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Monday, 28 September, 2026
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ट्रंप-शी समिट ने दिखाई अमेरिकी शक्ति की सीमाएं, महाशक्तियों के मुकाबले का तरीका बदल रहा है

अमेरिका चीन के फैसलों को प्रभावित तो कर सकता है, लेकिन उन पर अपनी मर्जी थोप नहीं सकता. चीन अमेरिकी दबाव का विरोध तो कर सकता है, लेकिन स्थिर बाहरी माहौल की अपनी ज़रूरत से बच नहीं सकता.

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पिछले हफ्ते वॉशिंगटन में ट्रंप-शी शिखर बैठक ने अमेरिकी रणनीति के सामने एक बड़ी चुनौती साफ कर दी. अमेरिका चीन पर दबाव डाल सकता है और उसे इसकी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है, लेकिन अमेरिका की बहुत बड़ी राष्ट्रीय ताकत अकेले बीजिंग को वॉशिंगटन की शर्तें मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.

शिखर बैठक से पहले, वॉशिंगटन और बीजिंग ने अपने व्यापार समझौते पर लगी अस्थायी रोक को दो महीने और बढ़ाकर 10 जनवरी 2027 तक कर दिया. इस दौरान टैरिफ, चीन द्वारा अमेरिकी सामान की खरीद और दुर्लभ खनिजों की सप्लाई को लेकर बातचीत जारी रही. स्थिरता दिखाने से दोनों देशों के बीच ताइवान, ईरान या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर मतभेद खत्म नहीं हुए. शिखर बैठक ने फिलहाल दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा को संभालने लायक बनाए रखने में मदद की, लेकिन इसने यह भी दिखाया कि अमेरिकी ताकत को लंबे समय तक प्रभावी दबाव में बदलना कितना मुश्किल हो गया है.

अमेरिका के पास अभी भी बहुत बड़ी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय ताकत है. इसके साथ उसका ऐसा सहयोगी देशों का नेटवर्क भी है, जिसकी बराबरी चीन नहीं कर सकता. लेकिन चीन का औद्योगिक पैमाना, ग्लोबल सप्लाई चेन में उसकी जगह और दुनिया भर में उसका व्यापारिक प्रभाव उसे दबाव सहने, जवाबी कदम उठाने और उन देशों के लिए कीमत बढ़ाने की क्षमता देते हैं, जिन्हें किसी एक पक्ष का साथ देने के लिए कहा जाता है. टैरिफ, निर्यात पर नियंत्रण और सैन्य ताकत इस प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन इनमें से कोई भी राजनीतिक नतीजे की गारंटी नहीं दे सकता.

राष्ट्रीय ताकत से बातचीत में प्रभाव तक

व्यापार समझौते को थोड़े समय के लिए बढ़ाने से वॉशिंगटन की समस्या साफ दिखाई देती है. इससे अस्थायी समझौता बना रहता है, लेकिन ज्यादा मुश्किल बातचीत बाद के लिए टल जाती है. दुर्लभ खनिजों की सप्लाई में रुकावट की खबरें और अमेरिकी कृषि सामान की चीन द्वारा खरीद में अनुमानित कमी दिखाती है कि व्यापार समझौते को लागू करना भी दोनों देशों के बीच मुकाबले का एक मैदान बन गया है.

वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों को आर्थिक स्थिरता की जरूरत है, लेकिन साथ ही दोनों एक-दूसरे के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए बातचीत इस प्रतिस्पर्धा से अलग कोई चीज नहीं है. बातचीत खुद इस प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है.

दो महीने की राहत बाजारों को भरोसा दे सकती है और अधिकारियों को बातचीत के लिए समय दे सकती है. लेकिन इससे कारोबार करने वाली कंपनियां इस बात को लेकर अनिश्चित रहती हैं कि उन्हें किन नियमों के तहत निवेश और व्यापार करना है. दोनों पक्षों ने उन मूल समस्याओं को दूर नहीं किया है, जिनकी वजह से यह अस्थायी समझौता जरूरी हुआ था.

व्यापार के बाहर ईरान भी इसी तरह की सीमा दिखाता है. वॉशिंगटन ने ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए चीन का समर्थन लेने की कोशिश की. बीजिंग ने इससे दूरी बनाए रखी और शिखर बैठक से इस मामले में कोई बड़ी सफलता सामने नहीं आई.

इसके बजाय शी ने अमेरिका और ईरान के बीच एक अस्थायी समझौते पर वापस लौटने का समर्थन किया. यहां तक कि ऐसी स्थिति भी, जिसका पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता था, बीजिंग को वॉशिंगटन की स्थिति के मुताबिक चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकी.

ताइवान इससे भी बड़ी और महत्वपूर्ण परीक्षा है. चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, शी ने ट्रंप से ताइवान की आजादी का विरोध करने को कहा. यह बात वॉशिंगटन की लंबे समय से चली आ रही स्थिति से ज्यादा मजबूत थी. अमेरिका की मौजूदा स्थिति यह है कि वह ताइवान की आजादी का समर्थन नहीं करता. हालांकि, अमेरिका की नीति में कोई बदलाव घोषित नहीं किया गया.

फिर भी अगर यह धारणा बनती है कि ताइवान को दिए गए भरोसे को कहीं और रियायतें हासिल करने के लिए बदला जा सकता है, तो इससे दूसरे साझेदार देशों का अमेरिका की प्रतिबद्धताओं को देखने का तरीका बदल सकता है.

शिखर बैठक ने शायद अमेरिका और चीन की प्रतिद्वंद्विता का तापमान कुछ कम किया हो, लेकिन इसके केंद्र में मौजूद जोखिम अभी भी बने हुए हैं. बीजिंग को लगता है कि वह वॉशिंगटन से क्या हासिल कर सकता है, और क्या ताइपे को अमेरिका की नीति में किसी बदलाव की साफ सीमाएं दिखाई देती हैं, ये बातें अब उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी बैठक में हुई बातचीत.

किसी संभावित समझौते को लेकर अनिश्चितता उन लोगों और देशों को परेशान कर सकती है, जिन्हें उस समझौते के नतीजों के साथ रहना होगा.

दोनों नेताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में भी अलग-अलग बातें कहीं. ट्रंप ने सीमित नए नियमों और नियंत्रणों पर जोर दिया, जबकि शी ने AI के विकास को संभालने और नियंत्रित करने की बात कही.

तकनीक के मामले में बातचीत करने में रुचि होना और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के नियमों पर सहमत होना एक ही बात नहीं है. दोनों सरकारों के पास किसी खतरनाक घटना को रोकने की वजह है. लेकिन साथ ही दोनों ऐसी तकनीकों में बढ़त हासिल करना चाहते हैं, जो उनके आर्थिक और सैन्य भविष्य को प्रभावित कर सकती हैं.

संकट के समय दोनों देशों के बीच बातचीत उपयोगी होगी, लेकिन इससे तकनीक तक पहुंच, तकनीकी मानकों और तकनीकी नेतृत्व को लेकर बड़ी प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं होगी.

गठबंधन और बदलता हुआ मुकाबला

अमेरिका के सहयोगी देश अभी भी उसकी बड़ी रणनीतिक ताकत हैं, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में. लेकिन किसी सहयोगी देश का चीन को रोकने की रणनीति में अमेरिका का साथ देना यह जरूरी नहीं बनाता कि वह चीन पर लगाए गए हर आर्थिक प्रतिबंध को भी स्वीकार करे.

यूरोप के सहयोगी देशों, जापान और दक्षिण कोरिया की अपनी सुरक्षा चिंताएं, अपनी इंडस्ट्री और चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंध हैं. वे संवेदनशील तकनीकों और मजबूत सप्लाई चेन के लिए अमेरिका के साथ सहयोग कर सकते हैं, लेकिन साथ ही चीन की पूरी अर्थव्यवस्था को अलग-थलग करने की व्यापक कोशिश का विरोध भी कर सकते हैं.

वॉशिंगटन को खास जोखिमों को लेकर सहमति बनानी होगी, सहयोगियों पर पड़ने वाली लागत को विश्वसनीय तरीके से साझा करना होगा और अपनी प्रतिबद्धताओं को लेकर भरोसा बनाए रखना होगा.

चीन को अमेरिकी गठबंधनों को तोड़ने की जरूरत नहीं है. अगर इन गठबंधनों के अंदर ही अलग-अलग मत हैं, तो चीन को उसका फायदा मिल सकता है.

किसी गठबंधन का निर्माण सिर्फ सहयोगी देशों की ताकत को जोड़ देने का गणित नहीं है. यह एक राजनीतिक प्रक्रिया भी है. वॉशिंगटन से प्रभावी दिखने वाला कोई कदम उसके सहयोगी देशों पर अलग-अलग और असमान लागत डाल सकता है. अगर इन लागतों का ध्यान नहीं रखा गया, तो ऊपर से दिखाई देने वाली एकता असल में कमजोर पड़ सकती है.

बड़ी शक्तियों के बीच मुकाबले का तरीका बदल रहा है. सुरक्षा संबंध, उत्पादन नेटवर्क और तकनीकी साझेदारियां एक-दूसरे से जुड़ रही हैं, लेकिन दुनिया दो साफ-साफ अलग खेमों में नहीं बंट रही है.

कोई देश समुद्री सुरक्षा के मामले में वॉशिंगटन के साथ काम कर सकता है, चीन के साथ व्यापार कर सकता है और जलवायु या वित्तीय स्थिरता के मामले में अपनी स्वतंत्र स्थिति रख सकता है.

एक मुद्दे पर किसी देश का साथ देना यह तय नहीं करता कि वह दूसरे मुद्दे पर भी उसी पक्ष का साथ देगा. दूसरे देश चीन की ताकत को गंभीरता से लेते हैं, लेकिन उनके हितों को सिर्फ वॉशिंगटन या बीजिंग में से किसी एक को चुनने तक सीमित नहीं किया जा सकता.

उदाहरण के लिए, भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक अनुकूल शक्ति संतुलन बनाए रखने और अमेरिका के साथ रणनीतिक और तकनीकी संबंधों को और मजबूत करने में मजबूत रुचि है.

इसके साथ ही, चीन को लेकर भारत का अपना आकलन है. भारत की अपनी जमीन और समुद्र से जुड़ी प्राथमिकताएं हैं और वह स्वतंत्र तरीके से फैसले लेने की अपनी प्रतिबद्धता रखता है.

एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के दूसरे देश भी अपनी-अपनी परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग फैसले लेते हैं. उनके फैसले यह तय करने में भूमिका निभाएंगे कि अमेरिका और चीन की कौन-सी पहल सफल होती है.

इन देशों को सिर्फ दो बड़ी शक्तियों के बीच मुकाबले में वोट देने वाले देशों की तरह देखना उस स्वतंत्र भूमिका को नजरअंदाज करना है, जो इस बदलते हुए मुकाबले का आकार तय कर रही है.

भारत की साझेदारियां उसकी काम करने की क्षमता बढ़ा सकती हैं, लेकिन सिर्फ साझेदारियों की संख्या से यह पता नहीं चलता कि भारत के पास कितनी स्वतंत्रता या प्रभाव है.

इन साझेदारियों की असली उपयोगिता इस बात में है कि क्या वे तकनीक और पूंजी तक पहुंच बढ़ाती हैं, देश की अपनी क्षमताओं को मजबूत करती हैं और किसी भी बड़ी शक्ति के दबाव का सामना करने के लिए भारत को विकल्प देती हैं.

इसलिए वॉशिंगटन को यह पूछना होगा कि उसे वास्तव में किस तरह के सहयोग की जरूरत है.

दबाव या जबरदस्ती को रोकने के लिए साझा सुरक्षा उपायों की जरूरत हो सकती है. कुछ खास देशों या जगहों पर निर्भर सप्लाई चेन को कम करने के लिए निवेश, तकनीक और ऐसे दूसरे विकल्पों की जरूरत हो सकती है जो वास्तव में काम कर सकें.

हर मुद्दे पर एक जैसी साझा स्थिति की मांग करने से ऐसा सहयोग भी मुश्किल हो सकता है, जो वास्तव में हासिल किया जा सकता है.

अमेरिका का प्रभाव सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह दूसरों पर कितनी कीमत थोप सकता है. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह दूसरे देशों को क्या ऐसा देता है, जो उनके लिए उपयोगी, आकर्षक और भरोसेमंद हो.

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर बड़ा सवाल

शिखर बैठक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल भी उठाती है.

ट्रंप ऐसे दोतरफा समझौते कर सकते हैं, जिनसे उन्हें साफ दिखाई देने वाले फायदे मिलें. वहीं, शी चाहते हो सकते हैं कि वैश्विक व्यापार और सुरक्षा में चीन के बढ़ते महत्व को मान्यता मिले.

ऐसे समझौते खतरे को कम कर सकते हैं, लेकिन कमरे से बाहर मौजूद देशों के हितों का फैसला कोई भी नेता अकेले नहीं कर सकता.

एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था सिर्फ एक शिखर बैठक या स्थिरता की घोषणा से नहीं बनती. यह नियमों, संस्थाओं, निवेश और भरोसे को लेकर बार-बार लिए गए फैसलों से बनती है.

दो बड़ी शक्तियों के बीच अस्थायी समझौता दुनिया में स्थिरता के व्यापक हित में हो सकता है. लेकिन इससे यह सवाल भी उठ सकता है कि किसकी चिंताओं को सुना गया और किसकी चिंताओं को बाद के लिए टाल दिया गया.

किसी भी उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की असली परीक्षा यह है कि क्या वॉशिंगटन और बीजिंग के बाहर मौजूद देश भी उसकी शर्तों पर भरोसा कर सकते हैं.

संभावना यही है कि इन शर्तों को लेकर लंबे समय तक मुकाबला चलता रहेगा.

अमेरिका चीन के फैसलों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन उन्हें अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता.

चीन अमेरिकी दबाव का विरोध कर सकता है, लेकिन वह खुद भी बाहर की दुनिया में स्थिर माहौल की जरूरत से बच नहीं सकता.

इन दोनों के आसपास मौजूद दूसरे देश अपनी प्रतिबद्धताओं, मौकों और जोखिमों को अपने-अपने हितों के हिसाब से तौलते रहेंगे.

अमेरिकी नेतृत्व कितने समय तक मजबूत बना रहता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वॉशिंगटन अपनी बड़ी ताकत को ऐसे भरोसेमंद सहयोग में कितना बदल पाता है, जहां बाकी देश अमेरिका के सामने पहले की तरह झुकने वाले नहीं हैं.

मोनीष तौरंगबाम, चिंतन रिसर्च फ़ाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फ़ेलो हैं. विचार निजी हैं. 

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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