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Tuesday, 28 July, 2026
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भारत के युवाओं को साइंस, क्लीन एनर्जी और फास्ट ट्रेनों पर सवाल पूछने चाहिए

क्या भारत को ऐसे लोग चाहिए जो सिर्फ एल्गोरिदम के पीछे भागते रहें और तेज़ आवाज़ में रील्स देखते रहें? या फिर ऐसे मेहनती युवा, जो दुनिया के विज्ञान और तकनीक का भविष्य तय करें.

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पिछले हफ्ते की बड़ी खबरों के बीच विज्ञान और तकनीक (STEM) में भारतीय युवाओं की बड़ी कामयाबियां लोगों की नज़रों से छूट गईं.

इस महीने की शुरुआत में कोलंबिया में हुई 56वीं इंटरनेशनल फिजिक्स ओलंपियाड (IPhO) 2026 में भारत के छात्रों ने शानदार प्रदर्शन किया. सबसे खास बात यह रही कि भारत के सभी पांचों छात्रों ने गोल्ड मेडल जीता. इस प्रतियोगिता में 87 देशों के 381 छात्रों ने हिस्सा लिया और भारत संयुक्त रूप से दुनिया में पहले स्थान पर रहा.

पुणे के कनिष्क जैन, इंदौर के ऋद्धेश अनंत बेंदाले, नई दिल्ली के ऋषित गर्ग, मुंबई के श्रेष्ठ सुरैया और अहमदाबाद के स्वरित जोशी ने पूरे देश का नाम रोशन किया.

भारत में ओलंपियाड कार्यक्रम होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मिलकर चलाते हैं. यह कार्यक्रम परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत चलता है, जो विज्ञान के प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने में मदद करता है.

इसी दौरान चीन के शंघाई में हुई 67वीं इंटरनेशनल मैथमैटिकल ओलंपियाड 2026 में भी भारत के छात्रों ने शानदार प्रदर्शन किया. भारत ने 2 गोल्ड और 4 सिल्वर मेडल जीते. इस प्रतियोगिता में 117 देशों के 666 छात्र शामिल हुए और भारत सातवें स्थान पर रहा.

जुलाई में भारत ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की. निजी एयरोस्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने भारत का पहला पूरी तरह स्वदेशी विकसित रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया. इसके साथ ही भारत दुनिया का तीसरा देश बन गया, जिसने बिना किसी सरकारी एजेंसी के बनाए गए रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया.

इसके बाद भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन ने हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच अपनी पहली यात्रा पूरी की. इसके साथ भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया, जहां रेलवे से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए हाइड्रोजन ट्रेनें चलाई जा रही हैं.

आज एआई के दौर में विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) की ये उपलब्धियां इतनी ज़रूरी क्यों हैं? यही सवाल देश के नीति-निर्माताओं, शिक्षकों, प्रभावशाली लोगों और माता-पिता को खुद से पूछना चाहिए.

STEM ही AI की असली नींव है

एआई ने पढ़ाई को कई तरह से आसान बना दिया है, लेकिन हाल ही में छात्रों और उनके माता-पिता से बात करते समय मुझे लगा कि कई छात्र एआई पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो गए हैं. दुनिया की कई यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स एआई से जवाब लिखवा रहे हैं, पढ़ाई कर रहे हैं और यहां तक कि होमवर्क भी करवा रहे हैं.

अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर ने इसे परखने के लिए परीक्षा में एक छिपा हुआ निर्देश डाल दिया. उसमें एआई से कहा गया था कि औद्योगिक क्रांति पर जवाब लिखते समय “मैडागास्कर” के बारे में भी लिखे. 35 में से 32 छात्र उस हिस्से में फेल हो गए क्योंकि उन्होंने AI का इस्तेमाल किया था.

एक दूसरे मामले में अमेरिका की एक मशहूर यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ने देखा कि मिड-टर्म परीक्षा में छात्रों के नंबर अचानक बहुत ज्यादा आने लगे. इसके बाद उन्होंने घर से होने वाली परीक्षा बंद कर दी और फिर से क्लास में बैठकर परीक्षा लेना शुरू कर दिया.

एआई अब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है और आगे भी रहेगा, लेकिन एआई की असली बुनियाद गणित है. कैलकुलस, प्रायिकता (Probability) और रैखिक बीजगणित (Linear Algebra) की मदद से एआई डेटा समझता है, सीखता है और अपनी गलतियां सुधारता है. अगर आपको गणित की अच्छी समझ है, तो आप एआई के जवाबों की जांच कर सकते हैं, उसकी गलतियां पकड़ सकते हैं और यह भी समझ सकते हैं कि कहीं उसने गलत या मनगढ़ंत जानकारी तो नहीं दी. किसी भी समस्या को सही तरीके से समझना और उसका हल निकालना भी गणित से ही संभव होता है.

इसी तरह फिजिक्स हमें बताती है कि असली दुनिया कैसे काम करती है. यह समझाती है कि प्रकृति के नियम क्या हैं और चीजें कैसे चलती हैं. आसान भाषा में कहें तो असली दुनिया और डिजिटल दुनिया एक जैसी नहीं होती.

वैज्ञानिक सिमुलेशन (Scientific Simulations) की मदद से मशीन लर्निंग को असली दुनिया से जोड़ा जाता है. इसका इस्तेमाल मौसम की भविष्यवाणी, रोबोटिक्स और तरल पदार्थों (Fluid Dynamics) से जुड़े शोध में होता है.

इसीलिए एआई के दौर में भी गणित और फिजिक्स की पढ़ाई बहुत ज़रूरी है. यही विषय हमें सही सोच, तर्क करने की क्षमता और नई चीजें बनाने की समझ देते हैं. एआई हमारी मदद कर सकता है, लेकिन नई खोज और नए समाधान इंसान की समझ और सोच से ही निकलेंगे.

भारतीय युवाओं को सिर्फ बनाना नहीं, बल्कि सोचना भी सिखाना होगा

आज एआई को लेकर बहुत उत्साह है. कई युवा कोडिंग, ऐप बनाने और एआई से जुड़े स्टार्टअप की तरफ जा रहे हैं.

मुझे कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी जाने का मौका मिला है, जहां मुझे छात्रों से बात करने और उन्हें पुरस्कार देने के लिए बुलाया जाता है. आज लगभग हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी ने एआई से जुड़े नए कोर्स शुरू कर दिए हैं, जैसे BTech in AI and Machine Learning या BTech in AI with Prompt Engineering, लेकिन सवाल यह है कि इन कोर्सों में छात्र आखिर सीख क्या रहे हैं? ये कोर्स काम के हैं, लेकिन क्या यही असली STEM शिक्षा है?

एआई की असली ताकत सिर्फ उसे इस्तेमाल करने में नहीं है. उसकी असली नींव गणित, फिजिक्स और कंप्यूटर साइंस है. इन्हीं की वजह से एआई संभव हुआ है.

भारत हमेशा से गणित में मजबूत रहा है. दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों के कई सीईओ आईआईटी से निकले हैं, जैसे सुंदर पिचाई, अरविंद कृष्णा, संजय मेहरोत्रा और निकेश अरोड़ा. इन लोगों ने एआई आने से बहुत पहले कंप्यूटर की दुनिया में अपनी पहचान बनाई थी.

अगर भारत को एआई की दौड़ में आगे रहना है, तो सिर्फ विदेशी कंपनियों के एआई मॉडल इस्तेमाल करना काफी नहीं होगा. हमें अपने एआई सिस्टम और अपने बड़े भाषा मॉडल (LLMs) भी बनाने होंगे. युवाओं को सिर्फ यह नहीं सीखना चाहिए कि किसी सिस्टम का इस्तेमाल कैसे करें, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि वह सिस्टम कैसे और क्यों काम करता है.

जो छात्र कैलकुलस, रैखिक बीजगणित (Linear Algebra), प्रायिकता (Probability), विद्युत-चुंबकत्व (Electromagnetism), ऊष्मागतिकी (Thermodynamics) या क्वांटम मैकेनिक्स अच्छी तरह समझता है, वह सिर्फ एआई टूल इस्तेमाल नहीं करेगा, बल्कि भविष्य की नई वैज्ञानिक खोजों में भी योगदान दे सकेगा.

कोविड के दौरान मेरी मुलाकात एक आईआईटी छात्र से हुई थी. उसने बिना किसी स्वार्थ के अपने थ्रीडी प्रिंटर से डॉक्टरों और नर्सों के लिए सुरक्षा शील्ड बनाई. उसने रोबोटिक्स की मदद से यूवी सैनिटाइजेशन मशीनें भी बनाईं, हमने इन चीज़ों का इस्तेमाल एनडीएमसी के कुछ अस्पतालों में किया. अब वह रोबोटिक्स के जरिए बच्चों में नई चीजें सीखने की जिज्ञासा बढ़ाने के लिए एक एडटेक सिस्टम बना रहा है.

वहीं Agentic AI ऐसे ऑटोमेटिक सिस्टम बनाता है, जो कोडिंग और LLMs की मदद से रोबोट की तरह कई काम खुद कर सकते हैं. भविष्य में जब एआई सिर्फ एक क्लिक पर कई काम करने लगेगा, तब सोचने, तर्क करने, नई खोज करने और नए समाधान निकालने की क्षमता ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत होगी. इसलिए स्कूलों और कॉलेजों में STEM शिक्षा को मजबूत करना बहुत ज़रूरी है.

नई सोच और नई खोज करने वाली पीढ़ी तैयार करनी होगी

जैसे-जैसे भारत विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमें सिर्फ तकनीक में नहीं, बल्कि उसे बनाने वाले युवाओं के दिमाग में निवेश करना होगा. क्या भारत को सिर्फ कोडर चाहिए, या ऐसे लोग जो दिनभर रील देखते रहें और एल्गोरिद्म के पीछे भागते रहें? नहीं. देश को ऐसे मेहनती और जिज्ञासु युवाओं की ज़रूरत है, जो दुनिया में विज्ञान और तकनीक का भविष्य तय करें.

मुझे यह जानकर खुशी हुई कि स्काईरूट एयरोस्पेस के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की औसत उम्र सिर्फ 28 साल है. युवा भारत को ऐसे लोग चाहिए जो नई राह दिखाएं, न कि सिर्फ दूसरों के पीछे चलें. मुझे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक बात याद आती है. उन्होंने छात्रों से कहा था कि अगर वे मेहनत नहीं करेंगे, तो बेंगलुरु जैसे शहरों के छात्र उनसे आगे निकल जाएंगे. उस समय “Bangalored” शब्द काफी चर्चा में था.

इसी सोच से मैं अपनी एक पुरानी बात फिर दोहराती हूं—अगर डेटा नया तेल है, तो सोशल मीडिया नया अफीम है. हमें अपनी नई पीढ़ी को भविष्य के लिए तैयार करना होगा और अपनी नीतियों को आने वाले समय की ज़रूरतों के हिसाब से बनाना होगा. हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए, जो बच्चों में सवाल पूछने की आदत डाले, नई सोच को बढ़ावा दे और बचपन से ही गणित, भौतिकी और इंजीनियरिंग की मजबूत नींव रखे.

हमारा लक्ष्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना होना चाहिए, जो AI की मदद के बिना भी किसी गणितीय प्रमेय (Theorem) को साबित कर सके या जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए नए और पर्यावरण के अनुकूल (Biodegradable) पदार्थ बना सके.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में लागू की गई थी. यह 21वीं सदी की भारत की पहली शिक्षा नीति है, जिसका मकसद पूरी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाना और खास तौर पर STEM शिक्षा को मजबूत करना है. 1947 में देश को आजादी के लिए क्रांति की जरूरत थी. उसी तरह विकसित भारत 2047 के लिए छात्रों और गांव-गांव तक विज्ञान और तकनीक की नई क्रांति की जरूरत है.

करके सीखना—जैसे The Boy Who Harnessed the Wind की सच्ची कहानी, जिसमें अफ्रीका के एक लड़के ने खुद सीखकर अपने गांव के लिए पवनचक्की बनाई—युवाओं को प्रेरित करना चाहिए कि वे जलवायु संकट, वायु प्रदूषण और सभी के लिए साफ पानी जैसी समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान खोजें.

विज्ञान, इंजीनियरिंग, थर्मोडायनेमिक्स और तेज रफ्तार ट्रेनें—यही वे विषय हैं, जिन पर देश के युवाओं को सवाल पूछने चाहिए. और हमें उनकी सोच को ऐसी दिशा देनी चाहिए, जिससे वे हमेशा सीखते रहें, नई खोज करें और देश को आगे बढ़ाएं.

मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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