इस हफ्ते जामनगर अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खियों में छाया रहा. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और राजदूत सर्जियो गोर का रिलायंस कंपनी के रिफाइनरी टाउनशिप का दौरा लगभग अचर्चित रहा, जबकि यह शहर राजनीति के रडार स्क्रीन पर छा गया और घरेलू चर्चाओं का विषय बन गया.
अंबानी परिवार ने इन मेहमानों की मेजबानी की, और यह भी चर्चा का मुद्दा बन गया. सवाल उभरने लगे, अमेरिका भारत की इस रिफाइनरी में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है? वे अंबानी को वेनेजुएला से तेल खरीदने के लिए क्यों कह रहे हैं? वे भारत को रिफाइनिंग का ‘सुपर पावर’ क्यों कह रहे हैं और हमें इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए क्यों कह रहे हैं? कुल मिलाकर यह कि रुबियो और गोर अब तक दौरे पर आने वाले मेहमानों की तरह दिल्ली या बेंगलूरू में सीमित न रहकर जामनगर में क्यों हैं?
यूपीए वाले दौर को याद कीजिए. उस दौरान पश्चिमी देशों के शासक जब इनफोसिस या दूसरी टेक कंपनियों के दौरे कर रहे थे तब कोई विवाद नहीं उठा था. तब सबने इसे राष्ट्रीय गौरव माना था. और सभी राजनीतिक हलक़ों की भी यही राय थी. यहां तक कि वाम दलों ने कॉर्पोरेट विरोधी अपने तेवर को परे कर दिया था.
तो अब इतना संदेह, संशय और उन्माद क्यों?
कहा जा रहा है कि जब रूस इतना करीब है तब अंबानी (या भारत) पर वेनेजुएला जैसे दूर देश से तेल खरीदने का दबाव क्यों डाला जा रहा है? जरूर यह पुतिन को सकते में डालने के मकसद से हमें रूस से अलग करने और अमेरिकी नियंत्रण वाले वेनेजुएला का तेल खरीदने को मजबूर करने की चाल है.
लेकिन तथ्यों की सरसरी जांच में ये बातें टिकती नहीं हैं. वैसे, यह आपके अपने अपमान का मोहक भ्रम क्यों तोड़ें? रूस से भारत जितना तेल खरीदता है, उसकी मात्रा में कोई नाटकीय कमी नहीं आई है, और न आने की संभावना है. भारत को अगर रिफाइनिंग का सुपर पावर कहा जा रहा है तो यह न केवल एक बड़ी प्रशंसा है बल्कि यह हमें हमारी ‘व्यापक राष्ट्रीय शक्ति’ (सीएनपी) के एक नये शानदार तत्व की याद दिलाती है. दिवंगत धीरूभाई अंबानी की दूरदर्शिता ने उनके देश को इनर्जी के संसाधनों की कमी के अभिशाप से मुक्त होने का जुगाड़ बताया था.
भारत जैसे विशाल देश के पास अगर हाइड्रोकार्बन न के बराबर हो, तब वह क्या करे? दूसरे देश अपनी धरती या समुद्र के अंदर से जो कच्चा तेल निकालते हैं उसकी रिफाइनिंग की वैश्विक स्तर वाली क्षमता वह विकसित करे. बिना रिफाइनिंग के कच्चा तेल किसी काम का नहीं होता. इनर्जी का उपभोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसे तमाम देशों की तेल शोधन क्षमता पूरा नहीं कर पा रही है. भारत ने इस कमी को पूरा किया. अंबानी की दूरदर्शिता यह भी है कि उसने वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल की रिफाइनिंग की चुनौती को कबूल किया है, और इसमें छिपे अवसर को पहचाना है.
अगर इसने भारत को रिफाइनिंग का सुपर पावर बना दिया, तो क्या इस पर हमें वैसा ही गर्व नहीं होना चाहिए जैसा हमें हमारी टेक कंपनियों और बेंगलूरू से आउटसोर्सिंग पर होता है?
आइए, हम कुछ हकीकतों को पहचान लें. आज अमेरिका को खासकर वेनेजुएला के मोम की अधिकता वाले कच्चे तेल की ग्लोबल रिफाइनिंग क्षमता की जो जरूरत आन पड़ी है उसका रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्व (इसी क्रम में) भी है.
रणनीतिक इसलिए कि अमेरिका ने वेनेजुएला में अभी-अभी जबरन सत्ता परिवर्तन करवाया है. वेनेजुएला के पास दुनिया में कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार है. वे जब दुनिया के पश्चिमी भाग को अपने हितों के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहे हैं, तब उन्हें अपनी सफलता को व्यापारिक दृष्टि से भी मुकम्मल करने की जरूरत महसूस हो रही है. इस रस्साकशी में भारत का कुछ भी दांव पर नहीं लगा है.
राजनीतिक पहलू यह है कि ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की बहुतायत होगी तो कीमतें घटेंगी. ईरान में हालात सामान्य नहीं दिख रहे हैं. अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान में हालात और बिगड़ ही सकते हैं.
और जहां तक आर्थिक पहलू की बात है, वेनेजुएला जो तेल बेचेगा उसमें अमेरिका को ‘हिस्सा’ मिलेगा. ग्लोबल मार्केट में रिफाइंड प्रोडक्ट की जितनी बहुतायत होगी, अमेरिका में फ्युल की कीमतें उतनी गिरेंगी.
कहा जा सकता है कि अमेरिका में मध्यावधि चुनाव देर से हो रहे हैं. लेकिन अमेरिकी सिस्टम में, अगले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी मध्यावधि चुनाव के बाद से ही शुरू हो जाती है, खासकर तब जब मौजूदा राष्ट्रपति अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर रहा हो. इस समय डॉनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का सितारा बुलंद नहीं नजर आ रहा है, इसलिए वह चाहती है कि महंगाई और गैसोलीन की कीमतों में कमी आए.
इसके लिए ज्यादा कच्चा तेल चाहिए और ज्यादा रिफाइनिंग चाहिए. अमेरिका वेनेजुएला के तेल के सबसे बड़े आयातकों में शामिल है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में, भारी कच्चे तेल की इसकी कई रिफाइनरियां बंद हो गईं क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था संसाधन पर निर्भर क्षेत्रों पर कम, और अधिक ‘सॉफ्ट’ तथा धनी क्षेत्रों की ओर ज्यादा मुड़ गई— जैसे टेक, वित्त, रॉकेट विज्ञान, और अब एआइ की ओर. मोटे तौर पर आप कह सकते हैं कि टेक्सस, डेट्राइट तथा इस्पात व वाहन आदि का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों ने सिलिकन वैली, सिएटल, और न्यू यॉर्क आदि के लिए जगह खाली कर दी है.
ऐसी स्थिति में भारत के सिवा भला कौन देश दुनिया के लिए रिफाइनर की भूमिका निभा सकता है? यूरोप में ग्रेटा थनबर्ग की मुहिम से बचकर रिफाइनिंग की न्यूनतम क्षमता रह गई है. पश्चिम एशिया विस्तार करने की सोच नहीं सकता क्योंकि ईरान और उसके लड़ाके इस क्षेत्र में बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों के साथ घूम रहे हैं.
अक्सर कहा जाता है कि बेंगलूरू में कोई अनहोनी घट गई या इंटरनेट बंद हो गया तो दुनिया ठहर जाएगी. हमारी ‘सीएनपी’ का यह तत्व अगर हमारी ताकत बढ़ाता है, तो रिफाइनिंग को भी ऐसा तत्व क्यों न बनाया जाए? भारत को तो और ज्यादा रिफाइनरी बनानी चाहिए, वह भी कम लागत से. रिलायंस को एक और जामनगर बनाना चाहिए, खासतौर से पूर्वी समुद्री क्षेत्र के पास. इनमें से कुछ को तो ‘स्माल मॉडुलर रिएक्टरों’ (एसएमआर) के साथ बनाया जा सकता है.
आशंकाएं हर तरफ से जाहिर की जा रही हैं. वाम पक्ष से तो इसकी उम्मीद की ही जा सकती है, लेकिन दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी पक्ष भी आशंकाएं जाहिर कर रहे हैं. आज की कांग्रेस पार्टी को आप मध्यमार्गी कह सकते हैं. वैसे, मेरा मानना है कि उसका अभी जो वामपंथी झुकाव है वह मनमोहन सिंह को अपनी महत्वपूर्ण हस्तियों की सूची से हटाने की कोशिश से ज्यादा, खुद को अलग दिखाने की कोशिश का हिस्सा है.
दक्षिणपंथी खेमा भी भ्रमित दिख रहा है. अमेरिका ही क्यों? और अंबानी क्यों? उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि रुबियो ने टाटा सन्स के एन. चंद्रशेखरन और गौतम अडानी से भी मुलाक़ात की. तब, यह कि केवल अमीर ही क्यों?
व्यापक दृष्टि से, इस सबको अमेरिका और अंबानी के दोहरे मेल पर बिना सोचे-समझे की गई प्रतिक्रिया माना जा सकता है. अमेरिका-विरोध भारत की पुरानी, गहरी और स्वाभाविक मुद्रा है. अमेरिका आपको कुछ करने को कहे या आपके काम के लिए आपको थैंक यू कहे तो सतर्क हो जाइए, कहीं छिप जाइए. इसके पीछे जरूर कोई गुप्त मंशा होगी. यह धारणा सभी राजनीतिक पक्षों में व्याप्त है, और भाजपा अथवा उसके समर्थक भी इससे मुक्त नहीं हैं. इसके साथ यह सबसे पुराना भारतीय डर भी है, जिसे नफरत भी कह सकते हैं कि ‘कॉर्पोरेट तो शैतान है’.
नेहरू-इंदिरा दौर में ‘बिरला-टाटा’ अपशब्द माने जाते थे. अब उनकी जगह ‘अंबानी-अडानी’ को अपशब्द माना जाता है. आखिर, हमारी राजनीति, हमारे साहित्य और हमारी फिल्मों ने हमारी यही समाजवादी ‘ब्रेनवाशिंग’ तो की है. जिस नारे ने पीढ़ियों का मानस तैयार किया वह दिलीप कुमार की 1957 की फिल्म ‘नया दौर’ में मजदूर के पक्ष में बोले गए उनके इस डायलॉग में निहित संदेश की देन है कि ‘’झगड़ा तो हाथ और मशीन का है’. पूंजीपति को हमारी लोक संस्कृति में शायद ही कभी भले पात्र के रूप में पेश किया गया है.
अब जरा दूसरी नजर से देखिए. हमारे प्रधानमंत्री, या मुख्यमंत्री जब अमेरिका, जापान, फ्रांस के दौरे में वहां के औद्योगिक कारखानों और टेक कैंपसों में जाते हैं तब क्या हम खुश नहीं होते? या जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेनलो पार्क में मार्क ज़ुकरबर्ग से मिलने जाते हैं या एलन मस्क को उनके बाल-बच्चों समेत निजी तौर पर आमंत्रित करते हैं या दौरे पर आए सीईओ से मिलते हैं तब क्या हमें अच्छा नहीं लगता है?
काँग्रेस को तो याद करना चाहिए कि राजीव गांधी ने भारत में किस तरह टेक क्रांति का सूत्रपात किया था. जून 1985 में अमेरिका के अपने पहले दौरे में वे टेक्सस इन्स्ट्रूमेंट्स के मार्क शेफर्ड जूनियर से मिले थे और उन्हें बेंगलूरू में अपनी एक यूनिट स्थापित करने के लिए राजी किया था. बाद में उन्होंने ‘जीई’ के जैक वेल्च को भी आमंत्रित किया. वेल्च से कहा गया कि वे अगर यह चाहते हैं कि भारत उनकी इंजिन खरीदे, तो उन्हें हमारी कंपनियों से सॉफ्टवेयर खरीदनी पड़ेगी. विप्रो और जीई ने संयुक्त उपक्रम स्थापित किए. जीई को सैम पित्रोदा, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और जयराम रमेश ने कैसे फुसलाया यह कहानी आप डीएलएफ के संस्थापक के.पी. सिंह के संस्मरणों की किताब ‘व्हाइ दि हेक नॉट?’ में पढ़ सकता हैं.
हमारे अमेरिका-विरोध की जड़ें अभी भी 1971 में दबी हैं, जिसे न काट कर सबसे पहले तो हम अपने राष्ट्रहित का नुकसान कर रहे हैं. दूसरे, हम अपने उद्यमियों को भारत निर्माता नहीं, शोषक मानकर खारिज कर देते हैं. पहली बात को समय के संदर्भ में देखने की जरूरत है. देश एक-दूसरे को प्रोटोकॉल के लिहाज से नहीं, बल्कि अपने हितों के नजरिए से आंकते हैं. वैसे भी, ट्रंप के दौर में प्रोटोकॉल को कितनी अहमियत दी जा रही है? जो समाज अपने उद्यमों की सफलता का सम्मान नहीं करता, वह पिछड़ने के लिए अभिशप्त होता है.
भारत में अंबानी, टाटा, अडानी, बिरला, जिंदल, भारती जैसे समूह हैं, इसमें एकमात्र गलत बात यह है कि इनकी संख्या बहुत कम है. भारत को ऐसे कुछ और समूह चाहिए. वे दुनियाभर के लिए और ज्यादा रिफ़ाइनरियां, स्टील प्लांट, स्मेल्ट कॉपर तथा एलुमिनियम तैयार करें; सॉफ्टवेयर बनाएं, ‘ग्लोबल कैपबिलिटी सेंटर’ (जेसीसी) का गठन करें, बिजली संयंत्र लगाएं. भारत को अपने उद्यमियों का सम्मान करना सीखना होगा. जामनगर केवल एक प्रतीक है, जो याद दिलाता है कि भारत क्या कुछ बन सकता है.
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