Monday, 27 June, 2022
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समीर वानखेडे़ एक साथ मुसलमान और SC दोनों क्यों नहीं हो सकते?

संवैधानिक नैतिकता का कार्य धर्मांतरण की सुविधा के बजाय संवैधानिक मूल्यों, मानदंडों और प्रावधानों की प्राप्ति सुनिश्चित करना है. धर्म और अन्तःकरण का व्यक्ति की पसंद के ईश्वर और अलौकिक शक्ति के साथ गहरा संबंध है. इस तरह का संबंध भौतिक वस्तुओं के लाभ की इच्छा से परे होता है.

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नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की मुंबई इकाई के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद ने एक नैतिक और संवैधानिक सवाल उठाया है कि क्या मुस्लिम समुदाय के कुछ समूह जो कि अपने साथ जातिगत भेदभाव होने का दावा करते हैं, उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए? इस विषय पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने हाल ही में दिप्रिंट में एक विचारोत्तेजक टिप्पणी लिखा हैं, जिसमें उन्होंने तर्क दिया है कि ऐसे समुदायों को एससी सूची में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि संविधान का अनुच्छेद-341, जो कि भारत के राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों की पहचान करने का अधिकार देता है, धर्म की कसौटी का उल्लेख नहीं करता है. अतः 1950 का राष्ट्रपति का वह आदेश जिसके तहत धर्म को आधार बनाकर एससी सूची अधिसूचित की गई है, वह मुसलमानों एवं इसाईयों के साथ भेदभावपूर्ण है.

दिलीप मण्डल आगे तर्क देते हैं कि इस विषय पर राष्ट्रपति का 1950 का मूल आदेश और 1956 और 1990 में आया संशोधित आदेश दरअसल एक संविधान बनने के बाद उपजी उस सोच का नतीजा है, जिसका मूल उद्देश्य भारतीय धर्मों (हिन्दू, सिख, बौद्ध) से अब्राहमिक धर्मों (ईसाई, इस्लाम) में होने वाले संभावित धर्मांतरण को रोकना रहा है, इसलिए उक्त आदेश भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, एवं 25 में समाहित समानता और धर्म एवं अंतःकरण की स्वतंत्रता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं.

इस लेख में एससी सूची की ऐतिहासिकता और संविधान सभा में उस पर हुई बहस के आधार पर दिलीप मण्डल के उक्त दावों का खंडन किया गया है.


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क्या एससी सूची की संकल्पना धर्म तटस्थ रखकर की गई थी?

दिलीप मंडल का पहला तर्क है कि अनुच्छेद 341 में उल्लेखित अनुसूचित जाति की कटेगरी को धर्म तटस्थ माना जाना चाहिए, क्योंकि इसमें धर्म को आधार बनाने का उल्लेख नहीं है. मुस्लिम और ईसाई धर्म के नेता भी यही सवाल उठाते हैं.
दरअसल, यह तर्क जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट से निकला है, जिसमें कहा गया है कि ‘भारत का संविधान अनुसूचित जाति सूची को किसी चुनिंदा धर्म तक सीमित नहीं रखता’ (पेज-139).

जब हम संविधान सभा में अनुसूचित जाति से संबंधित बहस को देखते हैं, तो उक्त कथन का खंडन हो जाता है. संविधान सभा में इस बात पर सहमति थी कि अनुसूचित जाति को आरक्षण दिया जाएगा और भारत के राष्ट्रपति अनुसूचित जाति की सूची में शामिल होने वाली जातियों, नस्लों और जनजातियों की सूची की अधिसूचना जारी करेंगे. मूल विचार यह था कि राष्ट्रपति, भारत सरकार (अनुसूचित जाति) आदेश-1936 के माध्यम से अधिसूचित पहले से मौजूद अनुसूचित जाति सूची का उपयोग करेंगे. उक्त आदेश की धारा 2 ने ‘ब्रिटिश सरकार को किसी भी जाति, नस्ल, जनजाति या जाति के भीतर के किसी समूह को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता देने का अधिकार दिया था’. 1936 के आदेश की धारा 3 ने धर्म को भी मानक बनाते हुए दो प्रावधान किए गए-
क) किसी भी भारतीय ईसाई को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा.
b) बंगाल में बौद्ध धर्म या जनजातीय धर्म को मानने वाले किसी भी व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा.

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भारत सरकार (अनुसूचित जाति) का आदेश-1936 यह स्पष्ट करता है कि अपनी स्थापना के समय से ही अनुसूचित जाति सूची कभी भी धर्म तटस्थ नहीं थी. हमारे संविधान निर्माताओं को इस तथ्य की जानकारी थी और अनुच्छेद 341 पर बहस के दौरान, वे इसी धारणा के तहत कार्य कर रहे थे कि मौजूदा सूची को सुधार के द्वारा राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से पुन: प्रस्तुत किया जाएगा. 1950 में राष्ट्रपति का आदेश भारत के विभाजन और रियासतों के एकीकरण से अनुसूचित जाति की सूची में उत्पन्न हुई अस्पष्टता को दूर करने के लिए भी आया था.

सिखों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का विचार

दिलीप मंडल का कहना है कि शुरुआत में एससी का दर्जा केवल उन समूहों के लिए था जो कि हिंदू धर्म को मानते हैं, और 1950 के संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश को 1956 में सिखों को और 1990 में नव बौद्धों को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया था’. यह कथन भी रंगनाथ मिश्र समिति की रिपोर्ट से ही लिया गया है जिसमें कहा गया है कि 1950 के राष्ट्रपति के आदेश को 1956 में सिखों और 1990 में नव बौद्धों को शामिल करने के लिए संशोधित किया गया था (पृष्ठ 139). इस कथन के आधार पर दिलीप मंडल का तर्क है कि मुसलमानों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति सूची से बाहर करने का यह एक जानबूझकर किया गया प्रयास है. इन समुदायों के सदस्य भी इसी तरह के आरोप लगाते हैं कि भारतीय गणराज्य ने एससी सूची में शामिल करने के लिए मानदंड तैयार करते समय भारतीय धर्मों और अब्राहमिक धर्मों के बीच अंतर को पैमाना बनाया है.

राष्ट्रपति के 1950 के आदेश की करीब से जांच यह साबित करती है कि उपरोक्त तर्क अधूरे हैं क्योंकि सिखों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रावधान 1950 के आदेश में ही किया गया था, ना कि 1956 के संशोधित आदेश के द्वारा जैसा कि आलोचकों का दावा है.

राष्ट्रपति के 1950 के आदेश का खंड-3 कहता है कि –

3- कोई भी व्यक्ति जो हिंदू धर्म से भिन्न धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा. बशर्ते कि पंजाब या पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ में रहने वाले रामदासी, कबीरपंथी, मज़हबी या सिल्कगर जाति के प्रत्येक सदस्य को उस राज्य के संबंध में अनुसूचित जाति का सदस्य माना जाएगा, चाहे वह हिंदू धर्म या सिख धर्म को मानता हो.

सच तो यह है कि 1956 का संशोधन आदेश केवल सिखों को शामिल करने के बजाय राज्यों के पुनर्गठन के कारण उत्पन्न अस्पष्टता को दूर करने के लिए आया था. इसलिए यह कहना कि सिखों को एक सोची-समझी रणनीति के तहत आजादी के बाद अनुसूचित जाति में शामिल किया गया, गलत है. सिखों को एससी सूची में शामिल करने की मांग 14 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा की बहस में की गई थी, जिसे संविधान निर्माताओं ने स्वीकार किया था.

सरदार हुकुम सिंह : मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया है. क्या इन चार सिख वर्गों* को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: बेशक, वे शामिल होंगे.

श्री के.एम. मुंशी: राष्ट्रपति को अनुच्छेद 300-ए के तहत अनुसूचित जातियों की सूची जारी करने का अधिकार है. इन जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में जगह मिलेगी.

सरदार हुकुम सिंह: इस बात की गारंटी कहां है कि राष्ट्रपति इन जातियों को उस सूची में शामिल करेंगे? हमने संविधान में इसे सुरक्षित करने के लिए सभी विशेषाधिकारों को त्याग दिया है, फिर भी ऐसा नहीं किया जा रहा है.

श्री के.एम. मुंशी: राष्ट्रपति के पास वह शक्ति है. राष्ट्रपति ने जो संकल्प दिया है, उसे निभाया जाना निश्चित है. इस निर्णय को सलाहकार समिति की रिपोर्ट में जगह मिली है कि सिख अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जाति का हिस्सा बनेंगी और अनुच्छेद 296 के तहत प्रदान किए विशेष लाभ प्राप्त करेंगी. इसे हम पहले ही पारित कर चुके हैं. उस प्रतिज्ञा पर वापस जाने का कोई सवाल ही नहीं है, आप इसे मुझसे लिखकर ले सकते हैं. मैं फिर दोहराता हूं कि पंजाब में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूची में सिख अनुसूचित जातियों को शामिल किया जाएगा.

*(मजहबी, कबीरपंथी, रामदसिया, बावरिया, सरेरा और सिलकीगर.

संविधान सभा की उक्त बहस का अंश भी स्पष्ट करता है कि एससी सूची को शुरू से ही धर्म तटस्थ मानकर कल्पना नहीं की गई थी. अगर ऐसा होता तो संविधान निर्माताओं ने सिखों को शामिल करने का आश्वासन देने के बजाय यह कहा होता कि यह सवाल नहीं उठता क्योंकि यह सूची धर्म तटस्थ होने जी रही है.

मुसलमानों का एससी सूची में शामिल होने का हक क्यों नहीं?

एससी के लिए आरक्षण का प्रावधान 1932 के पूना पैक्ट का परिणाम है, जो कि एससी समुदाय के नेताओं का कांग्रेस और हिंदू महासभा के नेताओं के बीच हुए एक समझौते का परिणाम है. उस समझौते के तहत अनुसूचित जाति के नेताओं ने अपने समुदाय को मिले पृथक निर्वाचक मंडल की अपनी मांग को छोड़ दिया था जिसके बदले में उन्हें आरक्षण का प्रावधान दिया गया था, जिसे बाद में संविधान में शामिल किया गया. मुस्लिम और सिख उस समझौते के पक्षकार नहीं थे क्योंकि दोनों ही समुदाय पृथक निर्वाचन मण्डल का लाभ ले रहे थे. इसलिए एससी के प्रतिनिधित्व का मुद्दा, हिंदुओं के भीतर के मामले के रूप में देखा गया. इसीलिए हिंदू महासभा ने कांग्रेस के साथ पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किया था. उस समय यदि मुस्लिम नेताओं ने अपने कुछ समुदायों को दलित वर्ग/अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने के लिए जोर दिया होता, तो मुस्लिम लीग को अपने हिस्से (पृथक निर्वाचक मंडल) से कुछ सीटों को छोड़ना पड़ता, और उन्हें भी पूना पैक्ट पर हस्ताक्षरकर्ता बनना पड़ता. सिखों को भी यही करना पड़ता.

जहां तक सिखों का सवाल है, उन्होंने संविधान सभा की अल्पसंख्यक समिति को अपने पृथक निर्वाचक मंडल को सौंप दिया था, जिसके बदले में उनके कुछ समुदायों को एससी सूची में शामिल करने का आश्वासन दिया गया था. चूंकि मुस्लिम लीग की पृथक निर्वाचन की मांग पाकिस्तान के गठन के रूप में प्रफुल्लित हुई, इसलिए मुसलमान नेतृत्व विशेष अधिकारों की मांग की बातचीत से बाहर हो गया क्योंकि उनके पास छोड़ने के लिए कुछ था ही नहीं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय गणराज्य की संकल्पना मुसलमानों के साथ सौतेला व्यवहार करने  के लिए की गई थी. यदि ऐसा कोई उद्देश्य होता, तो मुस्लिम समुदाय कभी भी एसटी और ओबीसी सूची में शामिल करके आरक्षण नहीं दिया गया होता.

केवल वही मुसलमान एससी सूची में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं जो ओबीसी आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं. सवाल उठता है कि वह ओबीसी सूची में घुटन क्यों महसूस कर रहे हैं? उन्हें एससी सूची क्यों आकर्षित कर रही है. मुझे इसके दो संभावित कारण दिखाता है. पहला, उनको OBC आरक्षण का लाभ ठीक से नहीं मिल पा रहा है; दूसरा उनकी मांग दलितों से अपनी सामाजिक स्थिति की तुलना का परिणाम है.

धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन

एससी सूची से मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर रखने को इस सूची में शामिल लोगों की धर्म और अन्तःकरण की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया जाता है, क्योंकि यह अनुसूचित जाति के व्यक्तियों की धर्मांतरण के लिए उनकी पसंद को सीमित करता है. धर्मांतरण का अधिकार धर्म और अन्तःकरण की स्वतंत्रता का एक अनिवार्य घटक है. उक्त तर्क से सहमति व्यक्त करते हुए दिलीप मंडल बताते हैं कि उक्त प्रावधान संवैधानिक नैतिकता के विरुद्ध हैं.

संवैधानिक नैतिकता का कार्य धर्मांतरण की सुविधा के बजाय संवैधानिक मूल्यों, मानदंडों और प्रावधानों की प्राप्ति सुनिश्चित करना है. धर्म और अन्तःकरण का व्यक्ति की पसंद के ईश्वर और अलौकिक शक्ति के साथ गहरा संबंध है. इस तरह का संबंध भौतिक वस्तुओं के लाभ की इच्छा से परे होता है. भौतिक लाभ का लालच किसी भी व्यक्ति को धर्म परिवर्तित करने से नहीं रोक सकता यदि व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना के आधार पर आश्वस्त हो जाता है कि फलां भगवान या धर्म उसके विवेक के लिए सबसे उपयुक्त होगा. अतः यह पूरा तर्क दलितों के धर्म की पसंद को लांछित करता है।

(अरविन्द कुमार (@arvind_kumar__), पीएचडी स्कॉलर, डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इंटेरनेशनल रिलेशन, रॉयल हालवे, यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन)


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