प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिवंगत स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के होलोग्राफिक अवतार से बातचीत ने मुझे ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा की वह तस्वीर याद दिला दी, जब उन्होंने 81 साल की उम्र में आखिरकार एक स्मार्टफोन लिया. यह वामपंथी नेता की रविवार को दक्षिणपंथी नेता फ्लावियो बोल्सोनारो के खिलाफ होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के अंतिम मुकाबले से पहले ऑनलाइन पीढ़ी से जुड़ने की एक बेताब कोशिश थी.
लूला दा सिल्वा के उलट, PM मोदी भारत के सबसे ज्यादा टेक्नोलॉजी को समझने वाले नेताओं में से एक रहे हैं. फिर भी, उन्हें 33 साल पहले मर चुके व्यक्ति से बात करवाना और उनका समर्थन दिलवाना—कथित तौर पर AI पीढ़ी से जुड़ने के लिए—‘कूल’ से ज्यादा बेताब कोशिश लगी.
इससे मुझे दूसरे दिन अपने फेसबुक टाइमलाइन पर दिखा एक वीडियो क्लिप याद आ गया. यह फिल्ममेकर करण जौहर के सेलिब्रिटी टॉक शो ‘कॉफी विद करण’ के सीजन 9 का वीडियो था. उस क्लिप में करिश्मा कपूर सलमान खान से पूछ रही हैं, “सलमान होने की सबसे अच्छी और सबसे खराब बात क्या है?” अभिनेता बिल्कुल शांत चेहरे के साथ जवाब देते हैं, “सलमान होने की सबसे अच्छी बात सलमान है. सलमान होने की सबसे खराब बात भी सलमान है.”
इससे मैं सोचने लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होने की सबसे अच्छी और सबसे खराब बातें क्या हैं. दोनों का जवाब PM मोदी हैं. वह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और हर जगह मौजूद हैं. मैं ऐसा राजनीति के संदर्भ में बोल रहा हूं. उन्हें किसी से सलाह की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वह लोगों की नब्ज़ जानते हैं. वह टाइटेनियम की परत वाले भारत के सबसे लोकप्रिय नेता हैं. भारतीय जनता पार्टी (BJP) या बड़े संघ परिवार में कोई भी उनके किसी शब्द या काम पर सवाल नहीं उठा सकता. वह अपनी पार्टी से भी बड़े हैं. BJP के केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक, संगठन के पदाधिकारी—सभी को हर कुछ प्रधानमंत्री के कारण ही मिला है और उनका पद पर बने रहना भी उनकी इच्छा पर निर्भर है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) सिर्फ उनकी तारीफ कर सकता है. BJP के अंदर या बाहर उनका कोई असली चुनौती देने वाला नहीं है. विपक्ष उनके लिए मायने नहीं रखता. वे वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार चीन की गलत हरकतों, मणिपुर की त्रासदी या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अपने मनमाने तरीके से काम करने को लेकर कितना भी शोर मचा सकते हैं. इससे क्या फर्क पड़ता है? PM मोदी उन्हें आसानी से नज़रअंदाज़ कर सकते हैं क्योंकि वह चुनाव जीतते हैं, वे नहीं जीतते. वह विकसित भारत 2047 जैसे और भी बड़े लक्ष्य तय करते रह सकते हैं, जबकि आम लोग नोबेल पुरस्कार विजेता और MIT के अर्थशास्त्री डैरोन एसेमोग्लू को यह कहते हुए सुनते हैं कि राजनेता मतदाताओं के साथ किए अपने सबसे जरूरी वादे भूल गए हैं—“नालियों की देखभाल करना”—या स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे की देखभाल करना.
दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में एकतरफा रिश्ता
खैर, PM मोदी होने की सबसे खराब बात क्या है? स्वामी चिन्मयानंद के AI अवतार ने शुक्रवार को एक वाक्य में इसका जवाब दिया: “शिखर पर व्यक्ति अकेला होता है.” राजनीति में ‘परिवार न होना’ एक बड़ा फायदा है, क्योंकि लोगों को लगता है कि आप भ्रष्ट नहीं हो सकते—किसके लिए जमा करेगा? परिवार के साथ नहीं रहना अपने आप यह साबित करने जैसा हो जाता है कि आप लोगों और देश के लिए जी रहे हैं. इसलिए ‘परिवार के बिना’ होना लोगों की नज़र में PM मोदी को एक संत बना देता है—कम से कम लोगों के एक वर्ग की नज़र में.
लेकिन इसका मतलब यह भी है कि अपने डर और चिंताओं को साझा करने के लिए कोई करीबी या अपना व्यक्ति नहीं है. शिखर पर पहुंचने के बाद अकेलापन और बढ़ जाता है, जब आपको यह समझ आने लगता है कि आपके और आपके आसपास के लोगों के हित एक-दूसरे से टकरा सकते हैं. आप जितनी जल्दी हटेंगे, उतनी जल्दी उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने का मौका मिलेगा.
इन निजी दुविधाओं के बीच उम्मीदों का यह बहुत बड़ा बोझ भी है. टाइटेनियम की परत वाले PM मोदी को अपनी ढाल का इस्तेमाल अपने पार्टी के साथियों को बचाने के लिए करना पड़ता है. CM, मंत्री, सांसद, विधायक सभी खूब मजे कर रहे हैं, बीच-बीच में ‘जय मोदी’ के नारे लगा रहे हैं और सत्ता में बने रहने की जिम्मेदारी PM मोदी पर छोड़ रहे हैं.
इसलिए मध्य प्रदेश के CM मोहन यादव और उनका परिवार जमीन-जायदाद जमा करने पर ध्यान दे सकते हैं. उनके अरुणाचल प्रदेश के समकक्ष पेमा खांडू भी आराम से रह सकते हैं इसके बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट ने CM की पत्नी और भाई से जुड़ी कंपनियों को दिए गए 1,270 करोड़ रुपये के ठेकों के आरोपों की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने का निर्देश दिया है. कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी अपने ही मंत्रालय के तहत आने वाले एक बोर्ड से अपने खेत के लिए 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी मंजूर करा सकते हैं. जब कोई विवाद खड़ा हो, तो वह बस पैसे वापस कर सकते हैं और आराम से रह सकते हैं.
MP के मंत्री विजय शाह कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की “बहन” कह सकते हैं और आराम से रह सकते हैं, क्योंकि BJP सरकार उन्हें मुकदमे का सामना करने की मंजूरी नहीं देगी. ऐसे कई उदाहरण हैं, जब PM मोदी को अपनी पार्टी के साथियों के लिए अपनी साख का इस्तेमाल करना पड़ा है. उत्तराखंड की लड़की जिसकी हत्या की गई, उसके दुखी माता-पिता के आरोपों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए दुश्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त करना इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है.
असल में, हर कोई किसी न किसी चीज़ के लिए PM मोदी की तरफ देख रहा है. यह एकतरफा रिश्ता है. जब चीज़ें गलत होने लगती हैं, तब उन्हें चेतावनी देने या मदद करने वाले बहुत कम लोग हैं. जब जेन जी के प्रदर्शनकारी नई दिल्ली की सड़कों पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, तब दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी BJP के कार्यकर्ता कहां थे? 18 करोड़ सदस्य होने का दावा करने वाली पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से हर शहर, कस्बे और गांव को भर सकती थी और इसके जवाब में अपनी बात लोगों के सामने रख सकती थी. इसके बजाय, PM मोदी को खुद ही सब संभालने के लिए छोड़ दिया गया.
ऐसा कैसे है कि राहुल गांधी, जिन्हें PM मोदी की नज़र में एक “फेल प्रोडक्ट” माना जाता है, जनता के बीच होने वाली चर्चा पर हावी हैं और सरकार का एजेंडा तय कर रहे हैं, यहां तक कि वे सरकार की महत्वाकांक्षी परिसीमन योजना को लगभग नाकाम करने में भी सफल रहे हैं? दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहां है? मैं उन शब्दों में कहूं जो BJP शायद अपने कामों से PM को बता रही है: ‘यह मत पूछिए कि आपकी पार्टी आपके लिए क्या कर सकती है, यह पूछिए कि आप अपनी पार्टी के लिए और क्या कर सकते हैं.’
स्वामी चिन्मयानंद अपने AI अवतार में इतने दूरदर्शी थे.
डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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