21 अक्टूबर को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी का दौरा काफी कुछ बताने वाला था. रुबियो ने भारत को “तेल रिफाइनिंग की महाशक्ति” बताया और कहा कि यहां वेनेजुएला से आने वाले कच्चे तेल को और ज्यादा मात्रा में रिफाइन किया जा सकता है. जामनगर में रिलायंस के दो प्लांट हैं, जो हर दिन करीब 14 लाख बैरल तेल रिफाइन कर सकते हैं. इसमें भारी कच्चा तेल भी शामिल है. इस दौरे ने ऊर्जा के उस पहलू को सामने रखा, जिसका जिक्र आमतौर पर तेल उत्पादन और निर्यात के नक्शे में नहीं होता. वह है तेल को रिफाइन करने की क्षमता.
अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है, लेकिन सितंबर में खाड़ी देशों से कच्चे तेल का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर के तीन-चौथाई से ज्यादा तक पहुंच गया. इसके बावजूद, मध्य पूर्व से रिफाइन किए गए पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर के आधे से भी कम रहा. डीजल की भारी कमी भी बनी हुई है.
ऊर्जा सुरक्षा की परिभाषा तय करना कभी आसान नहीं रहा है. शोधकर्ताओं अलेह चेर्प और जेसिका ज्वेल ने सही सवाल उठाया था कि ऊर्जा व्यवस्था हमारे लिए इतनी जरूरी क्यों है और किन हालात में यह पता लगाया जा सकता है कि वह कितनी कमजोर है. इसका जवाब हमेशा एक जैसा नहीं होता और संकट के हर दौर के साथ बदलता रहता है. कच्चे तेल के भंडार और अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की व्यवस्था, कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावटों का असर कम करती है. लेकिन इससे यह समझने में ज्यादा मदद नहीं मिलती कि रिफाइन किए गए उत्पादों के उत्पादन और सप्लाई चेन में रुकावट आने पर क्या होगा. रिफाइनरियां अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को इस्तेमाल लायक ईंधन में बदलती हैं. इसके बाद व्यापारी और जहाज इन ईंधनों को खरीदारों तक पहुंचाते हैं.
लेकिन इस मामले में कुछ और सवाल भी अहम हैं. कौन-सी रिफाइनरी किस तरह का कच्चा तेल प्रोसेस कर सकती है, वह किस तरह के ईंधन बना सकती है और क्या वह ईंधन किसी हमलावर ड्रोन के हमले का शिकार हुए बिना सुरक्षित रूप से खरीदारों तक पहुंच सकता है?
कच्चे तेल की सप्लाई सुधरी, लेकिन डीजल की नहीं
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुमान के मुताबिक, सितंबर में खाड़ी देशों से कच्चे तेल का निर्यात लगभग पहले के स्तर पर लौट आया. यह बढ़कर हर दिन 1.39 करोड़ बैरल हो गया. यह युद्ध से पहले के हर दिन 1.5 करोड़ बैरल के स्तर से थोड़ा कम था. लेकिन इस सप्लाई पर दोबारा हमले होने का खतरा अभी भी बना हुआ है. इस खतरे की वजह से तेल की कीमत भी ऊंची बनी हुई है. 20 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड की कीमत 115.22 डॉलर प्रति बैरल थी.
हालांकि, मध्य पूर्व से रिफाइन किए गए पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात अब भी हर दिन करीब 19 लाख बैरल पर अटका हुआ है, जबकि युद्ध से पहले यह 47 लाख बैरल था. ऐसा क्यों है? इसकी एक बड़ी वजह रिफाइनरियों पर हो रहे हमले हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले, एनर्जी इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में रिफाइनिंग की स्थापित क्षमता हर दिन 10.38 करोड़ बैरल थी. लेकिन वास्तव में औसतन हर दिन 8.31 करोड़ बैरल तेल ही प्रोसेस किया जा रहा था. इसमें चीन की क्षमता 1.88 करोड़ बैरल प्रतिदिन, अमेरिका की 1.82 करोड़, यूरोपीय संघ की 1.20 करोड़, मध्य पूर्व की 1.19 करोड़, भारत की 49 लाख और दक्षिण कोरिया की 36 लाख बैरल प्रतिदिन थी. 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की कुल स्थापित रिफाइनिंग क्षमता में भारत की हिस्सेदारी 4.7 प्रतिशत थी. भारत सरकार की एक नई सूची में यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा, हर दिन 50 लाख बैरल से ऊपर बताया गया है.
डीजल ही क्यों?
पेट्रोल की कीमतें सीधे ग्राहकों को दिखाई देती हैं. लेकिन डीजल की लागत का असर सामान और सेवाओं की कीमतों में शामिल होकर ग्राहकों तक पहुंचता है. ट्रक, ट्रैक्टर, निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मशीनें, खनन की मशीनें और बिजली के बैकअप जनरेटर डीजल पर निर्भर हैं. इससे जुड़ा एक और उत्पाद गैस ऑयल है, जिसका इस्तेमाल घरों को गर्म रखने के लिए किया जाता है.
लेकिन डीजल महंगा होने से फसल काटने, खाने-पीने की चीजों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने और इमारतों का निर्माण पूरा करने की लागत भी बढ़ जाती है. इतिहासकार एडम टूज ने हाल ही में फॉरेन पॉलिसी के पॉडकास्ट ‘वन्स एंड टूज’ में इस बारे में चर्चा की. उन्होंने बताया कि डीजल का अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर पड़ता है, यह आसानी से नजरअंदाज हो जाता है. इसकी वजह यह है कि आम लोगों का ध्यान पेट्रोल पंप पर मिलने वाले ईंधन की कीमतों पर ही रहता है.
2026 के लिए IEA ने अनुमान लगाया कि तीसरी तिमाही में दुनिया भर में डीजल और गैस ऑयल का उत्पादन पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले हर दिन 17 लाख बैरल कम था. आइए समझते हैं कि कीमतों के लिहाज से इसका क्या मतलब है. सितंबर में सिंगापुर में थोक डीजल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा हो गई. यूरोप और अमेरिका में यह करीब 220 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई.
अलग-अलग इलाकों में सप्लाई पर असर
आइए, रिफाइनरियों की पूरी व्यवस्था को समझते हैं. कोई रिफाइनरी अपनी मर्जी से सिर्फ डीजल नहीं बना सकती, क्योंकि कच्चे तेल में कई तरह के हाइड्रोकार्बन होते हैं. डिस्टिलेशन की प्रक्रिया से इन्हें अलग किया जाता है. इसके बाद क्रैकिंग और हाइड्रोक्रैकिंग जैसी प्रक्रियाओं से इन्हें दूसरे उत्पादों में बदला जाता है. वहीं, डीसल्फराइजेशन के जरिए सल्फर हटाया जाता है, ताकि ईंधन तय मानकों पर खरा उतरे. इन प्रक्रियाओं से बनने वाले ईंधन की मात्रा और उसकी गुणवत्ता बदल जाती है. डीजल, जेट फ्यूल और हीटिंग ऑयल के साथ मिडिल डिस्टिलेट्स की श्रेणी में आता है.
भारी कच्चे तेल में सल्फर की मात्रा ज्यादा होती है. ऐसे तेल को प्रोसेस करने के लिए ज्यादा कन्वर्जन और सफाई वाले उपकरणों की जरूरत होती है. जाहिर है, इन उपकरणों को लगाने में ज्यादा पैसा और समय लगता है. इसके अलावा, इस गर्मी में रिफाइनरियों ने जेट फ्यूल को ज्यादा प्राथमिकता दी, जिससे गैस ऑयल का उत्पादन घट गया. इसका मतलब है कि अगर किसी रिफाइनरी को दूसरे स्रोत से कच्चा तेल मिल भी जाए, तो वह अपना काम जारी रख सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि उससे पहले जितना ही डीजल बने.
आगे बढ़ने से पहले माप की इकाइयों से जुड़ी एक आम गलतफहमी दूर कर लेते हैं. कच्चे तेल और डीजल, दोनों को मापने के लिए कोई एक ही तय इकाई नहीं है. बैरल का इस्तेमाल मात्रा मापने के लिए होता है, जबकि टन से वजन मापा जाता है. IEA के मुताबिक, एक टन कच्चे तेल में औसतन 7.37 बैरल और एक टन डीजल में 7.46 बैरल होते हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका की रिफाइनरियां 42 गैलन कच्चे तेल के एक बैरल से डीजल की श्रेणी वाले ईंधन के करीब 11 से 13 गैलन बना लेती हैं. ऐसे ईंधन का एक टन बनाने के लिए करीब 24 से 29 बैरल कच्चे तेल की जरूरत पड़ती है. इसी तेल से दूसरे ईंधन भी बनाए जाते हैं.
इसके बाद एशिया के दूसरे देशों पर भी इसका असर पड़ता है. भारत, चीन और दक्षिण कोरिया घरेलू इस्तेमाल और निर्यात के लिए खाड़ी देशों से कच्चा तेल खरीदते हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई कम होने के कारण दूसरी तिमाही में इन देशों की रिफाइनरियों में तेल प्रोसेस करने की मात्रा और गैस ऑयल का उत्पादन घट गया. चीन में रिफाइनरियों ने पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में हर दिन 22 लाख बैरल कम कच्चा तेल प्रोसेस किया. भारत में भी अप्रैल के दौरान कच्चे तेल की प्रोसेसिंग घटकर हर दिन 52.3 लाख बैरल रह गई.
दूसरी ओर, यूक्रेन ने तेल की सप्लाई में रुकावट पैदा करने का एक और कमजोर बिंदु पहचान लिया है. ब्लूमबर्ग के आंकड़ों का हवाला देते हुए iSANS के मुताबिक, रूस में रिफाइनिंग की स्थापित क्षमता हर दिन करीब 65 लाख बैरल है, लेकिन सितंबर में वहां अनुमानित 36 लाख बैरल तेल ही प्रोसेस किया गया. अक्टूबर के पहले हफ्ते में यह काम फिर बढ़ा, लेकिन यूक्रेन के दूर तक मार करने वाले हमले जारी रहे. यूक्रेनी ड्रोन ने उन प्रोसेसिंग यूनिटों पर हमले किए, जो डीजल और जेट फ्यूल को साफ करती हैं. इनकी मरम्मत में कई बार महीनों लग सकते हैं. इन हमलों से रूस के पास पर्याप्त कच्चा तेल होने के बावजूद ईंधन की सप्लाई और निर्यात से होने वाली कमाई पर दबाव पड़ता है.
रूस और खाड़ी देशों से रिफाइन किए गए तेल उत्पादों का घटा हुआ निर्यात अब एक ही डीजल बाजार में मिलकर असर को और बढ़ा रहा है. सितंबर में रूस और खाड़ी देशों का मिलाकर डीजल और गैस ऑयल का शुद्ध निर्यात हर दिन सिर्फ 8.2 लाख बैरल रह गया. यह 2025 के मुकाबले हर दिन 13 लाख बैरल कम था.
रूस और खाड़ी देशों में सप्लाई बाधित होने से भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की अहमियत काफी बढ़ गई है. अब यह भी बहुत मायने रखता है कि इन देशों को अपनी रिफाइनरियों के लिए सही तरह का कच्चा तेल कितना मिल पाता है और वे तैयार ईंधन का कितना निर्यात कर सकते हैं.
तेल रिफाइनिंग की क्षमता कहां है?
यूरोप में रिफाइनिंग की अच्छी-खासी क्षमता है. यूरोस्टैट के आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में यूरोपीय संघ ने 21.57 करोड़ टन तेल के बराबर गैस ऑयल और डीजल का उत्पादन किया. इसके बावजूद, उस साल शुद्ध आयात सिर्फ 1.57 करोड़ टन दर्ज किया गया.
रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने से पहले, उत्तर-पश्चिमी यूरोप की रिफाइनरियां रूस से मिलने वाले मीडियम-सॉर यूराल्स कच्चे तेल पर निर्भर थीं. यह तेल वहां की रिफाइनरियों की बनावट और डीजल की जरूरतों के हिसाब से उपयुक्त था. इसकी जगह लेने के लिए नॉर्वे के जोहान स्वेरड्रुप क्षेत्र से मिलने वाले तेल, उत्तरी सागर के दूसरे तरह के कच्चे तेल और मध्य पूर्व से आने वाले तेल का इस्तेमाल किया गया. लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि अलग-अलग तरह के कच्चे तेल की लागत और गुणवत्ता एक जैसी नहीं होती.
यूरोप ने रूस से आने वाले डीजल की जगह खाड़ी देशों, अमेरिका और एशिया से तैयार ईंधन खरीदना शुरू किया. कुवैत और ओमान में बनी नई रिफाइनरियों ने भी यूरोप को सप्लाई की. यूरोपीय आयोग ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा कि ईंधन की सप्लाई भौतिक रूप से स्थिर बनी हुई है, हालांकि इसकी कीमत ज्यादा है. इस लिहाज से यूरोप की कमजोरियां कई स्तरों पर बनी हुई हैं.
वॉशिंगटन के हालिया फैसले दिखाते हैं कि यह स्थिति कितनी असहज हो गई है. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि रूस तुरंत 3 लाख टन डीजल की सप्लाई करेगा, नवंबर में इसके अलावा 5 लाख टन और उसके बाद 10 लाख टन डीजल देगा. IEA के हिसाब से, शुरुआती 3 लाख टन डीजल की खेप कुल करीब 22.4 लाख बैरल के बराबर होगी.

अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने रूस में बने डीजल से जुड़े कुछ तय लेन-देन को 7 अप्रैल 2027 तक मंजूरी दी है. ट्रंप ने नए ग्राहम एक्ट के तहत कुछ अहम प्रतिबंधों और टैरिफ में अलग से छूट भी दी है. रुबियो ने साफ किया कि प्रशासन इन फैसलों के आर्थिक असर का आकलन करने के लिए 60 दिनों तक का समय लेगा, हालांकि आदेश में खुद 60 दिनों की कोई समय-सीमा नहीं दी गई है. ईरान युद्ध के फिर तेज होने की अटकलों के बीच, वॉशिंगटन के पास डीजल की कमी कम करने की पूरी वजह है. खाड़ी देशों से सप्लाई में एक और रुकावट आई, तो स्थिति और खराब हो सकती है.
भारत की स्थिति को समझने के लिए जामनगर में रुबियो के दौरे का जिक्र करना काफी नहीं है. भारत सरकार के विस्तृत आंकड़ों के मुताबिक, देश में कच्चे तेल को प्रोसेस करने की स्थापित क्षमता सालाना 26.71 करोड़ टन है, जो हर दिन करीब 54 लाख बैरल के बराबर है. यह समझना जरूरी है कि रिफाइनरी की कुल क्षमता और हर दिन वास्तव में बनने वाले डीजल की मात्रा अलग-अलग चीजें हैं.
नीचे दी गई तालिका में भारत की कच्चे तेल को प्रोसेस करने की स्थापित क्षमता दिखाई गई है. वहीं, डीजल का वास्तविक उत्पादन इस बात पर निर्भर करता है कि रिफाइनरियां कितना तेल प्रोसेस कर रही हैं, कच्चे तेल की किस किस्म का इस्तेमाल हो रहा है और उससे कितना डीजल बन पा रहा है.
भारत की अलग-अलग रिफाइनरियां अलग-अलग तरह का काम कर सकती हैं. रिलायंस का कहना है कि जामनगर में 216 से ज्यादा तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस किया जा चुका है. इनमें वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल भी शामिल है. कंपनी यह भी कहती है कि रूस से मिलने वाला यूराल्स तेल मध्य पूर्व से आने वाले कुछ तरह के कच्चे तेल की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है.
इंडियन ऑयल ने 2025-26 में 48 देशों से आए 275 तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस किया. ओडिशा में पारादीप रिफाइनरी को खास तौर पर ज्यादा सल्फर वाले कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए बनाया गया था.
नायरा एनर्जी का कहना है कि गुजरात में उसकी वाडिनार रिफाइनरी हल्के और कम सल्फर वाले कच्चे तेल से लेकर बेहद भारी और ज्यादा सल्फर वाले तेल तक को प्रोसेस कर सकती है. हालांकि, प्रतिबंधों के कारण कंपनी को कच्चे तेल के लिए रूस की ओर ज्यादा रुख करना पड़ा है. यहां फीडस्टॉक का मतलब उस कच्चे माल से है, जिसे रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाता है.
यह समझना जरूरी है कि किसी एक रिफाइनरी को हमेशा के लिए “रूसी कच्चा तेल” और दूसरी को “खाड़ी देशों का कच्चा तेल” नहीं दिया जाता. कंपनियां तकनीकी जरूरतों, कारोबार और प्रतिबंधों से जुड़ी पाबंदियों को ध्यान में रखकर अलग-अलग तेल मिलाती हैं और जरूरत के हिसाब से बदलती भी हैं. इस लचीलेपन से मदद मिलती है, लेकिन भारत अब भी महंगे आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है.
दक्षिण कोरिया की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. वहां की पांच बड़ी रिफाइनरियों की क्षमता हर दिन करीब 35 लाख बैरल है. देश अपनी जरूरत का लगभग पूरा कच्चा तेल टैंकरों के जरिए आयात करता है. इससे घरेलू ईंधन की जरूरत पूरी होती है और अच्छी गुणवत्ता वाले तेल उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है.
विविध स्रोतों से तेल खरीदने के बावजूद, 2026 के पहले आठ महीनों में दक्षिण कोरिया के कुल कच्चे तेल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी. एस-ऑयल की ओंसान रिफाइनरी ने निर्यात के मानकों के मुताबिक डीजल बनाने के लिए तेल को बेहतर तरीके से प्रोसेस करने और उसमें से सल्फर हटाने पर निवेश किया है.
तेल उत्पादों के बाजार में दक्षिण कोरिया की मजबूत स्थिति है. लेकिन समुद्र के रास्ते आने वाले कच्चे तेल पर उसकी निर्भरता के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य उसके लिए बेहद अहम है. वहां से सप्लाई बाधित होने पर देश का उत्पादन और उसके बाद रिफाइन किए गए तेल उत्पादों का निर्यात भी प्रभावित होता है.
चीन भी एक ऐसा बड़ा रिफाइनिंग देश है, जिसके बिना इस व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती. वहां हर दिन करीब 1.9 करोड़ बैरल तेल प्रोसेस करने की क्षमता है. सरकारी कंपनियों के बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स और छोटी निजी रिफाइनरियां अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को प्रोसेस करती हैं. शानडोंग प्रांत की स्वतंत्र रिफाइनरियां कम कीमत पर मिलने वाला ईरान और रूस का कच्चा तेल खरीदती हैं.
लेकिन सिर्फ रिफाइनिंग क्षमता होने से निर्यात की गारंटी नहीं मिलती. आयात के कोटे और तेल उत्पादों के निर्यात के लाइसेंस तय करते हैं कि कौन-सी रिफाइनरी कितना तेल मंगा सकती है और कितना तैयार ईंधन बाहर भेज सकती है.
कच्चे तेल की तरह डीजल के भी भंडार होते हैं. IEA ने 7 अक्टूबर को कहा कि उसके सदस्य देशों के पास आपात स्थिति के लिए सरकारी भंडार में 20 करोड़ बैरल से ज्यादा डीजल था. ये देश अपने वादे के मुताबिक इस भंडार से डीजल जारी करने की प्रक्रिया भी तेज कर रहे थे.
अक्टूबर में अमेरिका के व्यावसायिक डिस्टिलेट भंडार में 10.43 करोड़ बैरल ईंधन था. यूरोपीय देशों के पास भी आपात जरूरतों के लिए तय नियमों के तहत तेल उत्पादों का भंडार है. हालांकि, डीजल कितने दिनों तक चलेगा, इसका हिसाब अक्सर कुल खपत के बजाय आयात के आधार पर लगाया जाता है. चीन डीजल के अपने मौजूदा भंडार का ऐसा कोई तुलनीय आंकड़ा जारी नहीं करता.
कच्चे तेल का उत्पादन, रिफाइनरी की बनावट और क्षमता, ईंधन का भंडार और कारोबार, ये सभी अलग-अलग तरह की कमजोरियों को दिखाते हैं. रिफाइनिंग क्षमता से समझ आता है कि रूस की तेल प्रोसेसिंग यूनिट और सऊदी अरब में अरामको पर हुए हमलों का असर दूसरे देशों तक पहुंचने के बीच भारत और दक्षिण कोरिया इस चर्चा में इतने अहम क्यों हो गए हैं.
जामनगर में रुबियो का हालिया दौरा और भारत को तेल रिफाइनिंग की महाशक्ति बताना, ये सभी बातें अभूतपूर्व रुकावटों के बीच ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े बड़े सवाल का हिस्सा हैं.
दुनिया में कच्चे तेल की कमी नहीं हो रही है. असली समस्या रिफाइनरियां हैं, बेवकूफों!
स्वस्ति राव दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रेटेजिक अफेयर्स) हैं. वह @swasrao पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.
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