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Thursday, 15 October, 2026
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‘बाहरी लोगों पर रोक’: मणिपुर की पहाड़ियों में कुकी-नागा संघर्ष से बढ़ा डर, चुनाव से पहले शांति की आस

कुकी और नागा समुदायों के बीच टकराव के कारण मणिपुर की पहाड़ियों में डर बढ़ रहा है. सामान्य हालात लौटने का सपना अभी दूर है और लोग चुनाव से पहले शांति चाहते हैं. दिप्रिंट ने मैतेई, कुकी और नगा बहुल तीन जिलों का दौरा किया.

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कांगपोकपी/सेनापति/इंफाल: जैसे ही कोई राजधानी इंफाल से करीब 45 किलोमीटर उत्तर में स्थित कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में दाखिल होता है, हर कुछ किलोमीटर पर सफेद रंग के सूचना बोर्ड दिखाई देने लगते हैं. ये बोर्ड हाईवे के दोनों तरफ बसे छोटे-छोटे गांवों के बाहर लगे हैं.

बोर्ड पर लिखा है, “सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे के बीच बाहरी लोगों को गांव में आने की इज़ाज़त नहीं है.” इस पर संबंधित गांव के प्रशासन के हस्ताक्षर हैं. याइकोंगपाओ गांव के बोर्ड से कुछ ही मीटर की दूरी पर लोहे का एक बड़ा गेट गांव के रास्ते को रोकता है. वहां एक युवक पहरा दे रहा है. वह किसी भी व्यक्ति या गाड़ी को उसकी पहचान की जांच करने के बाद ही अंदर आने देता है.

यह युवक मणिपुर पुलिस या केंद्रीय सुरक्षा बलों का हिस्सा नहीं है, जिनकी राज्यभर में बड़ी संख्या में तैनाती है. वह गांव के उन स्वयंसेवकों की टीम का हिस्सा है, जिसे कांगपोकपी जिले के थांगल नगा गांव याइकोंगपाओ की सुरक्षा के लिए लगाया गया है. इस इलाके में और इसके आसपास नगा समुदाय के नौ गांव हैं.

हालांकि, कांगपोकपी में आदिवासी कुकी समुदाय की आबादी सबसे ज्यादा है, लेकिन नेशनल हाईवे-2 (जो इंफाल को कोहिमा से जोड़ता है) और इंफाल-तामेंगलॉन्ग रोड (आईटी रोड) के किनारे करीब दो दर्जन बस्तियां हैं. इनमें थांगल, माओ, पाउमाई और लियांगमाई जैसे अलग-अलग नगा समुदायों के लोग रहते हैं.

मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में नागा गांवों के बाहर लगे बोर्ड, जिन पर बाहरी लोगों के आने पर रोक है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में नागा गांवों के बाहर लगे बोर्ड, जिन पर बाहरी लोगों के आने पर रोक है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

आज लगभग सभी नागा गांवों के बाहर सूचना बोर्ड लगे हैं और लोहे के गेट लगाकर उनकी सुरक्षा की जा रही है. इस साल फरवरी में, मई 2023 में आदिवासी कुकी-जो और गैर-आदिवासी मैतेई समुदायों के बीच शुरू हुआ जातीय संघर्ष एक नया मोड़ ले चुका है. अब कुकी और नागा समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए हैं. इससे पहले तक नागा समुदाय इस संघर्ष में तटस्थ रहा था.

मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में नगा गांव याइकोंगपाओ के प्रवेश द्वार पर लोहे के गेट लगे हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
मणिपुर के कुकी बहुल जिले कांगपोकपी में नगा गांव याइकोंगपाओ के प्रवेश द्वार पर लोहे के गेट लगे हैं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

नागा और कुकी, दोनों आदिवासी ईसाई समुदाय हैं और मणिपुर की पहाड़ियों में रहते हैं. उखरुल, सेनापति और तामेंगलॉन्ग में नागा समुदाय की आबादी सबसे ज्यादा है, जबकि चूड़ाचांदपुर, कांगपोकपी और मोरेह में कुकी समुदाय का दबदबा है. कामजोंग और तेंगनौपाल समेत पहाड़ी इलाकों के बाकी जिलों में कुकी और नागा, दोनों समुदायों के लोग रहते हैं. फरवरी से अब तक दोनों समुदायों के बीच हुई हिंसा में करीब 50 कुकी और नागा लोगों की मौत हो चुकी है.

मई 2023 में गैर-आदिवासी मैतेई और आदिवासी कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़कने के बाद इंफाल में भी इस तरह के नोटिस और गेट आम हो गए थे. मणिपुर के तीन प्रमुख समुदायों में से ये दो समुदाय हैं. हिंसा के चरम पर, जिन इलाकों में कुकी और मैतेई समुदायों के लोग साथ रहते थे, वहां मैतेई लोगों ने भीड़ से अपने घरों को बचाने के लिए अपने गेट पर नोटिस चिपका दिए थे. इन पर लिखा था, “यह संपत्ति मैतेई समुदाय की है.”

तब से संघर्ष का रुख कुकी और नागा समुदायों की ओर हो गया है, लेकिन ज़मीन पर हालात कमोबेश वैसे ही बने हुए हैं. दोनों समुदायों के गांवों में स्वयंसेवक अब भी अपने-अपने इलाकों की सुरक्षा के लिए पहरा दे रहे हैं. लोगों की बिना रोक-टोक आवाजाही पर पाबंदी है और एक या दूसरे समुदाय की ओर से बार-बार लगाए जाने वाले आर्थिक बंद के कारण लोगों की ज़िंदगी प्रभावित होती रहती है.

डर और चिंता

जमीन पर दोनों पक्षों के लोगों में भविष्य को लेकर डर और चिंता है. साथ ही, इस बात को लेकर गुस्सा भी है कि राज्य में इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद हिंसा क्यों जारी है.

याइकोंगपाओ गांव के 42-वर्षीय किसान एम. खांगबा ने कहा, “हम डर के माहौल में रहते हैं, क्योंकि यह एक संवेदनशील इलाका है. यहां नागा समुदाय की छोटी-छोटी बस्तियां हैं, जो कुकी गांवों से घिरी हुई हैं. हमें अपनी महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की चिंता है. सुबह जब पुरुष काम पर निकल जाते हैं, तो गांव के गेट बंद कर दिए जाते हैं और किसी भी बाहरी व्यक्ति को अंदर आने की इज़ाज़त नहीं होती. शाम को जब हम काम से लौटते हैं, तो गांव के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर पहरा देते हैं.”

माओ जनजाति के अदाखो माओ (बाएं) और याइकोंगपाओ गांव के 42-वर्षीय किसान एम. खांगबा | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
माओ जनजाति के अदाखो माओ (बाएं) और याइकोंगपाओ गांव के 42-वर्षीय किसान एम. खांगबा | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

खांगबा ने बताया कि फिलहाल इस इलाके के नौ गांवों में शांति है. आईटी रोड के मुकाबले यहां हालात बेहतर हैं. आईटी रोड के किनारे लियांगमाई नगा समुदाय की बस्तियां हैं, जो अब तक कांगपोकपी में हुई हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई हैं.

माओ जनजाति के अदाखो माओ ने कहा, “हालांकि, कांगपोकपी, कामजोंग और उखरुल समेत कुछ जिलों में तांगखुल और लियांगमाई जनजातियों की बस्तियों वाले कुछ इलाकों में हिंसा ज्यादा भड़की है, लेकिन हमें चिंता है. हमें नहीं पता कि कल क्या होने वाला है…” वह कांगपोकपी के डाइली गांव में रहते हैं.

खांगबा ने कहा कि नागा समुदाय के लोगों के खिलाफ हुई हिंसा का असर उन सभी पर पड़ा है. उन्होंने कहा, “हम अपने सभी जनजातीय लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं…हम मिल-जुलकर रहते हैं और हमारा इतिहास भी एक है.” खांगबा थांगल यूनियन के प्रमुख हैं, जो कांगपोकपी के सभी थांगल नागा लोगों का प्रतिनिधित्व करती है.

माओ ने दिप्रिंट को बताया कि पहले वे नेशनल हाईवे-2 से होकर सेनापति तक बिना किसी रोक-टोक के जा सकते थे. उन्होंने कहा, “अब कोई भी खतरा उठाना नहीं चाहता. आम लोगों की आवाजाही पर असर पड़ा है.”

अगर कुकी बहुल जिलों में रहने वाले नागा लोग डर के माहौल में जी रहे हैं, तो उखरुल, सेनापति और तामेंगलॉन्ग जैसे नगा बहुल जिलों में रहने वाले कुकी लोगों के हालात भी बहुत अलग नहीं हैं. यही स्थिति कामजोंग और तेंगनौपाल जैसे उन जिलों में भी है, जहां नागा और कुकी दोनों समुदायों के लोग रहते हैं. इन जिलों में दोनों समुदायों की बस्तियां एक-दूसरे के आसपास होने के कारण तनाव बना हुआ है.

कांगपोकपी बाजार में गश्त लगाते सीआरपीएफ के जवान | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

कांगपोकपी बाजार में गश्त लगाते सीआरपीएफ के जवान | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंटपिछले शुक्रवार को कामजोंग के चस्साद गांव में 42 साल की एक कुकी महिला की गोली मारकर हत्या कर दी गई. यह घटना सुरक्षा बलों और हथियारबंद लोगों के बीच गोलीबारी के बाद हुई. इसके जवाब में कुकी ग्रामीणों ने पास के एक तांगखुल नागा गांव के कुछ घरों में आग लगा दी. इसके बाद दूसरे पक्ष ने जवाबी कार्रवाई करते हुए चस्साद में 22 साल के एक युवक की हत्या कर दी. जल्द ही हालात और बिगड़ गए और हिंसा पास के कांगपोकपी जिले के दो नागा गांवों तक फैल गई. वहां संदिग्ध कुकी हथियारबंद समूहों ने छह नगा आम नागरिकों की हत्या कर दी.

कांगपोकपी जिले के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि यहां छोटी-सी घटना भी जल्दी हिंसा में बदल जाती है, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में नागा और कुकी समुदाय के लोग एक-दूसरे के बहुत करीब रहते हैं. अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “जरा-सी चूक हुई, तो दोनों में से किसी भी पक्ष के निर्दोष आम लोगों की जान जा सकती है.”

सेनापति में ताफू जैसे नागा गांव भी हैं, जो सीमा के दूसरी ओर बसे कुकी गांव से कुछ ही मीटर की दूरी पर हैं. इन इलाकों में दोनों समुदायों के बीच अक्सर छोटी-मोटी झड़पें होती हैं, जो बढ़कर गोलीबारी और एक-दूसरे के घरों में आग लगाने तक पहुंच जाती हैं.

सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई अधिकारियों ने बताया कि दोनों पक्षों की ओर से भूमिगत संगठन भी इसमें शामिल हैं. सुरक्षा अधिकारियों में से एक ने कहा, “हमें नागा पक्ष की ओर से एनएससीएन (आईएम) के सदस्यों और कुकी पक्ष की ओर से कुकी नेशनल ऑर्गनाइजेशन-बर्मा (केएनओ-बी) जैसे अंडरग्राउंड हथियारबंद समूहों की भूमिका से जुड़ी जानकारी मिली है. ये लोग सीमा के दूसरी ओर से आते-जाते रहते हैं.”

नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक मुइवा) यानी एनएससीएन (आईएम) नगा समुदाय के सबसे बड़े संगठनों में से एक है. यह संगठन दो दशक से भी ज्यादा समय से भारत सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल है. हालांकि, 2015 में हुए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट के बावजूद इन वार्ताओं में अब तक ज्यादा प्रगति नहीं हुई है.

क्या ज़मीन इस संघर्ष की जड़ है?

सरकार और सुरक्षा व्यवस्था, दोनों से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, पहाड़ी इलाकों में ज़मीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद कुकी और नागा समुदायों के बीच संघर्ष की मुख्य वजहों में से एक है.

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, “दोनों समुदायों के बीच यह विवाद की सबसे बड़ी वजहों में से एक है. कुकी समुदाय का दावा है कि पहाड़ियों की ज़मीन उनकी है, जबकि नागा समुदाय का कहना है कि उनके पूर्वज इस ज़मीन के मूल मालिक थे. कुकी बाद में यहां आए और बस गए.”

उन्होंने आगे कहा, “आज तक ज़मीन का सही तरीके से सर्वे नहीं हुआ है.”

पिछले महीने दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में मणिपुर सरकार के दो उपमुख्यमंत्रियों में से एक, लोसी दिखो ने कहा था कि दोनों समुदायों के बीच संघर्ष का पुराना इतिहास रहा है. उन्होंने कहा, “दोनों समुदायों के बीच पिछली बार 1990 के दशक की शुरुआत में संघर्ष हुआ था, जो पांच साल तक चला. समस्या जमीन और अवैध प्रवासियों की है.”

सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े एक अधिकारी ने भी यही बात दोहराई. उन्होंने कहा, “कुकी पहाड़ियों में जगह-जगह बसे हुए हैं. वे जहां चाहते हैं, वहां अपना गांव बसा लेते हैं. नागा समुदाय ने इस पर आपत्ति जताई है. समस्या यह है कि कुकी और नागा समुदायों की मांगें एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं. दोनों के बीच सहमति बनने की कोई साझा गुंजाइश नहीं है.”

आपस में जुड़ा इतिहास

कांगपोकपी के याइकोंगपाओ गांव से करीब 16 किलोमीटर दूर बेथसाइदा गांव है. यहां कुकी समुदाय के लोगों की आबादी ज्यादा है. इसी गांव में चोंगपु किपगेन अपनी पत्नी टिंगनेइचोंग के साथ रहते हैं. उनकी पत्नी इंफाल के जी. पी. महिला कॉलेज में इतिहास विभाग में लेक्चरर रह चुकी हैं.

सेवानिवृत्त सिविल सेवा अधिकारी चोंगपु किपगेन अपनी पत्नी टिंगनेइचोंग के साथ, जो पहले लेक्चरर थीं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
सेवानिवृत्त सिविल सेवा अधिकारी चोंगपु किपगेन अपनी पत्नी टिंगनेइचोंग के साथ, जो पहले लेक्चरर थीं | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

4 मई 2023 को हिंसक भीड़ ने इंफाल के ओल्ड लमबुलाने इलाके में हमला किया था, जिसके बाद किपगेन का परिवार अपना घर छोड़कर भाग गया. वे कांगपोकपी आ गए, जहां उनका पुश्तैनी घर है. इस घटना से उनकी बहू को इतना गहरा सदमा लगा कि बाद के कई महीनों तक उन्हें चिंता और घबराहट की समस्या के लिए दवाएं लेनी पड़ीं.

किपगेन ने कहा, “हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे थे, लेकिन फिर एक नया संघर्ष शुरू हो गया. इसका कोई मतलब नहीं है. हम दोनों एक ही धर्म (ईसाई धर्म) को मानते हैं. हममें से कई लोगों के नगा समुदाय के साथ पारिवारिक रिश्ते हैं.”

उन्हें यह बात अच्छी तरह पता है. उनकी दादी तांगखुल नागा समुदाय से थीं. तांगखुल मणिपुर की सबसे बड़ी नागा जनजाति है. उन्होंने कहा, “मेरे दादा तामेंगलॉन्ग में रहते थे, जहां नागा समुदाय की आबादी ज्यादा है. वहीं उनकी मुलाकात मेरी दादी से हुई और उन्होंने उनसे शादी कर ली. मेरे पिता का जन्म भी वहीं हुआ था.”

उनकी पत्नी टिंगनेइचोंग के भी नागा रिश्तेदार हैं. उन्होंने कहा, “मेरी ननद तांगखुल समुदाय से हैं. इस संघर्ष के बावजूद हमने एक-दूसरे से बात करना बंद नहीं किया है. हम अक्सर बात करते हैं.”

किपगेन परिवार की तरह ऐसे कई लोग हैं, जिनके नागा समुदाय के लोगों से पारिवारिक रिश्ते हैं और जो इस संघर्ष की वजह समझ नहीं पा रहे हैं. किपगेन ने कहा, “यह अपने फायदे के लिए काम करने वाले लोगों की ओर से लोगों को बांटने और उन पर राज करने की जानबूझकर की गई कोशिश है.”

उनके मुताबिक, इस संकट का एकमात्र समाधान दोनों समुदायों के बीच बातचीत है. किपगेन ने कहा, “और सच कहूं तो ऐसा नहीं हो रहा है. जब तक बातचीत के लिए कोई रास्ता नहीं बनाया जाता और संवाद शुरू नहीं होता, तब तक तनाव बना रहेगा.”

उनकी पत्नी भी इस बात से सहमत थीं. उन्होंने कहा, “इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सभी समुदायों को अपने मतभेद भुलाकर एक साथ रहना सीखना होगा. यही एकमात्र समाधान है. आप हिंसा पर काबू तो पा सकते हैं, लेकिन जब तक तीनों समुदायों के बीच भरोसा नहीं होगा, तब तक हालात सामान्य नहीं होंगे.”

‘चुनाव दोधारी तलवार साबित हो सकते हैं’

मणिपुर विधानसभा के चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने हैं, लेकिन तीनों में से कोई भी समुदाय इसे लेकर उत्साहित नहीं है. उनका कहना है कि जब तक ज़मीन पर हालात नहीं सुधरते, तब तक चुनाव कराने का कोई मतलब नहीं होगा.

किपगेन ने कहा, “चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होने चाहिए. पहले भी ऐसे चुनाव हुए हैं, जब अंडरग्राउंड संगठनों ने लोगों पर अपने समर्थन वाले उम्मीदवारों को वोट देने का दबाव बनाया था. मौजूदा हालात को देखते हुए मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि इस बार स्थिति अलग होगी.”

मई 2023 के संघर्ष के बाद अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए और घाटी व पहाड़ी इलाकों के राहत शिविरों में रह रहे लोग चुनाव के बारे में पूछे जाने पर गुस्सा हो जाते हैं.

कांगपोकपी के फैजांग इलाके में अपने माता-पिता के साथ राहत शिविर में रह रहीं 23 साल की कुकी समुदाय की सेन्नू खोंगसाई ने कहा, “मैं पहली बार वोट डालने वाली हूं, लेकिन मुझे बताइए कि मेरे सामने क्या विकल्प हैं? एक ऐसी सरकार, जिसने हमें यहां छोड़ दिया और तीन साल से भी ज्यादा समय से यह भूल गई कि हमारा भी कोई अस्तित्व है. एक ऐसा विपक्ष, जो एक बार भी हमारी बात सुनने यहां नहीं आया. हमारे खर्च चलाने के लिए हमें हर दिन, हर व्यक्ति के हिसाब से 80 रुपये दिए जाते हैं…यहां रहना बहुत निराशाजनक है.”

कांगपोकपी जिले में फैजांग राहत शिविर | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
कांगपोकपी जिले में फैजांग राहत शिविर | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

मई 2023 में हिंसा भड़कने के बाद राहत शिविर में लाए जाने से पहले खोंगसाई इंफाल पश्चिम जिले के पहाड़ी गांव कांगचियुप में रहती थीं. फिलहाल वह बैंक की परीक्षाओं की तैयारी के लिए ऑनलाइन कोर्स कर रही हैं. उन्होंने कहा, “यहां करने के लिए कुछ भी नहीं है. मैं मणिपुर से बाहर जाना चाहती हूं.”

राज्यभर में, घाटी और पहाड़ी जिलों, दोनों जगहों पर लोगों के बीच यही भावना दिखाई देती है.

सेनापति के ताफू लियांगमेई गांव के सचिव अपी पामाई चाहते हैं कि सरकार पहले हालात सामान्य करे. उन्होंने कहा, “फिलहाल हम सुरक्षा बलों के काफिले के बिना इंफाल तक नहीं जा सकते. हमारे बच्चे पढ़ाई के लिए पास के जिले में नहीं जा सकते. ऐसे हालात में आप चुनाव कराना चाहते हैं? अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो राजनीतिक दलों के लिए प्रचार करना भी मुश्किल होगा.”

सेनापति के ताफू लियांगमेई गांव के सचिव अपी पामाई | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
सेनापति के ताफू लियांगमेई गांव के सचिव अपी पामाई | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

मणिपुर की पहाड़ियों में लोहे के गेट अनजान लोगों को गांवों में आने से रोक रहे हैं, लेकिन डर, दुख और भविष्य को लेकर अनिश्चितता अब भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ रही है. इन बैरिकेड्स और आपसी दुश्मनी के नीचे परिवारों के आपस में जुड़े रिश्तों और एक साझा धर्म का इतिहास छिपा है. हिंसा के कारण जब भरोसा टूट रहा है, तो सबसे बड़ी चुनौती शांति-व्यवस्था बहाल करना और पड़ोसियों के बीच रिश्तों को फिर से मजबूत करना है, ताकि चुनाव से पहले सार्थक बातचीत हो सके और हालात सामान्य हो सकें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मणिपुर में जातीय बंटवारे का असर प्रशासन पर, मैतेई, कुकी और नगा अधिकारियों के अलग-अलग इलाके


 

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