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Tuesday, 20 October, 2026
होमफीचर30 साल तक सस्ती लेबर के दम पर बढ़ीं भारतीय IT कंपनियां, अब AI से कारोबार पर संकट

30 साल तक सस्ती लेबर के दम पर बढ़ीं भारतीय IT कंपनियां, अब AI से कारोबार पर संकट

भारत के 250 अरब डॉलर के आईटी सेक्टर में 60 लाख लोग काम करते हैं, जो देश में ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों का आधा हिस्सा हैं. अब इस सेक्टर के सामने बड़ा खतरा है, क्योंकि AI एजेंट इंसान के हर घंटे के काम के बदले पैसे लेने वाले कारोबारी मॉडल की अहमियत घटा रहे हैं.

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हैदराबाद/नई दिल्ली: इस महीने की शुरुआत में अमेरिका के आइजनहावर एग्जीक्यूटिव ऑफिस बिल्डिंग में खड़े होकर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भारत की चार सबसे बड़ी आईटी कंपनियों को साफ संदेश दिया: अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से न निकालें और उनकी जगह “विदेशी बंधुआ मजदूरों” को न रखें.

यह सिर्फ अमेरिका में भारतीय टेक कर्मचारियों की नौकरी जाने, उनके वीज़ा का दर्जा खत्म होने और उनके घर लौटने की बात नहीं है. वेंस की बात भारतीय आईटी कंपनियों के लिए भी आखिरी चेतावनी थी. ये कंपनियां अचानक आए इस बदलाव के लिए तैयार नहीं थीं और अब करीब एक सदी में होने वाले सबसे बड़े बदलाव का सामना करने की तैयारी कर रही हैं. ये कंपनियां बहुत लंबे समय तक सस्ते कर्मचारियों के सहारे कारोबार चलाने के अपने पुराने और कामयाब तरीके में फंसी रहीं. इस वजह से वे अगले बड़े बदलाव के लिए नए तरीके खोजने और नई तकनीक बनाने में निवेश नहीं कर पाईं.

भारत के 250 अरब डॉलर के आईटी सेक्टर में 60 लाख लोग काम करते हैं, जो देश में ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों का आधा हिस्सा हैं. अब इस सेक्टर के सामने अपने अस्तित्व का खतरा है, क्योंकि AI एजेंट इंसान के हर घंटे के काम के बदले पैसे लेने वाले कारोबारी मॉडल की अहमियत घटा रहे हैं.

भारत की सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री एक बेहद आसान आर्थिक हिसाब पर खड़ी हुई थी. जब पश्चिमी देशों में तकनीकी कर्मचारियों को रखने के लिए पांच गुना ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं, तो भारत में कम खर्च पर उतने ही कर्मचारी क्यों न रखे जाएं और कारोबार क्यों न बढ़ाया जाए?

अब कर्मचारियों की लागत में अंतर का फायदा उठाने की जगह ज्ञान और तकनीक के अंतर का फायदा उठाने का दौर आ रहा है. अब जाकर कंपनियों को देर से यह बात समझ आ रही है कि भारत की सॉफ्टवेयर सेवा देने वाली कंपनियों ने रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D), यानी शोध और नई तकनीक विकसित करने, और लर्निंग एंड डेवलपमेंट (L&D), यानी कर्मचारियों को नई चीज़ें सिखाने और उनकी क्षमताएं बढ़ाने की प्रक्रियाओं पर पर्याप्त पैसा खर्च नहीं किया.

महिंद्रा ग्रुप के पूर्व चीफ डिजिटल ऑफिसर जसप्रीत बिंद्रा ने कहा, “भारत की पांच या छह सबसे बड़ी कंपनियों में से किसी ने भी AI की दुनिया के नियमों को सही तरीके से नहीं समझा.” उन्होंने बताया कि इसी वजह से उन्होंने डिजिटल कंसल्टिंग का काम छोड़ दिया और AI की ट्रेनिंग देने वाली अपनी कंपनी शुरू की.

बिंद्रा को याद है कि अगस्त 2017 में बेंगलुरु में स्थित भारत की एक बड़ी आईटी कंपनी के सीईओ OpenAI में इन्वेस्ट करना चाहते थे. कंपनी ने इनकार कर दिया और सीईओ ने इस्तीफा दे दिया. बिंद्रा कहते हैं कि वह अक्सर इस घटना का उदाहरण देते हैं कि सॉफ्टवेयर सर्विस देने वाली कंपनियों के मालिकों को यह समझ ही नहीं आया कि एआई की लहर उनके कारोबार को बदलने आ रही है.

इसके बाद इन आईटी कंपनियों के कई बड़े अधिकारियों ने नौकरी छोड़ दी और अपनी कंपनियां शुरू कर लीं. ये नई कंपनियां सबसे पहले तकनीक में और उसके बाद लोगों पर भारी निवेश करती हैं. CIEL HR के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर आदित्य नारायण मिश्रा ने कहा कि Hang Ten Systems, Sentient Investment और Simplify Alpha जैसी कंपनियों को बड़े-बड़े कारोबारी ऑर्डर मिल रहे हैं. ये कंपनियां धीरे-धीरे भारत की बड़ी आईटी कंपनियों की जगह ले रही हैं.

मिश्रा ने कहा, “पहले जो सौदे अरबों डॉलर के होते थे, वे अब घटकर करोड़ों डॉलर के रह गए हैं. कुछ कंपनियां तो बस किसी तरह अपना कारोबार चालू रखने की कोशिश कर रही हैं.” एआई से हुए नुकसान की गंभीर तस्वीर पेश करते हुए उन्होंने यह बात कही.

‘अगर सब ठीक चल रहा है, तो उसे बदलने की क्या ज़रूरत’

भारत के सॉफ्टवेयर सेक्टर की क्षमता को सामने लाने का काम एक ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री ने किया, जो मुश्किल से सात महीने तक पद पर रहे.

1991 की शुरुआत में चंद्रशेखर ने STPI योजना (सॉफ्टवेयर टेक पार्क्स ऑफ इंडिया) शुरू की. इसके तहत तेज़ रफ्तार सैटेलाइट कनेक्शन दिए गए, जो देश के पुराने और खराब टेलीफोन नेटवर्क पर निर्भर नहीं थे. इससे भारत से विदेशों में सॉफ्टवेयर सर्विस देना कारोबार के लिहाज़ से फायदेमंद हो गया. पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय में STPI ने भारतीय आईटी सेक्टर को पश्चिमी देशों की कंपनियों के बराबर पहुंचने में मदद की है. भारत से सॉफ्टवेयर का निर्यात 1991 में करीब 15 करोड़ डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2001 तक 600 करोड़ डॉलर से ज्यादा हो गया. इसके बाद वित्त वर्ष 2025-26 तक यह बढ़कर 2,2140 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया.

अपने अच्छे दिनों में, 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में, इंडियन IT सेक्टर वह लहर थी जिसने सभी नावों को ऊपर उठाया. इसने एक एस्पिरेशनल मिडिल क्लास को जन्म दिया जिसके पास रेगुलर डिस्पोजेबल इनकम थी और यह इंडिया के ग्लोबल प्रोजेक्शन के तौर पर काम करता था. इंडस्ट्री एक ऐसे साइकिल में आ गई थी जिसमें डिमांड बनाना, उसे सर्विस देना और फिर अगले साइकिल पर जाना शामिल था.

यह तरीका सभी के लिए अच्छा काम कर रहा था. भारत, युवाओं और उद्योग, सभी को इसका फायदा मिल रहा था. सभी इसी सोच के साथ काम कर रहे थे कि ‘जब सब ठीक चल रहा है, तो उसे बदलने की क्या ज़रूरत है.’

लेकिन अब एआई प्रयोग के लिए इस्तेमाल होने वाले एक साधन से आगे बढ़कर सीधे काम करने वाली तकनीक बन रहा है. ऐसे में भारत की बड़ी आईटी कंपनियां अपने काम करने के तरीकों पर दोबारा विचार कर रही हैं और अपने कारोबार की बुनियाद को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रही हैं. इस दौरान उन्हें एक ऐसे बदलाव का भी ध्यान रखना पड़ रहा है, जिसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है: तकनीकी कौशल कितने समय तक काम का बना रहता है.

उद्योग संगठन HYSEA (हैदराबाद सॉफ्टवेयर एंटरप्राइजेज एसोसिएशन) के सीओओ फणी पट्टामट्टा ने कहा, “अब प्रोग्रामर या डेवलपर की भूमिका पहले जैसी नहीं रह गई है, है न? क्योंकि मशीनें कोड लिख सकती हैं. इसका मतलब है कि आपको ऐसा इंसान बनना होगा, जो मशीन को बताए कि बेहतर कोड कैसे लिखना है.”

उद्योग के जानकारों का कहना है कि मशीन लर्निंग में बड़ी कामयाबी के संकेत 2012 में ही दिखने लगे थे. यह 2023 से काफी पहले की बात है, जब खुद से काम करने वाली एआई इंजीनियरिंग और ऑटोमेशन तकनीकें पहली बार लोगों के सामने आईं.

थिंक टैंक ग्लोबल फोरम फॉर सस्टेनेबल ट्रांसफॉर्मेशन में दूरदर्शिता और नए प्रयोगों के निदेशक श्रीधर शेषाद्री ने कहा, “लेकिन 2018 के बाद ही दूसरी बड़ी टेक कंपनियां, जैसै गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम, इसमें तेज़ी से शामिल हुईं. उस समय OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन और एलन मस्क के बीच AI को लेकर लंबे समय तक और काफी चर्चा में रहने वाला विवाद चल रहा था.”

“उन्हें एहसास हुआ कि कुछ ‘बहुत बड़ा’ हो रहा है.”

माइक्रोसॉफ्ट ने सितंबर 2023 में Copilot लॉन्च किया. इसके कुछ ही महीनों बाद, उसी साल दिसंबर में गूगल ने अपने एआई टूल्स में जैमिनाई पेश किया. इससे सॉफ्टवेयर उद्योग में बदलाव का रास्ता खुला. अब केवल कोड पूरा करने वाले साधारण टूल्स की जगह ऐसे एआई एजेंट आने लगे, जो अपने आप काम कर सकते हैं. ये एजेंट किसी सॉफ्टवेयर के पूरे फीचर बना सकते हैं, कोड में बदलाव के प्रस्ताव (पुल रिक्वेस्ट) तैयार कर सकते हैं और सॉफ्टवेयर की जांच करने या उसमें गड़बड़ी ठीक करने जैसे काम भी कर सकते हैं.

यह सब देखकर भारतीय आईटी कंपनियों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा. कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने बड़े ऑर्डर मिलने की उम्मीद में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी पर रखा था, लेकिन अब अचानक उन्होंने लाखों कर्मचारियों को नौकरी से निकालना शुरू कर दिया.

सितंबर 2025 में खत्म हुई तिमाही में टीसीएस ने अपने कर्मचारियों की संख्या करीब 20,000 घटा दी. कंपनी के मुताबिक, इसमें अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारी और कर्मचारियों को काम दिए बिना रखने से जुड़े नियमों को सख्त करना भी शामिल था. इसके अलावा, अनुमान है कि भारत में काम कर रहे ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) ने इस साल कम से कम 4,000 से 5,000 लोगों को नौकरी से निकाला है.

पट्टामट्टा ने कोविड के बाद बड़े पैमाने पर भर्ती की ओर इशारा करते हुए कहा, “2010-12 से लेकर 2020 तक उद्योग की बढ़त लगभग रुक गई थी और मांग स्थिर हो रही थी. अचानक 2021 से हमने जरूरत से ज्यादा लोगों को नौकरी पर रखना शुरू कर दिया.”

हालांकि, कई लोग अब भी कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने की वजह एआई के कारण हुए बदलाव के बजाय कंपनियों की पुरानी गलतियों को सुधारने की कोशिश को मानते हैं.

बेंगलुरु की विशेषज्ञ कर्मचारियों की भर्ती करने वाली कंपनी Xpheno के सह-संस्थापक कमल करंथ ने कहा, “2026 तक एआई को बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को नौकरी से निकालने या भर्ती के तरीके में बदलाव करने की साफ वजह के तौर पर नहीं देखा गया है. फिलहाल, बड़ी कंपनियों में एआई का इस्तेमाल अभी इतना विकसित नहीं हुआ है कि उसने इंजीनियरों की नौकरियों की जगह ले ली हो या बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरी से निकालने की नौबत आ गई हो.”

करंथ ने कहा कि अब तक नौकरी से निकाले जाने के ज्यादातर मामलों की वजह “मुनाफे पर दबाव, खर्चों में कटौती या बाजार की खराब स्थिति के कारण कारोबार में बदलाव करना है, न कि सीधे तौर पर एआई.”

Xpheno के मुताबिक, अक्टूबर में भारत में आईटी क्षेत्र की 1.23 लाख सक्रिय नौकरियां थीं, जो पिछले 18 महीनों में सबसे ज्यादा थीं. इनमें से 55 प्रतिशत नौकरियां मध्यम से वरिष्ठ स्तर के कर्मचारियों के लिए थीं, जबकि सिर्फ 12 प्रतिशत नौकरियां नए लोगों के लिए थीं. आईटी सर्विस के क्षेत्र में 66,000 सक्रिय नौकरियां थीं, जो पिछले साल के मुकाबले 57 प्रतिशत ज्यादा थीं.

हालांकि, अक्टूबर के नौकरी के मासिक जॉबस्पीक इंडेक्स के मुताबिक, आईटी और सॉफ्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र में भर्ती पिछले साल के मुकाबले 4 प्रतिशत घट गई.

इसके अलावा, Xpheno द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में 15,000 से ज्यादा आईटी प्रोफेशनल अमेरिका से भारत लौटे. इस साल जून तक ही यह संख्या बढ़कर 7,500 हो गई थी.

करंथ ने कहा कि आईटी क्षेत्र में तकनीक और इंजीनियरिंग से जुड़े मुख्य कामों में अब भी सबसे ज्यादा मांग है. इनसे जुड़ी नौकरियां कुल सक्रिय रिक्तियों का करीब 50 प्रतिशत हैं.

AI ने बदले नियम

यह पूरी कहानी सिर्फ नौकरियां जाने की नहीं है. यह उस सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री की कहानी है, जिसने तीन दशकों तक अपना दबदबा बनाए रखा, लेकिन फिर मौका गंवा दिया और अब अचानक दूसरों की बराबरी करने के लिए तेज़ी से भाग रहा है.

कर्मचारियों की घटती संख्या से जुड़ी उलझन से आगे बढ़कर देखें, तो एआई ने चुपचाप दुनिया के बैक ऑफिस के तौर पर भारत की दशकों पुरानी पहचान खत्म होने की शुरुआत कर दी है. भारत को मिलने वाले सस्ते कर्मचारियों के फायदे और दुनिया भर में विदेशों से काम कराने के पुराने मॉडल की बुनियाद को अब खतरा है. इसकी वजह यह है कि इंडस्ट्री अब कर्मचारियों की कम लागत के बजाय उनकी क्षमताओं और ज्ञान का फायदा उठाने की ओर बढ़ रहा है. भारतीय उद्योग के जानकार इसे “एल्गोरिदम के दम पर फायदा उठाना” (Algorithmic Arbitrage) कह रहे हैं. यह सिर्फ अपने मुनाफे को बचाने के लिए ऑटोमेटेड प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढ़ाने और पुराने फायदे की जगह नई तकनीक लाने से कहीं ज्यादा जटिल बदलाव है.

‘AI for Everyone’ किताब के लेखक शेषाद्री ने कहा, “ऑफिस में काम करने वाले सॉफ्टवेयर कर्मचारियों को दूसरे देशों की कंपनियों के लिए उपलब्ध कराने का कारोबार पूरी तरह बदल गया है.”

पहले सॉफ्टवेयर सर्विस देने वाली कंपनियां अपने विदेशी ग्राहकों से कर्मचारियों के काम करने के कुल घंटों के हिसाब से पैसे लेती थीं, लेकिन अब यह तरीका बदलकर तय कीमत पर काम करने का हो गया है. उदाहरण के लिए अगर अमेरिका या यूरोप की कोई कंपनी किसी भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनी को ऊर्जा की लागत में 30 प्रतिशत बचत करने वाला कोड लिखने का काम देती है और भारतीय कंपनी यह नतीजा हासिल कर लेती है, तो उसे पहले से तय रकम मिलती है. यह रकम कामयाब नतीजे के आधार पर तय होती है, न कि इस आधार पर कि भारतीय कोड लिखने वाले कर्मचारियों ने कितने घंटे काम किया.

सॉफ्टवेयर कर्मचारियों को कोड लिखते समय या नुकसान पहुंचाने वाले सॉफ्टवेयर (मैलवेयर) को ठीक करते समय डिजिटल ट्विन यानी एआई एजेंट का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे आज जिस काम को करने के लिए 20 लोगों की ज़रूरत पड़ती है, उसे 10 इंसान और 10 डिजिटल ट्विन मिलकर कर सकते हैं.

Cognizant के एक सीनियर एचआर और टैलेंट हंट अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा, “यह हमारे मुनाफे को नुकसान पहुंचाने का सबसे पक्का तरीका है. किसी इंसान के काम की तुलना लगातार एआई एजेंट के काम से करना दुखद है. एचआर प्रोफेशनल के तौर पर हम अक्सर अपने सीनियर्स से कहते हैं कि संतरे और सेब की तुलना करना बंद करें.”

इन बदलावों के सबूत अगस्त में जारी Fitch Ratings की रिपोर्ट में भी दिए गए हैं. तकनीकी उद्योग के व्यापक विश्लेषण वाली इस रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी गई है कि जैसे-जैसे दुनिया की बड़ी कंपनियां सॉफ्टवेयर बनाने के काम में ऑटोमेटेड प्रक्रियाओं का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं, वैसे-वैसे विदेशों में इंजीनियरों की बड़ी टीमें रखने के पीछे का आर्थिक फायदा कम होता जा रहा है.

इस साल अगस्त में जारी Fitch की रिपोर्ट में भी इन बदलावों के सबूत हैं. तकनीकी उद्योग के अपने व्यापक विश्लेषण में Fitch कहता है, “भारतीय आईटी सर्विस देने वाली कंपनियां दुनिया भर में एआई के जरिए बड़े कारोबारी बदलावों का नेतृत्व करने की तैयारी कर रही हैं. हालांकि, निकट भविष्य में ज़रूरत के हिसाब से होने वाला तकनीकी खर्च स्थिर बना हुआ है. ग्राहकों की ओर से देखें तो, दुनिया की बड़ी कंपनियां ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर प्रक्रियाओं का इस्तेमाल कर रही हैं. ऐसे में विदेशों में इंजीनियरों की बड़ी टीमें रखने के पीछे का आर्थिक फायदा कम होता जा रहा है.”

AI का डर

सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब ग्राहकों ने कर्मचारियों के काम के घंटों के हिसाब से पैसे देने के बजाय प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन लेना शुरू कर दिया. महिंद्रा ग्रुप के पूर्व चीफ डिजिटल ऑफिसर जसप्रीत बिंद्रा ने कहा कि तकनीक खरीदने के लिए पैसे खर्च करने का तरीका तेज़ी से बदल रहा है. पहले कंपनियां कर्मचारियों के काम पर ज्यादा खर्च करती थीं, लेकिन अब उनका खर्च तकनीक पर ज्यादा हो रहा है.

उन्होंने समझाया, “कंपनियों के बजट में तेज़ी से बदलाव हो रहा है. वे हाथ से काम करने वाले कर्मचारियों पर खर्च कम कर रही हैं और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई एजेंट और कंपनियों के लिए एआई सब्सक्रिप्शन पर ज्यादा पैसा लगा रही हैं. कई बड़े कारोबारी प्रोजेक्ट्स में तकनीकी टीमों का आकार घटाने से जो पैसे बच रहे हैं, वे पूरी तरह जीपीयू और क्लाउड पर एआई चलाने के तेज़ी से बढ़ते खर्च में खत्म हो रहे हैं.”

दूसरों से अलग, बिंद्रा इस बात से सहमत नहीं हैं कि भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां सिर्फ ‘AI के डर’ की शिकार हैं.

वह मानते हैं कि एआई की वजह से कारोबार करने के दूसरे तरीके सामने आए हैं, लेकिन उन्होंने कहा कि काफी नुकसान इसलिए हुआ, क्योंकि “भारतीय सॉफ्टवेयर सर्विस देने वाली कंपनियां बदलाव का विरोध कर रही थीं और शुरुआती सालों में लापरवाह बनी रहीं. उस समय एआई सिर्फ कंपनियों के बड़े अधिकारियों की बैठकों में चर्चा का विषय था.”

मिश्रा ने कहा कि मार्केट में हर कुछ महीनों में एआई के नए रूप आ रहे हैं. इससे एआई के समाधान न सिर्फ महंगे हो रहे हैं, बल्कि कुछ समय बाद बेकार भी हो जा रहे हैं. यही वजह है कि कंपनियां यह तय नहीं कर पा रही हैं कि उन्हें कौन-सा टूल इस्तेमाल करना चाहिए या मार्केट में आया कोई नया एआई टूल पहले वाले से बेहतर है या नहीं.

यह साफ है कि समस्या मौजूद है. लेकिन भारतीय कंपनियां इसका सामना कैसे कर रही हैं?

आखिरी बात

भारतीय आईटी कंपनियों की मौजूदा रणनीति यह है कि वे बाकी दुनिया से पहले तेज़ी से बदलते हालात को समझें और आगे निकल जाएं. ठीक वैसे ही, जैसे उन्होंने Y2K की समस्या के समय किया था. अब वे ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही हैं, जिसमें कोडिंग कम और एआई को काम में शामिल करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा.

इस बदलाव के पीछे सोच यह है कि बिल्कुल नए सिरे से कोडिंग करना आसान और तेज होता है, जबकि पहले से बने सॉफ्टवेयर में बदलाव करना ज्यादा मुश्किल होता है. आगे भी बड़ी कंपनियां भारतीय आईटी कंपनियों की सर्विस लेंगी, लेकिन कोडिंग के लिए कम और एआई को अपने काम में शामिल करने के लिए ज्यादा.

इंडस्ट्री के एक अनुभवी व्यक्ति ने कहा, “कंपनियों के अंदर काम करने के तरीके बहुत जटिल होते हैं. एआई को लागू करना आसान नहीं है. इसके लिए उन्हें मदद की ज़रूरत पड़ेगी.”

अमेरिका में रहने वाले एआई के नियमों और निगरानी के विशेषज्ञ रोहन शर्मा ने कहा कि एआई को कंपनियों के काम में शामिल करने से भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार खुल गया है. इसमें नियमों का पालन सुनिश्चित करना, जोखिम का प्रबंधन करना, तय नियमों के मुताबिक काम करना और यह भरोसा दिलाना शामिल है कि एआई सही तरीके से काम कर रहा है. शर्मा ISO/IEC की एआई मानक समिति में अमेरिका के प्रतिनिधि हैं और एआई के जोखिम व जवाबदेही पर OECD.AI के विशेषज्ञ समूह के सदस्य भी हैं.

उन्होंने कहा, “और जो भी यह काम कर सकेगा, उसे फायदा होगा, क्योंकि अगले दो से तीन साल में मार्केट में असली नौकरियां इसी सेक्टर में आएंगी. अगर भारत की बड़ी ऑफशोर आईटी कंपनियां इस मौके का फायदा उठा सकीं, तो उन्हें अच्छे पैसे वाले कॉन्ट्रैक्ट मिल सकते हैं. इसके लिए उन्हें खुद एआई बनाने की ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि हम दुनिया की सबसे आगे चल रही एआई लैब की बराबरी कभी नहीं कर पाएंगे और अपने लिए एआई विकसित नहीं कर पाएंगे.”

भारतीय आईटी कंपनियों ने भी एआई के क्षेत्र में सबसे आगे चल रही कंपनियों के साथ साझेदारी शुरू कर दी है. टीसीएस ने ओपनएआई के साथ और इंफोसिस ने एंथ्रोपिक के साथ समझौता किया है. विप्रो ने गूगल क्लाउड के साथ अपनी साझेदारी बढ़ाई है, ताकि “कंपनियों में जेमिनी एंटरप्राइज और खुद काम करने वाले एआई एजेंट का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ाया जा सके.” दूसरी ओर, एआई बनाने वाली सबसे आगे की कंपनियों ने भारत के मार्केट के लिए अपनी कीमतें घटा दी हैं. कुछ सर्विस मुफ्त में भी दी जा रही हैं, क्योंकि उन्हें डेटा की ज़रूरत है.

शुरुआत में एआई टूल सब्सक्रिप्शन के आधार पर मिलते थे. भारतीय आईटी कंपनियों ने इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया. इससे खर्च बढ़ गया, क्योंकि एआई में इस्तेमाल होने वाले टोकन महंगे हैं. इंडस्ट्री से जुड़े लोग मानते हैं कि अब किसी एक कर्मचारी की उत्पादकता की तुलना में पूरी कंपनी की उत्पादकता को देखकर ही मुनाफे का हिसाब तय नहीं किया जा सकता. ऐसा तब है, जब कंपनियों को यह एहसास हो चुका है कि कोडिंग से जुड़ी बहुत सारी नौकरियां एआई के हाथ में जा सकती हैं.

इंडस्ट्री इस बड़े बदलाव के लिए तैयार हो रहा है. इसमें कोई शक नहीं कि एआई ने तकनीकी कर्मचारियों को लगातार नए स्किल्स सीखने की ज़रूरत वाले ऐसे दौर में पहुंचा दिया है, जिसका कोई अंत नज़र नहीं आता. ऐसा उस नौकरी मार्केट में हो रहा है, जहां कुल एक्टिव जॉब्स में से हर दो में एक जॉब अब भी आईटी सेक्टर से जुड़ी है.

बैंकिंग कंपनी HSBC के अमेरिकी टेक रिसर्च प्रमुख स्टीफन बर्सी के नेतृत्व में लिखे गए तीन हिस्सों वाले एक चर्चा में रहे शोधपत्र में लेखकों ने तर्क दिया कि “दुनिया की GDP के बड़े हिस्से का उत्पादन करने वाली कंपनियों के भीतर एआई का इस्तेमाल करने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में खुद एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर कंपनियां हैं.”

इस शोधपत्र का शीर्षक था ‘सॉफ्टवेयर पहले से ही AI पर हावी हो रहा है’ (Software is already eating AI). इसमें एक बड़ी बात कही गई: AI का भविष्य “कुल मिलाकर सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म के अधीन रहना है.”

ऐसी स्थिति में भारतीय आईटी सेक्टर को उम्मीद होगी कि वह पहले से बने सॉफ्टवेयर में बदलाव करने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए अपनी विशेषज्ञता बढ़ाएगा. इससे वह एआई के दौर में अपने कारोबार को नए तरीके से आगे बढ़ा सकेगा.

एआई के दबाव ने भारतीय आईटी कंपनियों को आखिरकार उस बदलाव की ओर बढ़ने पर मजबूर कर दिया है, जिसे वे दशकों से टालती आ रही थीं. अब उद्योग को इस बदलाव की रफ्तार से कदम मिलाने में मुश्किल हो रही है. भारत की ज्यादातर बड़ी आईटी कंपनियां नए कर्मचारियों को इस कमी को पूरा करने के लिए 14 हफ्ते तक के ट्रेनिंग प्रोग्राम दे रही हैं. कमाई का पुराना तरीका बदल रहा है, इसलिए कंपनियां अपने कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने और उन्हें एआई के साथ काम करने के लिए तैयार करने में तेजी से जुटी हैं.

Infosys ने अपनी सालाना एकीकृत रिपोर्ट में कहा, “जनरेटिव AI फ्रंट-एंड डेवलपर और सॉफ्टवेयर की जांच करने वाले कर्मचारियों जैसी 9.2 करोड़ नौकरियों की जगह ले सकता है, लेकिन यह डेटा को व्यवस्थित करने वाले कर्मचारियों, एआई इंजीनियरों और एआई का नेतृत्व करने वाले लोगों के लिए करीब 17 करोड़ नई नौकरियां पैदा करेगा.”

पट्टामट्टा ने कहा, “किसी कौशल के काम आने की अवधि लगातार घट रही है. आज यह कुछ महीनों की रह गई है. लोगों की चिंता की एक वजह यह भी है. असल में जो चीज बदलेगी, वह है मशीन के साथ मिलकर काम करने की हमारी क्षमता.”

विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) की नौकरियों के भविष्य पर आई ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में आईटी सर्विस क्षेत्र के 93 प्रतिशत काम एआई से प्रभावित हो सकते हैं. भारत में सर्वे में शामिल 88 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि एआई और सूचना को प्रोसेस करने वाली तकनीकें कारोबार में बदलाव लाने वाला प्रमुख तकनीकी रुझान हैं. पूरी दुनिया में यह औसत 86 प्रतिशत था. इसके अलावा, भारत की 86 प्रतिशत कंपनियों ने कहा कि वे अपने सभी कर्मचारियों को एआई के साथ बेहतर तरीके से काम करने के लिए नए कौशल सिखा रही हैं और उनकी मौजूदा क्षमताएं बढ़ा रही हैं.

एआई के नियमों और निगरानी पर दो किताबें लिख चुके रोहन शर्मा इसे एक चेतावनी मानते हैं. उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच इस हद तक जुड़ी हुई है कि वहां कई स्नातक पाठ्यक्रमों में उद्योग के लोग तय करते हैं कि छात्रों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए.

शर्मा ने कहा, “भारत भी इस तरीके को अपना सकता है, अगर उसके शैक्षणिक पाठ्यक्रम में कुछ लचीलापन हो और वह अमेरिका के किसी मिले-जुले मॉडल को अपना सके. सिंगापुर में निजी और सरकारी क्षेत्र मिलकर काम कर रहे हैं. इस तरह की व्यवस्था में लागत पर सब्सिडी दी जाती है और नए कारोबार शुरू करने वाली कंपनियों के पूरे माहौल को बढ़ावा दिया जाता है.”

किसी भी तरह देखें, दुनिया बदल रही है और भारतीय आईटी सेक्टर बदलाव की कई जरूरी सीढ़ियां चढ़ने से चूक गया हो सकता है. भारत के लाखों इंजीनियरिंग स्नातकों को इस नए दौर में काम करने का तरीका सीखने से पहले काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

शर्मा ने कहा, “अब बात सिर्फ कोई नई प्रोग्रामिंग भाषा सीखने की नहीं है. अब आपको यह सीखना है कि डेटाबेस में नेटवर्किंग कैसे की जाती है. शुरुआती स्तर के इंजीनियरों को यह नहीं पता कि तकनीक के अलग-अलग हिस्से कैसे काम करते हैं या यह उद्योग किस तरह चलता है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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