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Sunday, 14 June, 2026
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भ्रूण लिंग जांच कानून पर SC की सख्त, कहा: कागजी खामियां मामूली गलती नहीं, बल्कि गंभीर उल्लंघन हैं

सुप्रीम कोर्ट ने महिला भ्रूण हत्या को एक लगातार चली आ रही सामाजिक बुराई बताते हुए PCPNDT एक्ट के तहत एक डॉक्टर की याचिका खारिज कर दी और कहा कि लिंग चयन को रोकने के लिए अल्ट्रासाउंड रिकॉर्ड रखना ज़रूरी और अहम है.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक डॉक्टर की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व नैदानिक तकनीक (लिंग चयन निषेध) अधिनियम, 1994 यानी PCPNDT एक्ट के तहत उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी. कोर्ट ने दोहराया कि कन्या भ्रूण हत्या एक गंभीर सामाजिक बुराई है, जिसकी जड़ महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव में है.

यह मामला डॉक्टर रमेश के खिलाफ PCPNDT एक्ट के तहत रिकॉर्ड रखने के नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़ा था. बेंच ने कहा कि फॉर्म एफ, जो अल्ट्रासाउंड जांच के लिए तय रिकॉर्ड है, उसमें गड़बड़ियां सिर्फ छोटी-मोटी लिपिकीय गलतियां नहीं हैं, बल्कि कानून का गंभीर उल्लंघन हैं.

बेटियों की “सुंदर खुशी” पर आधारित एक हिंदी कविता और एक संस्कृत श्लोक से फैसले की शुरुआत करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि PCPNDT एक्ट का मकसद महिलाओं की गरिमा की रक्षा करना और यह सुनिश्चित करना है कि बेटी का जन्म खुशी के साथ स्वीकार किया जाए.

आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें PCPNDT एक्ट के उल्लंघनों, जिनमें फॉर्म एफ का ठीक तरीके से रखरखाव न करना भी शामिल था, पर संज्ञान लिया गया था. उसका कहना था कि रिकॉर्ड रखने में हुई अनजानी और बिना इरादे की गलतियां तकनीकी त्रुटियां थीं, जानबूझकर किए गए आपराधिक उल्लंघन नहीं.

कोर्ट ने इससे सहमति नहीं जताई. कोर्ट ने कहा कि पूरा और सही रिकॉर्ड रखना कानून के पालन के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि क्लीनिकों में लिंग जांच की प्रथा का पता लगाने का अक्सर यही एकमात्र तरीका होता है. कोर्ट ने कहा, “कानून के सही कामकाज के लिए इस फॉर्म का महत्व और जरूरत अब किसी बहस का विषय नहीं है.”

PCPNDT एक्ट के तहत तय फॉर्म एफ हर प्रसव पूर्व जांच प्रक्रिया के लिए भरना जरूरी है. इसमें मरीज की जानकारी और डॉक्टर का नाम दर्ज किया जाता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें मरीज और डॉक्टर दोनों के हस्ताक्षर वाला एक घोषणा पत्र होता है, जिसमें कहा जाता है कि गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग नहीं बताया गया.

1994 का यह कानून गर्भधारण से पहले और बाद में लिंग चयन पर रोक लगाता है, भ्रूण का लिंग बताने पर प्रतिबंध लगाता है और रिकॉर्ड रखने के नियमों का सख्ती से पालन जरूरी बनाता है. कानून के मुताबिक, गर्भवती महिला का अल्ट्रासाउंड करने वाले व्यक्ति को तय फॉर्म में पूरा रिकॉर्ड रखना होगा और किसी भी तरह की कमी या गलत जानकारी को कानून का उल्लंघन माना जा सकता है.

PCPNDT एक्ट की धारा 4 प्रसव पूर्व जांच तकनीकों के नियमन से जुड़ी है और धारा 4(3) के प्रावधान में सबूत का उल्टा बोझ रखा गया है.

अल्ट्रासाउंड करने वाले व्यक्ति द्वारा रखे गए रिकॉर्ड में किसी भी तरह की कमी या गलती, जब तक आरोपी इसके विपरीत साबित न कर दे, कानून की धारा 5 और 6 के उल्लंघन के बराबर मानी जाएगी, जो लिंग जांच पर मुख्य प्रतिबंध हैं.

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट कई दशकों से सक्रिय है. फैसले में फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ (2019) मामले का जिक्र करते हुए दोहराया गया कि फॉर्म एफ की जानकारी अनिवार्य है.

उस मामले में कोर्ट ने कहा था कि दस्तावेजी रिकॉर्ड अक्सर यह सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका होता है कि कोई संस्थान लिंग जांच में शामिल नहीं है. कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि कानून के प्रावधानों को कमजोर करना “कन्या भ्रूण हत्या रोकने के उद्देश्य को विफल कर देगा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत लड़की के जीवन के अधिकार को सिर्फ एक औपचारिकता बनाकर रख देगा.”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ पंजाब बनाम भारत संघ (2013) का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि कन्या भ्रूण हत्या की जड़ “गलत धारणाओं, स्वार्थी परंपराओं, सामाजिक मानदंडों की विकृत समझ और पूरी तरह व्यक्तिगत सोच में है, जिसमें सामूहिक हित की कोई जगह नहीं है.”

मौजूदा मामले में कोर्ट ने अपने पुराने इस विचार से सहमति जताई कि कन्या भ्रूण को नष्ट करना भविष्य की एक महिला को सूली पर चढ़ाने जैसा है. कोर्ट ने कहा, “एक दशक से अधिक समय बाद भी हमारी भावना वही है.”

कोर्ट ने राष्ट्रीय लिंग अनुपात और लैंगिक समानता से जुड़े व्यापक आंकड़ों का भी जिक्र किया और कहा कि देश ने प्रगति जरूर की है, लेकिन ये आंकड़े संतुष्ट होकर बैठ जाने की इजाजत नहीं देते.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) के मुताबिक, देश में प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाएं हैं, जो पिछले सर्वेक्षण से बेहतर है. लेकिन जन्म के समय लिंग अनुपात, जो लिंग चयन की प्रथाओं का एक संवेदनशील संकेतक है, प्रति 1,000 लड़कों पर 929 लड़कियां है. यह जैविक रूप से अपेक्षित 950 के स्तर से कम है.

बेंच ने कहा, “रिकॉर्ड रखना इस कानून और उसके घोषित उद्देश्य के लिए जरूरी है. यह सही है कि सामान्य तौर पर घटते लिंग अनुपात की स्थिति बेहतर हुई है और इसमें काफी सुधार आया है, लेकिन कानून के प्रावधानों को कमजोर करना या उसके उल्लंघनों को नजरअंदाज करना स्वीकार नहीं किया जा सकता.”

कोर्ट ने पुरुष बच्चों के प्रति “गहरी पैठी पितृसत्तात्मक पसंद” और “पर्दे के पीछे जारी लिंग चयन की प्रथाओं” का जिक्र किया. कोर्ट ने कहा कि पंजाब और हरियाणा जैसे कई राज्यों में जन्म के समय लिंग अनुपात अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है.

इसके अलावा, भारत की विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में कुल लैंगिक समानता रैंकिंग 148 देशों में 131वें स्थान पर पहुंच गई है.

कोर्ट ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब लिंग चयन के खिलाफ कानून को पूरी तरह और सख्ती से लागू किया जाए.

कोर्ट ने कहा, “ये योजनाएं दिखाती हैं कि एक मूल रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लड़कियों के खिलाफ मौजूद पक्षपात को खत्म करने के प्रयास लगातार जारी हैं. काफी प्रगति हुई है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. कुल मिलाकर, स्थिति 1990 के दशक के मध्य की तुलना में काफी बेहतर है, लेकिन आंकड़े संतुष्ट होकर बैठ जाने का समर्थन नहीं करते.”

कोर्ट ने कहा कि जब तक सोच में व्यापक बदलाव नहीं आता और महिला की जिस चीज को अब तक उसकी “जन्मजात कमजोरी” माना जाता है, उसकी जगह सच्ची समानता नहीं ले लेती, और जब तक यह एहसास नहीं हो जाता कि ऐसे प्रयासों की अब जरूरत नहीं है, तब तक PCPNDT एक्ट की सख्ती और ईमानदारी से लागू करना जरूरी रहेगा. यह कहते हुए कोर्ट ने अपील खारिज कर दी.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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