Thursday, 7 July, 2022
होमराजनीतिराजा, शिक्षाविद, प्रधानमंत्री, उपप्रधान मंत्री और किसान नेता- 7 जाट हस्तियां जिन्होंने भारत को आकार दिया

राजा, शिक्षाविद, प्रधानमंत्री, उपप्रधान मंत्री और किसान नेता- 7 जाट हस्तियां जिन्होंने भारत को आकार दिया

पीएम मोदी द्वारा जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर यूपी में एक विश्वविद्यालय की घोषणा किए जाने के बाद जाट राजनीति एक बार फिर से चर्चा में आ गई है. यहां पेश है इस समुदाय के कुछ अन्य प्रभावशाली हस्तियों की जानकारी-

Text Size:

नई दिल्ली: पिछले हफ्ते, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जाट आइकन राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर अलीगढ़ में एक नए विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी. यह कदम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 2019 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की योजना संबंधी घोषणा किए जाने के दो साल बाद उठाया गया है, और इसे अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों- जो मोदी सरकार के तीन कृषि कानूनों की वजह से गुस्से से भरे पड़े हैं- का दिल जीतने के लिए भाजपा के एक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.

इस विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने के बाद दिए गये अपने भाषण में, पीएम मोदी ने कहा कि उनकी सरकार छोटे किसानों को सशक्त बनाने के प्रयास कर रही है और उन्होंने सर छोटूराम और पूर्व पीएम चौधरी चरण सिंह जैसे अन्य जाट हस्तियों के नामों का भी ज़िक्र किया. अभी यह देखा जाना बाकी है कि क्या यह सब इस मतदाता समूह को शांत करने के लिए पर्याप्त होगा? ख़ासकर तब जब कि चरण सिंह के पोते और राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी भी उसी वोट बैंक की ताक में हैं.

ऐसा कहा जाता है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों और मुसलमानों के बीच हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक भूमिका निभाई थी. हालांकि, अब जाट समुदाय कृषि कानूनों के खिलाफ एकजुट दिखता है.

दिप्रिंट ने इस समुदाय से आने वाले कुंवर नटवर सिंह और चौधरी बीरेंद्र सिंह जैसे नेताओं से बात की, जिन्होंने कहा कि कृषि कानूनों के खिलाफ मौजूदा विरोध सांप्रदायिक सीमाओं से परे है क्योंकि ये पूरे जाट कृषक समुदाय को प्रभावित करते हैं.

पूर्व राजनयिक और केंद्रीय विदेश मंत्री नटवर सिंह, जो राजस्थान में जाटों के गढ़ भरतपुर से आते हैं और जिन्होने जाट राजा सूरज मल पर एक किताब भी लिखी है, ने कहा, ‘भाजपा जाटों को लुभाने की कोशिश कर रही है.’

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

उन्होंने कहा, ‘यह कदम (महेंद्र प्रताप के नाम पर एक विश्वविद्यालय शुरू करना) एक शैक्षणिक कृत्य से कहीं अधिक राजनीतिक चाल है,’ लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह विश्वविद्यालय ‘इस असाधारण व्यक्ति’ के लिए एक स्थायी श्रद्धांजलि के रूप में हमेशा खड़ा रहेगा.‘

दिप्रिंट ने जाट समुदाय के कुछ अन्य हस्तियों – जिन्होंने राष्ट्रीय राजनीति पर अपनी छाप छोड़ी है- के बारे में जानकारियां बटोरने के लिए इतिहास के पन्ने पलटे-


यह भी पढ़ें: भविष्य में रोजगार पाने वालों से लेकर कमतर रोजगार वालों तक, यही करेंगे भारत के अगले जनांदोलन का नेतृत्व


सूरज मल

जाट समुदाय हिंदू, मुस्लिम और सिखों से मिलकर बना एक कृषक समुदाय है, और यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उत्तर भारतीय राज्यों तथा सिंध और पंजाब जैसे पाकिस्तानी प्रांतों में फैला हुआ है. जमींदारों के रूप में अपनी बेहतर स्थिति के कारण ही इस पूरे इलाक़े में यह समुदाय अमीर और प्रभावशाली बन पाया, और वह शासक जिन्होंने उन्हें इस मजबूत स्थिति में आने में मदद की वे थे महाराजा सूरज मल.

पहले जाट साम्राज्य के संस्थापक माने जाने वाले सूरज मल ने भरतपुर राज्य की स्थापना की. उन्हें ‘जाट यूलिसिस’ भी कहा जाता था क्योंकि उन्होंने अपने समुदाय की भूमि की रक्षा के लिए मुगलों और मराठों दोनों के खिलाफ युद्ध लड़े थे. 18वीं शताब्दी के मध्य में अपनी शक्ति के चरम पर उन्होंने वर्तमान दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना शासन स्थापित किया. 2019 में, जाट समुदाय के सदस्यों ने फिल्म पानीपत में एक लालची राजा के रूप में उनके चित्रण का जोरदार विरोध किया था.

2018 में, जयपुर में आयोजित एक रैली के दौरान पीएम मोदी ने महाराजा सूरज मल की वीरता की प्रशंसा की थी. उन्होने कहा था, ‘महाराणा प्रताप के साहस, महाराजा सूरज मल की वीरता, पन्ना धाई, हाड़ी रानी और अमृता देवी के बलिदान और मीराबाई की भक्ति के बारे में प्रचलित कहानियां राजस्थान में जन-जीवन का हिस्सा हैं.‘

सर छोटूराम

सर छोटूराम विभाजन से पहले के उत्तर भारत में जाटों और कृषक समुदाय दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण नेता थे. सभी के लिए शिक्षा की पैरोकरी करने वाले इस नेता ने सर फजल-ए-हुसैन और सर सिकंदर हयात खान के साथ मिलकर यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी, जो कृषकों के हितों का प्रतिनिधित्व करते थे. इस पार्टी को हिंदू, मुस्लिम और सिख जाटों का समर्थन प्राप्त था और 1937 में इसने प्रांतीय पंजाब सूबे में अपनी सरकार भी बनाई थी.

दिप्रिंट से बात करते हुए, उनके पोते और भाजपा के पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय इस्पात मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि उनके दादा ही वह व्यक्ति थे जो इस क्षेत्र में कृषि सुधार लेकर आए.

सिंह कहते हैं, ‘मेरे दादाजी को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत सहित पूरे उत्तर भारत में कृषि सुधार लाने का श्रेय दिया जाता है.’ वे कहते हैं कि उन सुधारों और उनके परिणामों के बगैर आधुनिक पाकिस्तान ‘भूख से मर जाता’.

बीरेंद्र सिंह आगे बताते हैं, ‘पाकिस्तानी किसान अभी भी छोटूराम को अपना मसीहा मानते हैं.’ उनका यह भी कहना है कि उन्होंने (छोटू राम) पंजाब का मुख्यमंत्री बनने से तीन बार इनकार किया क्योंकि उन्हें लगा कि इस राज्य में एक मुस्लिम मुख्यमंत्री होना चाहिए, क्योंकि अविभाजित पंजाब एक मुस्लिम बहुल प्रांत था.‘

सिंह का दावा है, ‘उनकी आखिरी सांस तक मुस्लिम किसान उनके ही साथ थे. यहां तक कि जब मिस्टर जिन्ना अपने चरम पर थे, तब भी पंजाब में मुसलमानों ने छोटूराम को ही पसंद किया क्योंकि उनका कहना था कि वह उन्हें सही दिशा में ले जा रहे हैं.’

सिंह ने कहा कि वर्षों बाद, कृषि कानूनों के विरोध में किसान धार्मिक आधार की परवाह किए बिना उसी तरह एकजुट हो रहे हैं जैसे उनके दादा के सुधारों ने किसानों को एकजुट किया था. इस भाजपा नेता, जो पार्टी के रुख से असहमत चल रहे हैं, ने कहा कि किसानों और सरकार के बीच बातचीत को फिर से शुरू करने के लिए यह ‘उचित समय’ है.

अविभाजित पंजाब की प्रांतीय सरकार में विकास मंत्री रहते हुए छोटूराम ने ही कृषि उपज मंडी समितियों का विचार पेश किया था. बाद में उनकी यूनियनिस्ट पार्टी ने पंजाब कृषि उत्पाद बाजार अधिनियम (पंजाब एग्रिकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट्स एक्ट) पारित किया, जिसने मंडियों की स्थापना की अनुमति दी, और आधुनिक एपीएमसी के पूर्व-रूप का स्थापना की.

बीरेंद्र सिंह ने कहा, ‘छोटूराम ने यह स्पष्ट किया कि किसानों का भी देश की संपत्ति में हिस्सा होना चाहिए और उन्हें उनका हक मिलना चाहिए.’

साल 2018 में, पीएम मोदी ने रोहतक में छोटूराम की 64 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था और उनकी तुलना सरदार पटेल से की थी. जाट नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने भी 2004 में छोटूराम की एक और इससे छोटी मूर्ति स्थापित की थी.


यह भी पढ़ें: RLD प्रमुख अब हुए ‘चौधरी जयंत सिंह’ और बड़े चौधरी, राजनीतिक रूप से इसकी कितनी अहमियत है


राजा महेंद्र प्रताप सिंह

शिक्षाविद श्रुति कपिला के अनुसार, राजा महेंद्र प्रताप सिंह, जिनके नाम पर अलीगढ़ में विश्वविद्यालय का नाम रखा जाना है, न केवल एक जाट हिंदू नेता थे, बल्कि ‘एक अंतर्राष्ट्रीयवादी और प्रगतिशील’ व्यक्ति भी थे. वह उन वर्षों का जिक्र कर रही थीं, ज़ो उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने और इसकी पैरवी करने के लिए विदेशों में रहने में बिताया.

राजा महेंद्र ने 1915 में काबुल में भारत की पहली निर्वासित सरकार, ‘प्रॉविजनल गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ भी बनाई और इसके राष्ट्रपति बने. उन्होंने जर्मनी, जापान और रूस सहित दुनिया भर के नेताओं से भी मुलाकात की और उन्हें 1932 में नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. लगभग तीन दशकों के निर्वासन के बाद वह 1946 में वापस भारत लौटे.

कपिला, जिनकी आगामी पुस्तक, वायलेंट फ्रेटरनिटी: इंडियन पॉलिटिकल थॉट इन द ग्लोबल एज, में महेंद्र प्रताप सिंह का भी ज़िक्र है, ने कहा, ‘उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण के लिए जमीन दान करके भी अपने इलाके के लिए बहुत कुछ किया है.’

इस राजा ने अपने मथुरा स्थित निवास को एक पॉलिटेक्निक में बदल दिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए भी जमीन दान की थी. वह इतने लोकप्रिय थे कि उन्होंने उस समय के युवा नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भी हराया था और 1957 में मथुरा से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में लोकसभा सीट जीती थी. उन्होंने अपने आप को कांग्रेस पार्टी और जनसंघ दोनों से दूर रखा था.

चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा

चौधरी रणबीर सिंह हुड्डा एक स्वतंत्रता सेनानी थे और 2009 में उनकी मृत्यु के समय तक वे भारत की पहली संविधान सभा के अंतिम जीवित सदस्य बचे थे. उनके नाम विधायी विभागों (लेजिस्लेटिव पोर्टफोलीयोस) की अधिकतम संख्या का राष्ट्रीय कीर्तिमान भी है और उन्होंने पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों में मंत्री के रूप में कार्य किया था.

हुड्डा 1947 में पूर्वी पंजाब से संविधान सभा के लिए चुने गए और उन्होंने आरक्षण और किसानों के लिए अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हुई बहस में अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने कैबिनेट स्तर के कई पदों पर भी कार्य किया और विभिन्न विधायी निकायों (लेजिस्लेटिव बॉडीस)- संविधान सभा, प्रादेशिक संविधान सभा, अंतरिम संसद, पंजाब और हरियाणा राज्य विधानसभाओं, लोकसभा और राज्यसभा में कार्य किया.

उनके बेटे भूपिंदर सिंह हुड्डा हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हैं, और उनके पोते दीपेंद्र सिंह हुड्डा वर्तमान में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं.

चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह भारत के पांचवें प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 1979 में मोरारजी देसाई के बाद पद संभाला था. एक ग्रामीण जाट किसान परिवार से संबंध रखने वाले चरण सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में काफ़ी सक्रिय थे और कई बार जेल भी गए थे और अंततः वे कांग्रेस के नेता बने.

आपातकाल के बाद की राजनीतिक अस्थिरता के दौर में चरण सिंह केवल छह महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री बने थे. उससे पहले के वर्षों में उन्होंने पिछले गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री के रूप में भी काम किया था. उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में बिताए अपने पूरे समय के दौरान कृषि और ग्रामीण विषयों पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया, और किसानों के शुभंकर (मास्कट) माने जाते थे.

उन्होंने विकास से संबंधित कई मुद्दों पर किताबें लिखीं, यूपी जमींदारी उन्मूलन अधिनियम और भूमि सुधार अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानूनों को पेश किया और किसानों को साहूकारों के चंगुल से मुक्त करने के लिए भी काम किया. उन्होंने भारतीय किसान यूनियन की भी स्थापना की, जिसे उन्होंने मूलरूप से पंजाब में पंजाब फार्मिंग यूनियन के रूप में शुरू किया था.

एक अनुमान के अनुसार 1978 में उनके जन्मदिन पर लगभग 10 लाख किसानों ने दिल्ली में एक किसान रैली का आयोजन किया था. उनकी जयंती अब राष्ट्रीय स्तर पर किसान दिवस के रूप में मनाई जाती है और नई दिल्ली में उनके स्मारक का नाम किसान घाट है.

नटवर सिंह ने राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने के अवसर पर पीएम मोदी द्वारा इस पूर्व प्रधानमंत्री के उल्लेख का जिक्र करते हुए कहा, ‘चौधरी चरण सिंह और उनकी विरासत का उल्लेख करना एक बहुत ही बुद्धिमानी वाली बात थी – अवसर ही ऐसा था.’

चरण सिंह के पोते राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी हैं, जो किसानों के विरोध प्रदर्शन में सबसे आगे रहे हैं. सोमवार को, भारत भर के विभिन्न खापों के नेताओं ने उनका चरण सिंह की विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर औपचारिक रूप से अभिषेक करते हुए उन्हें पारंपरिक टोपी भेंट की.


यह भी पढ़ें: राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के बहाने जाट कैसे पटेंगे? एक हाथ से दो तरबूज क्यों कर उठेंगे


चौधरी देवीलाल

चौधरी देवीलाल 1989 से 1991 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों में भारत के उप प्रधानमंत्री थे. वह दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री भी रहे. एक शक्तिशाली किसान नेता के रूप में उन्होंने हरियाणा राज्य के गठन में भी भूमिका निभाई. वह किशोरावस्था में ही कांग्रेस में शामिल हो गए थे और उन्होने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी भाग लिया. लेकिन 1970 के दशक में वे इस पार्टी से अलग हो गए. बाद में उन्होंने इंडियन नेशनल लोक दल की स्थापना की. उनके बेटे, ओम प्रकाश चौटाला भी हरियाणा के सीएम बने. चौटाला नाम परिवार के पैतृक गांव चौटाला से लिया गया है.

देवीलाल की हरियाणा में एक भारतीय डिज़नीलैंड, जिसमें तीन लक्जरी होटल, वाटर स्कीइंग के लिए झीलें और बाघ शामिल थे, बनाने की भी योजना थी जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को विकसित किया जा सके.

उन्होंने खुद को ‘किसानों के कल्याण में रुचि रखने वाले जनता के आदमी’ के रूप में पेश किया. देवीलाल ने किसानों को फसल के नुकसान की भरपाई करने की परंपरा शुरू की और किसानों के लिए पेंशन और बेरोजगारी भत्ते की भी शुरुआत की. उन्होंने किसानों के 10 हजार रुपये तक के कर्ज भी माफ कर दिए.

उनके चार बेटों में से तीन राजनीति में शामिल हुए, और भले ही उनका ख़ानदान बिखर गया हो, पर यह अभी भी राजनीतिक रूप से प्रभावी है और देवीलाल के परपोते दुष्यंत चौटाला वर्तमान में हरियाणा के उपमुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत हैं.

महेंद्र सिंह टिकैत

महेंद्र सिंह टिकैत भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष और कृषक समुदाय के प्रमुख नेता थे. उत्तर प्रदेश के रहने वाले, टिकैत 1988 में उस समय एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गए, जब उन्होंने किसानों के लिए सुधारों की मांग करते हुए दिल्ली तक एक मार्च का नेतृत्व किया था. इसके 30 से भी अधिक वर्षों के बाद, उनके बेटे राकेश टिकैत और नरेश टिकैत उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और किसानों के विरोध के प्रमुख चेहरे बन गये हैं.

महेंद्र सिंह टिकैत की रैली ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों किसानों को दिल्ली के बोट क्लब लॉन तक लाकर भारत की राजधानी को एकदम ठप कर दिया. अंततः उस समय की राजीव गांधी सरकार ने किसानों की कई मांगों को मान लिया, जिसमें बिजली के बिल और पानी के शुल्क की माफी भी शामिल थी.

एक तरह से टिकैत ने उस खाली स्थान को भर दिया, जिसे चौधरी चरण सिंह 1987 में अपनी मृत्यु के समय पीछे छोड़ गये थे. अपने अनुयायियों की विशाल संख्या के बावजूद, टिकैत कभी किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हुए, लेकिन जाट और कृषक समुदायों में एक प्रभावशाली व्यक्ति बने रहे.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: NSS का सर्वे मोदी सरकार के किसानों से किए वादे की मिड-टर्म परीक्षा थी, मार्कशीट में साफ लिखा है ‘फेल’ !


 

share & View comments