रामगढ़, झारखंड: दो हफ्ते पहले तक कविता महतो दिहाड़ी मजदूरी करके गरीबी से लड़ रही थीं. फिर साड़ी पहनकर नंगे पैर 1.6 किलोमीटर दौड़ने का उनका वीडियो वायरल हो गया और वह रातोंरात चर्चा में आ गईं. अब वह एक अलग ही दौड़ की तैयारी कर रही हैं. यह दौड़ होमगार्ड भर्ती की है, जिससे उन्हें उम्मीद है कि उनकी जिंदगी बदल सकती है.
इस शोहरत के साथ ऐसी पहचान भी जुड़ गई है, जिसकी कविता ने कभी उम्मीद नहीं की थी. अब नेता उनसे मिलना चाहते हैं, पत्रकार उनका इंटरव्यू लेना चाहते हैं और सोशल मीडिया पर अनजान लोग भी उनके नाम की चर्चा कर रहे हैं. लेकिन इस पूरे ध्यान के बीच जिस एक चीज की उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है, वह अब भी अनिश्चित है. वह है एक नौकरी.
कविता महतो ने कहा, “मुझे होमगार्ड भर्ती के बारे में कुछ महीने पहले ही पता चला था. मुझे लगा कि यह दिहाड़ी मजदूरी छोड़कर आगे बढ़ने का एक मौका है. जब मैं साड़ी पहनकर दौड़ी थी, तब मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा वीडियो वायरल हो जाएगा.”
कविता की इस कोशिश ने उन्हें हजारों लोगों के बीच पहचान दिलाई है, लेकिन जिन हालात ने उन्हें यह दौड़ लगाने के लिए मजबूर किया था, वे अब भी लगभग वैसे ही हैं. देशभर में मजदूरों, किसानों और आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों के वीडियो वायरल होते रहते हैं. इन वीडियो के जरिए उनकी निजी परेशानियां लोगों के सामने आती हैं. उन्हें तारीफ मिलती है, नेताओं का ध्यान जाता है और मदद के वादे भी किए जाते हैं. लेकिन वीडियो वायरल होने से नौकरी मिलने की गारंटी नहीं होती. इससे घर में खाने का इंतिजाम भी अपने आप नहीं हो जाता.
कविता को अब इस लोकप्रियता का दबाव भी महसूस होने लगा है. साल 2023 में एक महीने के भीतर बीमारी के कारण उनके पति और देवर की मौत हो गई थी. इसके बाद पिछले तीन साल से वह दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का खर्च उठा रही हैं और बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की कोशिश कर रही हैं. वह कभी ईंट भट्ठों पर काम करती हैं, कभी निर्माण स्थलों पर और कभी खेतों में मजदूरी करती हैं. अब उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी है कि अगर उन्हें नौकरी नहीं मिली, तो उनका हौसला बढ़ाने वाले लोग निराश हो जाएंगे.
होमगार्ड की नौकरी से उन्हें दिहाड़ी मजदूरी के मुकाबले नियमित आमदनी मिलने की उम्मीद है. लेकिन भर्ती की तैयारी के लिए उन्हें अपनी मजदूरी का कुछ हिस्सा छोड़ना पड़ रहा है. वह भी तब, जब उन्हें अभी यह पता नहीं है कि उनका चयन होगा या नहीं.
कविता के पास कोचिंग लेने के पैसे नहीं थे और उन्हें दौड़ की तैयारी करने का भी ज्यादा मौका नहीं मिला था. जब उन्हें पता चला कि दौड़ का ट्रायल मुफ्त में कराया जा रहा है, तो उन्होंने इसमें हिस्सा लेने का फैसला किया. वह नीली साड़ी पहनकर नंगे पैर दौड़ीं.
कविता ने होमगार्ड भर्ती की दौड़ 9 मिनट 40 सेकंड में पूरी कर ली. उन्होंने तय समय सीमा से 20 सेकंड पहले दौड़ पूरी करके क्वालिफाई कर लिया.
हालांकि, दौड़ पास करना भर्ती की पहली ही परीक्षा थी. अभी कई और चुनौतियां बाकी हैं.
रामगढ़ में होमगार्ड के सिर्फ 284 पदों के लिए करीब 16,000 लोगों ने आवेदन किया है. बताया जा रहा है कि कविता के डुमरी प्रखंड में केवल 22 पद हैं. इनमें 11 पुरुषों और 11 महिलाओं के लिए हैं.
ऐसे में मुकाबला काफी कड़ा है. दौड़ पास करने का मतलब नौकरी मिलना नहीं है. कविता को अभी लंबी कूद, ऊंची कूद और लिखित परीक्षा समेत बाकी चरणों में भी सफल होना होगा. इसके साथ ही उन्हें उस घर की जिम्मेदारी भी संभालनी है, जिसका खर्च उनकी कमाई से चलता है.
आगे की परीक्षाओं की तैयारी के लिए कविता ने एक अकादमी में दाखिला लिया है, जहां होमगार्ड भर्ती की तैयारी कराई जाती है. उन्हें वहां आए अभी सिर्फ एक हफ्ता हुआ है. अकादमी चलाने वाले अंकित सिंह ने उन्हें मुफ्त ट्रेनिंग देने की पेशकश की है. उन्होंने कविता को जरूरी सामान भी दिया है और उनका फोन भी ठीक करवाया है.
अंकित सिंह ने कहा, “कविता में दौड़ने की अच्छी क्षमता है और उनका शरीर भी एथलेटिक है. लेकिन लंबी कूद और ऊंची कूद के लिए उन्हें अभी और अभ्यास करना होगा. भर्ती की परीक्षा नजदीक है, इसलिए उनके पास बाकी इवेंट की तैयारी के लिए बहुत कम समय है.”

महतो की जिंदगी में कई जिम्मेदारियां
महतो का पूरा दिन अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाने में गुजरता है. वह रोज सुबह 3 बजे उठती हैं. सबसे पहले गायों और बकरियों को चारा देती हैं, घर की सफाई करती हैं और अपने दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती हैं. इसके बाद सुबह 4 से 4.30 बजे के बीच काम पर निकल जाती हैं.
पंचायत भवन में झाड़ू लगाने का उनका एक नियमित काम है, जिसके लिए उन्हें महीने में 1,000 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा उन्हें हर महीने 1,000 रुपये विधवा पेंशन भी मिलती है. बाकी खर्च चलाने के लिए उन्हें अलग-अलग जगहों पर मजदूरी करनी पड़ती है.
वह काम की तलाश में मजदूरों के चौराहे पर खड़ी नहीं होतीं. सोसो गांव में ज्यादातर काम उन्हें जान-पहचान और लोगों की सिफारिश से मिलते हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें नियमित काम या आमदनी मिलती है.
निर्माण स्थलों और ईंट भट्ठों पर उनका काम शाम करीब 5 बजे खत्म होता है. इसके बाद घर पहुंचने में उन्हें दो घंटे और लग जाते हैं. एक दिन की मजदूरी से उन्हें 200 रुपये तक मिल जाते हैं, लेकिन हर दिन काम मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती.
इसी थोड़ी-सी कमाई से उन्हें अपने बुजुर्ग सास-ससुर और 13 और 10 साल के दो बच्चों का खर्च उठाना पड़ता है. दोनों बच्चे एक निजी स्कूल में पढ़ते हैं, जिसकी फीस हर महीने 4,000 रुपये है. जब कविता के लिए फीस भरना मुश्किल हो जाता है, तो उनके भाई मदद करते हैं.

हालांकि, पिछले दो हफ्तों से उनकी दिनचर्या बदल गई है.
घर के काम निपटाने के बाद अब वह मजदूरी की तलाश में नहीं निकलतीं. वह दो गिलास पानी पीती हैं और एक रिश्तेदार की मोटरसाइकिल पर बैठकर ट्रेनिंग सेंटर के लिए निकल जाती हैं. यह सेंटर उनके घर से 16 किलोमीटर दूर है. ट्रेनिंग भले ही मुफ्त है, लेकिन आने-जाने में लगने वाला समय उनकी मजदूरी के घंटों और कमाई, दोनों को कम कर रहा है.
सेंटर पहुंचकर वह साड़ी बदलती हैं और टी-शर्ट, शॉर्ट्स और स्पोर्ट्स शूज पहनकर तीन घंटे की कड़ी ट्रेनिंग शुरू करती हैं.
स्टेडियम में करीब 200 महिलाएं होमगार्ड भर्ती की तैयारी कर रही हैं. यहां कविता की थकान और कम होती ऊर्जा पर भी लोगों का ध्यान जाने लगा है.
ट्रैक पर एक महिला दूसरी महिला से कहती है, “यह बहुत उदास और थकी हुई लग रही है. इनकी नींद भी पूरी नहीं हो रही है.”
यहां भी कविता के पीछे लोगों का ध्यान लगा हुआ है. करीब 150 किलोमीटर दूर गुमला से एक यूट्यूबर स्टेडियम पहुंचा है. वह कविता का इंटरव्यू लेना चाहता है.
यूट्यूबर ने उनसे कहा, “बस आपके कुछ वीडियो बनाने हैं. आप बहुत प्रेरणा देती हैं.” इसके बाद उसने कविता से दौड़कर दिखाने और कुछ स्ट्रेचिंग करने को कहा.
कविता अब भी इस बात की आदी होने की कोशिश कर रही हैं कि लोग उन्हें पहचानने लगे हैं. शुरुआती इंटरव्यू में वह वीडियो वायरल होने से काफी उत्साहित नजर आई थीं. लेकिन जैसे-जैसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, पत्रकार और नेता उनसे मिलने पहुंचने लगे, यह ध्यान उनकी उस दिनचर्या में दखल देने लगा, जिसे बनाए रखना नौकरी पाने के लिए जरूरी है.
वह लोगों को मना करना चाहती हैं, लेकिन उन्हें वापस भेजना उनके लिए आसान नहीं है.
कविता ने कहा, “मुझे समझ नहीं आता कि लोगों को मना कैसे करूं. कुछ लोग तो हमारे घर पर भी रुकते हैं. पटना और लखनऊ से भी लोग आए हैं.”

एक घर, जो सपनों के टूटने का गवाह है
शनिवार की सुबह कविता महतो ट्रेनिंग के लिए पहुंचती हैं. लेकिन घर के काम निपटाने में ज्यादा समय लग जाने के कारण वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार नहीं कर पातीं. वह वापस साड़ी पहनती हैं और घर लौट जाती हैं. कुछ देर पहले तक वह होमगार्ड भर्ती की तैयारी कर रही थीं, लेकिन अब उन्हें फिर एक मां की जिम्मेदारी निभानी है.
सोसो गांव के कई घरों के मुकाबले उनका घर बड़ा और मजबूत है. उनके पति ने यह घर उस समय बनवाया था, जब उनकी कमाई अच्छी थी. साल 2009 में, जब 13 साल की उम्र में कविता की शादी हुई थी, तब उन्होंने भी अपने भविष्य को लेकर कई सपने देखे थे.
आज वही घर उनके टूटे सपनों की कहानी बयां करता है. घर के अंदर एक बड़ा आंगन है, लेकिन वहां रोशनी कम है. रसोई में खाना बनाने के लिए कोई ऊंचा चबूतरा नहीं है. गैस सिलेंडर और चूल्हा जमीन पर रखे हैं. बर्तन भी इधर-उधर जमीन पर पड़े हैं.
घर लौटते समय कविता रास्ते में एक फल की दुकान से आधा किलो सेब और कुछ केले खरीदती हैं. वह अपना बटुआ निकालती हैं और दुकानदार को देने के लिए 10-10 रुपये के 10 सिक्के गिनती हैं.
कविता ने दुकानदार से कहा, “लीजिए, पूरे 100 रुपये हैं. हमने गुल्लक तोड़ी है. इसलिए इतने सारे खुले पैसे हैं.”

फल खरीदते समय भी कविता के मन में यही चल रहा है कि कहीं स्टेडियम में मिला यूट्यूबर उनके घर न पहुंच जाए. अगर वह आ गया, तो उन्हें अपने बाकी काम छोड़कर उसकी खातिरदारी भी करनी पड़ेगी.
कविता ने कहा, “घर आने के बाद सबसे पहले मैं गाय का दूध निकालती हूं. यह काम सिर्फ मैं ही कर सकती हूं.” इतना कहकर वह अपनी बड़ी बेटी से चाय बनाने को कहती हैं.
लेकिन घर के छोटे-छोटे काम भी हमेशा योजना के मुताबिक नहीं होते.
बेटी उन्हें बताती है, “घर में चीनी नहीं है.”
कविता हैरानी से कहती हैं, “मैं तो तीन दिन पहले ही चीनी लेकर आई थी.” इसके बाद वह बेटी को दुकान से और चीनी लाने के लिए कहती हैं.
खुद कविता गाय का दूध निकालने के लिए बाहर चली जाती हैं. गाय को एक अधूरी ईंटों की बनी जगह में बछड़े के साथ बांधा गया है. वहां दीवारें कच्ची लाल ईंटों की हैं. ईंटों के बीच खाली जगह है और उन पर प्लास्टर भी नहीं हुआ है. फर्श गीला है. जानवरों के पैरों के आसपास पानी और गिरा हुआ दूध जमा है.
कविता अपनी फिरोजी-नीली साड़ी को पैरों के आसपास समेटकर गाय के पास बैठ जाती हैं और एक धातु के बर्तन में दूध निकालने लगती हैं. उनकी एड़ियां सूखी हैं और उनमें गहरी दरारें पड़ी हैं. सालों तक नंगे पैर चलने और सख्त जमीन पर काम करने से उनके पैरों की त्वचा खुरदरी हो गई है.
यह उनके रोजमर्रा के कामों में से एक है. उनकी जिंदगी में आराम के लिए बहुत कम समय है. वीडियो वायरल होने और अनजान लोगों के घर पहुंचने से पहले भी वह दिहाड़ी मजदूरी के साथ ऐसे ही काम संभालती थीं. लेकिन अब लोग उनसे मिलने आते रहते हैं. वे सवाल पूछते हैं और उनका समय चाहते हैं.
गाय का दूध निकालने का काम पूरा भी नहीं हुआ था कि कुछ लोग उनके घर पहुंच गए. स्थानीय नेताओं का एक समूह उनसे मिलने आया है. वे कविता से अपने साथ चलने के लिए तैयार होने को कहते हैं.
उनमें से एक नेता कहता है, “क्या कर रही हो? सब कुछ छोड़कर हमारे साथ चलो.”
अब यह कविता की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है. उन्हें अभी भी इस बात की आदत नहीं हुई है कि लोग अचानक उनसे मिलने पहुंच जाते हैं. जब भी कोई आता है, वह अपना काम छोड़कर उसकी खातिरदारी में लग जाती हैं. यहां तक कि उन्हें अपना खाना भी छोड़ना पड़ता है.
कविता ने कहा, “मैं उन्हें मना नहीं कर सकती. वे गांव के लोग हैं. यहां लोग इसी तरह बात करते हैं.”
कविता ने अभी तक कुछ खाया नहीं है. यहां तक कि उनकी चाय भी नहीं बनी है. नेताओं के साथ जाने का मतलब है 15 किलोमीटर दूर जाना. वह जानती हैं कि इस चक्कर में उनका एक और पूरा दिन निकल जाएगा.
पहचान मिलने की कीमत
कविता महतो से मिलने आने वाले लोग अक्सर खाली हाथ नहीं आते. कोई उनके लिए टी-शर्ट लाता है, कोई पैंट, तो कोई साड़ी. कुछ लोग मांसपेशियां मजबूत करने वाले प्रोटीन सप्लीमेंट भी लेकर आए हैं. कई लोग उनके साथ तस्वीरें भी खिंचवाते हैं. कविता के साथ खिंचवाई गई एक तस्वीर पर उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर हजारों लाइक्स आ सकते हैं. लेकिन कविता के लिए इस पहचान की एक अलग ही कीमत है.
कविता के मुताबिक, उनके नाम से सोशल मीडिया पर 10 से ज्यादा फर्जी अकाउंट बनाए गए हैं. कुछ लोग खुद को उनका भाई या बहन बताकर दूसरों से पैसे मांग रहे हैं. इसके बाद उनके ट्रेनर्स ने कविता के लिए एक इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया है. इस अकाउंट के जरिए वह बार-बार लोगों से अपील कर रही हैं कि उनके नाम पर किसी को पैसे न दें. उन्हें डर है कि उनकी कहानी को लोगों तक पहुंचाने वाले कुछ लोग इसका गलत फायदा भी उठा सकते हैं.
कविता महतो ने कहा, “अब लोग मेरे नाम पर दूसरों से पैसे मांग रहे हैं. मैं साफ कहना चाहती हूं कि मुझे किसी से मदद नहीं चाहिए. अगर कोई सच में मेरी मदद करना चाहता है, तो मुझे नौकरी दिला दे.”
कविता से मदद के कई वादे किए गए हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम पूरे हुए हैं. उनके मुताबिक, उन्हें अब तक कोई खास आर्थिक मदद नहीं मिली है. ट्रेनिंग के लिए मिले कपड़े और जूते उनकी तैयारी में मदद कर रहे हैं, लेकिन इससे परिवार की आर्थिक परेशानियां कम नहीं हुई हैं.
कविता ने कहा, “बहुत सारे लोगों ने मदद करने का वादा किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ. ट्रेनिंग अकादमी के भाइयों ने मेरा मोबाइल ठीक करवाया और मुझे जूते, टी-शर्ट और शॉर्ट्स दिए. मैं साफ कहना चाहती हूं कि मैं किसी से पैसे या मदद नहीं मांग रही हूं.”
कविता को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि लोग समझ रहे हैं कि उन्हें बहुत मदद मिल रही है, जबकि हकीकत कुछ और है. उन्हें डर है कि उनके सास-ससुर और गांव वाले भी यही सोचेंगे कि उन्हें काफी पैसे मिले हैं और फिर पूछेंगे कि वे पैसे कहां गए.
कविता ने कहा, “लोग मेरे नाम से फर्जी अकाउंट बनाकर पैसे मांग रहे हैं. मेरे सास-ससुर और गांव वाले सोचेंगे कि मुझे ये पैसे मिल रहे हैं. कुछ महीने बाद मेरे सास-ससुर भी पूछेंगे कि वे पैसे कहां गए. मेरी जिंदगी पहले से ही मुश्किल है. मैं इसे और मुश्किल नहीं बनाना चाहती.”

परिवार की उम्मीद
65 साल की फूलको देवी अपने दोनों बेटों को खो चुकी हैं. अब उनके परिवार का सहारा उनकी बहू कविता हैं, जिन्होंने होमगार्ड भर्ती की तैयारी के लिए फिलहाल मजदूरी करना छोड़ दिया है.
कविता की सास फूलको देवी ने कहा, “अगर वह खेतों में काम करने नहीं जाएगी, तो हम क्या खाएंगे? मेरे पति खेतों में काम करते हैं, लेकिन हमारे पास इतनी जमीन नहीं है कि पूरे परिवार का पेट भर सके. अपनी जमीन से हमें सिर्फ छह महीने का अनाज मिलता है. कविता बाहर जाकर मजदूरी करती है और पैसे कमाती है. उसी से हमारा घर चलता है.”
पहले परिवार की कमाई की जिम्मेदारी फूलको देवी के दोनों बेटों पर थी. एक बेटा गुजरात की एक निजी कंपनी में सुपरवाइजर था, जबकि दूसरा हैदराबाद में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था.
कविता ने 12वीं तक पढ़ाई की है, लेकिन पढ़ी-लिखी होने के बावजूद उन्हें परिवार का खर्च चलाने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है. उनके 70 साल के ससुर भी इस उम्र में खेतों में काम करते हैं.

कविता की बेटी आरुषि कुमारी अपनी मां को अपना आदर्श मानती हैं. वह भी इंतिजार कर रही हैं कि उनकी मां को नौकरी मिलती है या नहीं. आरुषि का सपना डॉक्टर बनने का है. हालांकि, उन्हें अभी नहीं पता कि वह अपना सपना कैसे पूरा करेंगी. लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अगर उनकी मां को नौकरी मिल गई, तो परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी और उनके सपने को पूरा करने का रास्ता भी आसान हो जाएगा.
आरुषि कुमारी ने कहा, “मेरी मां बहुत मेहनती हैं. वह सबके बारे में सोचती हैं. नौकरी पाने का उनका सपना अपने लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए है. मुझे उनके काम से कोई शर्म नहीं आती, लेकिन मैं चाहती हूं कि उन्हें एक अच्छी नौकरी मिले. वह पढ़ी-लिखी हैं. उन्हें एक मौका मिलना चाहिए.”
उधर, कविता के घर पर कुछ स्थानीय नेता उनका इंतजार कर रहे हैं. वे बताते हैं कि गिरिडीह के सांसद उनसे मिलना चाहते हैं. कविता ने अब तक कुछ खाया नहीं है. घर के कई काम बाकी हैं और दिनभर की जिम्मेदारियां भी पूरी नहीं हुई हैं.
उनमें से एक नेता कविता से कहता है, “अपनी साड़ी बदल लो. सांसद जी तुमसे मिलना चाहते हैं.”
कविता अपना चेहरा धोते हुए जवाब देती हैं, “मैं अपनी साड़ी नहीं बदलूंगी. उनसे मिलने के लिए साड़ी क्यों बदलूं? उन्हें भी पता चलना चाहिए कि मैं इसी तरह रहती हूं.”
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