दिसंबर 1774 में, अपनी मौत से कुछ समय पहले, आधुनिक नेपाल के संस्थापक पृथ्वी नारायण शाह ने नुवाकोट में अपने परिवार और सलाहकारों को इकट्ठा किया था. उन्होंने मशहूर तौर पर उन्हें सलाह दी थी कि उनका राज्य दो बड़े पत्थरों के बीच एक कंद की तरह है. दो सदियों से ज्यादा समय बाद भी नेपाल अपनी भौगोलिक स्थिति को इसी उदाहरण के जरिए समझता है.
समय के साथ, नेपाली शासन व्यवस्था सिर्फ इस असुरक्षा की तस्वीर से ही प्रभावित नहीं हुई, बल्कि जब घरेलू राजनीति मुश्किल हुई, तब लगातार अलग-अलग राजनीतिक नेताओं ने राष्ट्रवादी भावनाएं भड़काने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया. हालांकि, आज नेपाल की चुनौती सिर्फ भारत और चीन के बीच अपनी स्थिति को संभालना नहीं है, बल्कि इस स्थिति को देश की समृद्धि के लिए एक मौके में बदलना है.
इसी पृष्ठभूमि में नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले का एक बयान खास महत्व रखता है. 23 अक्टूबर को नई दिल्ली में एक समिट में बोलते हुए उन्होंने कहा, “एक समय था जब हम नेपाली राष्ट्रवाद को भारत विरोधी भावना के बराबर मानते थे. वह दौर अब खत्म हो गया है.” उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल “एक-दूसरे से बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं”. उन्होंने यह भी कहा कि “यह बेहद जरूरी है कि भारत आगे बढ़े.”
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की आरएसपी के नेतृत्व वाली सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री की ओर से आया यह बयान सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार से कहीं ज्यादा था. यह नई पीढ़ी के नेताओं की उस कोशिश का संकेत था, जिसमें वे राष्ट्रवाद को शिकायतों के बजाय आर्थिक अवसर के इर्द-गिर्द फिर से परिभाषित करना चाहते हैं.
नई पीढ़ी, अलग राजनीतिक जनादेश
वाग्ले के बयान के समय को समझाने वाले तीन कारण हैं. पहला, वह घरेलू बदलाव, जिसके बाद बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आई.
सितंबर 2025 में जेन जी के प्रदर्शन शुरू में सोशल मीडिया पर लगी पाबंदियों के खिलाफ थे, लेकिन जल्द ही ये भ्रष्टाचार और पुरानी राजनीतिक व्यवस्था से लोगों के भरोसे के खत्म होने के खिलाफ बड़े गुस्से में बदल गए. शाह की सरकार नेपाल की उस पुरानी तरह की राजनीति के विकल्प के तौर पर सामने आई, जिसकी नेपाल के लोग लंबे समय से आदी हो चुके थे.
काठमांडू के मेयर के तौर पर शाह ने बिना किसी दिखावे के सीधे तरीके से सरकार चलाने की अपनी शैली के जरिए लोगों के बीच अपनी जगह बनाई. उनका यह तरीका सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चा में आता था और देश के युवाओं को पसंद आता था.
पारंपरिक राजनीतिक भाषा को खारिज करने की वजह से शाह नेपाल के पुराने और स्थापित नेताओं से अलग दिखे. खासकर उन युवा वोटरों के बीच, जो नौकरी के कम मौकों, राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्ट शासन से परेशान थे.
इसलिए शाह की सरकार ने अपने वादे में सुधार और रोजगार को केंद्र में रखा है. इन प्राथमिकताओं का भारत विरोध से बहुत कम लेना-देना है.
आर्थिक रिश्ते व्यावहारिकता की जरूरत बताते हैं
दूसरा कारण आर्थिक वास्तविकता है. भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से वह रिश्ता है, जिसे अक्सर रोटी-बेटी का रिश्ता कहा जाता है. यह रिश्ता पीढ़ियों से सीमा पार होने वाली शादियों, शिक्षा, पारिवारिक संबंधों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के जरिए बना हुआ है.
नेपाल के करीब 62.3 प्रतिशत वस्तु व्यापार का संबंध भारत से है. वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार 9.39 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
इसके अलावा, 2024 में दोनों देशों ने एक लंबे समय के समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत 10 साल के भीतर नेपाल से भारत को बिजली का निर्यात बढ़ाकर 10,000 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है. यह नेपाल के लिए कमाई का एक बड़ा स्रोत बन सकता है.
शाह की पहली द्विपक्षीय यात्रा आगे की दिशा तय कर सकती है
तीसरा कारण प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की पहली द्विपक्षीय यात्रा है, जो इस साल के आखिर में होने की उम्मीद है. इस बहुप्रतीक्षित यात्रा से राजनीतिक माहौल में आए इस बदलाव को आगे बढ़ाया जा सकता है और यह संकेत दिया जा सकता है कि नेपाल को अपने राष्ट्रीय आत्मविश्वास को नई दिल्ली से राजनीतिक दूरी बनाकर दिखाने की ज़रूरत नहीं है. इसके बजाय, यह आर्थिक विकास और रोजगार पर आधारित हो सकता है.
भारत के लिए यह नेपाल के नेतृत्व की नई पीढ़ी के साथ जुड़ने और वाग्ले के बयान पर सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ने का मौका है.
एजेंडे में भैरहवा में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट का उद्घाटन, दोधारा चांदनी चेक पोस्ट का निर्माण, लोअर अरुण हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की शुरुआत और सिलीगुड़ी से झापा तक पेट्रोलियम पाइपलाइन का काम शुरू करना शामिल हो सकता है.
अगर इन परियोजनाओं से बिजली, कमाई, नौकरियां और लोगों और सामान की आसान आवाजाही संभव होती है, तो दोनों देश अपने रिश्ते के लिए एक मजबूत आधार बना सकते हैं. यह आधार टकराव के बजाय ठोस सहयोग और व्यावहारिक कूटनीति पर आधारित हो सकता है.
पुराने राष्ट्रवादी मतभेद अब भी कायम
हालांकि, हाल के समय की जानी-पहचानी राजनीति पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. वाग्ले के बयान पर नेपाल के विपक्षी नेताओं ने कड़ी आलोचना की है. पूर्व उप-प्रधानमंत्री कमल थापा ने जोर देकर कहा कि “नेपाल का राष्ट्रवाद कभी भी किसी खास देश के विरोध पर आधारित नहीं रहा है.” नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) के पूर्व मंत्री गोकुल बास्कोटा ने इस बयान को “बौद्धिक दिवालियापन” बताया.
भारत और नेपाल के बीच बातचीत में उन मुश्किल मुद्दों पर भी बात करनी होगी, जो सिर्फ कूटनीतिक प्रतीकों से आगे हैं. इनमें खास तौर पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर सीमा विवाद शामिल है.
भारत ने 2020 में नेपाल के संशोधित राजनीतिक नक्शे को खारिज कर दिया था. दोनों देशों के बीच अलग-अलग क्षेत्रीय दावों पर बातचीत के लिए दोनों पक्षों को बहुत समझदारी से कूटनीतिक तरीके से आगे बढ़ना होगा.
वहीं काठमांडू की प्राथमिकताओं में हवाई मार्ग से आने के लिए और रास्ते, अपने कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजारों तक आसान पहुंच, हाइड्रोपावर परियोजनाओं को तेजी से लागू करना और प्रस्तावित सिलीगुड़ी-झापा पेट्रोलियम पाइपलाइन पर आगे बढ़ना शामिल होगा.
शाह के लिए चुनौती यह होगी कि विपक्ष की कड़ी निगरानी के बीच वास्तविक आर्थिक फायदे लोगों तक पहुंचाए जाएं. विपक्ष किसी भी सहयोग या समझौते को घरेलू राजनीतिक विवाद में बदलने की कोशिश कर सकता है.
समझौतों से मौकों की ओर
आखिर में, नेपाल के नए नेतृत्व के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह ऐसी राजनीतिक संस्कृति से आगे बढ़ सकता है, जिसमें भारत के साथ रिश्तों को अक्सर इस आधार पर देखा जाता है कि भारत से कितनी रियायतें ली गईं, न कि इस आधार पर कि कितने नए मौके बनाए गए.
यही वजह है कि वाग्ले का बयान महत्वपूर्ण है. इसका मतलब यह नहीं है कि लंबे समय से चले आ रहे विवाद खत्म हो गए हैं. बल्कि यह संकेत देता है कि इन विवादों से कहीं ज्यादा भी इस रिश्ते में मौजूद है.
पृथ्वी नारायण शाह ने दो बड़े पत्थरों के बीच कंद वाले उदाहरण के जरिए एक अलग दौर और अलग परिस्थितियों में नेपाल की भौगोलिक स्थिति को लेकर उसकी चिंताओं को बताया था. अगर वाग्ले के शब्द एक नई राजनीतिक वास्तविकता की शुरुआत का संकेत हैं, तो दो बड़े पत्थरों के बीच कंद वाला उदाहरण शायद नेपाल की पहचान बताने वाले मुख्य उदाहरण के तौर पर अब अपनी उपयोगिता खो चुका है.
रामी निरंजन देसाई इंडिया फाउंडेशन, नई दिल्ली में एक प्रतिष्ठित फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @ramindesai है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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