अयोध्या राम मंदिर में कथित “चंदा चोरी” की खबर पर कुछ विपक्षी नेताओं और खुद को “सेक्युलर” कहने वाले टिप्पणीकारों की खुशी देखने लायक नहीं, बल्कि परेशान करने वाली है. इस चोरी के बाद कई लोगों ने यह भी कहा कि मंदिरों का संचालन सीधे सरकार को करना चाहिए. जहां कुछ लोग इस उम्मीद में खुश हैं कि इससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है, वहीं जो लोग मानते हैं कि ऐसी चोरी रोकने के लिए सरकार की बड़ी भूमिका होनी चाहिए, वे गलत दिशा में सोच रहे हैं (जैसा कि द टाइम्स ऑफ इंडिया में सरकार के एक पूर्व सचिव ने अपने लेख में लिखा है). जब भी कहीं कोई गड़बड़ी होती है, तो सरकार को बीच में लाना सही समाधान नहीं है. यह इस मूल सोच के भी खिलाफ है कि धार्मिक मामलों में सरकार का कोई काम नहीं होना चाहिए.
यह मान लेना कि चोरी सिर्फ हिंदू मंदिरों में ही होती है, बिल्कुल गलत है. वेटिकन से लेकर भारत और दूसरे देशों की मस्जिदों और चर्चों तक, चोरी ही नहीं बल्कि कई तरह की गलत घटनाएं सामने आई हैं. इनमें पादरियों द्वारा बच्चों के पेडोफिलिया जैसे मामले भी शामिल हैं. अगर इन घटनाओं के बाद सरकारों ने गैर-हिंदू धार्मिक स्थलों का संचालन अपने हाथ में नहीं लिया, तो फिर यह कहना कि जिन मंदिरों में चोरी हुई है, वे सरकार के बिना खुद नहीं चल सकते, इसकी क्या वजह है?
जब भी कहीं कोई गड़बड़ी होती है, तो सरकार को बीच में लाना सिद्धांत के तौर पर कई वजहों से गलत है. नीचे दी गई वजहों में सबसे आखिरी वजह हिंदू नजरिए से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है.
पहली बात, धार्मिक संस्थाओं—यानी मंदिरों में अगर कोई धोखाधड़ी या गड़बड़ी होती है, तो उसका समाधान ऐसे निष्पक्ष कानून के तहत होना चाहिए, जिसमें सरकार थोड़े समय के लिए दखल दे और व्यवस्था ठीक होने के बाद पूरी तरह पीछे हट जाए. धार्मिक मामलों में सरकार का स्थायी दखल नहीं हो सकता. जैसे कंपनियों में धोखाधड़ी होने पर कानून के तहत जांच एजेंसियां जांच करती हैं और दोषियों को सजा देती हैं, वैसे ही मंदिरों में भी होना चाहिए. जिस तरह हर धोखाधड़ी करने वाली कंपनी का राष्ट्रीयकरण नहीं किया जाता, उसी तरह मंदिरों का भी नहीं किया जाना चाहिए. 2014 में चिदंबरम के नटराज मंदिर से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सरकार का दखल सिर्फ व्यवस्था ठीक करने तक सीमित होना चाहिए. उसके बाद उसे पीछे हट जाना चाहिए.
दूसरी बात, मंदिरों के संचालन से जुड़ा जो भी कानून हो, वही कानून मस्जिदों, चर्चों और दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए. संविधान का अनुच्छेद 14 हर भारतीय को कानून के सामने समानता का अधिकार देता है. इसमें गैर-व्यक्तिगत कानूनी संस्थाएं भी शामिल हैं. इसलिए सिर्फ हिंदू मंदिरों पर एक कानून लागू करना और मस्जिदों-चर्चों के लिए दूसरा तरीका अपनाने का कोई आधार नहीं है.
तीसरी बात, मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं हैं. उनके पास ऐसे संसाधन भी हैं, जिनका इस्तेमाल सिर्फ श्रद्धालुओं को दूसरे धर्मों में जाने से रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए भी होना चाहिए. चाहे यह स्कूल और अस्पताल बनाकर किया जाए या सीधे धार्मिक प्रचार के जरिए, यह भी मंदिरों की जिम्मेदारी का हिस्सा है. मस्जिदों और चर्चों के पैसों का इस्तेमाल अक्सर धर्मांतरण के लिए किया जाता है. अगर बिना किसी लालच के धर्म परिवर्तन भारतीय कानून के तहत वैध है, तो हिंदू मंदिरों को भी अपने श्रद्धालुओं की रक्षा करने और दूसरे धर्मों के लोगों को हिंदू धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करने का वही अधिकार होना चाहिए. अगर मंदिरों और हिंदू धर्म की दूसरी संस्थाओं को यह काम करना है, तो सरकार द्वारा चलाया जाने वाला संस्थान ऐसा धार्मिक प्रचार नहीं कर सकता. सरकार सिर्फ मंदिर का प्रशासन संभालकर यह नहीं कह सकती कि उसका काम पूरा हो गया. उसे पूरे हिंदू समाज को यह भी बताना होगा कि उसने लोगों को दूसरे धर्मों में जाने से रोकने के लिए क्या किया और जहां जरूरत हो, वहां हिंदू धर्म के विस्तार के लिए क्या कदम उठाए.
लेकिन बहुत कम लोग इस बात से सहमत होंगे कि सरकार को किसी भी तरह का धार्मिक प्रचार करना चाहिए, जब तक कि सरकार खुद धार्मिक आधार पर चलने वाली (थियोक्रेटिक) सरकार न हो.
सीधी बात यह है कि जब तक भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया जाता, तब तक सरकार का मंदिर चलाने का कोई काम नहीं है. अगर सरकार और धर्म एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हों, तभी सरकार मंदिर चला सकती है और दूसरे धर्मों को हिंदुओं को अपने धर्म में ले जाने से रोकने के लिए भी सक्रिय भूमिका निभा सकती है.
धार्मिक स्थल ऐसे सार्वजनिक स्थान हैं, जहां यह सुनिश्चित करने में सरकार की कुछ भूमिका हो सकती है कि उनका संचालन ठीक से हो रहा है. लेकिन वे सार्वजनिक पार्कों जैसे नहीं हैं, जहां हर किसी को समान रूप से आने की अनुमति होती है. मंदिर ऐसे सीमित सार्वजनिक-निजी स्थान हैं, जो आस्था रखने वालों के लिए बने हैं. उनका सीधा संचालन सरकार नहीं कर सकती. जब तक हम हिंदू राष्ट्र की सोच को स्वीकार न कर लें.
आर जगन्नाथन स्वराज्य मैगज़ीन के एडिटर और पूर्व एडिटोरियल डायरेक्टर हैं. उनका एक्स हैंडल @TheJaggi है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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