाने वाली है. ओखला का मौजूदा वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट रोजाना 1,950 टन कचरा संभालता है और मार्च 2027 तक इसकी क्षमता बढ़ाकर 2,950 टन प्रतिदिन की जा रही है. भलस्वा में दोबारा इस्तेमाल लायक बनाई गई जमीन पर रोजाना 1,800 टन नया कचरा प्रोसेस करने वाले एक नए प्लांट को मंजूरी दी गई है. गाजीपुर में रोजाना 800 टन कचरा प्रोसेस करने वाली सुविधा और दिसंबर 2028 तक रोजाना 2,000 टन कचरे से ऊर्जा बनाने वाला नया प्लांट मिलने वाला है.
MCD अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि गाजीपुर के ठेकेदार को अंतिम रूप दे दिया गया है और अब वहां काम की रफ्तार बढ़नी चाहिए.

नया कचरा बनाम पुराना कचरा
ओखला साइट पर बदबू कम हो गई है, लेकिन कचरा डालने के लिए ट्रक लगातार आते रहते हैं – हर दिन करीब 2,800 मीट्रिक टन कचरा आता है. बायोमाइनिंग एक दिन में इससे ज्यादा कचरा साफ कर सकती है, लेकिन तभी जब हालात सही हों.
अगस्त में मशीनों ने हर दिन 6,000-9,000 टन कचरा हटाया. लेकिन 3 से 11 अगस्त के बीच बारिश की वजह से यह घटकर सिर्फ 650 टन रोज रह गया.
MCD के वरिष्ठ अधिकारी मनीष जैन ने कहा, “इन महीनों में बारिश एक बड़ी समस्या रही है. इन महीनों में बायोमाइनिंग का काम बहुत मुश्किल और थका देने वाला हो जाता है.”

सफाई का काम शुरू होने के बाद से पुराने कचरे को हटाने और नए कचरे से निपटने की समय सीमाएं बार-बार आगे बढ़ती रही हैं. ओखला को पहले 2023 तक साफ किया जाना था, लेकिन अब इसकी समय सीमा दिसंबर 2026 कर दी गई है. भलस्वा को भी पहले 2025 तक साफ किया जाना था, लेकिन अब इसकी समय सीमा दिसंबर 2026 कर दी गई है. तीनों में सबसे बड़ा गाजीपुर है, जिसकी समय सीमा दिसंबर 2027 है.
दिल्ली के मेयर परवेज वाही ने जुलाई में ओखला लैंडफिल का निरीक्षण किया था. उन्होंने कहा कि आधी जमीन साफ हो चुकी है और वहां आने वाले नए कचरे को भी “दिसंबर 2026 तक प्रोसेस करके हटा दिया जाएगा”.
MCD अधिकारियों ने कहा कि इस समय लैंडफिल में जो कचरा है, वह नया है और सिर्फ कुछ महीने पुराना है.


काला पानी, कचरे के नए ढेर
ओखला लैंडफिल बलराम गुप्ता की जिंदगी का हमेशा से हिस्सा रहा है. उनका जन्म तहखंड गांव में हुआ था और अब वह ESI अस्पताल के पास एक छोटी-सी रेहड़ी चलाते हैं. 36 साल के बलराम के लिए एक और चीज हमेशा से रही है – नेताओं के ये वादे कि कचरे का पहाड़ खत्म हो जाएगा.
मुख्यमंत्री के वीडियो संदेश में कहा गया कि लैंडफिल के पास रहने वाले लोगों की जिंदगी बेहतर हुई है और “प्रॉपर्टी के दाम बढ़ गए हैं”.
बलराम गुप्ता भी मानते हैं कि कुछ सुधार दिखाई दे रहा है.
उन्होंने कहा, “पिछले डेढ़ साल में इलाके में प्रदूषण और बदबू कम हुई है.” लेकिन पुरानी सभी समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं.

लैंडफिल के पास काले और बदबूदार पानी की एक धारा सड़क के चौराहे पर भर गई थी. कारें उस पानी के बीच से निकल रही थीं और वहां रहने वाले लोग उससे बचकर चल रहे थे.
पास में बैठे 60 साल के निवासी अनमोल कुमार ने चेतावनी दी, “पानी में पैर मत रखना.” उन्होंने कहा कि वह इस पानी को कई सालों से देख रहे हैं. हालांकि अब यह कुछ कम हुआ है, लेकिन बारिश के मौसम में समस्या और बढ़ जाती है.
गुप्ता ने कहा, “मानसून के दौरान यह काला पानी घरों तक पहुंच जाता है.” “आम आदमी पार्टी ने भी BJP की तरह वादे किए, लेकिन उनमें से कोई भी इसका समाधान नहीं निकाल पाया.”
30 साल की प्रीति कश्यप भलस्वा के पास बजरंग चौक की एक कम आय वाली कॉलोनी में पिछले 10 साल से रह रही हैं. जब उन्होंने पहली बार कचरे के पहाड़ को छोटा होते देखा, तो उन्हें खुशी हुई. उनकी छत से दिखाई देने वाला नजारा बदल गया था. लेकिन कचरे का यह इलाका फिर से बढ़ने की क्षमता रखता है.
उन्होंने कहा, “एक दिन जब मैं लैंडफिल की दूसरी तरफ गई, तो मैंने देखा कि वहां एक और पहाड़ खड़ा हो रहा था.”
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