नई दिल्ली: 26 अगस्त को नेपाल हालिया इतिहास की सबसे विनाशकारी बाढ़ में से एक के साथ जागा. शुक्रवार तक मरने वालों की संख्या बढ़कर कम से कम 547 हो गई, जबकि करीब 1,500 लोग अब भी लापता थे. इनमें 290 भारतीय पर्यटक भी शामिल हैं.
ताज़ा सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक, इस त्रासदी की शुरुआत नेपाल की सीमाओं के बाहर हुई. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हिमालय के ऊपरी हिस्से में ग्लेशियर का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट गया और 5,200 मीटर की शुरुआती ऊंचाई से 1,200 मीटर नीचे घाटी में जा गिरा.
ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की सैटेलाइट तस्वीरों में दिखा कि ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा ढह गया. इससे बर्फ, चट्टानों और मलबे का एक बहुत बड़ा हिमस्खलन हुआ, जो पहाड़ की ढलान से तेज़ी से नीचे आया. इसका असर इतना जबरदस्त था कि आपदा के शुरुआती घंटों में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (US Geological Survey) ने इससे पैदा हुई झटकों को गलती से 4.4 तीव्रता का भूकंप मान लिया.
बाद में पता चला कि ग्लेशियर इतनी ताकत से घाटी की ज़मीन पर गिरा था कि उससे 5.2 तीव्रता की घटना के बराबर “भूकंप जैसी” भूकंपीय ऊर्जा पैदा हुई.
नेपाल के लिए सबसे बुरा दौर अभी खत्म नहीं हुआ है. आने वाले दिन देश के शुरुआती चेतावनी सिस्टम, आपदा से निपटने की क्षमता, स्वास्थ्य ढांचे और सबसे बढ़कर लोगों और समुदायों की मुश्किल हालात से उबरने की क्षमता की कड़ी परीक्षा लेंगे.
लेकिन यह आपदा शायद पूरे हिमालयी क्षेत्र में आने वाले इससे भी बड़े संकट की सिर्फ शुरुआत है, जो नेपाल की सीमाओं पर नहीं रुकेगा. जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, ग्लेशियर पिघलेंगे और नदियों में उनकी क्षमता से कहीं ज्यादा पानी बढ़ेगा, वैसे-वैसे ऐसी तबाही हिमालय के लिए नया सामान्य बन सकती है.
इस बढ़ते खतरे के बावजूद सरकारें ऐसी स्थिति के लिए अभी भी ठीक से तैयार नहीं हैं. इस तबाही का बड़ा स्तर, इसके पीछे के ढांचागत कारण और शुरुआती चेतावनी व पूर्वानुमान की जानकारी पहुंचाने में हुई गंभीर कमियां ही वजह हैं कि नेपाल की बाढ़ इस हफ्ते दिप्रिंट की न्यूज़मेकर ऑफ द वीक है.
आपदा कैसे हुई?
तिब्बत और नेपाल में बाढ़ आने की पहली खबरों के कुछ ही मिनट बाद घरों, पुलों और सड़कों के बह जाने के डरावने वीडियो और तस्वीरें सामने आने लगीं. घबराए हुए स्थानीय लोग एक पल बढ़ती नदी को हैरानी से देखते नज़र आए और अगले ही पल अपनी जान बचाने के लिए भागते दिखे.
सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि बाढ़ का पानी सबसे ज्यादा प्रभावित रसुवा जिले के लोगों के घरों तक पहुंचने से कई दिन पहले ही, यह आपदा सैकड़ों किलोमीटर दूर और इंसानी आबादी से बहुत दूर शुरू हो चुकी थी.
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) में रिमोट सेंसिंग और जियोइन्फॉर्मेशन एसोसिएट सार्थक श्रेष्ठ ने कहा, “अब तक मिले सबूत बताते हैं कि स्याब्रुबेसी के ऊपर हुए हिमस्खलन ने नदी को रोक दिया और इसके बाद बाढ़ आई.”
असल में क्या हुआ था, इसका अंतिम आकलन अभी जारी होना बाकी है, लेकिन शुरुआती समझ के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने के बाद चट्टानों, बर्फ और मलबे का एक तेज़ बहाव घाटी से होकर गुज़रा और फिर ल्हेंडे खोला नदी से टकराया. यह नदी भोटे कोशी नदी में पानी पहुंचाने वाली एक सहायक नदी है. जमा हुए मलबे और चट्टानों ने भूस्खलन से एक अस्थायी बांध बना दिया, जिसके पीछे पानी फंस गया. जब यह प्राकृतिक बांध टूट गया, तो जमा पानी बहुत तेज़ ताकत के साथ नीचे की ओर बहा और रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर दिया.
क्षेत्रीय अंतर-सरकारी लर्निंग और नॉलेज-शेयरिंग सेंटर ICIMOD ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा कि गलछी में त्रिशूली नदी का जलस्तर कथित तौर पर 30 मिनट के भीतर नौ मीटर तक बढ़ गया. वहीं, मालेखु में इसी तरह के समय में जलस्तर सात मीटर बढ़ गया.
बयान में आगे कहा गया, “घटना के दौरान त्रिशूली नदी के किनारे कई जल निगरानी स्टेशन कथित तौर पर क्षतिग्रस्त हो गए या बह गए, हालांकि गलछी निगरानी स्टेशन अब भी काम कर रहा है.”
नेपाल में दिप्रिंट से बात करने वाले प्रत्यक्षदर्शी अर्जुन रेमल ने बताया कि वह रसुवा में एक पुल पर काम कर रहे थे, तभी उनके फोन पर नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) की तरफ से इमरजेंसी अलर्ट आया.
रेमल ने कहा, “यह सब इतना अचानक हुआ कि हमें यह समझने तक का समय नहीं मिला कि क्या हो रहा है.”
जलवायु परिवर्तन और शुरुआती चेतावनी सिस्टम में कमी
नेपाल की यह आपदा इस बात का सबूत है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली घटनाएं अब न सिर्फ ज्यादा बार हो रही हैं, बल्कि पहले से ज्यादा खतरनाक और भयानक भी होती जा रही हैं. यह प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए मजबूत शुरुआती चेतावनी सिस्टम और देशों के बीच सीमा पार तालमेल की तुरंत ज़रूरत को भी दिखाती है.
पूरे हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में पहले से तैयारी कर आपदाओं से निपटने की जरूरत अब पहले से कहीं ज्यादा साफ दिखाई दे रही है. इस साल की शुरुआत में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), आईआईटी भुवनेश्वर और डिफेंस जियोइन्फॉर्मेटिक्स रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट के वैज्ञानिकों की ओर से प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में बताया गया था कि तेज़ी से बदलती जलवायु ने हिमालय के ग्लेशियरों को ढांचागत रूप से कमजोर कर दिया है. इसकी वजह से खड़ी चट्टानों से लटके बर्फ के अस्थिर हिस्से बन रहे हैं, जिन्हें हैंगिंग ग्लेशियर कहा जाता है और जो कभी भी टूटकर गिरने के लिए तैयार हैं.
ICIMOD की एक दूसरी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियर पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ रहे हैं. स्टडी में बताया गया कि 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र ने अपने कुल ग्लेशियर क्षेत्र का 12 प्रतिशत और बर्फ की कुल मात्रा का 9 प्रतिशत खो दिया.
इन गंभीर चेतावनियों के बावजूद, इन युवा पहाड़ों को साझा करने वाले ज्यादातर देशों का रुख पहले से तैयारी करने के बजाय आपदा होने के बाद प्रतिक्रिया देने वाला ही बना हुआ है. पिछले एक दशक में कई भयानक प्राकृतिक आपदाओं के बाद भी नेपाल अभी तक ऐसा व्यापक शुरुआती चेतावनी सिस्टम विकसित नहीं कर पाया है, जो संकट से पहले ही एडवांस पूर्वानुमान जारी कर सके और लोगों को अचानक आपदा में फंसने से बचा सके.
दरअसल, मौजूदा बाढ़ के दौरान नेपाल में पत्रकारों और पूर्व मंत्रियों समेत कई लोगों ने आरोप लगाया कि चीन ने नेपाल सरकार को नीचे की ओर बहने वाले पानी और संभावित खतरे को लेकर समय पर चेतावनी नहीं दी.
हालांकि, शुक्रवार को तिब्बत-नेपाल सीमा पर बन रही एक नई बैरियर झील को लेकर नया अलर्ट जारी किया गया. यह झील आने वाले दिनों में टूट सकती है और एक और बड़ी आपदा ला सकती है. सबसे अहम बात यह है कि इस बार चेतावनी बहुत देर होने से पहले जारी कर दी गई.
भविष्य की तैयारी
नेपाल की बाढ़ एक दर्दनाक याद दिलाती है कि जलवायु संकट भविष्य का कोई दूर का खतरा नहीं है. हिमालय में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ता तापमान और वहां के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना आने वाले वर्षों में ऐसी आपदाओं का खतरा और बढ़ाएगा.
इसके अलावा, बाढ़ की आशंका वाले संवेदनशील इलाकों में बिना योजना के विकास और सीमा पार आपदा से निपटने की प्रभावी योजनाओं की कमी से भविष्य में जानमाल का नुकसान बढ़ना तय है. भारत के सिक्किम में 2023 की ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), 2021 की चमोली आपदा और 2025 में धराली में आई अचानक बाढ़, ये सभी उस कहीं ज्यादा भयावह तस्वीर की सिर्फ झलक थे, जो इस पूरे क्षेत्र का इंतजज़ार कर रही है.
नेपाल निश्चित रूप से इन बाढ़ों के बाद फिर से खुद को खड़ा करेगा और दोबारा संभलेगा, जैसे वह पहले भी ऐसी दर्जन से ज्यादा आपदाओं से उबर चुका है, लेकिन सबसे अहम सवाल अब भी बना हुआ है: क्या यह ताजा आपदा आखिरकार कोई सार्थक और व्यवस्था में बड़े बदलाव लाएगी, या फिर यह भी हिमालय में हुई आपदाओं की लंबी और लगातार बढ़ती सूची में एक और भुला दी जाने वाली त्रासदी बनकर रह जाएगी?
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