मैंने पिछले दो दिनों 18 अक्टूबर को हुए ‘चलो यमुना मेगा स्वच्छता अभियान’ की तैयारी की. मैं सुबह बहुत जल्दी उठी और यमुना नदी की ओर निकल पड़ी, ताकि हज़ारों स्वयंसेवकों, छात्रों, कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और शहर के लोगों के साथ इसमें शामिल हो सकूं. इस दौरान मेरे कानों में मशहूर माता की भेंट के शब्द गूंज रहे थे. “चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है.”
भारत में नदियां सिर्फ पानी के स्रोत नहीं हैं. गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी और ऐसी अनगिनत नदियों की सदियों से पूजा होती रही है. इन नदियों ने सभ्यताओं को सहारा दिया, हमारी जमीनों को उपजाऊ बनाया और हमारी पवित्र कहानियों का हिस्सा बनी रहीं. महान मां यमुना, यमुना नदी का ही रूप मानी जाती हैं और गंगा के बाद भारत की दूसरी सबसे पवित्र नदी हैं. हिंदू धर्म में यमुना को सूर्य देव की बेटी और मृत्यु के देवता यमराज की जुड़वां बहन माना जाता है. वह कृष्ण की आठ प्रमुख पत्नियों, यानी अष्टभार्या, में से एक भी हैं.
इस रविवार की सुबह दिल्ली सरकार के बड़े यमुना सफाई अभियान के तहत हजारों स्वयंसेवक और बीजेपी के कार्यकर्ता शहर के करीब 70 घाटों पर पहुंचे.
मैं भी उत्साही युवाओं की एक टीम के साथ एक घाट पर गई. इन युवाओं ने देर तक सोने के बजाय अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल एक साथ मिलकर, अच्छे काम और समाज के लिए योगदान देने में किया.
इन जोश से भरे और उत्साह से लबरेज़ युवाओं को देखना दिल्ली में धरना देने वालों से बिल्कुल अलग है. मैं यह देखकर कुछ बातें सोचने और लिखने के लिए मजबूर हुई.
खुद से पहले सेवा
सनातन धर्म के अनुसार, ब्रह्मांड की हर चीज़ को ईश्वर के रूप में देखा जाता है. इसी से मशहूर कहावत “नर सेवा, नारायण सेवा” आती है. इसका मतलब है कि इंसान की सेवा करना भगवान की सेवा करने के बराबर है.
सिख धर्म भी सेवा की भावना में गहराई से जुड़ा हुआ है. दरअसल, दुनिया में कहीं भी कोई आपदा या बड़ी मुसीबत आती है, तो आप सिखों को भूखे लोगों को खाना खिलाने के लिए लंगर चलाते हुए देखेंगे. वे सेवा को एक कदम और आगे ले जाते हैं. वे गुरुद्वारों में सफाई अभियान भी चलाते हैं, जहां अमीर और गरीब सभी मिलकर अपनी साझा जगह की देखभाल करते हैं.
इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘स्वच्छ सेवा’ का आह्वान करते हैं, तो यह हमारी अपनी संस्कृति का ही हिस्सा है, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में लंबे समय से चली आ रही है.
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥“
Let your aims be common, and your hearts be united. May your minds be of one accord, so that you may live together in harmony and effectively serve one another.
— Rigveda 10.191.4
प्राचीन सभ्यता, आधुनिक समस्या
हम सिंधु सरस्वती सभ्यता के वंशज हैं. यह सरस्वती-सिंधु क्षेत्र की एक बहुत विकसित और उन्नत सभ्यता थी. अच्छी तरह से बसे हुए शहर, सही जल निकासी व्यवस्था और अलग से बनाए गए शौचालय और नहाने की जगहें, ये सभी उस समय के नागरिक जीवन का हिस्सा थीं, जैसा कि अब तक की गई खुदाई में मिले अवशेषों से पता चलता है. इन अवशेषों से साफ है कि शहरों के कचरे को अच्छी तरह संभाला जाता था. बाद की पीढ़ियां दूसरी जगह चली गईं, लेकिन वे कचरे को संभाल नहीं पाईं. ऐसा क्यों हुआ?
ज़ाहिर तौर पर इसका बहुत कुछ संबंध नागरिक व्यवस्था और नागरिक जिम्मेदारी के टूटने से है. फिर आजादी के बाद तेजी से हुए विकास के साथ हमने प्रकृति और जैविक तरीके से कचरा गलने-सड़ने पर आधारित अपनी प्राचीन पर्यावरणीय व्यवस्थाओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया.
घरों से निकलने वाला कचरा बढ़ा और प्लास्टिक के इस्तेमाल ने हमारे कचरे को दोबारा इस्तेमाल करने और रिसाइकिल करने की व्यवस्थाओं को खत्म कर दिया. जल्द ही हमने पश्चिमी देशों की एक बार इस्तेमाल करके फेंक देने वाली संस्कृति अपना ली. सदियों के दौरान, अलग-अलग आक्रमणों और बदलते राजवंशों के बीच हम धीरे-धीरे अपने कचरे को संभालने की क्षमता खोते गए और नदियां कचरा फेंकने की जगह बन गईं.
1890 में अंग्रेज़ों ने शहर का सीवेज यमुना नदी में डालना शुरू कर दिया. यह चंद्रावल जल संयंत्र के नीचे की ओर किया जाता था, जहां पीने के पानी को साफ किया जाता था. इससे पवित्र नदी जहरीली और खतरनाक होती गई.
यमुना का सिर्फ 22 किलोमीटर हिस्सा, यानी मुश्किल से 2 प्रतिशत नदी, दिल्ली से होकर गुजरती है, लेकिन इसी हिस्से में नदी का 80 प्रतिशत प्रदूषण पहुंचता है. जहरीले गंदे पानी से बनी बादल जैसी झाग के बीच छठ पूजा किए जाने की तस्वीरें कौन भूल सकता है?
लागू करने की चुनौतियां
जब 2025 में बीजेपी की सरकार सत्ता में आई, तो उसके वादों में से एक यमुना नदी की सफाई भी थी. यह एक बहुत बड़ा काम है. नदी को फिर से साफ और स्वस्थ बनाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को आधुनिक बनाना, गंदे पानी को नदी में छोड़े जाने से पहले ही रोकना और दिल्ली के सीवेज नेटवर्क का निर्माण करना भी शामिल है.
दिल्ली सरकार ने 2026-27 के वित्त वर्ष में पवित्र नदी को साफ करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के मकसद से जल बोर्ड के जरिए 6,485 करोड़ रुपये दिए. यह ग्रीन बजट में एक ही मद के लिए दिए गए सबसे बड़े बजट हिस्सों में से एक है.
इसके अलावा, दिल्ली जल बोर्ड ने यमुना को पूरी तरह से फिर से साफ और बेहतर बनाने की परियोजनाओं के लिए करीब 4,500 करोड़ रुपये अलग से रखे हैं. इसमें सीवेज ट्रीटमेंट के 15 नए विकेंद्रीकृत प्लांट (डीएसटीपी) लगाना और सीवर नेटवर्क का विस्तार करना शामिल है, ताकि गंदे पानी को साफ करने की कुल क्षमता बढ़ाकर 1,041 एमजीडी तक पहुंचाई जा सके.
यह साफ है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पवित्र नदी को साफ करने को लेकर गंभीर हैं. वह खुद आगे बढ़कर उदाहरण पेश कर रही हैं. ऐसा पहली बार नहीं है, जब उन्होंने लोगों को नदी की सफाई के अभियान में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया हो.
हम क्या कर सकते हैं?
लेकिन शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि आम नागरिकों की भी है. दिल्ली के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह शहर को प्रदूषण से मुक्त रखने में मदद करे. कचरे को संभालने और उसे सही तरीके से ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी हम सभी की है.
हम प्लास्टिक के कचरे की आलोचना करते हैं, लेकिन फिर भी एक बार इस्तेमाल करके फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक की पानी की बोतलें खरीदते हैं. जब मैं बच्ची थी, तो मेरी मां मुझे साथ ले जाने के लिए हमेशा थर्मस या स्टील की बोतल देती थीं. 2000 के दशक की शुरुआत तक, या निश्चित रूप से 1990 के दशक के आखिर तक, सभी कार्बोनेटेड पेय कांच की बोतलों में घर लाए जाते थे और हर हफ्ते खाली बोतलों की पेटी देकर भरी हुई बोतलों की पेटी ले ली जाती थी. आज भी प्लास्टिक की बोतलों की समस्या का यह एक व्यावहारिक समाधान है.
सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर रोक लगाने की कोशिशों के बावजूद, हम सब्जियां खरीदने के लिए शायद ही कभी कपड़े के थैले लेकर जाते हैं. मुझे याद है कि मेरी दादी कपड़े के बचे हुए टुकड़ों को जोड़कर चमकीले रंगों के सूती थैले सिलती थीं. हम उनमें अपना टिफिन रखते थे और उन्हें कॉलेज भी ले जाते थे. आम नागरिक होने के नाते, कचरे को सही तरीके से संभालने की हमारी भी जिम्मेदारी है.
दिल्ली नगर निगम ने राष्ट्रीय ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के अनुसार कचरे को संभालने की व्यवस्था शुरू की. इन नियमों को 2026 में अपडेट किया गया था. इनके अनुसार, लोगों, घरों और संस्थानों को कचरे को चार अलग-अलग तरह से बांटना जरूरी है: गीला कचरा, सूखा कचरा, सैनिटरी कचरा और विशेष देखभाल वाला कचरा.
गीले कचरे में रसोई से निकलने वाला कचरा, जैसे फलों और सब्जियों के छिलके शामिल हैं. इससे खाद बनाई जा सकती है. प्लास्टिक और कांच की बोतलों जैसे सूखे कचरे को दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाया जा सकता है. सैनिटरी कचरे में डायपर और सैनिटरी नैपकिन शामिल हैं. इन्हें अलग से पैक करना चाहिए. विशेष देखभाल वाले कचरे में बैटरी और बल्ब शामिल हैं. इनमें जहरीला कचरा होता है और इन्हें लैंडफिल में नहीं फेंकना चाहिए. दिल्ली नगर निगम इस नीति को लागू करने के लिए बहुत कोशिश कर रहा है, लेकिन सच बताइए, हम शहरों में रहने वाले कितने लोग वास्तव में ऐसा कर रहे हैं?
अगर सुरक्षित और साफ पीने का पानी उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है, तो हमें भी यह सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए कि हमारा कचरा और प्लास्टिक देश की नदियों और जमीन में न पहुंचे.
मुझे वुडी गथरी का एक मशहूर गाना याद आता है: “This land is your land, this land is my land, this land is made for you and me.”
इस महीने की शुरुआत में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन के बाद, नई दिल्ली नगर परिषद ने वहां से 60 मीट्रिक टन (60,000 किलो) कचरा हटाया. एक दिन में सबसे ज्यादा 15,000 किलो कचरा जमा हुआ था. इसमें प्लास्टिक की बोतलें, खाने के डिब्बे, इस्तेमाल के बाद फेंकी जाने वाली प्लेटें, बैनर आदि शामिल थे. यह कचरा जंतर-मंतर, टॉलस्टॉय मार्ग, जय सिंह रोड, जनपथ और कनॉट प्लेस के आसपास के इलाकों में फेंका गया था. मैंने एक बार भी सीजेपी के नेताओं या यहां तक कि कथित “युवा आइकन” राहुल गांधी को प्रदर्शनकारियों से अपना कचरा खुद साफ करने की अपील करते नहीं सुना.
नेतृत्व का मतलब हमेशा अराजकता फैलाने की अपील करना नहीं होता. इसका मतलब लोगों में नागरिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना भी है. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद उदाहरण पेश करके नेतृत्व करने की कोशिश की है.
स्वच्छता पर बातचीत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद के वर्षों में स्वच्छ भारत और शौचालय बनाने को लेकर बातचीत शुरू हुई. महात्मा गांधी के बाद, कांग्रेस के किसी भी राजनीतिक नेता ने शौचालयों या अपने पीछे सफाई करने के बारे में बात नहीं की. कांग्रेस 2014 तक लगभग लगातार सत्ता में रही थी. गांधीजी ने एक बार कहा था, “स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी स्वच्छता है.”
उन्होंने जो कहा, उसे खुद करके भी दिखाया. उन्होंने झुग्गियों में रहने वाले लोगों की बेहद खराब जीवन स्थितियों को पूरे समाज की सामूहिक नाकामी माना. उन्होंने अपने हाथों से इंसानों का मल और कचरा तक उठाया. आज उनकी वाल्मीकि बस्ती में एक शानदार समुदाय रहता है, जो गांधीवाद के प्रेरणादायक मूल्यों पर आज भी चलता है.
सांसद के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने मोहन सिंह प्लेस में सफाई अभियानों में हिस्सा लिया. वहां लोग खुले में शौच करते थे. मैंने इलाके की पहचान करने के लिए गूगल मैप्स और जियोफेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया. 2014 के बाद ही प्रधानमंत्री मोदी ने कई योजनाएं खास लक्ष्यों को ध्यान में रखकर शुरू कीं. उन्होंने स्वच्छ भारत बनाने की दिशा में काम किया और हजारों शौचालय बनवाए. इससे देश में स्वच्छता की एक क्रांति आई.
हमारे जेन ज़ी यानी नई पीढ़ी से हमें इसी तरह के कैंपेन की जरूरत है क्योंकि यही हमारे देश की उम्मीद है. हमें उस तरह की अराजकता नहीं चाहिए, जिसने बांग्लादेश और नेपाल को अपनी चपेट में ले लिया था. अगर प्रधानमंत्री मोदी सच में तानाशाह होते, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं, तो उन्होंने कचरा फैलाने, खुले में शौच करने और सार्वजनिक जगहों पर पेशाब करने के लिए मौत की सज़ा शुरू कर दी होती. इसके बजाय, उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान के जरिए पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया. सिर्फ कैमरे के सामने खान चाचा के रोल खाते हुए दिखना किसी पीढ़ी के लिए प्रेरणा नहीं है.
याद रखने लायक सबक
यमुना के किनारे के विकास के लिए अहमदाबाद की साबरमती रिवरफ्रंट विकास परियोजना से अहम सबक लिए जा सकते हैं. इससे दिल्ली में नदी के उन उपेक्षित किनारों को लोगों के लिए सुंदर और जीवंत सार्वजनिक जगहों में बदला जा सकता है, साथ ही पर्यावरण को फिर से बेहतर बनाने को प्राथमिकता दी जा सकती है.
साबरमती परियोजना के तहत नदी के किनारे 11.25 किलोमीटर लंबा रिवरफ्रंट बनाया गया और करीब 205 हेक्टेयर जमीन को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाया गया. इस परियोजना की अनुमानित लागत 1,152 करोड़ रुपये थी. इसके पैदल चलने वाले रास्ते, पार्क, साइकिल ट्रैक और सांस्कृतिक जगहें दिखाती हैं कि नदियां किस तरह शहरों को उनकी प्राकृतिक विरासत से फिर जोड़ सकती हैं.
वास्तुकार पंकज गुप्ता की किताब द यमुना रिवर प्रोजेक्ट (2018) एक ऐसा खाका पेश करती है, जिससे यमुना के किनारे के इलाके को बदला जा सकता है. इसमें शहर के उन लोगों को शामिल करने की बात कही गई है, जिनका यमुना नदी से गहरा लगाव है, और जो “उसके डिजाइन का अभिन्न हिस्सा हैं”. दिल्ली के पास नदी के लिए लोगों को केंद्र में रखकर यह तरीका अपनाने का मौका है. हालांकि, यमुना नदी के लिए ऐसा तरीका अपनाना जरूरी है, जो पर्यावरण का ध्यान रखे. इसमें सीवेज का सही तरीके से ट्रीटमेंट, साफ पानी का बहाव, आर्द्रभूमि को फिर से बहाल करना, जैव विविधता वाले पार्क बनाना और बाढ़ के मैदानों की सुरक्षा करना शामिल है.
हम सभी को गांधीजी से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है.
“साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल”, यमुना नदी भी अपने किनारे रहने वाले लोगों के सामूहिक प्रयासों से साबरमती नदी जैसी बन सकती है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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