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Thursday, 15 October, 2026
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पहले के 8 SIR, हर बार मतदाताओं में हुआ इजाफा: फिर इस बार क्यों आई गिरावट?

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नई दिल्ली: पिछले साल भारत के चुनाव आयोग (EC) की ओर से शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) भारत के इतिहास में मतदाता सूची में कमी लाने वाली अपनी तरह की पहली प्रक्रिया है. दिप्रिंट के एक विश्लेषण में यह बात सामने आई है. इससे पहले जब भी आठ बार गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया अपनाई गई, हर बार मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के मुकाबले ज्यादा नए मतदाताओं को जोड़ा गया था.

2025-2026 के SIR से पहले, पूरे देश में या देश के कुछ हिस्सों में मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण 1952-56, 1958-61, 1965-66, 1983-84, 1987-88, 1993, 1995 और 2002-2004 में किया गया था.

इन सभी पुराने पुनरीक्षणों को सिर्फ “गहन पुनरीक्षण” कहा जाता था. लेकिन चुनाव आयोग की मतदाता सूची से जुड़ी नियमावली में 2002-2003 के पुनरीक्षण को “गहन प्रकृति का विशेष पुनरीक्षण” कहा गया था. इस बार भी इसी तरह का नाम इस्तेमाल किया गया है.

1952 से अब तक की इस प्रक्रिया का विश्लेषण करने के लिए दिप्रिंट ने गहन पुनरीक्षण से ठीक पहले हुए लोकसभा चुनाव और पुनरीक्षण के ठीक बाद हुए लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं की संख्या की तुलना की.

Infographic: Shruti Naithani/ThePrint
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

नए SIR में चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, आयोग ने कुल 95.40 करोड़ मतदाताओं की जानकारी की जांच की. इनमें से कुल 13.39 करोड़ मतदाताओं को इन श्रेणियों में रखा गया: अनुपस्थित या जिनका पता नहीं चल पाया (3.01 करोड़), स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके (6.30 करोड़), मृत (2.80 करोड़), एक से ज्यादा बार दर्ज नाम (1.02 करोड़) और अन्य (0.26 करोड़).

हालांकि, ये आंकड़े हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए जारी की गई शुरुआती मतदाता सूचियों से जुड़े हैं. सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR पूरा होने के बाद आधिकारिक और अपडेट किए गए आंकड़े जारी किए जाएंगे.

जिन इलाकों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां भी चुनाव आयोग अब विशेष अभियान चला रहा है. इसका मकसद उन मतदाताओं को सूची में शामिल करना है, जिनके नाम इस प्रक्रिया के दौरान छूट गए थे. इसके साथ ही नए मतदाताओं को भी सूची में जोड़ा जा रहा है.

Infographic: Shruti Naithani/ThePrint
इन्फोग्राफिक: श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया लेने के लिए चुनाव आयोग के महानिदेशक (मीडिया) आशीष गोयल को ईमेल भेजा गया है. जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

दिप्रिंट से बात करते हुए पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ओ.पी. रावत ने कहा कि पिछले कुछ सालों में जन्म दर में कमी आना मतदाताओं की संख्या घटने का एक कारण हो सकता है. लेकिन नए SIR में मतदाताओं की संख्या घटने की मुख्य वजह यह है कि चुनाव आयोग ने मतदाता बनने की पात्रता साबित करने की जिम्मेदारी खुद मतदाताओं पर डाल दी है.

उन्होंने कहा, “पहले मतदाता को कोई फॉर्म नहीं भरना पड़ता था और न ही कोई दस्तावेज देना पड़ता था. बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) खुद उसके घर जाता था और परिवार के मुखिया या परिवार के किसी प्रतिनिधि से सारी जानकारी लेता था. वह पूछता था कि परिवार के कितने लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं, वे कहां रहते हैं, उनकी उम्र क्या है और दूसरी जरूरी जानकारी क्या है. इसके बाद उसी हिसाब से बदलाव किए जाते थे.”

रावत जनवरी 2018 से दिसंबर 2018 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे. उन्होंने आगे कहा, “अब उन्होंने (चुनाव आयोग ने) कहा कि जिन लोगों का नाम 2002 या 2003 के SIR की मतदाता सूची से नहीं जुड़ता, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 11 दस्तावेजों में से कोई एक देना होगा. यह उन लोगों के लिए बहुत मुश्किल था, जिनके पास संसाधनों की कमी है, जो रोजाना मजदूरी करते हैं या गांवों में खेतों में काम करने जाते हैं. ऐसे लोगों की संख्या काफी बड़ी है.”

उन्होंने कहा, “लोग अपना नाम पुरानी सूची से इसलिए भी नहीं जोड़ पाए, क्योंकि उन्हें इसके लिए जरूरी मदद नहीं दी गई.”

उन्होंने चुनाव अधिकारियों के उन बयानों का भी जिक्र किया, जिनमें कहा गया था कि SIR के दौरान BLO को गलत जानकारी देने पर एक साल तक की जेल हो सकती है.

उन्होंने कहा, “इसलिए गरीब लोगों को लगा कि इतनी लंबी और मुश्किल प्रक्रिया में उलझना ठीक नहीं है.”

रावत ने कहा कि ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग को एहसास हो गया है कि कई पात्र लोगों के नाम मतदाता सूची से छूट गए हैं. इसलिए आयोग ने पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है, ताकि इस स्थिति को ठीक किया जा सके.

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2002-03 का SIR

2002-03 में हुई प्रक्रिया से जुड़े दिशानिर्देश सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं. हालांकि, चुनाव आयोग की मतदाता सूची से जुड़ी नियमावली में बताया गया है कि गहन प्रकृति का विशेष पुनरीक्षण, सामान्य गहन पुनरीक्षण से किस तरह अलग होता है.

नियमावली के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण में अधिकारियों को घर-घर जाकर जांच करने के लिए भेजा जाता था. उनके पास मतदाता सूची की एक कार्यकारी प्रति होती थी, जिसमें पहले से दर्ज मतदाताओं की जानकारी होती थी. हर नाम के नीचे एक खाली पंक्ति होती थी, ताकि जानकारी में सुधार किया जा सके और नए पात्र मतदाताओं का विवरण दर्ज किया जा सके.

2002-03 की यह प्रक्रिया दो हिस्सों में पूरी की गई थी. पहले चरण में 20 राज्यों में यह काम हुआ, जिसमें पात्रता तय करने की तारीख 1 जनवरी 2002 रखी गई थी. इसके बाद 2003 में सात राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी की गई.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एस. कृष्णमूर्ति 2002-03 की इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग में आयुक्त थे. उन्होंने कहा कि वह चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर टिप्पणी नहीं करना चाहते, क्योंकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

हालांकि, उन्होंने कहा कि 20 साल बाद मतदाता सूची की बड़े स्तर पर सफाई की जा रही है, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर नामों के छूटने और जुड़ने से उन्हें हैरानी नहीं हुई.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “पहले हर पांच साल में घर-घर जाकर जांच के जरिए मतदाता सूची में बदलाव किया जाता था. पहले की इन पांच साल वाली प्रक्रियाओं में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाते थे. अगर आप 2004 से पहले हर पांच साल में होने वाले पुनरीक्षण को देखेंगे, तो आपको कई नाम हटाए गए और कई नाम जोड़े गए मिलेंगे. वास्तव में, मौत या लोगों के दूसरी जगह जाने के कारण मतदाता सूची में बदलाव तुरंत और सही तरीके से नहीं हो पाते थे.”

कृष्णमूर्ति फरवरी 2004 से मई 2005 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे. उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में गलतियां होने की संभावना हो सकती है, लेकिन किसी गलत मंशा का आरोप लगाने के लिए पक्के सबूत जरूरी हैं, क्योंकि ये प्रक्रियाएं राज्य सरकार के कर्मचारी करते हैं.

एक पूर्व चुनाव अधिकारी, जो 2002-03 में इस प्रक्रिया के दौरान एक राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) थे, ने कहा कि मतदाता सूचियों में बहुत ज्यादा नाम दर्ज हो गए होंगे. इसी वजह से इस बार बड़ी संख्या में नाम हटाने की जरूरत पड़ी होगी.

उनका मानना था कि इस बार डिजिटलीकरण की वजह से मतदाता सूची ज्यादा सटीक होनी चाहिए.

कृष्णमूर्ति ने कहा कि गिनती करने वाले अधिकारियों की गलत प्रक्रियाओं के कारण कुछ मतदाताओं के नाम छूट गए होंगे.

उन्होंने कहा, “अगर गिनती करने वाला अधिकारी मतदाता के घर नहीं जाता है, तो गलत तरीके से नाम हटाए जा सकते हैं.”

गहन पुनरीक्षण और संक्षिप्त पुनरीक्षण में अंतर

चुनावों की निगरानी करने, उन्हें निर्देश देने और उन पर नियंत्रण रखने का अधिकार चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मिला है.

मतदाता सूची में बदलाव करने का चुनाव आयोग का अधिकार भी इन्हीं प्रावधानों से जुड़ा है. इसके अलावा, 1950 के कानून के तहत बनाए गए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 भी इस प्रक्रिया का आधार हैं.

इन नियमों के नियम 25 में कहा गया है कि हर निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में बदलाव “या तो गहन तरीके से, या संक्षिप्त तरीके से, या कुछ हिस्सों में गहन और कुछ हिस्सों में संक्षिप्त तरीके से” किया जा सकता है.

ये तीन तरीके हैं, जिनसे चुनाव आयोग मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर सकता है.

चुनाव आयोग की नियमावली में बताया गया है कि इन तीनों तरीकों के बीच मुख्य अंतर शुरुआती मतदाता सूची तैयार करने के तरीके में होता है. इसके बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया एक जैसी रहती है.

गहन पुनरीक्षण में अधिकारियों को घर-घर जाकर मतदाताओं की जानकारी की जांच करनी होती है. वहीं, संक्षिप्त पुनरीक्षण में मौजूदा मतदाता सूची की समीक्षा की जाती है और घर-घर जाकर जांच किए बिना शुरुआती मतदाता सूची जारी की जाती है.

इसके मुकाबले, गहन प्रकृति के विशेष पुनरीक्षण में अधिकारियों को मतदाता सूची की एक कार्यकारी प्रति लेकर घर-घर जाना होता है. इस प्रति में पहले से दर्ज मतदाताओं की जानकारी होती है. इससे अधिकारी मौके पर ही जानकारी में सुधार कर सकते हैं और नए मतदाताओं का विवरण भी दर्ज कर सकते हैं.

संक्षिप्त पुनरीक्षण अक्सर चुनावों से पहले किया जाता है. इसका मकसद नए पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ना होता है. इनमें वे लोग शामिल हैं, जिन्होंने 18 साल की उम्र पूरी कर ली है या जो दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में चले गए हैं. इसके अलावा, एक से ज्यादा बार दर्ज नामों और मृत मतदाताओं के नाम हटाने के लिए भी यह प्रक्रिया अपनाई जाती है.

आंशिक रूप से गहन और आंशिक रूप से संक्षिप्त पुनरीक्षण में मौजूदा मतदाता सूची को शुरुआती सूची के तौर पर प्रकाशित किया जाता है. इसके साथ ही, अधिकारियों को घर-घर जाकर जानकारी की जांच करने के लिए भी भेजा जाता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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