नई दिल्ली: जब पिछले हफ्ते लाहौर के ऐतिहासिक एचिसन कॉलेज में एक कक्षा के बाहर नई पट्टिका लगाई गई, तो यह एक ऐसी सौ साल पुरानी दोस्ती का आखिरी अध्याय बन गया, जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद भी कायम रही. यह 100 वर्षीय पाकिस्तानी उद्योगपति सैयद बाबर अली की अपने “सबसे अच्छे दोस्त” को भावुक श्रद्धांजलि थी.
यह कमरा पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री हरचरण सिंह बराड़ की याद में समर्पित किया गया, जो एचिसन कॉलेज के प्रतिष्ठित पूर्व छात्रों में भी शामिल हैं.
अली द्वारा लिखे गए शिलालेख में लिखा है, “यह कक्षा मेरे दोस्त हरचरण सिंह बराड़ (1922-2009), सराय नंगा, जिला फिरोजपुर की प्यार भरी याद में समर्पित है.” इस समारोह में बराड़ की बेटी बबली बराड़ भी शामिल हुईं, जो पट्टिका का अनावरण करने भारत से आई थीं.
कई पीढ़ियों तक एचिसन कॉलेज का अविभाजित पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में एक खास स्थान रहा. 1886 में स्थापित इस प्रतिष्ठित बोर्डिंग स्कूल में पूरे क्षेत्र के राजकुमारों, राजनेताओं, सैन्य अधिकारियों और नौकरशाहों ने पढ़ाई की. 1947 से पहले लाहौर पंजाब का धड़कता हुआ दिल था, और एचिसन, जिसे उसके पूर्व छात्र प्यार से “एचिसन” या सिर्फ “एसी” कहते थे, वह जगह थी जहां पंजाब के कई भावी नेता पहली बार मिले.
उनमें दो लड़के भी थे, जो एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होने वाले दोस्त बन गए. अली 1934 में कॉलेज पहुंचे. बराड़ तीन साल बाद, 1937 में, कॉलेज में दाखिल हुए. हालांकि बराड़ उनसे कई साल बड़े थे, लेकिन दोनों के बीच जल्द ही ऐसी दोस्ती हो गई, जो 70 साल से भी ज्यादा समय तक चली.

स्कूल की अभिलेखीय परियोजना से जुड़े एचिसन के पूर्व छात्र और इतिहासकार कवियन मीर ने दिप्रिंट को बताया, “दोनों सात साल तक एचिसन में साथ रहे और बाद में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में भी साथ पढ़े.”
बराड़ गॉडली हाउस में रहते थे, जहां सिख और हिंदू छात्र रहते थे. अली लाहौर के रहने वाले डे-स्कॉलर थे और हर शाम पढ़ाई के बाद अपने घर लौट जाते थे. लेकिन दोनों सबसे अच्छे दोस्त थे.
मीर ने आगे कहा, “दोनों ने खेलों में सम्मान हासिल किया और 1943 में साथ ग्रेजुएशन पूरी की. उनकी दोस्ती इतनी गहरी हो गई थी कि अली की मां ने बराड़ को अपना चौथा बेटा कहना शुरू कर दिया था.”
बंटवारे के बाद भी कायम रही दोस्ती
फिर बंटवारा हुआ. 1947 की हिंसा ने पंजाब को दो हिस्सों में बांट दिया. लाखों लोग नई बनी सीमाओं को पार करके चले गए. परिवार रातोंरात बिछड़ गए. सदियों से साथ रहने वाले पूरे समुदाय अलग हो गए.
लेकिन किसी तरह यह दोस्ती कायम रही.
मीर ने याद करते हुए कहा, “अली की बहनें उन्हें भाई हरचरण सिंह कहकर बुलाती थीं. आज भी परिवार के सदस्य उन्हें मामा हरचरण सिंह कहते हैं.”
जब बराड़ को पंजाब के तीसरे मुख्यमंत्री सरदार प्रताप सिंह कैरों की भतीजी पसंद आने लगी, तब अली ने उनका पूरा साथ दिया. उन्होंने दोनों की शादी भी करवाई.
गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से पढ़ाई पूरी करने के बाद अली 1945 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए थे और बराड़ पूर्वी पंजाब लौट गए थे. कई साल बाद जब अली वापस आए, तो उन्होंने एक पारिवारिक मित्र, जो एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे, की मदद से सीमा के पास जाने की विशेष अनुमति ली.
मीर ने कहा, “वहां उनका एक दोस्त था, जो बड़ा जमींदार था और एक राजनीतिक परिवार से जुड़ा था. इस तरह बंटवारे के बाद 1948 में, तीन-चार साल बाद दोनों दोस्त फिर मिले.”
यह उनकी कई मुलाकातों में पहली मुलाकात थी. इसके बाद के दशकों में भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते गए, लेकिन दोनों परिवारों ने संपर्क बनाए रखा. वे एक-दूसरे की शादियों में शामिल हुए, एक-दूसरे के घर गए और अपने बच्चों को बड़ा होते देखा.
बराड़ का राजनीतिक करियर उन्हें भारत के सबसे बड़े पदों तक ले गया. पंजाब की राजनीति में दशकों तक काम करने के बाद वह ओडिशा के राज्यपाल बने, फिर हरियाणा के राज्यपाल बने और आखिर में 1995 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने.
लेकिन लाहौर से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ.
दोस्त को एक तोहफा
1986 में जब एचिसन कॉलेज ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए, तब बराड़ भारत से आए पूर्व छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वहां लौटे. तीन साल बाद लाहौर की एक और यात्रा के दौरान उन्होंने कॉलेज में बाबर अली लाइब्रेरी का उद्घाटन किया, जो अपने दोस्त के लिए एक प्रतीकात्मक सम्मान था.
यह रिश्ता 2009 में बराड़ की मौत तक बना रहा.
मीर ने कहा, “जब उनकी दिल की सर्जरी हुई थी, तब बाबर साहब उनके साथ थे. जब उनका निधन हुआ, तब चंडीगढ़ में अंतिम संस्कार के बाद विदाई भाषण बाबर साहब ने ही दिया था.”
कक्षा को समर्पित करने का विचार एचिसन की एक नई फंड जुटाने की पहल से आया, जिसमें पूर्व छात्र शिक्षकों, सहपाठियों या अपने प्रिय लोगों के सम्मान में कक्षाओं को प्रायोजित कर सकते हैं. पिछले छह महीनों में अली ने इस पहल के तहत कई कमरों को प्रायोजित किया है.
लेकिन यह कमरा अलग था. इस महीने अपना 100वां जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे अली ने यह कक्षा उस लड़के की याद में समर्पित करने का फैसला किया, जो उनका जीवन भर का साथी बन गया था.
मीर ने कहा, “उन्होंने कहा, ‘मैं अपने सबसे अच्छे दोस्त की याद में एक कक्षा दान करना चाहता हूं.'”
समारोह काफी साधारण था. इसमें प्रिंसिपल एस.एम. तुराब हुसैन, पूर्व छात्रों के प्रतिनिधि और कुछ पुराने छात्र मौजूद थे. अली अपने घर से वीडियो लिंक के जरिए जुड़े, क्योंकि अब उनके लिए यात्रा करना मुश्किल है. बबली बराड़ ने पट्टिका का अनावरण करने से पहले स्कूल में अपने पिता के दिनों के बारे में संक्षेप में बात की.
इसके बाद सभी लोग रूम नंबर 108 की ओर गए. कमरे के अंदर युवा हरचरण सिंह बराड़ की एक तस्वीर लगी है, जिसमें उन्होंने एचिसन का खास ब्लेजर पहन रखा है, जो उन्होंने आठ दशक से भी अधिक पहले हासिल किया था. बाहर वह पट्टिका आज भी लगी हुई है.
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