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Wednesday, 15 July, 2026
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नेहरू से मोदी तक, संसद कई बार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बदल चुकी है

2026 का CAPF कानून, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के सीएपीएफ अधिकारियों के पक्ष में आए फैसले को पलट दिया गया, उसी लंबी संवैधानिक परंपरा का हिस्सा है, जो पहले संविधान संशोधन, शाह बानो, वोडाफोन और दिल्ली सर्विसेज विवाद तक जाती है.

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केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के 18,000 अधिकारी करीब 10 लाख जवानों का नेतृत्व करते हैं. इनमें सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) भारत की पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी संवेदनशील सीमाओं पर तैनात है. भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) तिब्बत (चीन) सीमा की सुरक्षा करती है. सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) नेपाल और भूटान की सीमाओं पर तैनात है. केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) अहम आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों में लगा है, जबकि केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) हवाई अड्डों, संसद और केंद्र सरकार के दूसरे अहम संस्थानों की सुरक्षा करता है.

इन सभी अधिकारियों को सीएपीएफ अधिनियम, 2026 के पास होने से नाराज़गी है. इस कानून ने संजय प्रकाश बनाम भारत संघ (2025) मामले में उनके करियर में आगे बढ़ने को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी सत्ताधारी पार्टी ने संसद में अपने भारी बहुमत का इस्तेमाल करके अदालत के फैसले को बदल दिया हो. भारत में अदालतों के फैसलों को पलटने के लिए कानून बनाने का लंबा इतिहास रहा है.

अलग-अलग राजनीतिक दलों, राज्यों, दशकों और कई तरह के मामलों में सरकारों ने अदालतों के निर्देशों को बेअसर करने के लिए कानून और संशोधन किए हैं. इसकी शुरुआत पहले संविधान संशोधन से हुई थी. इसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत के पहले आम चुनाव से भी पहले पेश किया था. Sixteen Stormy Days: The Story of the First Amendment to the Constitution of India किताब में त्रिपुरदमन सिंह ने मई और जून 1951 के दौरान संसद में हुई तीखी बहसों का ज़िक्र किया है. उस समय नेहरू ने संविधान के अनुच्छेद 19(2) में “उचित प्रतिबंध (reasonable restrictions)” जोड़ने का प्रस्ताव रखा था. इससे सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था, विदेशी देशों से अच्छे संबंध और अपराध के लिए उकसाने जैसे मामलों में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाने का अधिकार मिल गया. इस संशोधन से अदालतों की उस सख्त व्याख्या को कमजोर कर दिया गया, जिसमें अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सीमित प्रतिबंध की बात कही गई थी.

इसी तरह, अनुच्छेद 31A भी जोड़ा गया. इसका मकसद जमींदारी खत्म करने और संपत्तियों के अधिग्रहण से जुड़े कानूनों को अनुच्छेद 14, 19 और 31 के आधार पर अदालत में चुनौती से बचाना था. इसके अलावा, अनुच्छेद 31B के जरिए नौवीं अनुसूची बनाई गई. इसे कानूनों के लिए एक तरह का “ब्लैक बॉक्स” बनाया गया, ताकि इन कानूनों की अदालत में न्यायिक समीक्षा न हो सके.

गोलक नाथ से केशवानंद भारती

1967 में, सुप्रीम कोर्ट ने गोलक नाथ केस में अपने अधिकार का दावा किया और फैसला सुनाया कि पार्लियामेंट फंडामेंटल राइट्स में बदलाव नहीं कर सकती, लेकिन चार साल बाद, 1971 के 24वें कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट ने पार्लियामेंट को संविधान के किसी भी हिस्से, जिसमें पार्ट III भी शामिल है, में बदलाव करने की पावर साफ तौर पर वापस दे दी.

1973 में, पार्लियामेंट ने 32वां कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट लागू किया, जिसमें संविधान में आर्टिकल 371D और 371E जोड़े गए. यह आंध्र प्रदेश के उस कानून को वैलिडेट करने के लिए किया गया था, जो “मुल्कियों” (निज़ाम के तहत तेलंगाना इलाके के रहने वाले) को पढ़ाई और नौकरी में पहले से ज़्यादा छूट देता था. अच्छी बात यह है कि, इसमें मुल्कियों के रिज़र्वेशन के लिए एक सनसेट क्लॉज़ दिया गया था.

उसी साल, केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में, सुप्रीम कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन बनाया, लेकिन फिर इमरजेंसी के दौरान बदनाम 42वां संविधान संशोधन आया—यह सरकार की बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत की लगाई गई सीमाओं को बायपास करने की कोशिश थी.

शाह बानो, वोडाफोन, दिल्ली सर्विसेज

अदालत के फैसले को बदलने के लिए बनाए गए कानूनों में सबसे ज़्यादा विवाद शाह बानो मामले में हुआ था.

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि अगर तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपना खर्च नहीं चला सकती, तो उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) पाने का अधिकार है. यह एक ऐसा कानून है, जिसका मकसद लोगों को बेघर और बेसहारा होने से बचाना है और यह सभी धर्मों पर लागू होता है, लेकिन इस फैसले के बाद मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों ने बड़े पैमाने पर विरोध किया. उनका कहना था कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है.

काफी राजनीतिक दबाव के बीच राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 बनाया. इस कानून के तहत पति की गुजारा भत्ता देने की जिम्मेदारी सिर्फ इद्दत की अवधि तक सीमित कर दी गई. इसके बाद महिला की जिम्मेदारी उसके रिश्तेदारों पर या जरूरत पड़ने पर वक्फ बोर्ड पर डाल दी गई.

2012 में यूपीए सरकार ने आयकर अधिनियम, 1961 में पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू होने वाला संशोधन किया. इसका मकसद Vodafone International Holdings vs Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वोडाफोन का विदेश में हुआ यह सौदा भारत में टैक्स के दायरे में नहीं आता. इसके बाद सरकार ने “इनडायरेक्ट ट्रांसफर” की परिभाषा बदल दी, जिससे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का आधार ही बदल गया.

इसके बाद मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि दिल्ली सरकार के पास “सर्विसेज” (यानी अफसरशाही/ब्यूरोक्रेसी) पर कानून बनाने और प्रशासन चलाने का अधिकार है. हालांकि, पब्लिक ऑर्डर (कानून-व्यवस्था), पुलिस और जमीन इसके दायरे में नहीं होंगे. इसके कुछ ही समय बाद नरेंद्र मोदी सरकार एक अध्यादेश लेकर आई, जिसे बाद में कानून बना दिया गया. इस कानून के जरिए सर्विसेज पर नियंत्रण उपराज्यपाल (LG) को दे दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया.

सीएपीएफ एक्ट, 2026 को जिस तरह पास किया गया

इस तरह देखें तो सीएपीएफ अधिनियम, 2026 कोई अलग मामला नहीं है. हालांकि, इसे जिस तरीके से पास किया गया, वह पहले के मामलों से ज्यादा खुला और बेबाक था. यह कानून 1 अप्रैल को राज्यसभा में ध्वनिमत (वॉइस वोट) से पास हुआ और अगले दिन लोकसभा में भी पारित कर दिया गया. दोनों मौकों पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मौजूद नहीं थे. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए इस बिल पर चर्चा टालने की मांग की थी, लेकिन उनकी मांग तुरंत खारिज कर दी गई.

सिर्फ आठ धाराओं और दो पन्नों वाले इस कानून में “नॉन ऑब्स्टेंटे (Non obstante)” क्लॉज भी जोड़ा गया है. इससे यह कानून सिर्फ मौजूदा फैसले ही नहीं, बल्कि इस विषय पर भविष्य में आने वाले किसी भी अदालत के फैसले को भी प्रभावहीन कर सकता है.

2025 में जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा था कि सीएपीएफ एक ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप ‘A’ सर्विस (OGAS) है. इसलिए इसके अधिकारियों को एक समान प्रमोशन व्यवस्था और व्यवस्थित कैडर मैनेजमेंट नीति का अधिकार है. कोर्ट ने कहा था कि सीएपीएफ अधिकारियों को भी प्रमोशन कोटे में धीरे-धीरे बढ़ोतरी जैसे लाभ मिलने चाहिए, क्योंकि उनकी भर्ती भी सिविल सेवा परीक्षा की तरह यूपीएससी की अखिल भारतीय परीक्षा के जरिए होती है.

पृष्ठभूमि

हालांकि, सीएपीएफ के हर बल—सीआरपीएफ, बीएसएफ, एएसबी, सीआईएसएफ और आईटीबीपी का अपना अलग इतिहास है, लेकिन परंपरागत रूप से इन सभी का नेतृत्व भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी करते रहे हैं.

यह व्यवस्था उस समय ठीक तरह से काम करती थी, जब वरिष्ठ अधिकारी राज्य पुलिस सेवाओं से प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर आते थे या इमरजेंसी कमीशन के जरिए नियुक्त होते थे और जब असिस्टेंट कमांडेंट क्लास-2 के गैर-राजपत्रित (नॉन-गजेटेड) अधिकारी होते थे. लेकिन 1974 में असिस्टेंट कमांडेंट का दर्जा बढ़ाकर क्लास-1 राजपत्रित (गजेटेड) कर दिया गया. इसके बाद भर्ती प्रक्रिया और ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गई, जिसमें शारीरिक परीक्षा, लिखित परीक्षा (जिसमें साइकोमेट्रिक टेस्ट भी शामिल हैं) और इंटरव्यू होने लगे. 2011 से इन अधिकारियों की भर्ती संघ लोक सेवा आयोग कर रहा है.

यह भी उल्लेखनीय है कि 1992 से 2003 के बीच सीआईएसएफ अधिकारियों की भर्ती सिविल सेवा परीक्षा के जरिए हुई थी, जबकि रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के अधिकारियों की भर्ती आज भी इसी परीक्षा के जरिए होती है.

सीएपीएफ अधिकारियों का कहना है कि आईपीएस अधिकारियों के लिए सबसे ऊंचे पद पहले से ही आरक्षित हैं. सभी इंस्पेक्टर जनरल के 50 प्रतिशत पद, एडिशनल डायरेक्टर जनरल (एडीजी) के दो-तिहाई पद और डायरेक्टर जनरल के सभी पद आईपीएस अधिकारियों के लिए तय हैं. उनका कहना है कि आईपीएस अधिकारी अपने मूल काम—राज्यों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, आंतरिक सुरक्षा और अपराध की जांच—में कोई खास अलग पहचान नहीं बना पाए हैं. यही वजह है कि नीट की परीक्षा करानी हो, चुनाव करवाने हों या वीवीआईपी सुरक्षा और प्रोटोकॉल का काम हो, हर बड़े और अहम काम के लिए सीएपीएफ को ही बुलाना पड़ता है.

सीएपीएफ अधिकारियों का यह भी कहना है कि आम तौर पर सीएपीएफ का एक अधिकारी अपने आईपीएस साथी से कम से कम छह साल छोटा होता है. इसकी वजह यह है कि सीएपीएफ भर्ती की अधिकतम उम्र 24 साल है, जबकि आईपीएस के लिए यह 32 साल है. ऐसे में जो अधिकारी इन बलों में कई दशक तक सेवा देते हैं, उन्हें नेतृत्व के पदों तक पहुंचने का बराबर मौका क्यों नहीं मिलना चाहिए?

वे खुद को नए एकलव्य बताते हैं. उनका कहना है कि उनका निशाना बेहतर है, लेकिन उनकी “अंगूठा” उस पुरानी व्यवस्था की बलि चढ़ा दिया गया है, जो योग्यता नहीं बल्कि जन्म के आधार पर खुद को श्रेष्ठ मानती है.

संजीव चोपड़ा एक पूर्व आईएएस अधिकारी और सेंटर फॉर कंटेम्पररी स्टडीज, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. उनका एक्स हैंडल @ChopraSanjeev है. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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