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Tuesday, 13 October, 2026
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मणिपुर में जातीय बंटवारे का असर प्रशासन पर, मैतेई, कुकी और नगा अधिकारियों के अलग-अलग इलाके

इंफाल, कांगपोकपी और सेनापति में कई सरकारी और पुलिस अधिकारियों ने बिना नाम बताए माना कि समुदायों के बीच बंटवारा इतना गहरा हो गया है कि अधिकारियों के बीच भी अलगाव हो गया है.

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इंफाल/कांगपोकपी/सेनापति: मणिपुर की पहाड़ियों में नगा बहुल जिले सेनापति के माउंट एवरेस्ट कॉलेज के वाइस-प्रिसिंपल गोनमेई मेथुआनलुंगपौ ने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें अपने काम के सबसे आसान प्रशासनिक कामों में से एक को पूरा करने में भी इतनी परेशानी होगी—यह सुनिश्चित करना कि कोई भी क्लास टीचर के बिना न रहे.

लेकिन मई 2023 में मणिपुर में शुरू हुआ तीन साल से ज्यादा पुराना जातीय संघर्ष, जो पहले गैर-आदिवासी मैतेई और आदिवासी कुकी-जो लोगों के बीच हुआ और फिर कुछ समय की शांति के बाद आदिवासी कुकी और नगा लोगों के बीच शुरू हो गया, ने उनकी यह क्षमता परख दी है कि वह कितनी चीज़ों को एक साथ संभाल सकते हैं.

गोनमेई ने कहा, “जटिलता देखिए. 2023 की गर्मियों में मैतेई और कुकी के बीच झड़प शुरू होने के तुरंत बाद सभी मैतेई शिक्षक चले गए. छात्र भी चले गए. हमने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे तैयार नहीं थे…उन्होंने कहा कि उन्हें सुरक्षित महसूस नहीं हो रहा था.”

मणिपुर यूनिवर्सिटी से जुड़े इस सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज में 150 से ज्यादा टीचर्स हैं, जिनमें करीब आधे मैतेई थे. वाइस-प्रिसिंपल ने कहा, “हमारे पास मैतेई टीचर्स की जगह कुकी और नगा टीचर्स को रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. हम बिना टीचर्स के क्लास नहीं चला सकते.”

कुछ समय बाद हालात ठीक होने लगे थे, लेकिन फरवरी में फिर तनाव बढ़ गया. इस बार कुकी और नगा आमने-सामने थे. उन्होंने कहा, “अब हम करीब 20 कुकी टीचर्स की जगह नगा टीचर्स को रख रहे हैं. ये कुकी टीचर्स हिंसा बढ़ने के बाद सेनापति छोड़कर चले गए.”

उन्होंने सवाल किया, “आप सोच सकते हैं? इसका कोई मतलब नहीं है. कोई कॉलेज या कोई भी शिक्षण संस्थान इस तरह कैसे चल सकता है?”

परीक्षा देने वाले कुकी-जो छात्र भी चले गए. गोनमेई ने कहा, “हमें मणिपुर विश्वविद्यालय से अनुरोध करना पड़ा कि वह कुकी छात्रों को जहां वे हैं, वहीं से परीक्षा देने की अनुमति दे.”

कॉलेज के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट विभागों में करीब 1,000 छात्र हैं और इनमें काफी संख्या कुकी छात्रों की थी.

कांगपोकपी के डैमडेई क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
कांगपोकपी के डैमडेई क्रिश्चियन कॉलेज के छात्र | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

अगर सेनापति के माउंट एवरेस्ट कॉलेज से कुकी चले गए हैं, तो कुकी बहुल जिले कांगपोकपी के एक निजी कॉलेज डैमडेई क्रिश्चियन कॉलेज में इसका उलटा हुआ है.

कॉलेज की उप-प्राचार्य पारमोई हाओकिप ने दिप्रिंट को बताया, “हमारे 50-55 शिक्षकों में से ज्यादातर मैतेई थे. आज हमारे पास उनमें से सिर्फ 25 शिक्षक बचे हैं. इसका हम पर बहुत बुरा असर पड़ा है.”

हाओकिप ने कहा कि विज्ञान के विषयों में मैतेई मजबूत हैं. उन्होंने कहा, “हम (कुकी) इस मामले में कमजोर हैं. मैतेई लोगों को विज्ञान से लगाव के लिए जाना जाता है. मैतेई शिक्षकों के जाने के बाद हमने उनकी जगह पांगल (मुस्लिम) और नेपाली शिक्षकों को रखा. लेकिन उनके पास विशेषज्ञता नहीं है.”

डैमडेई क्रिश्चियन कॉलेज की वाइस-प्रिसिंपल पारमोई हाओकिप का कहना है कि कॉलेज पहले इंफाल में मणिपुर विश्वविद्यालय से कुछ विषय विशेषज्ञों को अतिथि शिक्षक के तौर पर बुलाता था, लेकिन अब यह संभव नहीं है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
डैमडेई क्रिश्चियन कॉलेज की वाइस-प्रिसिंपल पारमोई हाओकिप का कहना है कि कॉलेज पहले इंफाल में मणिपुर विश्वविद्यालय से कुछ विषय विशेषज्ञों को अतिथि शिक्षक के तौर पर बुलाता था, लेकिन अब यह संभव नहीं है | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

हाओकिप ने बताया कि पहले कॉलेज इंफाल स्थित मणिपुर यूनिवर्सिटी से कुछ विषय विशेषज्ञों को अतिथि शिक्षक के तौर पर भी बुलाता था. उन्होंने कहा, “लेकिन अब वे नहीं आ सकते. अगर वे किसी को भेजते भी हैं, तो वह मैतेई नहीं, लेकिन विषय का विशेषज्ञ भी नहीं होता. इससे छात्रों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है.”

बिखरा हुआ प्रशासन

साढ़े तीन साल से चल रहे इस संघर्ष ने सिर्फ लोगों को ही अलग-अलग नहीं किया है, बल्कि शिक्षा संस्थानों, स्वास्थ्य सेवाओं, प्रशासन और शासन को भी जातीय आधार पर अलग कर दिया है.

दिप्रिंट ने इंफाल, कांगपोकपी और सेनापति में सिविल और पुलिस प्रशासन के कई अधिकारियों से बात की. उन्होंने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि समुदायों के बीच बंटवारा इतना गहरा हो गया है कि अधिकारियों के बीच भी अलगाव हो गया है.

इंफाल में तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने कहा, “हम आपस में अनौपचारिक रूप से बात करते हैं कि मणिपुर में तीन कैडर के अधिकारी हैं—घाटी के लिए मैतेई कैडर, कुकी कैडर और पहाड़ियों के लिए नगा कैडर.”

उन्होंने कहा, “इंफाल सचिवालय में, जहां सिविल प्रशासन का काम होता है, आपको ज्यादातर मैतेई अधिकारी और कर्मचारी और कुछ नगा अधिकारी मिलेंगे. आप चुड़ाचांदपुर (कुकी बहुल पहाड़ी जिला) जाएं तो आज वहां आपको सिर्फ कुकी अधिकारी मिलेंगे. मैतेई और नगा दोनों वहां से जा चुके हैं. इसी तरह नगा बहुल जिलों में नगा और शायद कुछ मैतेई अधिकारी मिलेंगे.”

हिंसा के पहले दौर में ज्यादातर हिंदू मैतेई घाटी की ओर चले गए, जहां गैर-आदिवासी लोग रहते हैं. ज्यादातर ईसाई कुकी आदिवासी इलाकों वाली पहाड़ियों में वापस चले गए. आदिवासी नगा इस संघर्ष में तटस्थ रहे थे.

लेकिन इस साल की शुरुआत में हालात बदल गए, जब संघर्ष पहाड़ी जिलों में कुकी और नगा लोगों के बीच होने लगा. इससे एक नई समस्या पैदा हुई और कुकी लोग सेनापति, उखरुल और तामेंगलोंग जैसे नगा बहुल जिलों से जाने लगे. वहीं, नगा लोग चूड़ाचांदपुर और कांगपोकपी जैसे कुकी बहुल जिलों से बाहर चले गए.

सेनापति में तैनात एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “अब एक और तरह का अलगाव हो गया है.” उन्होंने कहा कि यह संघर्ष का चिंताजनक पहलू है.

उन्होंने कहा, “आपको प्रशासन और शासन में जातीयता को नहीं आने देना चाहिए. सुरक्षा, नौकरशाही, शिक्षा आदि को इस तरह अलग होने देना राज्य सरकार की बहुत बड़ी गलती है.”

कांगपोकपी जिले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के कार्यालय में लगा लकड़ी का बोर्ड, जिस पर वहां तैनात अधिकारियों के नाम लिखे हैं, इस बंटवारे को साफ दिखाता है.

कांगपोकपी जिले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के कार्यालय में लगा लकड़ी का बोर्ड | फोटो: मौसमी दास गुप्ता/दिप्रिंट
कांगपोकपी जिले में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के कार्यालय में लगा लकड़ी का बोर्ड | फोटो: मौसमी दास गुप्ता/दिप्रिंट

बोर्ड से पता चलता है कि ASP के कार्यालय में पी. किरणकुमार सिंह, जो मैतेई थे, मार्च 2019 से अक्टूबर 2020 तक तैनात थे. यह कुकी-मैतेई झड़प शुरू होने से ढाई साल पहले की बात है. उनके बाद करीब दो महीने के लिए एक कुकी अधिकारी तैनात किया गया. इसके बाद नगा अधिकारी थोलू रॉकी करीब तीन साल तक वहां तैनात रहे. अक्टूबर 2025 से इस कार्यालय में कुकी अधिकारी एस.एल. कामखोआओ तैनात हैं.

कुछ समय पहले तक सेनापति पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी एन. किपगेन थे, जो कुकी थे. इंफाल में तैनात एक IPS अधिकारी ने बताया, “अब यह संभव नहीं है. चुराचांदपुर में एक मैतेई सब-इंस्पेक्टर था, लेकिन जिलों के जातीय आधार पर बंटने के बाद यह मुश्किल हो गया है. हालांकि पुलिस बल में किसी के मन में कोई बुरी भावना नहीं है, लेकिन लोग ऐसे जिले में जाने से हिचकते हैं जहां कोई दूसरा समुदाय बहुसंख्यक है.”

दिप्रिंट ने पहाड़ी और मैदानी इलाकों में तैनात कई आईएएस अधिकारियों से बात की. उन्होंने बताया कि इस बंटवारे का प्रशासन पर किस तरह असर पड़ा है.

एक पहाड़ी जिले के डिप्टी कमिश्नर ने कहा, “कुछ छोटे सरकारी विभाग ऐसे हैं, जो व्यावहारिक रूप से पूरी तरह बंद हो गए हैं. इनमें कोई अधिकारी नहीं है, क्योंकि प्रभारी अधिकारी, जो मैतेई थे, कुकी-मैतेई संघर्ष शुरू होने के बाद इंफाल लौट गए. हम उनकी जगह किसी और को नहीं ढूंढ पाए हैं.”

उन्होंने आगे कहा कि कई कुकी और नगा अधिकारी, जो पहाड़ियों में अपने घर लौट गए हैं, उनके पास व्यावहारिक रूप से कोई काम नहीं है क्योंकि खाली पद नहीं हैं. उन्होंने कहा, “…वहां पहले से ही कोई काम कर रहा है.” उन्होंने बताया कि कुछ अधिकारी घर से काम करते हैं. उन्होंने कहा, “अधिकारियों को काम में लगाए रखना हमारे लिए भी एक चुनौती है. आखिरकार, उन्हें सरकार से वेतन मिल रहा है.”

सेनापति शहर के सेनापति बाजार का एक सामान्य दृश्य | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट
सेनापति शहर के सेनापति बाजार का एक सामान्य दृश्य | फोटो: प्रवीण जैन/दिप्रिंट

इंफाल में तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने कहा कि संघर्ष ने राज्य के हर सरकारी विभाग को प्रभावित किया है. उन्होंने कहा, “उदाहरण के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) को ही देख लीजिए. इनमें से कई पर बहुत बुरा असर पड़ा है. उखरुल और सेनापति जैसे नगा बहुल जिलों में तैनात कुकी लोग अब वहां नहीं हैं. मैतेई लोग भी वहां जाने से हिचकते हैं क्योंकि सेनापति के किसी PHC तक पहुंचने के लिए उन्हें कुकी बहुल कांगपोकपी जिले से होकर गुजरना पड़ता है. एक हद के बाद हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते.”

ऐसा नहीं है कि सरकार समुदायों के बीच दूरी कम करने और हाईवे पर लोगों की आवाजाही को आसान बनाने के लिए कुछ नहीं कर रही है.

अब पुलिस की गाड़ियां उन यात्रियों को सुरक्षा देती हैं जो इंफाल या पहाड़ी जिलों की ओर जा रहे हैं. इंफाल में तैनात आईएएस अधिकारी ने कहा, “कुछ ही सही, लेकिन कुकी लोग पुलिस की सुरक्षा में इंफाल एयरपोर्ट जा रहे हैं. करीब एक साल पहले तक ऐसा सोचना भी मुश्किल था. इसी तरह मैतेई लोग कांगपोकपी और सेनापति से होकर दीमापुर रेलवे स्टेशन जा रहे हैं.”

एक वरिष्ठ IPS अधिकारी ने कहा कि पुलिस में बहुत छोटे स्तर पर ही सही, कुछ एकीकरण शुरू हुआ है. नाम न बताने की शर्त पर उन्होंने कहा, “हमने हाल ही में कुछ मैतेई पुलिस कर्मचारियों को उखरुल और सेनापति में तैनात किया है. लेकिन हां, संख्या बहुत कम है. तीनों समुदायों के बीच भरोसे की कमी है. दूरी कम करने के लिए और ठोस कदम उठाने की जरूरत है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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