चंडीगढ़: 1999 में भिवानी के एक स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक ने स्टाफ रूम में एक बोर्ड लगाया था. उस पर उन्होंने अखबारों की कतरनें चिपकाई थीं. हरियाणा के जिस सैनिक की कारगिल युद्ध में मौत हुई थी, उनके लिए एक कतरन लगाई गई थी.
यह शिक्षक ओम प्रकाश धनखड़ थे. उस समय वह हरियाणा में बीजेपी के महासचिव भी थे. 27 साल बाद, उस बोर्ड पर लिखे नामों में से एक सैनिक की पत्नी को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किया गया है.
सुधा यादव उस समय 34 साल की थीं. वह बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट सुखबीर सिंह यादव की पत्नी थीं, जिनकी कारगिल युद्ध में मौत हो गई थी.
बीजेपी की पूर्व सांसद सुधा यादव का नाम सोमवार को भारत के राष्ट्रपति के अतिरिक्त सचिव अनीता सी. मेश्राम की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में राज्यपाल नियुक्त किए गए छह नेताओं की सूची में शामिल है. अन्य पांच नेताओं में केरलम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर, तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ, ओडिशा के राज्यपाल ब्रज मोहन राम, उत्तराखंड के राज्यपाल ढाल सिंह बिसेन और सिक्किम के राज्यपाल दुष्यंत गौतम शामिल हैं.
दिल्ली से आया फोन
ओम प्रकाश धनखड़ ने दिप्रिंट को बताया कि 1999 के लोकसभा चुनाव कारगिल युद्ध के तुरंत बाद हुए थे. धनखड़ 2014 से 2019 तक हरियाणा सरकार में मंत्री रहे और 2019 से 2023 तक बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे.
उस समय नरेंद्र मोदी बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) थे और हरियाणा के प्रभारी थे. पार्टी को राज्य की 10 लोकसभा सीटों में से पांच सीटें मिली थीं. उसकी सहयोगी पार्टी ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) ने बाकी पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था.
मोदी ने धनखड़ को फोन किया और कहा कि वह एक सीट से कारगिल युद्ध में मारे गए सैनिक की पत्नी को चुनाव लड़ाना चाहते हैं. उन्होंने धनखड़ से किसी उपयुक्त नाम का सुझाव देने को कहा.
चूंकि धनखड़ अपने स्कूल के बोर्ड पर मारे गए सैनिकों का रिकॉर्ड रख रहे थे, इसलिए उनके पास हर सैनिक की जानकारी थी.
धनखड़ ने कहा, “कारगिल युद्ध में सबसे पहले अपनी जान देने वाले भिवानी जिले के चरखी गांव के सुरेश थे. दूसरे बीएसएफ के डिप्टी कमांडेंट सुखबीर सिंह यादव थे.”
युद्ध में मारे गए कई सैनिकों की शादी नहीं हुई थी. कुछ सैनिकों की पत्नियां पीछे रह गई थीं, जिनकी उम्र 20 से 24 साल के बीच थी. सुधा यादव की उम्र करीब 34 साल थी और उन्होंने पीएचडी की थी.
धनखड़ ने कहा, “मैंने मोदी जी से कहा कि अपनी समझदारी और शिक्षा के कारण वह सबसे अच्छी उम्मीदवार होंगी.”
मोदी के निर्देश पर धनखड़ ने अपने पुराने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथी राम अवतार लांबा को सुधा यादव के घर भेजा. लांबा ने उनकी योग्यता समेत दूसरी जानकारियों की पुष्टि की.
फैक्स, क्वालिस और एक अलग योजना
धनखड़ ने बताया कि मोदी उस समय भी तकनीक का काफी इस्तेमाल करते थे. उन्होंने पार्टी के सभी पदाधिकारियों से अपने घर में फैक्स मशीन रखने को कहा था.
एक दिन मोदी की ओर से फैक्स आया. उसमें धनखड़ को पार्टी के उपाध्यक्ष कैलाश शर्मा के साथ सुधा यादव से मिलने के लिए कहा गया था.
धनखड़ ने बताया, “हम शर्मा की क्वालिस गाड़ी से गए और उन्हें पार्टी के प्रस्ताव के बारे में बताया, लेकिन वह अनुकंपा के आधार पर हरियाणा सिविल सेवा (एचसीएस) अधिकारी की नौकरी पाने की इच्छुक थीं.”
उस शाम कैलाश शर्मा और धनखड़ ने मोदी को अलग-अलग रिपोर्ट भेजीं. शर्मा ने लिखा कि सुधा यादव एचसीएस में शामिल होने के लिए तैयार थीं. वहीं, धनखड़ ने लिखा कि वह दोबारा विचार करेंगी और चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाएंगी.
कुर्ते में जमा हुए 12.5 लाख रुपये
धनखड़ ने बताया कि मोदी ने गुरुग्राम में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक सभा से सुधा यादव के चुनाव प्रचार की शुरुआत की. इस दौरान उन्होंने भावुक अपील की.
मोदी ने वहां मौजूद लोगों को बताया कि जब भी वह घर जाते थे, तो उनकी मां उन्हें आशीर्वाद के तौर पर 10 या 20 रुपये देती थीं. वह इस पैसे को कभी खर्च नहीं करते थे. एक बार उन्होंने यह पूरी रकम पार्टी के लिए भवन बनाने में दे दी थी. अब वह सुधा यादव के चुनाव के लिए अपने पास मौजूद सारी रकम देंगे.
इसके बाद उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेता रामबिलास शर्मा को पैसे इकट्ठा करने के लिए बुलाया. शर्मा ने अपने कुर्ते का एक हिस्सा झोली की तरह आगे किया और मोदी ने उसमें अपने पैसे डाल दिए. इसके बाद वहां मौजूद लोग भी आगे आए और अपनी क्षमता के अनुसार पैसे देने लगे. कुछ ही मिनटों में 12.5 लाख रुपये इकट्ठा हो गए.
चुनाव प्रचार को उस समय और गति मिली, जब एक मारे गए सैनिक की पत्नी रैली में मंच पर आईं और सुधा यादव को गले लगा लिया. दोनों महिलाएं रोने लगीं. टाइम्स ऑफ इंडिया समेत कई अखबारों ने इस तस्वीर को प्रकाशित किया.
महेंद्रगढ़ से चुनाव लड़ रहीं सुधा यादव ने कांग्रेस के राव इंद्रजीत सिंह को 1.39 लाख से ज्यादा वोटों से हराया. यह उनका पहला चुनाव था और राजनीति में उनका पहला साल था. बीजेपी-इनेलो गठबंधन ने सभी 10 सीटें जीत ली थीं.
पहली जीत के बाद
सुधा यादव 2004 और 2009 में हुए अगले दोनों चुनाव हार गईं. 2014 तक उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी इंद्रजीत सिंह भी बीजेपी में शामिल हो गए थे.
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सुधा यादव को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए पार्टी का टिकट नहीं मिला. हालांकि, पार्टी ने उन्हें दूसरी जिम्मेदारियां दीं. जुलाई 2015 में उन्हें बीजेपी के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मोर्चा का राष्ट्रीय प्रभारी बनाया गया. 2019 से 2022 तक वह राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सदस्य रहीं.
अगस्त 2022 में उन्हें बीजेपी के संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया. सुषमा स्वराज के बाद वह इस बोर्ड में शामिल होने वाली दूसरी महिला थीं.
राज्यसभा सांसद और हरियाणा बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला ने कहा कि सुधा यादव हरियाणा में पार्टी के सबसे सम्मानित नेताओं में शामिल हैं. उन्होंने कहा कि 2014 के बाद उन्हें चुनाव नहीं लड़ाया गया, लेकिन संगठन में उन्हें कई जिम्मेदारियां दी गईं.
सुधा यादव ने 1987 में आईआईटी रुड़की से रसायन विज्ञान में एमएससी और 1992 में पीएचडी की. उन्हें राष्ट्रपति गाइड पुरस्कार भी मिल चुका है. उनके दो बच्चे हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ‘विकसित भारत 2047’ एक ऐसा नारा है जो अपने ही मकसद को नाकाम करता है, मोदी को नए नारे की जरूरत है