नई दिल्ली: एक कड़े खुले पत्र में पूर्व केंद्रीय मंत्री और गृह सचिव आरके सिंह ने नागरिकों से “लोकतंत्र बचाने” के लिए एकजुट होने की अपील की है. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और “उनके बॉस” पर “गैरकानूनी काम” करने का आरोप लगाया है.
पत्र में सवाल किया गया है, “क्या ज्ञानेश कुमार ने ये सभी गैरकानूनी काम खुद किए या उन्हें ऐसा करने के लिए उनके बॉस ने निर्देश दिया था?”
सिंह की ये टिप्पणियां मतदाता सूची के चल रहे Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच आई हैं. पिछले हफ्ते इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों को लेकर बार-बार CEC से सवाल किए थे. इनमें नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया में बदलाव और मतदाता सूची की सुरक्षा से जुड़े फैसले भी शामिल थे.
सिंह ने सोमवार को एक्स पर एक पोस्ट में लिखा कि कुमार पर महाभियोग चलाने की विपक्ष की योजना “बेकार की कवायद” होगी, क्योंकि उसके पास इसके लिए पर्याप्त संख्या नहीं है. उन्होंने इसके बजाय कुमार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करने का सुझाव दिया.
उन्होंने कहा कि इसके बाद सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर घोषणा करनी चाहिए कि जब तक CEC और चुनाव आयुक्त इस्तीफा नहीं देते, तब तक वे चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि उनके उत्तराधिकारियों की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट की 2023 की उस व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, जिसका प्रस्ताव अदालत ने दिया था.
अदालत ने तब कहा था कि जब तक इस बारे में कोई कानून नहीं बनता, चुनाव आयोग में नियुक्तियां एक समिति के जरिए की जाएंगी. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे.
An open letter to all my countrymen.
Do you want India to remain a democracy? Then you must understand what Gyanesh Kumar, the CEC, and his bosses are doing in the so-called SIR.
They are violating the law.
– As per Section 21 of the law, a special revision is to be undertaken…— R. K. Singh (@RajKSinghIndia) September 28, 2026
उन्होंने लिखा, “जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपील लंबित थी, वहां हुए चुनाव रद्द किए जाने चाहिए और नए चुनाव होने चाहिए. और चुनाव EVM से नहीं, बैलेट से होना चाहिए क्योंकि अभी तक ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नहीं बनाई गई है जिसे हैक न किया जा सके. यही वजह है कि आर्थिक और डिजिटल रूप से विकसित कोई भी देश EVM का इस्तेमाल नहीं करता.”
सिंह ने कहा, “अगर हम अपने लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं तो पूरे देश को जागरूक और एकजुट करना होगा… आइए, लोकतंत्र बचाने के लिए एकजुट हों.”
उन्होंने कहा, “अब तक सरकार और चुनाव आयोग की कोशिश हमेशा सभी योग्य मतदाताओं को सूची में शामिल करने की रही है. यह लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का अभियान था. देश के इतिहास में यह पहली बार है जब अभियान लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने के लिए है.”
सिंह ने कहा कि अब तक SIR के जरिए 13 करोड़ नाम, यानी 13 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. उन्होंने कहा, “2024 के चुनाव में NDA और INDIA के बीच अंतर सिर्फ 3 प्रतिशत था. इसलिए नाम हटाए जाने का चुनावों पर बड़ा असर पड़ा है और आगे भी पड़ेगा.”
‘गैरकानूनी काम’
पत्र में सिंह ने आरोप लगाया कि SIR के दौरान चुनाव आयोग ने कई गैरकानूनी काम किए.
उन्होंने कहा कि Representation of the People Act, 1950 की धारा 21 के मुताबिक चुनाव आयोग “किसी भी समय, दर्ज किए जाने वाले कारणों के साथ, किसी भी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से की मतदाता सूची में विशेष संशोधन का निर्देश दे सकता है, जिस तरीके को वह उचित समझे.”
इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि पूरे देश में गहन संशोधन का आदेश देना गैरकानूनी था.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि SIR कराने का फैसला पूरे आयोग ने लिया था या सिर्फ कुमार ने.
सिंह ने धारा 21 का हवाला देते हुए आगे कहा कि जब विशेष संशोधन का निर्देश दिया जाता है, तब जो मतदाता सूची लागू होती है, वह संशोधन पूरा होने तक लागू रहती है. उन्होंने कहा कि संशोधित सूची तभी अंतिम होती है जब नाम जोड़ने या हटाने से जुड़ी सभी अपीलों का निपटारा हो जाए.
उन्होंने लिखा, “जहां अपील अभी लंबित थीं, वहां अधिसूचना की तारीख पर लागू मूल मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाना था. इसके उलट नई सूची, जिसमें नाम हटा दिए गए थे, का इस्तेमाल चुनावों के दौरान किया गया, जबकि नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील अभी लंबित थीं. यह गैरकानूनी था.”
सिंह ने 1950 के कानून की धारा 22 का भी हवाला दिया. यह धारा चुनाव पंजीकरण अधिकारी (ERO) को उचित जांच के बाद किसी नाम में बदलाव करने, उसे दूसरी जगह डालने या हटाने का अधिकार देती है.
उन्होंने आरोप लगाया, “ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद ERO द्वारा सूची में शामिल किए गए सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जांच और पंजीकृत मतदाताओं को कोई कारण बताओ नोटिस दिए बिना हटा दिए. यह खुले तौर पर गैरकानूनी था.”
उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम सीधे हटा दिए गए, उनसे Form 6 के जरिए नए मतदाता के रूप में आवेदन करने और अपनी पात्रता का सबूत देने को कहा गया.
सिंह ने आरोप लगाया कि इस तरह कुमार ने मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता साबित करने की जिम्मेदारी नागरिकों पर डाल दी.
उन्होंने लिखा, “जांच से पहले मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है और ज्ञानेश कुमार इसके दोषी हैं.”
सिंह ने सुप्रीम कोर्ट की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि SIR को मंजूरी देने वाला अदालत का आदेश “गलत था” और यह फैसला “आपातकाल को सही ठहराने वाले फैसले जितना ही बदनाम” है.
उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिका के लंबित होने का भी जिक्र किया.
उन्होंने कहा, “चुनाव आयुक्तों के चयन से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर देरी भी सुप्रीम कोर्ट के बारे में गलत संदेश दे रही है. यह बिल्कुल स्पष्ट मामला है कि चुनाव आयुक्तों का चयन सत्ता में मौजूद पार्टी द्वारा नहीं होना चाहिए, बल्कि एक निष्पक्ष चयन समिति द्वारा होना चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्षता सुनिश्चित हो.”
Form 6, तार्किक गड़बड़ियां
सिंह के पत्र में Form 6 में किए गए बदलाव का भी जिक्र किया गया है. यह फॉर्म नए मतदाताओं को भरना होता है. उन्होंने कहा कि इसमें एक नया appendix जोड़ा गया, लेकिन इसके लिए पर्याप्त बदलाव नहीं किए गए.
उन्होंने Form 7 के जरिए मतदाताओं के नाम जोड़ने पर बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज किए जाने पर भी सवाल उठाया.
उन्होंने पश्चिम बंगाल में 16 लाख मतदाताओं के नामों के खिलाफ चुनाव आयोग द्वारा अपील दायर किए जाने पर भी सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि आयोग को ऐसा करने की अनुमति किसने दी. इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों में से एक ने भी यह सवाल उठाया था.
सिंह ने दावा किया कि इस पूरी प्रक्रिया का असर अवैध प्रवासियों पर नहीं, बल्कि गरीब और कमजोर लोगों पर पड़ा है.
उन्होंने लिखा, “सबसे ज्यादा नाम गरीब और कमजोर लोगों के हटाए गए हैं, जिनकी कोई आवाज नहीं है. वे पहले भी और अब भी ज्यादातर अपने घरों से दूर रहकर रोजी-रोटी कमाते हैं. लाखों लोग दूर-दराज के इलाकों और दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं. वे अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक महीने के लिए घर वापस जाने का खर्च नहीं उठा सकते. अगर वे कमाई नहीं करेंगे तो भूखे रह जाएंगे. वे मुश्किल फॉर्म नहीं भर सकते. उनके पास जन्म प्रमाण पत्र और जरूरी कागज नहीं हैं. सिर्फ वोट के लिए उन्हें अपनी रोज की कमाई क्यों छोड़नी चाहिए?”
सिंह ने “तार्किक गड़बड़ियों” के आधार पर मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर भी चिंता जताई. उन्होंने ERONet प्लेटफॉर्म के जरिए मतदाता सूचियों के “केंद्रीकरण” पर अपनी चिंता दोहराई.
उन्होंने लिखा, “मतदाता सूची में बदलाव का केंद्रीकरण खतरनाक है. इसका इस्तेमाल उन बूथों से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा सकता है, जहां NDA के खिलाफ वोट पड़ते हैं. क्या ऐसा ही हुआ? जांच से पहले मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है और ज्ञानेश कुमार इसके दोषी हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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