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Monday, 26 October, 2026
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यूपी एमएलसी वोटर लिस्ट में ‘राम ने यादव को मारा’ कैसे हुआ नाम? गलत ट्रांसलेशन पर विवाद

यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि सॉफ्टवेयर में अंग्रेज़ी में टाइप किए गए नामों को हिंदी में ट्रांसलिटरेशन करना था, लेकिन किसी गड़बड़ी के कारण उनका ट्रांसलेशन हो गया.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधान परिषद की मतदाता सूची में हिंदी नामों के गलत ट्रांसलेशन को लेकर विवाद अब एक और अजीब सवाल पर पहुंच गया है. क्या यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर में इस्तेमाल किया जा रहा सॉफ्टवेयर कम्युनल है?

आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं ने सवाल उठाया कि सॉफ्टवेयर ने ‘रामहित यादव (Ram hit Yadav)’ नाम को ट्रांसलिटरेशन करने के बजाय उसका ट्रांसलेशन ‘राम ने यादव को मारा’ क्यों कर दिया. इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर ने रविवार देर रात सफाई दी कि एक दूसरे वोटर के पिता का नाम भी बदलकर ‘राम ने शर्मा को मारा’ हो गया था.

सीईओ के दफ्तर ने आगे लिखा, “कंप्यूटर/सॉफ्टवेयर जातिवादी नहीं होते. यह मानना ठीक है कि हमसे गलती हुई, लेकिन अच्छी बात यह है कि गलती के दौरान भी जाति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हुआ.” पोस्ट में आगे कहा गया, “हमें भगवान का शुक्रिया भी अदा करना चाहिए कि राम ने किसी अल्पसंख्यक को नहीं मारा. वरना जातिवादी होने के साथ-साथ सांप्रदायिक होने का आरोप भी लगता.”

यह विवाद पिछले हफ्ते के आखिर में शुरू हुआ. तब यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के एक्स अकाउंट ने माना कि उत्तर प्रदेश में पहली बार विधान परिषद चुनावों की वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा दी गई थी. इस दौरान 14.81 लाख से ज्यादा प्रविष्टियों में से 158 में वोटरों या उनके रिश्तेदारों के नाम अजीब तरीके से दर्ज हो गए.

अकाउंट ने बताया कि सॉफ्टवेयर में अंग्रेज़ी में टाइप किए गए नामों को हिंदी में ट्रांसलिटरेशन किया जाना था, लेकिन किसी गड़बड़ी के कारण उनका ट्रांसलेशन हो गया.

उदाहरण के लिए, पोस्ट में कहा गया कि अगर किसी वोटर का नाम रामहित यादव था और गलती से नाम ‘Ram hit Yadav’ टाइप हो गया, तो सॉफ्टवेयर ने उसका ट्रांसलेशन ‘राम ने यादव को मारा’ कर दिया.

इसमें कहा गया कि ऐसी गलतियों को ठीक करने और उनमें सुधार करने की व्यवस्था थी, लेकिन जहां लोगों ने सावधानी नहीं बरती, वहां ये गलतियां बनी रहीं. दफ्तर ने सफाई दी, “जब भी कोई काम पहली बार किया जाता है, तो उसमें गलतियां होने की संभावना रहती है.”

संबंधित मामलों में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ), जो मंडल आयुक्त थे, और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (एईआरओ), जो जिलाधिकारी थे, दोनों से स्पष्टीकरण भी मांगा गया.

रविवार को आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने एक वीडियो साझा किया. इसमें आप के यूपी पूर्वांचल प्रांत अध्यक्ष राजेश यादव यह सवाल पूछते दिख रहे हैं कि आखिर राम ने ‘यादव’ को ही क्यों मारा, पाठक, मिश्रा, सिंह, राय, बिष्ट, तिवारी या शर्मा को क्यों नहीं?

वीडियो में उन्होंने पूछा, “क्या राम सिर्फ ‘यादव’ को ही मार रहे हैं? क्या आपका कंप्यूटर भी जातिवादी है? या आप चुनाव आयोग में बैठकर किसी खास पार्टी का एजेंडा चला रहे हैं?”

संजय सिंह ने आप पदाधिकारी का वीडियो साझा करते हुए उनके सवाल को ‘वाजिब सवाल’ बताया.

इसके जवाब में यूपी सीईओ के अकाउंट ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव की वोटर लिस्ट में दर्ज एक और ऐसे ही ‘अजीब नाम’ का ज़िक्र किया: ‘राम ने शर्मा को मारा’.

इस जवाब को साझा करते हुए कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी सवाल उठाया कि यूपी सीईओ का एक्स अकाउंट कौन चला रहा है. उन्होंने टिप्पणी की, “खैर, अब आपकी कोई खास साख नहीं बची है, जिसे आप बचा सकें. जो थोड़ी-बहुत उलझन बाकी है, उसे यह अकाउंट खुद ही दूर कर रहा है.”

इसके जवाब में सीईओ के दफ्तर ने कहा कि “भारत निर्वाचन आयोग ने निर्देश दिए हैं कि हर मामले में संयमित भाषा का इस्तेमाल करते हुए केवल तथ्यों तक ही बयान सीमित रखे जाएं और गैर-जरूरी टिप्पणियां न की जाएं.”

‘उचित कार्रवाई की जा रही है’

भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि जिस सॉफ्टवेयर को लेकर विवाद हो रहा है, उसे विधान परिषद (एमएलसी) चुनावों के लिए खास तौर पर बनाया गया था. ये चुनाव 23 अक्टूबर को होने थे. यह सॉफ्टवेयर विभाग के अंदर ही तैयार किया गया था.

चुनाव से दो दिन पहले, मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर ने एक प्रेस बयान भी जारी किया था. इसमें कहा गया था कि “वोटर लिस्ट में किसी वोटर की जानकारी में लिखने या छपाई से जुड़ी छोटी-मोटी गलतियों के आधार पर किसी भी वोटर को उसके मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा.”

बयान में कहा गया था कि अगर कोई वोटर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए मतदान केंद्र पहुंचता है और पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी को वोटर लिस्ट में उसके नाम या दूसरी जानकारी में लिखने या छपाई से जुड़ी कोई गलती दिखाई देती है, तो ऐसी स्थिति में वोटर की पहचान की जांच की जाएगी.

अगर मतदान अधिकारी वोटर की ओर से पेश किए गए सही दस्तावेजों या वोटर लिस्ट में दर्ज दूसरी जानकारियों के आधार पर इस बात से संतुष्ट होता है कि वह व्यक्ति वही वोटर है, जिसका नाम वोटर लिस्ट में दर्ज है, तो लिखने या छपाई से जुड़ी ऐसी गलतियों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा. इसके बाद उस व्यक्ति को वोट डालने की अनुमति दी जाएगी.

सीईओ के दफ्तर ने सोमवार सुबह फिर कहा कि वोटर लिस्ट में ऐसे गलत नाम दर्ज होने के कारणों की “जांच की जा रही है और ऐसी गलती दोबारा न हो, इसके लिए उचित कार्रवाई की जा रही है.”

दफ्तर ने यह भी कहा कि “वोटर पर्चियों की कुछ जाली प्रतियां” वायरल हो रही हैं. इन्हें बनाने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी.

दफ्तर ने आगे कहा, “सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की ओर से वोटर लिस्ट के बारे में साझा की गई किसी भी जानकारी को सही तथ्य मानकर उसका हवाला देने, उसे दिखाने या प्रकाशित करने से पहले संबंधित अधिकारियों से उसकी पुष्टि करना उचित होगा. हमारे अधिकारी तथ्यों से जुड़े किसी भी सवाल का तुरंत जवाब देंगे.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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