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Tuesday, 27 October, 2026
होममत-विमतZara-H&M की कहानी से भारत क्या सीख सकता है? यह फैशन इंडस्ट्री में बदलाव का वक्त है

Zara-H&M की कहानी से भारत क्या सीख सकता है? यह फैशन इंडस्ट्री में बदलाव का वक्त है

कपड़ों और फैशन में एक्सक्लूसिविटी की परिभाषा बड़े पैमाने पर बनाए गए, स्टैंडर्ड मर्चेंडाइज़ से बदलकर दिखने वाली इंसानी कारीगरी और नेचुरल चीज़ों की ओर जा रही है.

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दुनिया के अलग-अलग बाजारों में फैशन रिटेल कंपनियां अपने स्टोर नेटवर्क की फिर से समीक्षा कर रही हैं, क्योंकि ग्राहकों की बदलती पसंद और आर्थिक दबावों से इस उद्योग का स्वरूप बदल रहा है. H&M अपने स्टोर बंद कर रही है, जबकि Lululemon की बिक्री की रफ्तार धीमी हो रही है. वहीं, Zara लगातार अपनी कमाई और मुनाफे में बढ़ोतरी दर्ज कर रही है.

अगर उद्योग की ये सभी चुनौतियां इन ब्रांडों को प्रभावित कर रही हैं, तो फिर इनके कारोबार में इतना अंतर क्यों दिखाई दे रहा है? क्या इसकी वजह सिर्फ ग्राहकों के खर्च में कमी है, या कुछ ब्रांड ग्राहकों की बदलती पसंद, कीमतों से जुड़ी उम्मीदों और मांग के हिसाब से खुद को बेहतर तरीके से ढाल रहे हैं?

कंपनियों की वित्तीय स्थिति क्या बताती है?

कंपनियों की बैलेंस शीट पर नज़र डालने से साफ पता चलता है कि कौन से ब्रांड बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. हम दो अलग-अलग श्रेणियों के चार ब्रांडों पर नज़र डालते हैं. हाई-स्ट्रीट रिटेल में Zara और H&M, जबकि लग्जरी क्षेत्र में Prada Group का Miu Miu और Burberry.

हाई-स्ट्रीट रिटेल में Zara अपने प्रतिद्वंद्वी H&M से काफी आगे है. भारत में Zara के करीब 22 स्टोर हैं, जबकि H&M के 67 स्टोर हैं. इसके बावजूद Zara की शुद्ध बिक्री H&M से दोगुनी है.

हालांकि H&M ने वित्त वर्ष 2025 में अपने ऑपरेटिंग प्रॉफिट में बढ़ोतरी दर्ज की है, लेकिन उसकी शुद्ध बिक्री पर नजर डालने से पता चलता है कि इसमें 3 प्रतिशत की गिरावट आई है.

आसान शब्दों में कहें तो इसका मतलब है कि ब्रांड पहले के मुकाबले कम कपड़े बेच रहा है. कुल मुनाफे में बढ़ोतरी की मुख्य वजह कामकाज के खर्चों में भारी कटौती है. इसमें साल भर के दौरान 128 स्टोर बंद करना भी शामिल है.

लग्जरी क्षेत्र में Prada की सहायक कंपनी Miu Miu की शुद्ध बिक्री में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इससे वित्त वर्ष 2026 में, जो मार्च में खत्म हुआ, Prada Group की कुल बिक्री में 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इससे एक साल पहले समूह की बिक्री में 4 प्रतिशत की गिरावट आई थी.

वहीं, Burberry ने अपनी नई रणनीति “Burberry Forward” के तहत स्टोरों की बिक्री में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है. इस रणनीति का उद्देश्य ब्रांड को उसकी पुरानी पहचान की ओर वापस ले जाना है. हालांकि, कामकाज के खर्चों में कटौती के बावजूद कई सालों से उसकी बिक्री में गिरावट आ रही थी.

ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन (FY23–FY26) यह दर्शाते हैं कि मिड-मार्केट में मार्जिन पर दबाव के बावजूद, प्राडा (Prada) का हाई-मार्जिन वाला कारीगरी-आधारित मॉडल और ज़ारा (Zara) का चुस्त इन्वेंट्री अनुशासन काफी मजबूत बना हुआ है / श्रुति नैथानी

कुछ ब्रांड सफल क्यों हो रहे हैं और कुछ क्यों नहीं?

पिछले कुछ वर्षों में सादे और हल्के रंगों वाले कपड़ों को “क्वाइट लग्जरी” यानी बिना ज्यादा दिखावे वाली लग्जरी के रूप में पेश किया गया. लेकिन अब यह चलन फिर बदल रहा है और लोग ज्यादा आकर्षक, बोल्ड और अलग दिखने वाले कपड़ों की ओर बढ़ रहे हैं. वोग मैगज़ीन की Pinterest Predicts ट्रेंड रिपोर्ट भी इसी बदलाव की ओर इशारा करती है.

फास्ट फैशन कंपनियों, जैसे Shein और Temu, ने सादे रंगों और डिजाइनों वाले कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन और वितरण किया. इससे लोगों को एक ही तरह के कपड़े देखकर ऊब महसूस होने लगी. H&M जैसे ब्रांड, जो सुरक्षित और सादे रंगों वाले कपड़ों पर बहुत ज्यादा निर्भर थे, उनकी बिक्री में गिरावट आई.

दूसरी ओर, Zara ने लगातार बढ़ोतरी दर्ज की है. कंपनी के पास अपने 700 डिजाइनरों की टीम है. इसकी मदद से Zara ने अपनी अलग डिजाइन पहचान बनाए रखी. उसके कपड़े देखने में आकर्षक होते हैं और उनकी सिलाई भी अच्छी होती है. इस तरह ब्रांड ने ग्राहकों की एक जैसे कपड़े देखकर होने वाली ऊब को दूर करने की कोशिश की.

लग्जरी क्षेत्र में भी यही अंतर दिखाई देता है. Burberry की बिक्री में कई सालों तक गिरावट आई, क्योंकि वह अपने ब्रांड नाम पर बहुत ज्यादा निर्भर रहा और उसकी मार्केटिंग रणनीतियां दूसरे ब्रांडों से अलग नहीं थीं. दूसरी ओर, Prada के Miu Miu ने अपनी अलग और मजबूत डिजाइन पहचान के दम पर लगातार बढ़ोतरी दिखाई.

इसी सोच के तहत Burberry ने “Burberry Forward” रणनीति शुरू की. इसके जरिए ब्रांड अपनी पहचान को ब्रिटेन की पारंपरिक शैली और खास कश्मीरी कपड़ों जैसे उत्पादों की ओर वापस ले जा रहा है. 2023 से लगातार बिक्री में गिरावट के बाद अब इसके स्टोरों की बिक्री में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

लेकिन इस बदलाव की वजह सिर्फ डिजाइन नहीं है. ग्राहकों की पसंद भी बदल गई है.

McKinsey & Company की 2026 की रिपोर्ट “द स्टेट ऑफ फैशन 2026” के मुताबिक, 2024 से अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ यानी आयात शुल्क ने कपड़ों और दूसरी वस्तुओं की कीमतें सीधे बढ़ाई हैं. इससे ग्राहकों के भरोसे और गैर-जरूरी चीजों पर खर्च करने को लेकर अनिश्चितता भी बढ़ी है. यह रिपोर्ट हर साल जारी होती है और इसमें वैश्विक फैशन उद्योग, अर्थव्यवस्था, सप्लाई चेन और ग्राहकों की सोच में होने वाले बदलावों का व्यापक विश्लेषण किया जाता है.

जेनरेशन Z और मिलेनियल पीढ़ी के ग्राहक अब कपड़ों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और उनकी सप्लाई चेन के बारे में ज्यादा जागरूक हैं. आर्थिक और पर्यावरण से जुड़ा दबाव बढ़ने के कारण वे सिर्फ ब्रांड की छवि या प्रतिष्ठा के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने को तैयार नहीं हैं.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, आज के ग्राहक ऐसे ब्रांड भी चाहते हैं, जिनसे वे भावनात्मक जुड़ाव महसूस कर सकें, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें और जिनकी सोच उनके जैसी हो. लेकिन वे चीजों को बहुत ध्यान से परखते भी हैं. ग्राहक असली उद्देश्य और सिर्फ समुदाय से जुड़ने का दिखावा करने के बीच अंतर समझ सकते हैं.

इसका एक उदाहरण एथलीजर यानी खेल और रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले कपड़ों के क्षेत्र में अग्रणी ब्रांड Lululemon है. 2022 में इस ब्रांड ने “Be Human, Be Well, and Be Planet” यानी इंसान, स्वास्थ्य और धरती की भलाई का संदेश अपनी पहचान का हिस्सा बनाया. कंपनी ने अपने स्टोरों में योग स्टूडियो, स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रम और स्थानीय ब्रांड प्रतिनिधियों के नेटवर्क भी बनाए.

लेकिन स्टोरों में ऐसे अनुभव देने के बावजूद ब्रांड की कहानी और उसके उत्पादों के बीच का अंतर दूर नहीं हो पाया. बाजार में Lululemon जैसे दिखने वाले सस्ते विकल्पों की भरमार हो गई. इसके अलावा, एथलीजर ब्रांड Aastey ने Shark Tank India में दावा किया था कि वह Lululemon के साथ उसी चीनी सप्लायर से अपने कलेक्शन बनवाता है. इससे Lululemon के उत्पादों की अलग पहचान और खासियत कमजोर हुई.

इसके साथ ही, Lululemon का बहुत ज्यादा मात्रा में पेट्रोलियम आधारित सिंथेटिक कपड़े इस्तेमाल करने पर निर्भर रहना भी ग्राहकों और ब्रांड के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ने की वजह हो सकता है. एक साल के दौरान कंपनी के बाजार मूल्य में 50 प्रतिशत से ज्यादा की भारी गिरावट और बिक्री में कमी इसी स्थिति की ओर इशारा करती है.

कीमत और इन्वेंट्री का प्रबंधन

ब्रांड की पहचान के अलावा, मुनाफा कमाने के लिए दो चीजें सही होना जरूरी हैं. पहली, उत्पादों की कीमत ऐसी होनी चाहिए जिसे ग्राहक खर्च के हिसाब से सही मानें. दूसरी, स्टॉक यानी इन्वेंट्री का सही प्रबंधन होना चाहिए.

सफल ब्रांडों ने अपनी अलग डिजाइन पहचान के साथ प्रीमियम कीमतों को संतुलित रखा है और स्टॉक का बहुत सावधानी से प्रबंधन किया है. ऐसे प्रतिस्पर्धी बाजार में, जहां आर्थिक दबाव बढ़ रहा है, सही कीमत तय करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है.

2023 में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर में लग्जरी उत्पादों को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के असर पर चर्चा की गई थी. इसमें सबसे बड़ी चुनौती यह बताई गई थी कि ऊंचे दर्जे और प्रतिष्ठा का एहसास देने वाले डिजाइन ऐसे दाम पर कैसे उपलब्ध कराए जाएं, जिन्हें ग्राहक आसानी से चुका सकें या जो उन्हें कीमत के हिसाब से सही लगें.

Zara इस संतुलन का अच्छा उदाहरण है. यह पारंपरिक फास्ट फैशन ब्रांडों की तुलना में थोड़ी ज्यादा कीमत लेता है, लेकिन इसके उत्पादों में डिजाइन की खास पहचान होती है. दूसरी ओर, H&M जैसे ब्रांडों के डिजाइन में अलग पहचान कम है और उनके उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते हैं. इसलिए उन्हें बड़े पैमाने पर एक जैसे उत्पाद बनाने वाले दूसरे ब्रांडों से सीधी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी बिक्री में गिरावट आती है.

इसी तरह, इन्वेंट्री का प्रबंधन भी ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों और संघर्ष कर रहे रिटेल ब्रांडों के बीच अंतर पैदा करता है. Zara अपने डिजाइनरों की मदद से बड़े फैशन शो में दिखाए गए नए ट्रेंड को ऐसे कपड़ों में बदल देता है, जिन्हें आम लोग पहन सकें. इसकी डिजाइन पहचान भी अलग होती है और यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ 15 से 20 दिनों में पूरी हो सकती है.

कंपनी डेटा के आधार पर कामकाज संभालती है और कम मात्रा में कपड़े बनाती है. जानबूझकर सीमित उत्पादन करने से वह अपने उत्पादों की एक तरह की “कलात्मक कमी” बनाए रखती है. इसके उलट, H&M एशियाई देशों, खासकर चीन, बांग्लादेश और भारत में होने वाले उत्पादन पर काफी निर्भर है. बुनियादी कपड़ों को तैयार करने में उसे छह महीने तक लग सकते हैं. इसके लिए लंबे समय पहले योजना बनानी पड़ती है, जिससे उत्पादन की मात्रा और ग्राहकों की बदलती मांग के बीच तालमेल बिगड़ने का खतरा रहता है.

इन कंपनियों के प्रदर्शन में अंतर को समझने से रिटेल कारोबार में सफल बने रहने का एक साफ मॉडल सामने आता है. यह मॉडल Apple जैसी उन तकनीकी कंपनियों की रणनीति से मिलता-जुलता है, जो अपने उत्पादों को खास बनाते हुए उन्हें ज्यादा लोगों की पहुंच में रखती हैं.

Apple सस्ते दामों की होड़ में शामिल होने से बचता है. इसके बजाय वह अपने उत्पादों के खास डिजाइन, कीमतों की स्पष्ट श्रेणियों और सीमित स्टॉक पर ध्यान देता है. इससे बाजार में सामान की सप्लाई जरूरत से ज्यादा नहीं होती और दोबारा बेचने पर भी उत्पादों की कीमत बनी रहती है. फैशन और कपड़ों के कारोबार में भी यही रणनीति कारगर दिखाई देती है.

ऐसे कपड़े तैयार करना, जिनका डिजाइन अलग हो और जिनकी नकल बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली कंपनियां आसानी से न कर सकें, सही रणनीति का हिस्सा है. इसके साथ ही, ऐसी “प्रीमियम लेकिन ग्राहकों की पहुंच में” कीमत तय करना जरूरी है, जिससे ग्राहकों को अपने पैसे की अच्छी कीमत मिले. स्टॉक पर कड़ा नियंत्रण रखने से भारी छूट देने की जरूरत कम होती है और उत्पादों की दोबारा बिक्री की कीमत भी बनी रहती है. यही रणनीति सफल साबित होती दिखाई दे रही है.

सफल ब्रांडों ने प्रीमियम कीमतों और इन्वेंट्री के सख्त प्रबंधन के बीच सही संतुलन बनाया है / श्रुति नैथानी

भारत के लिए अवसर कहां है?

भारत के लिए असली अवसर यहीं है और इसी क्षेत्र में वह अपनी अलग पहचान बना सकता है. हाथों से होने वाले कारीगरी के काम को अब प्रीमियम और लग्जरी उत्पादों की खासियत के रूप में देखा जा रहा है. Chanel के हस्तनिर्मित Métiers d’Art कलेक्शन और Bottega Veneta के हाथ से बुने जाने वाले Intrecciato चमड़े के उत्पाद इस बदलाव के उदाहरण हैं. ट्रेंड का अनुमान लगाने वाली कंपनी Mintel ने भी 2026 के ब्यूटी ट्रेंड्स में इसे “ह्यूमन टच रिवॉल्यूशन” यानी इंसानी हुनर की वापसी का नाम दिया है.

कपड़ों और फैशन उत्पादों में खास होने का मतलब अब बदल रहा है. अब हाथों से की गई ऐसी कारीगरी को ज्यादा महत्व मिल रहा है, जिसकी नकल एल्गोरिदम नहीं कर सकते. इसी तरह, प्राकृतिक सामग्री भी अहम हो रही है, क्योंकि उसे बड़े पैमाने पर आसानी से तैयार नहीं किया जा सकता.

जनवरी 2026 में हुए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के तहत, भारत में पूरी तरह काते और बुने गए प्राकृतिक रेशों पर शून्य टैरिफ यानी कोई आयात शुल्क नहीं है.

दुनिया में लिनेन कपड़े का बाजार 18 अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है. यह प्राकृतिक और हवा को आसानी से गुजरने देने वाले कपड़ों की बढ़ती मांग को दिखाता है. वैश्विक बाजार पहले से ही चीन और वियतनाम जैसे देशों के बड़े पैमाने पर तैयार किए जाने वाले कम मुनाफे वाले “कट-मेक-ट्रिम” यानी कपड़ा काटने, सिलने और तैयार करने वाले उत्पादों या फास्ट फैशन से भरे हुए हैं.

इसलिए सवाल यह है कि भारत सिर्फ सस्ते कपड़ों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तक सीमित रहने के बजाय, कपड़ों के उत्पादन की ऐसी मूल्यवर्धित व्यवस्था की ओर कैसे बढ़ सकता है, जिसमें वह अपने पहले से मौजूद प्रतिस्पर्धी लाभ का इस्तेमाल कर सके?

PM-MITRA योजना के तहत कपड़ों का उत्पादन

भारत सरकार की प्रमुख PM MITRA यानी प्रधानमंत्री मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल एंड अपैरल पार्क योजना का उद्देश्य कपड़ा और परिधान निर्माण के पूरे ढांचे को मजबूत करना है. इसके लिए सरकार का 5F विजन है: फार्म से फाइबर, फाइबर से फैक्ट्री, फैक्ट्री से फैशन और फैशन से विदेश तक.

कपड़ा मंत्रालय के तहत शुरू की गई यह योजना कपड़ा उद्योग के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने की पहल है. PM MITRA जैसी योजनाएं अब सरकार की उन प्राथमिकताओं के साथ जुड़ रही हैं, जिनमें मानव निर्मित रेशों (MMF) और तकनीकी कपड़ों का उत्पादन बढ़ाना शामिल है.

लेकिन सिर्फ उत्पादन क्षमता बढ़ाना ही पूरी चुनौती नहीं है. अगर भारत वैश्विक कपड़ा उद्योग में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे डिजाइन, उत्पाद विकास और बाजार की बदलती मांग के हिसाब से तेजी से काम करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी.

मूल्यवर्धित कपड़ों के उत्पादन की प्रक्रिया, “कट-मेक-ट्रिम” मॉडल से अलग होती है. कट-मेक-ट्रिम कपड़ा निर्माण का सबसे निचला स्तर है और ज्यादातर फास्ट फैशन फैक्ट्रियां इसी मॉडल पर काम करती हैं. इसमें फैक्ट्रियां मुख्य रूप से खरीदारों की ओर से दिए गए निर्देशों के अनुसार कपड़ा काटती हैं, कपड़े सिलती हैं और उत्पाद को अंतिम रूप देती हैं.

मूल्यवर्धित कपड़ों के उत्पादन के लिए ऐसा ODM यानी ओरिजिनल डिजाइन मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अपनाना होगा, जिसमें डिजाइन तैयार करने और उत्पादन करने वाली कंपनियां मिलकर काम करें. इसे प्रीमियम और लग्जरी बाजारों से जोड़ना भी जरूरी होगा. भारत के PM MITRA केंद्रों में ऐसा करने के लिए मांग के आधार पर एक व्यवस्थित व्यवस्था बनानी होगी. इसके जरिए कारीगरों के हुनर को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ा जा सकेगा, न कि उनकी कला को अलग-अलग छोटे घरेलू उद्योगों तक सीमित रखा जाएगा.

सबसे पहले, भारत के प्रमुख डिजाइनरों और राष्ट्रीय फैशन डिजाइन संस्थानों, जैसे NIFT और IITs, को फ्रांस के लग्जरी समूह Kering की वैश्विक रिसर्च और डेवलपमेंट प्रयोगशालाओं के साथ जोड़ने के लिए सहयोग को बढ़ावा देना होगा. यह काम उनके प्रमुख और विशेष रूप से तैयार किए गए कार्यक्रमों के जरिए किया जा सकता है.

दूसरा, कपड़ों के उत्पादन से जुड़ी सैंपल बनाने जैसी प्रक्रियाओं को तकनीक की मदद से सप्लाई चेन का हिस्सा बनाना होगा. ग्लोबल सप्लाई चेन में अलग-अलग देशों के बीच असली सैंपल बार-बार भेजना और मंगाना व्यावहारिक नहीं है. इसलिए Adobe Substance 3D Sampler और CLO3D जैसे कपड़ों के डिजाइन सॉफ्टवेयर की मदद से डिजिटल प्रोटोटाइप तैयार करने होंगे. इससे कपड़ों के सैंपल जल्दी बनाए जा सकेंगे और तैयार उत्पाद की फिटिंग भी जांची जा सकेगी.

आखिर में, पेरिस और मिलान जैसी प्रमुख फैशन राजधानियों में रणनीतिक कार्यालय स्थापित करने होंगे. ये कार्यालय असली सैंपल तैयार करने और विदेशी ग्राहकों तथा भारत में मौजूद उत्पादन केंद्रों के बीच कारोबारी बातचीत को आसान बनाने में मदद करेंगे.

हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय को ध्यान में रखना जरूरी है.

PM MITRA योजना 2021 में शुरू की गई थी. लेकिन पांच साल बाद भी इसके सात बड़े पार्कों में से ज्यादातर शुरुआती विकास के चरण में हैं. शुरुआती दौर में लिए जाने वाले फैसले आने वाले कई दशकों तक भारत के कपड़ा उद्योग का भविष्य तय करेंगे.

हस्तशिल्प की विरासत और प्राकृतिक रेशों के उत्पादन से जुड़ा एकीकृत ढांचा भारत की अपनी ताकत है. अगर इन्हें प्रीमियम फैशन की वैश्विक सप्लाई चेन से अच्छी तरह जोड़ा जाए, तो भारत दुनिया भर में डिजाइन आधारित कपड़ा उद्योग का एक बड़ा केंद्र बन सकता है.

विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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