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Saturday, 24 October, 2026
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मॉडर्नाइजेशन की बात करने वाले सऊदी ने बांग्लादेशी कपल को बिना जुर्म बताए फांसी दी

बांग्लादेश सरकार को आरोप, सुनवाई, बांग्लादेशी नागरिकों को मिली कानूनी मदद और सऊदी अरब में उनकी फांसी की सूचना उसके दूतावास को कथित तौर पर क्यों नहीं दी गई, इस पर साफ जवाब मांगना चाहिए.

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सऊदी अरब ने 14 अक्टूबर 2026 को बांग्लादेश के दो नागरिकों, नाजेरुल इस्लाम अब्दुल बसीर और सिटी अख्तर को फांसी दे दी. अधिकारियों ने कहा कि वे मक्का की एक मस्जिद के अंदर अनैतिक काम में शामिल थे.

मुझे जो बात परेशान करती है, वह यह है कि अधिकारियों ने एक धार्मिक जगह की पवित्रता बचाने के नाम पर मौत की सज़ा को सही ठहराया, लेकिन उन्होंने यह साफ तौर पर नहीं बताया कि इन दोनों लोगों ने आखिर क्या किया था.

सोशल मीडिया पर एक नैरेटिव चल रहा है कि वे शादीशुदा दंपति थे और उन्हें सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा था, लेकिन मेरी समझ के मुताबिक, इस दावे को सही साबित करने वाला कोई भरोसेमंद सबूत नहीं है. यहां तक कि उनकी बताई जा रही तस्वीरें भी कथित तौर पर फर्जी निकली हैं.

कोई सरकार नैतिकता के नाम पर दो इंसानों को फांसी कैसे दे सकती है, जबकि वह जनता को यह तक साफ तौर पर नहीं बताती कि उनका अपराध क्या था?

और इससे भी ज्यादा जरूरी सवाल यह है कि नैतिकता की ऐसी कौन सी समझ थी, जिसने उन्हें किसी इंसान की जान लेने की इज़ाज़त दी? सऊदी अरब ने इस बांग्लादेशी दंपति के साथ ऐसा व्यवहार किया, जैसे उनकी जान की कोई कीमत ही नहीं थी.

ताज़ीर का सवाल

लाखों मुसलमानों के लिए मक्का सबसे पाक जगहों में से एक है. यह आस्था, दया और आध्यात्मिक शांति से जुड़ा हुआ है. मैं समझती हूं कि लोग ऐसी जगह की पवित्रता की रक्षा क्यों करना चाहते हैं. हर धार्मिक समुदाय को यह उम्मीद करने का अधिकार है कि लोग उसके पूजा स्थलों का सम्मान करें.

लेकिन किसी धार्मिक जगह का सम्मान करने और उसके नियमों का उल्लंघन करने पर किसी की जान लेने के बीच अंतर है.

अगर इस दंपति ने स्थानीय धार्मिक रीति-रिवाजों के हिसाब से कुछ आपत्तिजनक या अनुचित किया भी था, तो भी इस समय और इस दुनिया में इसके लिए मौत की सज़ा किसी भी तरह सही नहीं ठहराई जा सकती.

यहां एक बात बताना मुझे बहुत ज़रूरी लगता है कि ऐसे अपराध के लिए कुरान की कोई आयत मौत की सज़ा नहीं बताती. जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक, सऊदी अधिकारियों ने इस अपराध को ताज़ीर के तहत माना, जो इस्लामी कानून में अपनी इच्छा से दी जाने वाली सजा की एक कैटेगरी है.

जो लोग नहीं जानते, उनके लिए ताज़ीर का मतलब ऐसे अपराधों की सज़ा से है, जिनके लिए कुरान और सुन्नत में कोई खास और तय सज़ा नहीं बताई गई है. ऐसे मामलों में अपराध और उसकी परिस्थितियों के आधार पर जज या कानूनी अधिकारियों के पास सज़ा तय करने का अधिकार होता है. और यही बात मेरे लिए इस मामले को और ज्यादा परेशान करने वाला बनाती है.

मौत की सज़ा को सही ठहराने के लिए ताज़ीर का इस्तेमाल करना खुद इस्लामी विद्वानों के बीच इतिहास में बहस का विषय रहा है. कई पुराने विद्वानों का मानना था कि ताज़ीर की सज़ा आम तौर पर हुदूद से कम कठोर होनी चाहिए. हुदूद वे सज़ाएं हैं, जो इस्लामी कानून में कुछ खास अपराधों के लिए तय की गई हैं. विचार यह था कि अपनी इच्छा से दी जाने वाली सज़ा का इस्तेमाल सुधार और अनुशासन के लिए किया जाना चाहिए, न कि सबसे कठोर सजा देने के लिए.

एक हदीस में यह भी कहा गया है कि किसी को 10 कोड़ों से ज्यादा नहीं मारा जाना चाहिए, सिवाय ऐसे अपराध के जिसमें अल्लाह की ओर से कोई सज़ा तय की गई हो.

और यही बात मेरे लिए समझना मुश्किल है. जब इस्लामी कानून की समझ में भी इस बात को लेकर मतभेद हैं कि ऐसी सज़ाएं कितनी दूर तक जानी चाहिए, तो किसी की जान लेने के लिए सबसे कठोर व्याख्या का इस्तेमाल क्यों किया जाना चाहिए?

अगर कथित अपराध के लिए कुरान में सज़ा साफ तौर पर तय नहीं है और इंसानी व्याख्या की गुंजाइश है, तो क्या इससे हमें मौत जैसी ऐसी सज़ा देने से पहले और ज्यादा सावधान नहीं होना चाहिए, जिसे बाद में बदला नहीं जा सकता? अगर सज़ा तय करने का अधिकार किसी के पास है, तो इसका मतलब है कि किसी ने फैसला किया कि इन दोनों लोगों ने जो भी किया, उसके लिए मौत की सज़ा मिलनी चाहिए.

इसके अलावा, हम ऐसे समय में रहते हैं जब इंसान यह समझ चुका है कि इंसानों से होने वाले फैसलों में गलती की संभावना रहती है. इसी वजह से हम हर आरोपी को अपना बचाव करने और अपील करने का मौका देने की ज़रूरत को समझते हैं. सोचिए, अगर कोई फैसला पूरी तरह एकतरफा हो और उसमें कोई पारदर्शिता न हो, तो कितना बड़ा खतरा हो सकता है. मैं सोशल मीडिया पर कई ऐसे मुस्लिम इन्फ्लुएंसर्स लोगों को देख रही हूं, जो अभी लोकतांत्रिक देशों में रहते हैं और सिर्फ भावनाओं के आधार पर मौत की सज़ा को सही ठहरा रहे हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि वे ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करेंगे, जहां सरकार के पास उन्हें फांसी देने की पूरी ताकत हो और उन्हें अपना बचाव करने का एक भी मौका न दिया जाए.

इसके अलावा, इनमें से ज्यादातर लोग आज सख्त तरीके से लागू होने वाले शरिया आपराधिक कानून के तहत खुद सज़ा नहीं पाना चाहेंगे. वे नहीं चाहेंगे कि उनके हाथ काट दिए जाएं या उन्हें फांसी दी जाए. इसके बजाय, वे ऐसी कानूनी व्यवस्था पसंद करेंगे, जिसमें अपराध के हिसाब से उचित सज़ा दी जाए. यह बेहद शर्म की बात है कि वे ऑनलाइन ऐसी अमानवीय सज़ाओं का दिखावा करते हैं, उनका समर्थन करते हैं और बचाव करते हैं, जबकि खुद लोकतांत्रिक व्यवस्था से मिलने वाली सुरक्षा का फायदा उठा रहे हैं.

इसके बाद बात खुद सऊदी अरब की आती है, जो मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद के नेतृत्व में दुनिया के सामने अपनी एक आधुनिक और ज्यादा खुले विचारों वाले देश की छवि पेश करने की कोशिश कर रहा है.

हम देखते हैं कि इस नए सऊदी अरब के हिस्से के तौर पर संगीत समारोह, कॉन्सर्ट और मनोरंजन के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है. मुझे लोगों के संगीत सुनने या नाचने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन मैं यह जरूर सोचती हूं कि कोई देश ऐसे बदलावों का जश्न कैसे मना सकता है, जबकि धार्मिक नैतिकता के नाम पर इतनी कठोर सज़ाएं जारी रखता है. बांग्लादेशी दंपति को दी गई मौत की सज़ा ऐसी चीज़ है, जिसे सऊदी अरब के तथाकथित आधुनिकीकरण की बात करते समय हमें याद रखना चाहिए.

आधुनिकीकरण का मतलब सिर्फ खूबसूरत शहर बनाना, संगीत समारोह आयोजित करना, पर्यटकों को आकर्षित करना और विदेशी निवेश लाना नहीं हो सकता. कोई देश दुनिया के सामने अपना रूप बदल सकता है, लेकिन आम लोगों के अधिकारों और सम्मान के प्रति उसका रवैया वही रह सकता है.

मेरे लिए असली प्रगति यह भी है कि कोई देश अपने सबसे कमजोर लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, खासकर उन लोगों के साथ जिनके पास न पैसा है, न राजनीतिक पहुंच और न ही उनकी तरफ से बोलने वाली कोई ताकतवर सरकार. अगर एक आम इंसान को सरकार की ताकत से बचने के लिए इतनी कम सुरक्षा मिले, तो आधुनिक देश बनने का क्या मतलब है?

बांग्लादेश की जिम्मेदारी

जो बात मुझे और ज्यादा परेशान करती है, वह यह है कि ये दोनों लोग बांग्लादेश के नागरिक थे.

जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक बांग्लादेश के दूतावास को भी उनकी फांसी के बारे में पहले से जानकारी नहीं दी गई थी. हम दो ऐसे इंसानों की बात कर रहे हैं, जिन्हें सबसे बड़ी सज़ा दी जा रही थी, फिर भी उनके अपने देश के प्रतिनिधियों को कथित तौर पर पहले से इसकी जानकारी नहीं दी गई. ऐसी व्यवस्था में एक गरीब प्रवासी को कितनी इज्ज़त और सुरक्षा मिलती है?

प्रवासी मजदूर पहले से ही कमजोर स्थिति में होते हैं. वे किसी दूसरे देश में रहते हैं और अक्सर वहां की भाषा, कानूनी व्यवस्था और अपने अधिकारों से पूरी तरह परिचित नहीं होते. ऐसे में वकील, निष्पक्ष सुनवाई और अपने देश के दूतावास की मदद मिलना और भी ज़रूरी हो जाता है.

मैंने सोशल मीडिया पर लोगों को यह सवाल करते हुए भी देखा है कि अगर ये दोनों लोग अमेरिकी नागरिक होते, तो क्या सऊदी अरब उनके साथ इसी तरह व्यवहार करता? यह सवाल पूछना जायज़ है. क्या अधिकारी किसी व्यक्ति के दूतावास को पहले से जानकारी दिए बिना उसे फांसी देने में उतने ही सहज होते? अगर ये लोग किसी ताकतवर देश से होते, तो क्या मामले के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया जाता?

बांग्लादेश की भी यहां जिम्मेदारी है. उसकी सरकार को आरोपों, सुनवाई, इन दोनों लोगों को मिली कानूनी मदद और उनके फांसी दिए जाने की जानकारी उसके दूतावास को कथित तौर पर पहले से क्यों नहीं दी गई, इस पर साफ जवाब मांगना चाहिए.

किसी बांग्लादेशी प्रवासी या किसी भी प्रवासी की जान की कीमत किसी अमेरिकी या सऊदी नागरिक की जान से कम नहीं होनी चाहिए. अगर सऊदी अरब चाहता है कि दुनिया उसे एक आधुनिक देश के रूप में देखे, तो क्या इंसान की गरिमा और कानून के तहत समान व्यवहार का सम्मान भी उस आधुनिकीकरण का हिस्सा नहीं होना चाहिए?

आखिर में, हम जानते हैं कि दो लोगों को फांसी दी गई है. हम जानते हैं कि उनकी मौत को वापस नहीं किया जा सकता और हम यह भी जानते हैं कि जिस न्याय को न्याय कहा जा सके, उसके लिए सिर्फ एक अस्पष्ट आरोप और ऐसी सजा काफी नहीं है, जिसे बाद में बदला नहीं जा सकता.

किसी समाज का आकलन सिर्फ उन मूल्यों से नहीं होता, जिन्हें वह पवित्र बताता है. यह भी देखा जाता है कि उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, जिन पर उन मूल्यों का अपमान करने का आरोप लगाया जाता है.

आमना बेगम अंसारी एक कॉलमिस्ट, राइटर और टीवी न्यूज़ पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय अमाना एंड खालिद’ नाम का एक वीकली यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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