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Sunday, 14 June, 2026
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‘UP में का बा’ से Gen Z तक: नेहा राठौर का BJP पर निशाना, पेपर लीक को लेकर युवाओं का किया समर्थन

भोजपुरी सिंगर का कहना है कि BJP ने पॉपुलर एंटरटेनर्स को पॉलिटिक्स में लाकर अश्लील कंटेंट को सही ठहराया है, साथ ही उन्होंने कहा कि नौकरियों, एग्जाम और गवर्नेंस को लेकर Gen Z का गुस्सा ध्यान देने लायक है.

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लखनऊ: भोजपुरी लोक गायिका और राजनीतिक व्यंग्यकार नेहा राठौर ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर आरोप लगाया है कि वह मनोज तिवारी, निरहुआ और पवन सिंह जैसे कलाकारों और गायकों को चुनावी टिकट देकर उन भोजपुरी गायकों को बढ़ावा दे रही है, जिन्हें वह “अश्लील कंटेंट” से जुड़ा मानती हैं.

दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में खुद को “जेन जी” बताने वाली राठौर ने कहा कि भोजपुरी भाषा की सांस्कृतिक पहचान को बचाने और उद्योग में बढ़ती अश्लीलता के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के लिए एक सामाजिक आंदोलन की जरूरत है.

राठौर ने कहा, “ज्यादातर भोजपुरी गायक और अभिनेता, जो राजनीति में आए और जिन्हें BJP का टिकट मिला, उन्होंने पहले संगीत उद्योग में ‘अश्लील’ कंटेंट को बढ़ावा दिया था. उनसे दूरी बनाने के बजाय BJP ने उन्हें उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में आगे बढ़ाया.”

मनोज तिवारी, निरहुआ और पवन सिंह भोजपुरी मनोरंजन जगत के बड़े सितारे हैं, जिन्होंने बाद में भारतीय राजनीति में प्रवेश किया.

मनोज तिवारी 2014 से उत्तर-पूर्वी दिल्ली से सांसद हैं. दिनेश लाल यादव, जिन्हें निरहुआ के नाम से जाना जाता है, आधिकारिक रूप से BJP में शामिल हुए और 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ से चुनाव लड़ा. उस समय वह जीत नहीं पाए, लेकिन 2022 के आजमगढ़ उपचुनाव में उन्होंने बड़ी जीत हासिल की.

पवन सिंह को शुरुआत में 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से BJP उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन उन्होंने कुछ ही समय बाद अपना नाम वापस ले लिया.

मनोज तिवारी के पुराने संगीत करियर का जिक्र करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ‘तुहार लहंगा उठा देब रिमोट से’ जैसे गानों को सभ्य माना जा सकता है. उन्होंने कहा, “ऐसे कई गाने हैं जिन्हें गाया गया और लोकप्रिय बनाया गया.”

29 वर्षीय राठौर अपने व्यंग्यात्मक और राजनीतिक गीतों, खासकर ‘यूपी में का बा’ श्रृंखला के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं. इन गीतों में उत्तर प्रदेश में शासन, बेरोजगारी, महंगाई और दूसरे जनहित के मुद्दों को उठाया गया था.

उनकी राजनीतिक टिप्पणियों को लेकर विवाद भी हुआ है और सोशल मीडिया पर की गई कुछ पोस्ट के कारण उनके खिलाफ पुलिस शिकायतें और कानूनी कार्रवाई भी हुई है.

राठौर का कहना है कि भोजपुरी संगीत में बढ़ती अश्लीलता का मुकाबला करने और नई पीढ़ी में भोजपुरी भाषा के सांस्कृतिक पुनर्जागरण को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जनजागरूकता अभियान जरूरी है.

‘CJP का विरोध एक प्रतिक्रिया है’

राठौर ने कहा कि उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए जेन जी विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और उनका मानना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) उन भावनाओं की प्रतिक्रिया है, जिसमें कई युवाओं को लगता है कि उनकी चिंताओं और आकांक्षाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है. हालांकि, फिलहाल सीजेपी को लेकर उनकी कोई राय नहीं है.

उन्होंने कहा, “मैं युवाओं के गुस्से को समझ सकती हूं. अगर हम तथाकथित कॉकरोच जनता पार्टी की बात करें, तो यह उन भावनाओं की प्रतिक्रिया लगती है, जिसमें कई युवाओं को लगता है कि उनकी आकांक्षाओं और चिंताओं का सार्वजनिक रूप से अपमान किया जा रहा है. युवा लोग ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया देते हैं क्योंकि वे अपमान को कम सहन करते हैं.”

“साथ ही, मेरा मानना है कि उत्साह युवाओं की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी. मेरी चिंता यह है कि उनका गुस्सा गलत दिशा में न जाए और उसका इस्तेमाल कोई अपने हित में न करे. अगर स्वार्थी लोग किसी आंदोलन को प्रभावित करने लगें, तो वह अपनी दिशा खो सकता है.”

राठौर ने कहा कि वह हमेशा न्याय और अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों के साथ खड़ी रही हैं और उनका मानना है कि युवाओं को जवाबदेही मांगने का पूरा अधिकार है.

उन्होंने द प्रिंट से कहा, “हम हादसे, भगदड़, पेपर लीक और कई प्रशासनिक विफलताएं देख रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में लोग स्वाभाविक रूप से पूछते हैं कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है.”

“अगर लोग संवैधानिक, लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीकों से विरोध कर रहे हैं, तो लोकतंत्र में यह पूरी तरह जायज है. जहां तक नए युवा आंदोलनों का सवाल है, समय ही बताएगा कि वे आखिरकार किस दिशा में जाते हैं, लेकिन मैं उन्हें शुभकामनाएं देती हूं.”

‘ट्रोल्स मुझे निशाना बनाते हैं’

राठौर ने दावा किया कि वह लंबे समय से ऑनलाइन ट्रोल्स का निशाना रही हैं, जिनके बारे में उनका आरोप है कि वे सरकार के समर्थक हैं.

उन्होंने कहा, “जब भी मैं बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक, बिजली कटौती या सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दे उठाती हूं, तो मुझे गालियों से भरी टिप्पणियों की बाढ़ मिल जाती है. महिलाओं को ऐसे हमलों का ज्यादा सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना आसान समझा जाता है.”

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर आलोचकों की छवि खराब करने के लिए एक संगठित तंत्र काम करता है.

उन्होंने कहा, “AI जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल लोगों के बारे में भ्रामक सामग्री बनाने और गलत जानकारी फैलाने के लिए किया जा सकता है. इसका उद्देश्य अक्सर किसी व्यक्ति की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाना और उसे बोलने से हतोत्साहित करना होता है, लेकिन मैं रुकने वाली नहीं हूं.”

उन्होंने कहा, “कई बार ऐसा लगता है कि महत्वपूर्ण जन मुद्दों को उतना ध्यान नहीं मिलता, जितना मिलना चाहिए. कई विरोध प्रदर्शन और जन चिंताएं पर्याप्त रिपोर्ट नहीं होतीं, खासकर मुख्यधारा के टीवी कवरेज में, जिसे मैं ‘गोदी मीडिया’ मानती हूं. इसलिए सोशल मीडिया ऐसे सवाल उठाने का एक महत्वपूर्ण मंच बन गया है.”

गांव की जिंदगी से प्रेरित गीत

राठौर ने कहा कि उनका जन्म और पालन-पोषण बिहार के एक गांव में हुआ और वह एक किसान परिवार से आती हैं. उन्होंने याद किया कि बचपन में उनका सोशल मीडिया या राजनीतिक टिप्पणियों से बहुत कम परिचय था.

उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता काफी सख्त थे और लंबे समय तक मेरे पास मोबाइल फोन भी नहीं था.”

2018 में कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद राठौर ने अपना पहला फेसबुक अकाउंट बनाया. जबकि उनका परिवार चाहता था कि वह बीएड करें, लेकिन उन्हें लगा कि उनकी रुचि किसी और क्षेत्र में है. वह संगीत सीखने की योजना के साथ कोलकाता चली गईं.

उन्होंने कहा, “वहीं मुझे एहसास हुआ कि मेरी रुचि शास्त्रीय गायिका बनने से ज्यादा अपने गीत लिखने और उनके जरिए अपनी बात कहने में है.”

राठौर के अनुसार, उनके गीत लिखने की प्रेरणा गांव की वास्तविक जिंदगी से मिली. उन्होंने अपने कैमूर जिले के गांव की लगभग 100 मीटर लंबी एक सड़क का जिक्र किया, जो कई घरों में शौचालय होने के बावजूद गंदी रहती थी.

उन्होंने कहा, “लोग सड़क किनारे खुले में शौच करने जाते रहे. उसी समय स्वच्छ भारत अभियान का प्रचार हो रहा था. मुझे लगा कि इस मुद्दे पर बोलना चाहिए और 2019 में मैंने स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए भोजपुरी गीत ‘सौचालय बनाइये दे पिया ना’ लिखा.”

उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से बहुत कुछ नहीं बदला. लेकिन मेरा मानना है कि इसकी जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है. जन जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है. लोगों को भी अपने आसपास की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अपने नागरिक कर्तव्यों को निभाना चाहिए.”

उन्होंने बताया कि 2020 में उन्होंने कोरोना वायरस पर एक गीत लिखा, जिसे सोशल मीडिया पर कुछ लोकप्रियता मिली. लेकिन 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले आया उनका गीत ‘यूपी में का बा’ उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल बना गया.

उन्होंने कहा कि 2020 में उन्होंने बिहार में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को उजागर करते हुए ‘बिहार में का बा’ लिखा था, लेकिन ‘यूपी में का बा’ ज्यादा लोकप्रिय हुआ.

राठौर ने इस दावे को खारिज किया कि उनके ज्यादातर गीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकारों को निशाना बनाते हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार के खिलाफ भी गीत लिखे थे, लेकिन उन्हें उतना ध्यान नहीं मिला.

उन्होंने कहा, “मैंने 2021 के चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ भी गीत बनाए थे, लेकिन उन्हें उतना जन समर्थन नहीं मिला. जहां BJP सत्ता में होती है, वहां ऐसे गीत ज्यादा वायरल हो जाते हैं.”

राठौर ने कहा कि उनका ध्यान आम लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर रहता है.

उन्होंने कहा, “सरकारें अपनी उपलब्धियों के प्रचार पर पहले से ही बहुत संसाधन खर्च करती हैं. मेरी भूमिका अलग है. मैं उन मुद्दों पर ध्यान देती हूं जो आम लोगों को प्रभावित करते हैं और उन क्षेत्रों पर जहां मुझे जवाबदेही की कमी दिखाई देती है. अगर सड़कें टूटी हैं, कीमतें बढ़ रही हैं या सार्वजनिक सेवाएं विफल हो रही हैं, तो उन मुद्दों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य किसी भी सरकार की अंधी प्रशंसा करना या बिना सोचे-समझे आलोचना करना नहीं है.

उन्होंने कहा, “मेरा इरादा किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है. मेरी नजर में मेरा काम सवाल पूछना और उन समस्याओं को सामने लाना है जिनके समाधान की जरूरत है. मैंने हमेशा ऐसे लोकगीत लिखे हैं जो लोगों की रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़े हैं.”

कलाकार ने बताया कि वह इस समय बिजली संकट, महंगाई और ईंधन की कीमतों से जुड़े गीतों पर काम कर रही हैं, जिन्हें वह पेशेवर तरीके से स्टूडियो में रिकॉर्ड कर जल्द जारी करने की योजना बना रही हैं.

राठौर का उत्तर प्रदेश से वैवाहिक संबंध भी है. उनके पति हिमांशु सिंह उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के रहने वाले हैं. हिमांशु सिंह पेशे से लेखक हैं और पहले दिल्ली में दृष्टि IAS की सोशल मीडिया टीम के साथ काम कर चुके हैं. राठौर अक्सर अपनी रचनात्मक और पेशेवर यात्रा में उनके सहयोग को स्वीकार करती रही हैं.

राजनीति में आने की संभावना से इनकार नहीं

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि राठौर को किसी विपक्षी दल की ओर से उत्तर प्रदेश या बिहार की किसी सीट से उम्मीदवार बनाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि वास्तव में एक राजनीतिक दल ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन बातचीत आखिरकार आगे नहीं बढ़ सकी.

राठौर ने कहा कि फिलहाल उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, क्योंकि उनके पास न तो जमीनी राजनीतिक अनुभव है और न ही कोई संगठनात्मक आधार.

हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि उन्होंने भविष्य में राजनीति में आने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है. उन्होंने कहा, “शायद वह दिन बाद में आए, लेकिन अभी नहीं.”

फिलहाल, राठौर ने कहा कि उनका मुख्य ध्यान चुनावी राजनीति में आने के बजाय अपने मंच का इस्तेमाल नागरिकों के अधिकारों और आम लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए करना है.

नेहा का कहना है कि सरकार की आलोचना करना, देश की आलोचना करने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए. उनके अनुसार, सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना स्वस्थ लोकतंत्र का एक जरूरी हिस्सा है.

उन्होंने कहा, “नागरिकों को बिना डराए और चुप कराए, सवाल पूछने और सरकारों को जवाबदेह ठहराने की आजादी होनी चाहिए. जन मुद्दों को उठाना देश के खिलाफ होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा कि आलोचना, ट्रोलिंग या कानूनी कार्रवाई कभी-कभी सार्वजनिक जीवन में खुलकर बोलने का परिणाम भी हो सकती है. उन्होंने कहा, “अगर चिंताएं उठाने से आलोचना या कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तो यह सार्वजनिक विमर्श की वास्तविकता का हिस्सा है. लेकिन डर के कारण लोगों को उन मुद्दों पर बोलना बंद नहीं करना चाहिए, जो समाज और आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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