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Saturday, 23 May, 2026
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MGR और जयललिता के बाद AIADMK ने खुद को फिर संभाल लिया था, लेकिन इस बार दरारें कहीं ज्यादा गहरी हैं

द्रविड़ पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से हर विभाजन का सामना एक ही प्रभावशाली व्यक्तित्व की बदौलत किया है. EPS के उस रोल को पूरा करने में नाकाम रहने के कारण, रिवाइवल मुश्किल हो सकता है.

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चेन्नई: 50 साल से ज्यादा पहले, आम आदमी का किरदार निभाकर मशहूर हुए एक फिल्म स्टार — कभी रिक्शा चालक, कभी मछुआरा, किसान या क्लर्क — ने एक ऐसी पार्टी बनाई जिसने द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के दबदबे को तोड़ दिया और तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति के दो बड़े स्तंभों में से एक बन गई.

फिल्म सुपरस्टार एम. जी. रामचंद्रन द्वारा बनाई गई ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम आज एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है. यह चुनौती तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के उभार से आई है, जिसका नेतृत्व भी सुपरस्टार जोसेफ विजय कर रहे हैं. उनकी सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों ने उन्हें बहुत बड़ा फैन बेस दिलाया है.

MGR और विजय एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन दोनों में फर्क है.

MGR ने राज्य के सबसे बड़े प्रशासनिक पद तक पहुंचने से पहले 15 साल से ज्यादा समय तक राजनीति के उतार-चढ़ाव देखे थे. वह पार्टी, उसके कार्यकर्ताओं और उसकी वैचारिक जड़ों को अच्छी तरह जानते थे, और पार्टी भी उन्हें जानती थी.

दूसरी तरफ, विजय और उनकी टीवीके लगभग रातोंरात शीर्ष पर पहुंच गए.

अपने पहले ही चुनाव में टीवीके ने तमिलनाडु विधानसभा की 234 में से 108 सीटें जीत लीं. इससे AIADMK तीसरे स्थान पर पहुंच गई और पार्टी के भीतर एक नई टूट शुरू हो गई.

AIADMK के वरिष्ठ नेता एस. सेम्मलाई ने इस्तीफा दे दिया और सवाल उठाया कि क्या यह अब भी वही पार्टी है जिसे MGR ने बनाया था और जयललिता ने आगे बढ़ाया था. वहीं, वरिष्ठ नेताओं एस. पी. वेलुमणि और सी. वी. शणमुगम के गुट ने AIADMK प्रमुख एडप्पादी के. पलानीस्वामी यानी ईपीएस के नेतृत्व का विरोध किया.

13 मई को फ्लोर टेस्ट के दौरान 25 बागी विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर टीवीके का समर्थन किया, जिसके बाद ईपीएस खुद को राजनीतिक रूप से घिरा और अकेला महसूस करने लगे.

AIADMK के लिए संकट कोई नई बात नहीं है. MGR की मौत के बाद पार्टी कई बार टूट चुकी है और हर बार खुद को संभालने में सफल रही है. लेकिन इस बार राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी के भीतर दरारें ज्यादा गहरी हैं और यह उसके सबसे बड़े आंतरिक संकटों में से एक हो सकता है.

इसके अलावा, दूसरी पंक्ति का नेतृत्व न होने से पार्टी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

पूर्व AIADMK नेता सेम्मलाई ने कहा, “सभी वरिष्ठ नेता अलग-अलग स्थिति में हैं और किसी साझा फैसले तक पहुंचने की हालत में नहीं हैं. हर नेता लगभग रोज एक-दूसरे को दोष दे रहा है, जिससे पार्टी की सार्वजनिक छवि भी खराब हो रही है. गुटबाजी और टूट में फर्क होता है. गुटबाजी को संभाला जा सकता है, लेकिन टूट के बाद समझौते की संभावना बहुत कम होती है.”

उन्होंने कहा, “स्थिति बहुत नाजुक है. पहले भी टूट हुई है, लेकिन अब हालात सहज नहीं रहे. मुझे नहीं लगता कि पार्टी अब फिर से साथ मिलकर काम कर पाएगी.”

AIADMK का उभार

AIADMK की शुरुआत किसी वैचारिक पार्टी के रूप में नहीं हुई थी, बल्कि अक्टूबर 1972 में MGR को डीएमके से निकाले जाने के बाद यह पार्टी सीधे डीएमके को चुनौती देने के लिए बनी थी.

उस समय MGR डीएमके के कार्यकर्ता थे और पार्टी के कोषाध्यक्ष भी थे. लेकिन उनकी बढ़ती लोकप्रियता, सिनेमा और राजनीति को लेकर मतभेद और पार्टी के भीतर भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनके और तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के बीच दूरी बढ़ा दी.

MGR ने मंत्रिमंडल में जगह मांगी, लेकिन करुणानिधि ने यह कहते हुए मना कर दिया कि सिनेमा और राजनीति साथ नहीं चल सकते.

दूसरी ओर, MGR ने पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, जिससे पार्टी के कई नेता नाराज हो गए. उन्हें “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के लिए निकाल दिया गया. इसके बाद उन्होंने डीएमके संस्थापक सी. एन. अन्नादुरै के सम्मान में अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम बनाई. चार साल बाद MGR ने पार्टी के नाम के आगे “ऑल इंडिया” जोड़ दिया.

MGR अकेले नहीं निकले थे. उनके साथ डीएमके छोड़कर आए अनुभवी नेता भी थे, जिनमें नवालर नेदुंचेज़ियन और पनरुति रामचंद्रन शामिल थे.

जहां डीएमके की ताकत करुणानिधि के भाषणों और साहित्यिक-राष्ट्रवादी अपील से आती थी, वहीं MGR को अपनी फिल्मों के जरिए समाज के अलग-अलग वर्गों में व्यापक समर्थन मिला हुआ था.

1977 में, पार्टी बनाने के सिर्फ पांच साल बाद, MGR ने 234 में से 130 सीटें जीतकर सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने.

राजनीति के रूप में कल्याणकारी योजनाएं

समय के साथ AIADMK की लोकप्रियता उसकी कल्याणकारी राजनीति की वजह से बढ़ती गई.

1977, 1980 और 1984 में मिली बड़ी जीतों ने MGR को तमिलनाडु का बेहद मजबूत नेता बना दिया.

जहां डीएमके का मजबूत आधार कावेरी डेल्टा और उत्तर तमिलनाडु था, वहीं AIADMK ने दक्षिणी जिलों, मछुआरा समुदाय, आदिवासी समुदायों और महिलाओं तक अपनी पहुंच बढ़ाई.

1 जुलाई 1982 को शुरू की गई दोपहर भोजन योजना AIADMK सरकार की सबसे बड़ी पहचान बन गई. MGR ने 1980 में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया, जिससे ग्रामीण किसान समुदायों को सीधा फायदा हुआ.

बाद में जयललिता ने कल्याणकारी मॉडल को और आगे बढ़ाया. उन्होंने मुफ्त मिक्सर, ग्राइंडर, पंखे, छात्रों के लिए लैपटॉप, मंगलसूत्र के लिए सोना और तय सीमा तक मुफ्त बिजली जैसी योजनाएं शुरू कीं.

इन योजनाओं ने द्रविड़ लोकलुभावन राजनीति को संरचनात्मक सुधारों से हटाकर सीधे कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति में बदल दिया.

1980 में केंद्र सरकार द्वारा MGR सरकार को बर्खास्त किए जाने के बाद भी उन्होंने इसे चुनावी मुद्दा बनाया और दोबारा सत्ता में वापसी की.

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और MGR के अस्पताल में भर्ती होने के बाद उठी सहानुभूति लहर ने कांग्रेस-AIADMK गठबंधन को राज्य और लोकसभा दोनों चुनावों में बड़ी जीत दिलाई.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि AIADMK गठबंधनों को लेकर हमेशा सावधान रही. 1977 की जीत कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद आई थी और इमरजेंसी के बाद डीएमके विरोधी माहौल ने इसमें मदद की.

प्रसिद्ध राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार ने कहा, “1996 तक कांग्रेस को राज्य की राजनीति में बड़ा खिलाड़ी माना जाता था. कहा जाता था कि तमिलनाडु में ढाई पार्टियां हैं — डीएमके, AIADMK और कांग्रेस. AIADMK ने वामपंथी दलों और छोटी क्षेत्रीय पार्टियों से भी गठबंधन किया.”

MGR की मौत और पहली टूट

24 दिसंबर 1987 को MGR की मौत के बाद पार्टी में खालीपन आ गया और यह दो गुटों में बंट गई. एक गुट का नेतृत्व जयललिता कर रही थीं और दूसरे का MGR की पत्नी जानकी.

यह पार्टी हमेशा एक व्यक्ति के करिश्मे पर टिकी रही थी. उनके बिना कोई स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं था. केवल यह लड़ाई थी कि कौन खुद को उनका असली राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित कर सकता है.

जहां जानकी सिर्फ 24 दिन मुख्यमंत्री रहीं, वहीं कार्यकर्ताओं का समर्थन धीरे-धीरे जयललिता की तरफ बढ़ने लगा. 1989 विधानसभा चुनाव में दोनों गुट अलग-अलग लड़े, जिससे 13 साल बाद डीएमके की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ हो गया.

बाद में दोनों गुट जयललिता के नेतृत्व में फिर एक हो गए और 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद उठी सहानुभूति लहर ने उन्हें भारी जीत दिलाई.

अरुण कुमार ने कहा, “MGR की मौत के बाद जयललिता ने अपने करिश्मे का इस्तेमाल किया और AIADMK को उस स्थिति से फिर खड़ा किया, जहां माना जा रहा था कि पार्टी का कोई भविष्य नहीं है. पार्टी अपने पहले उत्तराधिकार संकट से बच गई थी.”

जयललिता: ‘अम्मा’ ब्रांड बनाने की कहानी

जे. जयललिता ने छह कार्यकालों में कुल 14 साल से ज्यादा समय तक तमिलनाडु पर शासन किया.

“अम्मा” की छवि ने उनके समर्थकों में लगभग धार्मिक भक्ति जैसी भावना पैदा कर दी थी. उनकी कल्याणकारी योजनाओं ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई.

राजनीतिक विश्लेषक रवींद्रन थुरैसामी ने कहा, “लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने वाली राजनीति ने पार्टी को फायदा पहुंचाया और 2016 में पार्टी ने 136 सीटें जीतीं. इसका बड़ा श्रेय राज्य में कल्याणकारी योजनाओं को जाता है.”

लेकिन उनके पहले कार्यकाल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगे.

उन पर अपनी घोषित आय से ज्यादा संपत्ति रखने का आरोप लगा और दिसंबर 1996 में उन्हें गिरफ्तार किया गया. इसके बाद कई साल तक कानूनी प्रक्रिया चली.

राजनीतिक विश्लेषक अरुण कुमार ने कहा, “भ्रष्टाचार के आरोप AIADMK के लिए बड़ा झटका थे और 1996 में माना जा रहा था कि पार्टी का कोई भविष्य नहीं है. लेकिन दो साल के भीतर जयललिता फिर सत्ता में लौट आईं.”

उन्होंने आगे कहा, “इसी तरह जब उन्होंने बीजेपी से समर्थन वापस लिया और बीजेपी ने डीएमके के साथ गठबंधन कर लिया, तब भी लोगों ने कहा कि AIADMK का भविष्य खत्म हो गया है. लेकिन जयललिता ने 2001 में फिर अपनी छवि बनाई. लोगों की नजर में अपनी छवि बदलने के बाद वह ‘अम्मा’ ब्रांड बनाने में सफल रहीं.”

2001 में जयललिता को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने AIADMK को जीत दिलाई और फिर सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए राज्यपाल से एक अयोग्य मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाने को कहा.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस नियुक्ति को गलत ठहराया. इसके बाद उन्होंने ओ. पन्नीरसेल्वम को अपनी जगह मुख्यमंत्री बनाया. ओपीएस ने यह भूमिका कई बार निभाई. 2014 में जब जयललिता को दोषी ठहराते हुए चार साल की सजा सुनाई गई, तब भी ओपीएस ने उनकी जगह संभाली और इस दौरान राज्य सरकार लगभग ठप हो गई थी.

2015 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया. इस फैसले पर काफी विवाद हुआ था. दिसंबर 2016 में उनकी मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ चल रही कार्रवाई बंद हो गई.

जयललिता की मौत के बाद एक और टूट

जयललिता की मौत के बाद सत्ता संघर्ष ने पार्टी को पूरी तरह बदल दिया.

उनकी करीबी सहयोगी वी. के. शशिकला को पार्टी का महासचिव बनाया गया. लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं ने इसका विरोध किया. 7 फरवरी 2017 को ओपीएस ने मरीना बीच पर सार्वजनिक रूप से उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया और कहा कि उन्हें जबरन इस्तीफा दिलवाया गया था.

शशिकला के पूरी तरह ताकत हासिल करने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति मामले में उनकी सजा को बरकरार रखा. उन्हें जेल भेज दिया गया और एडप्पादी के. पलानीस्वामी यानी ईपीएस मुख्यमंत्री बनाए गए.

ओपीएस और ईपीएस के बीच की लड़ाई अदालत तक पहुंच गई. दोनों पक्ष पार्टी के नाम और उसके चुनाव चिन्ह ‘दो पत्तियां’ पर दावा कर रहे थे. अगस्त 2017 में दोनों गुट फिर साथ आए, लेकिन तनाव दोबारा बढ़ गया. जुलाई 2022 में ओपीएस को पार्टी से निकाल दिया गया.

चुनाव आयोग और अदालतें इस लंबी लड़ाई का मैदान बन गईं कि असली AIADMK का प्रतिनिधित्व कौन करता है. कानूनी लड़ाई लंबे समय तक चलती रही, जबकि दोनों पक्ष संगठन में बहुमत दिखाने के लिए कार्यकर्ताओं और जिला सचिवों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे.

EPS के नेतृत्व में AIADMK

2021 के बाद मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में AIADMK ईपीएस के नेतृत्व में एक नेता वाली पार्टी बन गई, लेकिन एमजीआर और जयललिता की तरह ईपीएस के पास जनआकर्षण नहीं था.

पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ गठबंधन किया, जिससे उसका द्रविड़ आधार नाराज हो गया. इसके बाद डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 39 में से 38 सीटें जीत लीं.

AIADMK ने 2023 में बीजेपी से नाता तोड़ दिया, लेकिन 2025 तक फिर गठबंधन में लौट आई. 2026 विधानसभा चुनाव में पार्टी तीसरे स्थान पर पहुंच गई.

राजनीतिक विश्लेषक सुमंत रामम ने कहा, “ईपीएस जननेता नहीं हैं. उन्हें कोंगु वेल्लालर समुदाय और पश्चिमी जिलों का समर्थन मिला हुआ था, लेकिन वह पार्टी की पुरानी करिश्माई छवि को बनाए नहीं रख सके.”

उन्होंने कहा, “कुछ समय तक वह यह साबित कर पाए कि पार्टी उनके साथ है, लेकिन 2021 के बाद उन्होंने विधानसभा में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. विधानसभा में उनके छोड़े गए खालीपन का बड़ा असर पड़ा.”

सी. वी. शणमुगम ने ईपीएस की तीखी आलोचना की है. उन्होंने लगातार चुनावी हार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया और आरोप लगाया कि उन्होंने पार्टी के अंदर लोकतंत्र को दबाते हुए तानाशाह की तरह काम किया.

उन्होंने आरोप लगाया कि ईपीएस ने ओपीएस समेत निकाले गए नेताओं को वापस लेने से इनकार किया, चुनाव से पहले टीवीके से गठबंधन करने के सुझावों को नजरअंदाज किया और सहयोगी दलों को किनारे कर दिया.

शणमुगम ने मौजूदा नेतृत्व पर यह भी आरोप लगाया कि उसने हार के कारणों पर विचार करने या समीक्षा के लिए सामान्य परिषद की बैठक बुलाने की कोशिश नहीं की. एस. पी. वेलुमणि और सी. विजयभास्कर के समर्थन वाले बागी गुट ने लंबित मुद्दों पर चर्चा के लिए सामान्य परिषद की बैठक बुलाने की मांग की है.

राजनीतिक विश्लेषक रवींद्रन थुरैसामी ने कहा, “पार्टी को फिर से खड़ा करना मुश्किल होगा. एमजीआर और जयललिता जाति से ऊपर उठे हुए नेता थे, जिन्हें राज्य की सभी जातियों का समर्थन मिलता था. लेकिन जब ईपीएस की जातीय पहचान राजनीति में प्रमुख होने लगी, तो इससे वह व्यक्तिगत रूप से मजबूत हुए, लेकिन पार्टी की सभी जातियों में पकड़ कमजोर पड़ गई.”

पार्टी के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और AIADMK के दोनों गुट अब कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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