नई दिल्ली: पिछले कुछ हफ्तों तक देशभर में चले युवा आंदोलन की धूल अब बैठने लगी है. इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कुछ बड़े और अलग-अलग सुर वाले बयान सामने आए हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग नेताओं के ये बयान बीजेपी को आलोचना के साथ-साथ अपनी रणनीति सुधारने की सलाह भी दे रहे हैं.
RSS प्रमुख मोहन भागवत से लेकर बीजेपी के वरिष्ठ नेता और स्वयंसेवक मुरली मनोहर जोशी, मुरलीधर राव और संघ विचारक रतन शारदा तक, संघ के कई वरिष्ठ नेता इस बात से असहज दिखे कि सरकार ने युवा प्रदर्शनकारियों से जिस तरह निपटा, वह सही नहीं था.
पिछले हफ्ते मोहन भागवत ने युवा प्रदर्शनकारियों का नाम लिए बिना कहा कि नई पीढ़ी सवाल पूछती है और हर बात का तर्क चाहती है. उन्होंने लोगों से कहा कि युवाओं को आदेश देने के बजाय उनसे बातचीत करनी चाहिए.
‘समकालीन मातृत्व’ विषय पर आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय बैठक के समापन सत्र में बोलते हुए भागवत ने कहा कि युवाओं से जुड़ने के तरीके और शैली में बदलाव लाने की जरूरत है.
RSS पर कई किताबें लिख चुके रतन शारदा ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बीजेपी की मीडिया टीम और आईटी सेल की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि वामपंथी इकोसिस्टम के अच्छी तरह तैयार किए गए नफरत वाले नैरेटिव का जवाब देने के लिए बीजेपी पूरी तरह विफल रही.
हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि यह उनका “निजी विचार” है और इसका RSS से कोई लेना-देना नहीं है.
मुरली मनोहर जोशी ने भी पिछले हफ्ते प्रदर्शन का समर्थन किया और ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान बल प्रयोग की आलोचना की. उन्होंने X पर लिखा कि इस तरह का बल प्रयोग “विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य से भारतीय समाज के बड़े हिस्से को दूर कर देगा.”
जोशी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री थे. उस समय उन्हें शिक्षा में संघ के सांस्कृतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक विरोधियों की आलोचना झेलनी पड़ी थी. 2014 के बाद से जोशी पार्टी और सरकार दोनों में किसी भूमिका में नहीं हैं.
पूर्व बीजेपी महासचिव और पूर्व प्रचारक मुरलीधर राव ने भी X पर एक अप्रत्यक्ष संदेश लिखा. उन्होंने कहा, “सरकार बहुमत के जनादेश से बन सकती है, लेकिन वह जनता की सहमति से ही लंबे समय तक चलती है.”
इसी बीच जब हिंदुत्व विचारक टी.जी. मोहनदास ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बयान देते हुए कहा कि अगर उनके हाथ में सत्ता होती तो वह प्रदर्शनकारियों को “गोली मार देते”, तो RSS ने तुरंत इस बयान की निंदा की और खुद को इससे अलग कर लिया.
RSS के वरिष्ठ पदाधिकारी के.बी. श्रीकुमार ने कहा कि मोहनदास RSS के पदाधिकारी नहीं हैं और यह उनकी “निजी सोच” है. उन्होंने कहा कि RSS उनके बयान से सहमत नहीं है और “ऐसे विचारों की सबसे कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए.”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि NEET-UG 2026 पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में देशभर, खासकर नई दिल्ली में हुए बड़े प्रदर्शनों के बीच आए ये बयान, बीजेपी सरकार के लिए आलोचना भी हैं और सुधार की सलाह भी.
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में साउथ एशिया प्रोग्राम के वरिष्ठ फेलो और निदेशक मिलन वैष्णव का कहना है कि संघ के भीतर भी यह चिंता है कि सरकार आम लोगों, खासकर युवाओं से काफी दूर हो गई है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैं इन बयानों को ऐसे संकेत मानता हूं जिनका मकसद सत्तारूढ़ पार्टी को ज्यादा संवाद करने वाला, ज्यादा खुला और कम बंद दायरे में रहने वाला बनाना है. समय के साथ सत्ता में रहने वालों के लिए अपने ही दायरे में सिमट जाना और बढ़ जाता है.”
ब्राउन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर अशुतोष वार्ष्णेय का भी कहना है कि RSS अपनी मातृ संस्था की भूमिका निभाते हुए बीजेपी को सलाह दे रहा है.
उनका कहना है कि ये बयान “सिर्फ अप्रत्यक्ष आलोचना नहीं, बल्कि सरकार ने युवाओं के साथ जिस तरह व्यवहार किया, उसकी सीधी आलोचना हैं. जब RSS बीजेपी की आलोचना करता है तो वह कभी यह नहीं कहता कि बीजेपी ने उसकी विचारधारा से धोखा किया है. वह हमेशा इशारों में बात करता है. यह आलोचना भी है और सुझाव भी.”
स्वराज्य पत्रिका के पूर्व संपादकीय निदेशक और वरिष्ठ पत्रकार आर. जगन्नाथन का कहना है कि इन बयानों से साफ है कि इस मुद्दे पर अलग राय है और यह संदेश भी कि बीजेपी प्रदर्शन को बेहतर तरीके से संभाल सकती थी.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “बीजेपी और RSS को हमेशा एक जैसा नहीं समझना चाहिए. दोनों कई मुद्दों पर मिलकर काम करते हैं, लेकिन हर मुद्दे पर उनकी राय एक जैसी नहीं होती.”
उन्होंने कहा, “भागवत, शारदा, राव और जोशी के बयान बताते हैं कि RSS और बीजेपी इस बात पर अलग सोच रखते हैं कि हालात को कैसे संभाला जाना चाहिए. RSS सलाह देने की भूमिका में है. वह कुछ भी कह सकता है. लेकिन सरकार चलाने की जिम्मेदारी बीजेपी की है, इसलिए फैसला उसे ही लेना होगा.”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि यह सरकार को अप्रत्यक्ष सलाह है कि हर काम सिर्फ कानून और सरकारी फैसलों से नहीं हो सकता. लोगों से लगातार बात करनी पड़ती है. बातचीत से कई मतभेद अपने आप कम हो जाते हैं, चाहे दोनों पक्ष पूरी तरह सहमत न भी हों.”
उन्होंने कहा कि एक महीने तक चले आंदोलन के बाद “RSS के लिए यह सही समय है कि वह बीजेपी से कहे कि वह अपनी कुछ गलतियों पर खुद भी नजर डाले.”
युवाओं की ‘बेफिक्र भाषा’
युवा आंदोलन की सबसे ज्यादा आलोचना प्रदर्शनकारियों की भाषा को लेकर हुई. प्रदर्शन के दौरान हास्य और मीम्स के साथ-साथ सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ गालियां और अपमानजनक टिप्पणियां भी की गईं.
वार्ष्णेय इसे युवाओं की “बेपरवाह भाषा” बताते हुए कहते हैं, “जिस तरह खासकर युवा महिलाओं ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, मुझे लगा था कि RSS इसे ‘भारतीय संस्कृति के खिलाफ’ बताएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं कहा गया.”
इसके बाद वार्ष्णेय ने भागवत के बयान को “सबसे महत्वपूर्ण” बताया.
उन्होंने कहा, “भागवत का कहना है कि पहले की पीढ़ी अपने माता-पिता और बड़ों की बात मानती थी. लेकिन आज की पीढ़ी ऐसा नहीं करती. वह कह रहे हैं कि हमें इसे स्वीकार करना होगा और उनसे संवाद करना होगा. यह बहुत दिलचस्प बात है.”
वार्ष्णेय के मुताबिक यह बयान RSS की ‘प्रचार’ और ‘प्रचारक’ की परंपरा को फिर से मजबूत करने की अपील है, जो उसकी कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा है.
उन्होंने कहा, “विचार यह है कि प्रचार और प्रचारकों के जरिए युवाओं की सोच बदली जाए. प्रचारक RSS की रणनीति का सबसे अहम हिस्सा हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य युवाओं के मन को बदलना है, ताकि एक दिन हिंदू राष्ट्र का सपना पूरा हो सके.”
उन्होंने कहा, “अगर युवा इतने नाराज हैं कि सोशल मीडिया पर इस तरह की भाषा और तस्वीरों का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो यह प्रचार और प्रचारकों की विफलता है.”
उनके मुताबिक इसलिए RSS युवाओं से जुड़ने और प्रचार करने के नए तरीके अपनाने की बात कर रहा है, “क्योंकि लक्ष्य युवाओं की सोच को बदलना ही है.”
शारदा के ट्वीट पर जगन्नाथन ने कहा कि यह “सबसे तीखी टिप्पणी” थी.
अपने पोस्ट में शारदा ने लिखा कि बीजेपी मीडिया का “जमीनी हकीकत से कोई जुड़ाव नहीं है. साफ है कि कोई फीडबैक सिस्टम भी नहीं है. महीनों से बढ़ रहे युवाओं के गुस्से को नहीं समझा गया. सिर्फ NEET नहीं, बल्कि कई मुद्दों पर नाराजगी थी.”
उन्होंने कहा कि NEET “ऊंट की कमर तोड़ने वाली आखिरी कड़ी” था. उन्होंने “लेफ्ट इकोसिस्टम के अच्छी तरह तैयार किए गए नैरेटिव का जवाब देने में पूरी नाकामी” की बात कही और लिखा कि मीडिया टीम “मीम्स और व्हाटअबाउटरी से आगे नहीं बढ़ पाई.”
शारदा ने अपने पोस्ट का बचाव करते हुए कहा, “मेरे जैसे लोग एक्सेल शीट या PPT नहीं, बल्कि जमीनी अनुभव के आधार पर बात करते हैं. 2024 में मेरी आलोचना बीजेपी के बहुत काम आई थी. मैं राष्ट्रवादी ताकतों की सफलता के लिए संघर्ष करता रहूंगा, बीजेपी का समर्थन करूंगा, लेकिन जहां जरूरत होगी वहां बोलूंगा.”
जगन्नाथन ने कहा कि शारदा की टिप्पणी “ज्यादा महत्वपूर्ण और ज्यादा सीधी” थी.
उन्होंने कहा, “संचार का मतलब है कि आप अपने लक्षित लोगों पर ध्यान दें. मेरा मानना है कि शारदा बीजेपी मीडिया टीम से कहना चाहते हैं कि आप अपने नेताओं को खुश करने में लगे हैं, जबकि आपको उन लोगों से बात करनी चाहिए जिन तक आपका संदेश पहुंचना चाहिए.”
‘समझदारी भरी आवाजें’
कुछ विशेषज्ञ इन बयानों को अलग राय नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेताओं की “समझदारी भरी आवाजें” मानते हैं.
हिंदू कॉलेज में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले प्रो. चंद्रचूड़ सिंह का कहना है कि युवाओं की नाराजगी की असली वजह सरकार के विजन और उसके लागू होने के तरीके के बीच का अंतर है.
उन्होंने कहा कि युवाओं की शिकायतें सही हैं. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के जरिए शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए गंभीर कदम उठाए हैं. उनके मुताबिक समस्या नीति में नहीं, बल्कि उसे लागू करने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने में है.
उन्होंने कहा, “अगर आपको याद हो तो मोदी जी ने 2014 का अभियान SRCC से शुरू किया था. कहीं न कहीं उस जुड़ाव को फिर से मजबूत करने की जरूरत है. शायद सरकार को लगा कि NEP लागू करना ही काफी है. लेकिन अब सिर्फ परीक्षा सुधार नहीं, बल्कि शिक्षा संस्थानों के संचालन पर भी ध्यान देना चाहिए.”
सिंह का कहना है कि अलग-अलग नेताओं के ये बयान “समझदारी भरी आवाज” हैं, जो सरकार के लंबे समय के लक्ष्यों को मजबूत करते हैं, उनके खिलाफ नहीं जाते.
उन्होंने कहा, “मोहन भागवत और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं की तरफ से यह नेक नीयत से दी गई चेतावनी है. मुझे लगता है कि बीजेपी और सरकार के लिए इस सलाह पर ध्यान देना फायदेमंद होगा. यह अलग राय लग सकती है क्योंकि लोगों को लगता है कि RSS दबाव बनाने वाला संगठन है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता.”
उन्होंने कहा, “यह एक शुभचिंतक की आवाज है, जो सरकार की सफलता चाहता है.”
दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा का भी कहना है कि वह इन बयानों को बीजेपी के भीतर मतभेद नहीं मानते.
उन्होंने कहा, “मुरली मनोहर जोशी या मोहन भागवत की बातों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सलाह की तरह देखना चाहिए. उन्हें लगता है कि यह पार्टी और सरकार के लिए मुश्किल समय है और उन्हें सोच-समझकर कदम उठाने चाहिए.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “इनमें से कोई भी बयान ऐसा नहीं है जिसे सरकार के खिलाफ खुला विद्रोह या बड़ा मतभेद कहा जाए.”
वर्मा ने कहा कि पिछले एक महीने से प्रदर्शन करने वालों में ज्यादातर युवा, मध्यम वर्ग और उनके माता-पिता थे, जो बीजेपी का स्वाभाविक समर्थन आधार माने जाते हैं.
उन्होंने कहा, “अगर आपके अपने समर्थन आधार में असंतोष दिखता है, तो स्वाभाविक है कि कुछ लोग इस पर आवाज उठाएंगे.”
वर्मा ने कहा कि यह आंदोलन ऐसे समय हुआ जब बीजेपी सरकार आर्थिक चिंता और राम मंदिर परिसर में चोरी के आरोप जैसे दूसरे मुद्दों का भी सामना कर रही थी.
उन्होंने कहा, “ऐसे में कुछ लोग जरूर कहेंगे कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और हमें सावधान रहने की जरूरत है. यानी यह एक तरह की समझदारी भरी सलाह है.”
‘शांति के नीचे उठती हलचल’
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ये बयान पार्टी के अंदर मौजूद अलग-अलग गुटों की आवाज़ को सामने लाते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई का कहना है कि राजनीतिक दलों में कुछ न कुछ असहमति और बेचैनी हमेशा रहती है. लेकिन जब कोई पार्टी सत्ता में हो और किसी एक नेता का मजबूत प्रभाव हो, तब ये आवाजें अक्सर खुलकर सामने नहीं आतीं.
उन्होंने कहा, “लेकिन जब संकट की स्थिति आती है, तब ये सारी आवाजें सुनाई देने लगती हैं. जरूरी नहीं कि ये लोग किनारे कर दिए गए हों, लेकिन उनकी अपनी राय होती है, उनका जमीर होता है, अपनी बात पर टिके रहने का साहस होता है और सही बात को सही कहने की हिम्मत होती है. राजनीति और लोकतंत्र के नजरिए से यह अच्छी बात है, क्योंकि इससे नेतृत्व पर कुछ हद तक नियंत्रण बना रहता है.”
किदवई ने पार्टी के अंदर उत्तराधिकार और अलग-अलग गुटों के मुद्दे की ओर भी इशारा किया.
उन्होंने कहा, “इस बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता. कई लोग आगे आने की दौड़ में हैं और इसी वजह से पार्टी के अंदर अलग-अलग गुट हैं. हर कोई अपने भविष्य को देख रहा है. और इसमें RSS के लोगों की भूमिका बहुत अहम है.”
उन्होंने कहा, “पहले बीजेपी का संगठन बहुत अनुशासित माना जाता था. लेकिन अब बीजेपी के विधायी दल में करीब 20 प्रतिशत लोग बाहर से आए हुए हैं. ऊपर से सब कुछ शांत और सामान्य दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर हलचल है. यही वजह है कि ऐसी आवाजें सुनाई दे रही हैं.”
वर्मा ने भी पार्टी के अंदर गुटबाजी की संभावना की बात कही.
उन्होंने कहा, “हर पार्टी में अलग-अलग गुट होते हैं. किसी भी पार्टी में अलग-अलग हित वाले लोग होते हैं. इसलिए जब पार्टी का मुख्य और सबसे मजबूत गुट कमजोर दिखने लगता है, तब दूसरे लोगों की आवाजें भी सामने आने लगती हैं.”
उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह नहीं है कि हाल में ऐसे बयान देने वाले लोग बीजेपी के किसी अलग गुट से ही जुड़े हैं. हो सकता है जुड़े हों, हो सकता है नहीं भी. लेकिन ये सभी पार्टी के अलग-अलग दबाव समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे अब भी लगता है कि ये आवाजें सरकार की छवि खराब करने के लिए नहीं उठी हैं. इनका मकसद ज्यादा चिंता जताना है.”
किदवई ने RSS और बीजेपी के रिश्ते को दार्शनिक और राजा के रिश्ते जैसा बताया.
उन्होंने कहा, “जब दार्शनिक की बात नहीं सुनी जाती, या उसकी समझदारी भरी सलाह पर ध्यान नहीं दिया जाता, तब वह अलग तरीके से बोलना शुरू करता है. ताकि राजा को यह संदेश दे सके कि मेरी बात भी सुनो.”
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